जानें, मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट के तहत महिलाओं के पास कौन-कौन से अधिकार है
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महिलाएं शुरू से ही कार्यबल में एक अदृश्य शक्ति रही हैं। कार्यबल में शामिल होने के बावजूद, महिलाओं को अभी भी घरेलू काम और बच्चों की देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है। यह स्थिति गर्भावस्था के समय या बच्चा पैदा होने के बाद उनकी देखभाल करने के समय और भी तनावपूर्ण हो जाती है। अतीत में, कंपनियों के मालिक उन कर्मचारी महिलाओं को निकाल देते थे जिन्हें मातृत्व अवकाश की ज़रूरत होती थी। उनके अनुसार यह तथ्य कि उनकी महिला कर्मचारी गर्भवती है,  यह गर्भ उक्त कर्मचारी के काम करने की क्षमता में हस्तक्षेप करती है। 

इस तरह कंपनी से निकाल दिए जाने से बचने के लिए, गर्भवती महिला कर्मचारी बिना वेतन के छुट्टी ले लेती थीं या काम छोड़ने को मजबूर हो जाती थीं। इससे कार्यबल में लगतार लैंगिक अंतर और भेदभाल बढ़ने लगा। कार्यबल में लगातार वैश्विक लैंगिक अंतर ने श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए समावेशी नीतियां बनाने की सख्त ज़रूरत पैदा कर दी। नतीजतन दुनियाभर के कई देशों ने उदार मातृत्व लाभ प्रावधान तैयार किए ताकि माँ बनना महिलाओं के लिए कार्यबल से बाहर निकलने के लिए एक कारण न बने।

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भारत में भी गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद महिला कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए, भारतीय कानून अधिकांश प्रतिष्ठानों के लिए महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ देना अनिवार्य बनाता है। भारत में इस तरह का पहला कानून प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 था। इसे मातृत्व लाभ अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है। साल 2017 में इसे संशोधित किया गया और इसमें गर्भवती महिलाओं और नई माँओं के लिए कुछ नए प्रावधान जोड़े गए। भारत में मातृत्व लाभ मुख्य रूप से मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 द्वारा शासित होता है।

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यह अधिनियम 10 या अधिक कर्मचारियों को नियोजित करने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होता है। जैसे कारखानों, खानों, बागानों, सरकारी प्रतिष्ठानों, दुकानों और प्रतिष्ठानों को प्रासंगिक लागू कानून के तहत, या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी अन्य प्रतिष्ठान पर लागू होता है। मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 ने अधिनियम के तहत प्रदान किए जा रहे मातृत्व लाभ को और बढ़ा दिया। मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 का मकसद महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश और लाभ प्रदान करना और महिलाओं और उनके बच्चे के पूर्ण और स्वस्थ रखरखाव की व्यवस्था करके मातृत्व की उनकी गरिमा की रक्षा करना है।

मातृत्व लाभ और भारतीय संविधान

अनुच्छेद 15 (3)- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 15 (3) का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की कमजोर शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ‘सुरक्षात्मक भेदभाव’ पर आधारित है।

अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अर्थ है एक सार्थक, पूर्ण और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार। इसका कोई सीमित अर्थ नहीं है। इसलिए, राज्य को एक गर्भवती कामकाजी महिला को अपने रोजगार के साथ-साथ अपने और अपने बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए आवश्यक सभी सुविधाओं और सहायता की गारंटी देनी चाहिए। भारत के संविधान के भाग IV में निहित राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत, अनुच्छेद 41 के तहत राज्य को काम और शिक्षा के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करने की ज़रूरत है।

अनुच्छेद 42 – राज्य काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियों को सुनिश्चित करने और मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करे

मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017 ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधानों में संशोधन किया है। संशोधन अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य प्रसव की अवधि के दौरान महिलाओं के रोजगार को विनियमित करना है। इसने मातृत्व अवकाश की अवधि और प्रयोज्यता, और अन्य सुविधाओं से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया है। 2017 के संशोधित अधिनियम के कुछ मुख्य बिंदु निम्न हैं –

  • इसने महिला कर्मचारियों के लिए उपलब्ध सवैतनिक मातृत्व अवकाश की अवधि को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया।
  • हालांकि, उन महिलाओं के लिए जो 2 बच्चे होने के बाद तीसरे बच्चे को जन्म दे रही हैं उनकी छुट्टी की अवधि 12 सप्ताह ही है। 
  • दत्तक और कमीशन माताओं को गोद लेने की तारीख से 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश प्रदान किया गया। 
  • वेतन सहित मातृत्व अवकाश प्रसव की अपेक्षित तिथि से 8 सप्ताह पहले लिया जा सकता है। संशोधन से पहले, यह 6 सप्ताह था। बच्चे के जन्म के बाद बचे हुए 18 सप्ताह का लाभ उठाया जा सकता है।
  • अधिनियम ने ‘घर से काम’ से संबंधित एक सक्षम प्रावधान पेश किया है जिसका प्रयोग 26 सप्ताह की छुट्टी अवधि की समाप्ति के बाद किया जा सकता है। काम की प्रकृति के आधार पर, एक महिला इस प्रावधान का लाभ ऐसी शर्तों पर ले सकती है जो नियोक्ता (मालिक) के साथ परस्पर सहमति से हो।
  • संशोधित अधिनियम ने 50 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले प्रत्येक प्रतिष्ठान के लिए एक ‘क्रेच (शिशुगृह)’ सुविधा अनिवार्य कर दी है। महिला कर्मचारियों को दिन में 4 बार ‘क्रेच’ जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। अधिनियम में माताओं को क्रेच सुविधा तो उपलब्ध कराई है मगर उस समय अवधि के संबंध में कोई स्पष्टता नहीं है जब तक कि महिला कर्मचारी को क्रेच सुविधा प्रदान की जा सकती है और साथ ही नर्सिंग ब्रेक की उपलब्धता, आवृत्ति और सीमा के बारे में भी अधिनियम में स्पष्टता नहीं है।
  • संशोधित अधिनियम नियोक्ताओं के लिए महिलाओं को उनकी नियुक्ति के समय उपलब्ध मातृत्व लाभों के बारे में शिक्षित करना अनिवार्य बनाता है।

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1961 के अधिनियम में किए गए संशोधनों का महत्व

माँ और बच्चे की उत्तरजीविता और स्वास्थ्य:

संशोधित अधिनियम ने मातृत्व लाभ को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है। यह बढ़ोतरी अहम है और विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुरूप भी है जिसमें उल्लेख किया गया है कि बच्चों को पहले 24 सप्ताह तक केवल माँ द्वारा ही स्तनपान कराया जाना चाहिए। इस तरह मातृत्व अवकाश में वृद्धि से बच्चों के जीवित रहने की दर में सुधार और माँ और बच्चे दोनों के स्वस्थ विकास में मदद मिलेगी।

महिला श्रम बल की भागीदारी: अधिकतर महिलाएं काम और घर में तालमेल नहीं बैठा पाती हैं। ऑफिस का काम और बच्चे को संभालना दोनों ही उनके लिए असंभव हो जाते हैं। इस पितृसत्तात्मक समाज में दोंनो ही उनकी ही ज़िम्मेदारी मानी जाती है। परिणामवश उन्हें मजबूरन अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है। यह संशोधन पर्याप्त मातृत्व अवकाश की कमी के कारण महिलाओं के श्रम बल से बाहर होने के मामलों को कम करेगा और महिलाओं की कार्यबल में लिंग दर को बढ़ाएगा। साथ ही संशोधित अधिनियम मातृत्व संरक्षण सम्मेलन, 2000 (संख्या 183) जैसी अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप भी है, जो कम से कम 14 सप्ताह के अनिवार्य मातृत्व लाभ की मांग करता है।

अडॉप्टिंग एंड कमीशंड मदर्स: इस अधिनियम की एक और महत्वपूर्ण विशेषता गोद लेनेवाली महिलाओं को 12 सप्ताह का अवकाश देता है, जिससे वे अपने बच्चों की देखभाल सही से कर सकें।

असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं पर अधिनियम की अस्पष्टता

यह अधिनियम महिला कर्मचारियों को काम करने के साथ-साथ कई सारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है। लेकिन अधिनियम के पूर्ण अवलोकन पर पात चलता है कि असंगठित क्षेत्र पर अधिनियम की प्रयोज्यता से संबंधित प्रावधान अस्पष्ट हैं। हालांकि, एक ओर, अधिनियम में कहा गया है कि यह खदानों, बागानों, दुकानों और प्रतिष्ठानों के साथ-साथ संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में कारखानों में काम करने वाली सभी महिलाओं को शामिल करता है।

लेकिन दूसरी ओर, असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को उन लोगों के रूप में परिभाषित करता है जो 10 से कम कर्मचारियों वाली इकाई में काम करने वाले घर-आधारित, स्व-नियोजित या वेतन भोगी कर्मचारी हैं। भारत में लगभग 90% कामकाजी महिलाएं असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। इस तरह इस अधिनियम के प्रावधानों का असंगठित क्षेत्र में 10 से काम कर्मचारियों वाली इकाई में कार्य करने वाली महिलाओं पर लागू न होना परेशान करनेवाला तथ्य है। हालांकि, असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाएं जननी सुरक्षा योजना और इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना जैसी योजनाओं से लाभ उठा सकती हैं, लेकिन उन्हें केवल नकद सहायता के रूप में लाभ मिलता है और उन्हें मातृत्व लाभ अधिनियम में प्रदान की गई अन्य संस्थागत सहायता का फायदा नहीं मिलता है।

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दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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