संस्कृतिसिनेमा ‘The Holy Wives’ डॉक्यूमेंट्री जिसने धर्म और जाति के नाम पर हो रहे यौन शोषण को उजागर किया

‘The Holy Wives’ डॉक्यूमेंट्री जिसने धर्म और जाति के नाम पर हो रहे यौन शोषण को उजागर किया

यह डॉक्यूमेंट्री तीन अलग-अलग समुदायों के जीवन की कहानी को सामने लाती है, जिन्होंने इस देश में जाति आधारित यौन शोषण का सामना किया। यह फ़िल्म कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में मौजूद धार्मिक यौन शोषण और जातिगत यौन शोषण पर आधारित है

धर्म और परंपराओं के नाम पर हमारा समाज सदियों से हर हिंसा, बलात्कार और शोषण को सही ठहराता आया है, जिसका सबसे अधिक सामना महिलाओं को करना पड़ा है। यह डॉक्यूमेंट्री महिलाओं के उसी दर्द को बयां करती है। ‘The Holy Wives‘ यानी पवित्र पत्नियां या धार्मिक पत्नियां जो देवदासी और मथम्मा के नाम से जानी जाती हैं। ‘द होली वाइव्स’ एक दस्तावेज़ी फ़िल्म है जो रितेश शर्मा द्वारा साल 2010 में बनाई गई। यह डॉक्यूमेंट्री उन महिलाओं के जीवन पर आधारित है जिनका धर्म, परंपराओं और जाति के नाम पर यौन शोषण किया गया। 

यह डॉक्यूमेंट्री तीन अलग-अलग समुदायों के जीवन की कहानी को सामने लाती है, जिन्होंने इस देश में जाति आधारित यौन शोषण का सामना किया। यह फ़िल्म कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में मौजूद धार्मिक यौन शोषण और जातिगत यौन शोषण पर आधारित है, जिसे हम आज मानव तस्करी से जोड़कर देख सकते हैं। यह फ़िल्म इन तीन राज्यों के आसपास केंद्रित है जो तीन अलग-अलग समुदायों पर रोशनी डालती है, अर्थात कर्नाटक में देवदासी, आंध्र प्रदेश में मथम्मा और मध्य प्रदेश की बेड़नियां जो लगातार धर्म और जाति के नाम पर शोषित हो रही हैं। डॉक्यूमेंट्री 2009 के सर्वे यानी देवदासी, मथम्मा और बेड़नी समाज की विभिन्न महिलाओं और बच्चियों की कहानियों के माध्यम से उनकी समस्याओं को बयां करती चलती है। सबसे पहले फ़िल्म उत्तरी कर्नाटक के सौंदत्ती क्षेत्र में धर्म के नाम पर शोषित देवदासियों की स्थिति को दिखाती है।

देवदासी प्रथा के अंतर्गत कुंवारी लड़कियों को धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर ईश्वर के साथ विवाह कर मंदिरों में दान दे दिया जाता है, जिसके बाद वह देव की दासी या पत्नी बन जाती है। देवदासी यानी सर्वेंट ऑफ गॉड। देवदासी प्रथा का 700 से 1200 के बीच काफी विस्तार हुआ। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पहली बार देवदासी शब्द देखने को मिलता है। माने लगभग छठी सदी से आज तक ये परंपरा कहीं न कहीं छोटे पैमाने के रूप में ही सही पर मौजूद है।

और पढ़ें: देवी को पूजने वाले देश में औरतों के दंश दर्शाती फ़िल्म

यह डॉक्यूमेंट्री तीन अलग-अलग समुदायों के जीवन की कहानी को सामने लाती है, जिन्होंने इस देश में जाति आधारित यौन शोषण का सामना किया। यह फ़िल्म कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में मौजूद धार्मिक यौन शोषण और जातिगत यौन शोषण पर आधारित है

मान्यता थी कि नाबालिग लड़कियों को मंदिर में देवदासी प्रथा के नाम पर दान करके परिवार की समस्याएं खत्म हों जाएंगी और ये मान्यता मंदिर के ढोंगी पंडितों के द्वारा फैलाई जा रही थी। देवदासी बनने के बाद वे मंदिरों के पंडों की संपत्ति के अलावा और कुछ नहीं थीं। जहां मंदिरों के पण्डे यानी पुजारी उन देवदासियों का शारीरिक शोषण करते थे इसी कारण उन्हें ‘वेश्या’ भी कहा जाने लगा। इसाबेला जो एक उत्तरी कर्नाटक, धारवाड़ क्षेत्र की सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनका कहना है, “देवदासी बनने के बाद सबसे पहले उसके साथ गांव का मुखिया सोता है, अमीर आदमियों का उनके शरीर पर अधिकार होता था।” आगे वे कहती हैं कि उनके बच्चों का कोई पिता बनने को तैयार नहीं था। आज ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिन्हें नहीं पता कि उनके पिता कौन हैं। ऐसे बच्चे उत्तरी कर्नाटक के सौंदत्ती, बेड़गम, धारवाड़, हावेरी और उत्तर कन्नड़ जिले में देखे जा सकते हैं।

वेबसाइट न्यूज़ ट्रैक के एक लेख के अनुसार, देवदासी प्रथा के अंतर्गत लगभग 90 फीसदी लड़कियां अनुसूचित जाति और जनजाति से ताल्लुक रखती हैं यानी जो उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अंतर्गत अछूत होने के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं लेकिन धर्म के नाम पर देवदासी के रूप में उपभोग की जा सकतीं हैं, लेकिन अध्ययन के द्वारा ऐसा पाया गया है कि देवदासी प्रथा की शुरुआत में इसमें ब्राह्मण समाज की लड़कियों को देवदासी बनाया जाता था।

गोपाराजू रामचंद्र लवनम, जो एक भारतीय समाज सुधारक और गांधीवादी थे, वे देवदासी प्रथा के संबंध में कहते हैं कि उन दिनों केवल ब्राह्मण ही मंदिर में भगवान और देवी देवताओं के दर्शन कर सकते थे और कोई नहीं जा सकता था। उस समय उन्हें लगा कि वे समाज में बाकियों से बेहतर हैं क्योंकि वे सभी कलाओं में माहिर हैं चाहे वह नृत्य कला हो, संगीत कला हो या साहित्य सभी में वे ही माहिर थे। फिर उन्होंने अपनी लड़कियों को यानी ब्राह्मण लड़कियों को भगवान को समर्पित कर दिया और उन्हें दासी बना दिया। देवदासी यानी भगवान की दासी। कुछ समय बाद राजा और रानियों ने मंदिरों को नृत्य के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। तब ब्राह्मणों को अपने समुदाय की लड़कियों को मंदिरों में नृत्य के लिए भेजना ठीक नहीं लगा और वे अब भेजना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अन्य जातियों से लड़कियों को खरीद उन्हें अपनी लड़कियों के रूप में अपनाया और देवदासी के रूप में समर्पित कर दिया।

और पढ़ें: फ़ायर : पितृसत्ता को चुनौती देती, समलैंगिक रिश्तों पर आधारित फ़िल्म

फ़िल्म में एक देवदासी प्रथा की शिकार पीड़िता से बातचीत में यह बात सामने आई कि कैसे मंदिर के पुजारी लोगों के अंधविश्वास का फायदा उठाते हैं। शोभा जिन्हें 6 साल की उम्र में ही देवदासी बना दिया गया, वे कहती हैं कि उनकी माँ को एक दिन खुद को जोगप्पा के रूप में सपना आया नृत्य करते हुए तो उन्होंने इस सपने के बारे में पंडित से जाकर पूछा तो उसने कहा कि तुम्हारे घर में एक समस्या है, अपनी छोटी बेटी को देवी को दान दे दो तो तुम्हारी समस्या ठीक हो जाएगी साथ ही उन्होंने कहा कि अगर लड़की को देवदासी नहीं बनाया जाता तो उसके तीन बेटों में से एक जोगप्पा बन जायेगा। ‘जोगप्पा’ एक ट्रांसज समुदाय है जो ख़ुद को ऐसे लोगों के रूप में पहचानते हैं जिन्हें देवी येलम्मा ने छुआ, शाप दिया या अपने अधीन रखा। ये ट्रांसजेंडर हैं जो देवी येलम्मा से विवाहित माने जाते हैं। सामाजिक स्थलों को जाति, अर्थ, राजनीति व यौनता जैसी श्रेणियों में व्यवस्थित करने में मंदिर की भूमिका न केवल धार्मिक सेक्सवर्कर्स बल्कि ट्रांस समुदाय को समझने के दृष्टिकोण से भी अहम है।

शोभा के अलावा माला, रेणुका सिदव्वा और न जाने कितनी ही लड़कियां बचपन में ही देवदासी प्रथा का शिकार हो गईं। वहीं आंध्र प्रदेश के तिरुपति, नेल्लोर और चित्तूर जिलों में देवदासी प्रथा का ही दूसरा रूप मथम्मा प्रथा के रूप में दिखता है, जहां छोटी उम्र में लड़कियों को मंदिर में दे दिया जाता है, ज्यादातर परिवार बच्चियों के बीमार होने के कारण उन्हें देवी येलम्मा को समर्पित कर देते हैं। अगर वह जीवित रहती है तो वह समर्पित मानी जाती हैं और अगर मर जाती हैं तो समझ लिया जाता है कि वह देवी द्वारा ले ली गई है। उन्हें बहुत सी चीजें सिखाई जाती हैं, मुख्य रूप से नृत्य जो उन्हें सभी त्योहारों और मेलों में करना होता है। नृत्य के दौरान कोई भी उनका उत्पीड़न कर सकता है।

और पढ़ें: गंगूबाई काठियावाडी: सेक्सवर्कर्स के संघर्षों के मुद्दों को छूकर निकलती फिल्म

27 सालों से तिरुवल्लूर में इंटीग्रेटेड रूरल कम्युनिटी डेवलपमेंट सोसाइटी में काम कर रहे पी स्टीफ़न कहते हैं कि वे शादियों और त्यौहारों के दौरान नृत्य करती हैं और गाँव के युवा, जो किसी भी जाति के हो सकते हैं, उनका यौन शोषण करने के लिए स्वतंत्र हैं। महालक्ष्मी, कल्याणी, वेंकतम्मा, माधवी नागम्मा, अमरावती और न जाने कितनी ही लड़कियां इस प्रथा की शिकार हुईं। इन लोगों ने बताया कि किस तरह धर्म के नाम पर उनके साथ न जाने कितने ही आदमियों ने यौन शोषण किया। किसी ने नशे में धुत हो जबरदस्ती पकड़ा, बुरा व्यवहार किया, किसी ने सड़क पर ही बाल पकड़कर घसीटा तो किसी ने उन्हें नंगा कर दिया। कई आदमियों ने तो उनके शरीर को जली सिगरेट से दाग दिया। कोई उन्हें मनहूस कहता तो कोई उन्हें वेश्या। जिस धर्म और भगवान के नाम पर उनका बचपन खत्म किया गया और देवी बनाकर मंदिर में लाया गया वह उनके लिए केवल सेक्सवर्कर मात्र ही रहीं।

देवदासी प्रथा को कर्नाटक सरकार ने साल 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में अवैध घोषित कर दिया था। हालांकि, यह डॉक्यूमेंट्री 2009 के समय को दिखाती है, जहाँ यह प्रथा उत्तरी कर्नाटक के 10 जिलों और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में जारी थी। साल 2006 में राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में 44,000 से लेकर 2,50,000 देवदासी मौजूद थीं। इनमें से अधिकतर महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में रह रही थीं। भले ही राज्य सरकारों ने इस प्रथा के चलन पर रोक लगा दी हो लेकिन विभिन्न रिपोर्टों में पाया गया कि ये प्रथा अभी भी छोटे स्तर पर मौजूद है। अभी हाल ही में जून 2021 में देवदासी प्रथा की घटना सामने आई जहां कर्नाटक में 20 साल की लड़की देवदासी प्रथा से बचने के लिए घर छोड़ कर भाग गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसके परिवार वालों ने उसे धमकी दी कि अगर उसने अपनी बहन के पति से शादी नहीं की तो उसे देवदासी बना दिया जाएगा। भारत की सबसे निचली जाति की हजारों युवा लड़कियों को इस रूढ़िवादी धार्मिक और गैर कानूनी देवदासी प्रथा की आड़ में दक्षिण भारत में सेक्सवर्स में धकेला जा रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और उड़ीसा के मंदिरों में आज भी देवदासी प्रथा प्रचलित है।

यह फ़िल्म अंत में मध्य प्रदेश के बेड़िनी समुदाय की महिलाओं की समस्याओं को दिखाती है, जहां केवल जाति का नाम सुनते ही उन्हें सेक्सवर्कर मान लिया जाता है। इस समाज की महिलाएं नाचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं। तथाकथित ऊंची जाति कहे जानेवाले समाज के लोग उन्हें नाचने के लिए बुलाते हैं लेकिन उसके अलावा और बहुत कुछ करते हैं। चाहे वह उत्पीड़न हो, मारपीट हो या बलात्कार। बेड़िया समाज में 10 वर्ष की उम्र के बाद से ही बुजुर्ग महिलाएं लड़कियों को बेड़िनी प्रथा जिसे वे धंधा कहती हैं, उसमें नाचना सिखाना शुरू कर देती हैं। यह फ़िल्म मध्य प्रदेश के सागर शहर के सूखा, पथरिया, गंज बसौदा ज़िलों में बेड़िनी समुदाय की महिलाओं की स्थिति को बयां करती है जहां लक्ष्मी, काली बाई, क्रांति बाई, कुसान बाई, रामप्यारी बाई, अन्नु बाई, कृष्णा बाई, मुन्नी बाई, प्रेम बाई, संजू, लक्ष्मी आदि स्त्रियों की दर्दनाक कहानी सामने आती है। बेड़िनी समुदाय में राई नृत्य किया जाता है जिसके जरिए वे सेक्सवर्क में धकेल दी जाती हैं। लेकिन इसे रोकने की बजाय राज्य सरकार ने इस नृत्य को राज्य की परंपरा और संस्कृति घोषित कर दिया।

और पढ़ें: महिलाओं की दोस्ती, शोषण से आज़ादी और उनकी मर्ज़ी को उकेरती एक मज़बूत कहानी है पार्च्ड

देवदासी प्रथा को कर्नाटक सरकार ने साल 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में अवैध घोषित कर दिया था। हालांकि यह डॉक्यूमेंट्री 2009 के समय को दिखाती है, जहाँ यह प्रथा उत्तरी कर्नाटक के 10 जिलों और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में जारी थी। साल 2006 में राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में 44,000 से लेकर 2,50,000 देवदासी मौजूद थीं। इनमें से अधिकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में रह रही थीं।

बेड़िनी या बेड़िया उन जातियों में से थी जिसे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के कारण अपराधी जाति घोषित कर दिया गया था। इनमें बेड़िया, बांचड़ा, सांसी,कंजर, हेबुला, भांतु और रामधनी जैसी जातियाँ आती हैं। रामस्नेही जो बेड़िनी समुदाय से हैं और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। उनका मानना है कि ये जातियाँ खानाबदोश नाम से जानी जाती थीं, जो नवाबों के काफ़िलों को लुटती थीं। इसलिए उन्हें क्रिमिनल कम्युनिटी के तौर पर घोषित कर दिया गया।

कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि अपराधी जाति घोषित होने के कारण पुलिस के डर से पुरुष घरों से नहीं निकलते थे इसलिए इस समाज की महिलाएं खेल- तमाशा और नाचकर कमाने लगीं। लोग उन्हें बीहड़िया कहकर पुकारने लगे जो बाद में अपभ्रंश होता गया और बीहड़िया से बेड़िया हो गया। बेड़िनी व्यवस्था को लेकर मध्य प्रदेश में कोई कानून नहीं है कि किस उम्र की लड़कियों को शामिल करना चाहिए और किस उम्र की नहीं। बेड़िया समुदाय का सेक्सवर्क से पुराना संबंध है। महिलाओं का कहना है, “अगर हमारे घर के पुरुष कोई काम करने के लिए जाते हैं तो उन्हें कोई काम नहीं देता, यहां तक कि अगर कोई चीज वो लोग छू लेते हैं तो वे कहते हैं कि इस चीज को यहां से हटाओ इसे इस बेड़िया ने छू लिया है। वे हमारी मेहनत पर नहीं जाते। और ये सब यहीं तक नहीं रहता तथाकथित सभ्य और ऊंची कही जानेवाली जातियों से आनेवाले ये ‘सभ्य पुरुष’ उन महिलाओं की हालत बाद से बदतर कर देते हैं।” पथरिया और हबला में कई ऐसी घटनाएं सामने आई जहां उन महिलाओं के साथ जघन्य रूप से बलात्कार किया गया। 

जहां एक ओर देवदासी, मथम्मा और बेड़िनी महिलाओं का उत्पीड़न करके भी वे तथाकथित ऊंची जाति कहे जाने वाले लोग पवित्रता और सभ्य समाज की दुहाई देते फिरते हैं तो दूसरी ओर खुद से हुई संतान को स्वीकार भी नहीं करते। समाज ने पति और पिता न होने के कारण उन तमाम महिलाओं और उनके बच्चों के अस्तित्व को पूरी तरह नकार दिया। यहां तक कि विद्यालयों में छात्र हो या अध्यापक सभी उन्हें हिकारत की नज़र से देखते हैं। इस प्रकार यह डॉक्यूमेंट्री तीन अलग-अलग  समुदायों में प्रथाओं, परंपराओं, धर्म और जाति के नाम पर हो रहे बाल यौन शोषण, बलात्कार और सेक्सवर्क को दिखाती है। आज भी न जाने कितनी ही कम उम्र की लड़कियां ऐसी प्रथाओं का सामना कर रही हैं। सरकार को इन्हें रोकने के लिए कड़े रुख़ अपनाने की जरूरत है, उनके परिवार को आर्थिक सहायता, शिक्षा और रोजगार मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

और पढ़ें: She’s Beautiful When She’s Angry’  एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री जिसने बताया आखिर औरतें चाहती क्या हैं!


तस्वीर साभार: Book My Show

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content