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भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद यहां महिलाओं के वर्कफोर्स यानि कामकाज के क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी के मामले में पिछले कई दशकों से कोई वृद्धि नहीं हुई है। किसी समाज की उन्नति का अंदाज़ा महिलाओं और वंचित वर्ग की स्थिति से किया जाना चाहिए। लेकिन हाल में जारी हुई अलग-अलग रिपोर्ट्स श्रम बल में पीछे छूटती महिलाओं की दुर्दशा की कहानी को बयान करती हैं। कोई भी देश किसी चुनिंदा वर्ग या समुदाय के लोगों के साथ सम्पूर्ण विकास की प्राप्ति नहीं कर सकती। हालांकि महिलाओं के लिए समाज के नियम कभी भी आसान या समान नहीं थे पर, कोरोना महामारी ने पहले से कहीं ज्यादा महिलाओं के मौजूद चुनौतियों में बढ़ोतरी ही की है।

पिछले दिनों माइक्रोसॉफ्ट ने व्यावसायिक सामाजिक नेटवर्क लिंक्डइन में कई नई नौकरी के शीर्षकों को पेश किया जिनमें ‘स्टे-एट-होम मॉम’ जैसे विवरण भी शामिल थे। जबकि उन कामकाजी महिलाओं को जिन्होंने किसी कारणवश काम करना छोड़ दिया, उन्हें वर्कफोर्स से दूर चले जाने का केवल अधिक सटीक विवरण देने का अवसर प्रदान करना समस्या का हल नहीं बल्कि एक आवरण पहनाना ही है। दूसरी तरफ यह गौर करने वाली बात है कि ऐसे सामाजिक नेटवर्क की पहुंच सीमित होती है। ऐसे में, ये उपाय भले डिजिटल दुनिया में मददगार साबित हो लेकिन ग्रामीण भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाएं, जैसे दिहाड़ी महिला मजदूर, मनरेगा श्रमिक या घरेलू मदद की नौकरी करने वाली जैसी करोड़ों महिलाओं को अपने ही समुदाय के तुलना में पीछे छोड़ देगी।     

महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी, बढ़ोतरी और अच्छे रोज़गार तक पहुंच, समाज के समावेशी और समान होने के महत्वपूर्ण और आवश्यक तत्व हैं। यह समाज की विकास की प्रक्रिया में सहायक होते हैं। पहले से ही सामाजिक ढांचा पितृसत्तात्मक होने के कारण महिलाओं को श्रम बल में प्रवेश करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। तत्कालीन कोविड महामारी की परिस्थिति ने इन कारणों में इजाफ़ा किया है। ग्लोबल जेन्डर गैप 2021 की रिपोर्ट अनुसार दुनिया के जनसंख्या में भारी योगदान होने के बावजूद भारत में महज 22.3 प्रतिशत महिलाएं श्रम बल में अपनी भागीदारी देती हैं। यानि जहां देश के 288 मिलियन पुरुष कार्यरत हैं, वहीं मात्र 83 मिलियन महिलाएं किसी भी प्रकार की नौकरी कर रहीं हैं। तकनीकी भूमिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 29.2 प्रतिशत है। वहीं, वरिष्ठ पदों पर महिलाओं का नेतृत्व 14.6 प्रतिशत है। राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की प्रतिनिधित्व की बात करें, तो भारत 20वें पायदान से गिरकर 51वें पायदान पर आ चुका है। भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में औसतन 20.7 फीसदी तक कम वेतन पाती है। हालांकि महिलाओं की समस्या सिर्फ रोजगार पाने तक खत्म नहीं होती। अच्छे रोजगार तक महिलाओं की पहुँच पुरुषों से काफी कम होती है। साथ ही महिलाओं को अकसर असुरक्षा और गरीबी की दोहरी मार झेलनी पड़ती है। कई रोजगार में जैसे महिला खेतिहर मजदूर को ना सिर्फ कम वेतन दी जाती है बल्कि उन्हें जमीनी मालिकाना अधिकार से भी वंचित रखा जाता है। 0.65 मिलियन महिलाओं का गढ़ बना भारत का महिलाओं को समान अवसर, वेतन या काम की सुरक्षा ना प्रदान कर पाना, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विफलता दर्शाती है।

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महिलाओं को अपने रोज़गार, काम की पसंद, काम करने की स्थिति, रोजगार का सुनिश्चित होना, कार्यस्थल पर सुरक्षा, वेतन में असमानता, कार्यस्थल पर भेदभाव के साथ-साथ काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल के बोझ को संतुलित रखने जैसी की शर्तों का प्रतिदिन सामना करना पड़ता है। पहले से ही अवैतनिक कामों का बोझ उठाती महिलाओं को कोरोना के बीच बंद स्कूल और कॉलेजों के कारण और भी अधिक घरेलू कामों में जूझना पड़ा। वैश्विक स्तर पर औसतन महिलाएं पुरुषों के मुकाबले प्रतिदिन तीन गुना अवैतनिक घरेलू और देखभाल के काम में समय व्यतीत करती हैं। इस महामारी के दौरान बढ़ती घरेलू हिंसा, दैनिक काम, ग्रामीण और हाशिये पर जी रही महिलाओं का स्वास्थ्य उत्पादों और चिकित्सा से दूरी जैसी समस्याओं ने महिलाओं को कार्यक्षेत्र से और भी दूर कर दिया है। शहरी इलाकों में पुरुषों का बेहतर कर्मचारी होने पर यकीन करने वाली कंपनियों के लिए महिलाओं को अधिक संख्या में नौकरी से निकालना ही सहज उपाय रहा। तेलंगाना टूडे में छपे वीमेन इन टेक्नोलॉजी (डब्ल्यूआईटी) की 21 से 35 साल की भारतीय महिलाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 65 प्रतिशत कामकाजी महिलाओं ने माना कि इस महामारी ने उनके व्यावसायिक जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। सर्वेक्षण में पाया गया कि 10 में से 4 महिलाओं ने साल 2020 में अपनी नौकरी खोई। अप्रैल और मई में लगभग 17 मिलियन भारतीय महिलाओं ने नौकरी जाने की सूचना दी थी।

वैश्विक स्तर पर श्रम बाज़ार की बात करें, तो हाल में जारी हुई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार आज 50 प्रतिशत से भी कम कामकाजी महिलाएं श्रम बाज़ार में कार्यरत हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 सालों में इस अनुपात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि साल 2020 के श्रम बाजार में 74 प्रतिशत पुरुषों ने भाग लिया, जबकि उनके तुलना में केवल 47 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी रही। रिपोर्ट में इस बात को भी आगाह किया गया कि महिलाओं को तुलनात्मक रूप से अवैतनिक घरेलू और देखभाल के काम कहीं ज्यादा करने पड़ते हैं, जिससे उनकी आर्थिक क्षमता नियंत्रित हो जाती है। इस रिपोर्ट ने कोरोना के नकारात्मक परिणामों का महिलाओं की नौकरी और आजीविका को प्रभावित करने की बात भी सामने रखी।

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डिजिटल दुनिया की सुविधा होने से जहां शहरी इलाकों में लॉकडाउन के बावजूद जुड़े रहने या घर बैठे काम का विकल्प मौजूद था, वहीं ग्रामीण भारत की महिलाओं को इस असुविधा का भी सामना करना पड़ा। लॉकडाउन में लघु उद्योग, कुटीर उद्योग और स्वयं सहायता समूह का प्रभावित होना भी महिलाओं के कार्यक्षेत्र में बाधा की एक मुख्य वजह रही। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के 14 अप्रैल के रिकार्ड अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 8.4 और ग्रामीण भारत में 6.6 फ़ीसद है। सीएमआईई के अनुसार साल 2020 के मई से अगस्त के बीच भारत में बेरोजगारी पर तैयार की गई रिपोर्ट बताती है कि पुरुषों के 67.4 फीसद श्रम भागीदारी दर के तुलना में महिलाओं का मामूली 9.3 फ़ीसद रहा।

भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का श्रम भागीदारी दर का ना बढ़ना आने वाले संकटों का आह्वान है। दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चलने के लिए, साल 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को चिह्नित कर अग्रसर रहना अतिआवश्यक है। बढ़ती लैंगिक असमानता देश की महिलाओं के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास के आड़े आ सकती है। भारत का आने वाले दिनों में दुनिया में सबसे अधिक युवा जनसंख्या में योगदान देने का अनुमान है। ऐसे में महिलाओं का पीछे छूट जाना दुर्भाग्यपूर्ण और अहितकारी होगा। निश्चित ही सबका साथ, सबका विकास में महिलाओं को साथ लेकर चलना कोई विकल्प नहीं बल्कि आज के समय की मांग है।

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तस्वीर साभार : India TV

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