आखिर क्यों औऱतों के लिए मां बनना इतना ज़रूरी बना दिया गया है?
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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“एक औरत का अस्तित्व मां बनकर ही पूरा होता है”

आखिर कमा किसके लिए रही हो, बच्चों के लिए ही ना, तो पैदा करने में क्या दिक्कत है।

ये वे शब्द हैं जो हर एक औरत को उसकी शादी के बाद आए दिन सुनने ही पड़ते हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं की भूमिका मां,बहन और पत्नी के इर्द- गिर्द ही बुनी हुई है। क्या आपने कभी सोचा है, आखिर क्यों औऱतों के लिए मां बनना इतना जरूरी बना दिया गया है?

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क्या औरत की जिंदगी का सबसे बड़ा सुख मां बनना ही है?

एक औरत के मां ना बन पाने को उसकी जिंदगी के अधूरेपन से जोड़कर देखा जाता है। हमारे समाज में महिलाओं के मां बनने को उनके अस्तित्व से इस तरह जोड़ा गया है कि खुद महिलाओं को भी उनका जीवन का परम सुख और लक्ष्य सिर्फ मां बनना ही लगने लगता है। शिक्षा, रोज़गार जैसी दूसरी चीज़ें भी एक महिला के लिए उतनी ही जरूरी हैं जितनी कि एक आदमी के लिए।

बच्चे पैदा करने के लिए जब औरतें अपनी नौकरी या पढ़ाई छोड़ती हैं तो पितृसत्ता इसे त्याग का नाम देकर औरतों को महान बना देती है। अगर किन्ही वजहों से औरत बच्चे पैदा नहीं कर पाती हैं या ऐसा न करने का फैसला लेती हैं तो उन्हें समाज और परिवार में वह सम्मान नहीं मिलता जो कि मां बनने वाली औरत को मिलता है। इसके अलावा उन्हें स्वार्थी और समाज की बनाए गए ‘बुरी महिला’ के खांचे में रख दिया जाता है। 

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मां बनने से एक औरत को इज्ज़त मिलती है

भारतीय समाज में एक औरत को कितनी इज्ज़त मिलेगी ये उसके बच्चों के आधार पर तय किया जाता है। इसमें भी यह मायने रखता है कि कितने बच्चे लड़के और कितनी लड़कियां। जो औरतें बच्चे पैदा नहीं कर पाती हैं, उन्हें अक्सर तिरस्कार का समाना करना पड़ता है। कई औरतों के मां ना बनने पर उनके पति या उन्हें छोड़ देते है या दूसरी शादी कर लेते हैं। स्टडी ऑन डोमेस्टिक वायलेंस इन इनर्फटाइल वीमेन के मुताबिक, जो औरतें बच्चे पैदा नहीं कर पाती हैं, उन्हें घरेलू हिंसा का अधिक सामना करना पड़ता है।   

बच्चे पैदा करने के लिए जब औरतें अपनी नौकरी या पढ़ाई छोड़ती हैं तो पितृसत्ता इसे त्याग का नाम देकर औरतों को महान बना देती है। अगर किन्ही वजहों से औरत बच्चे पैदा नहीं कर पाती हैं या ऐसा न करने का फैसला लेती हैं तो उन्हें समाज और परिवार में वह सम्मान नहीं मिलता जो कि मां बनने वाली औरत को मिलता है।

वहीं, दूसरी तरह समाज में उन्हीं मांओं को इज्जत मिलती है जो अपने पति के साथ ही रहती हो या पितृसत्तात्मक समाज द्वारा मां की बनाई गई सभी जिम्मेदारियों को पूरा करती हो। तलाकशुदा, सिंगल या जॉब करने वाली मांओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं मां शब्द के आस-पास पितृसत्ता द्वारा रचे गए सारे मानक सिस जेंडर महिलाओं को ध्यान में रखते हैं। इस पितृसत्तात्मक और होमोफोबिक समाज के लिए ट्रांस महिलाएं, नॉन बाईनरी या एलजीबीटी समुदाय के लोग तो पैरंट्स हो ही नहीं सकते। क्विंट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 70 फ़ीसद भारतीय महिलाएं मां बनते ही और 50 फ़ीसद महिलाएं 30 की उम्र में आते ही अपनी नौकरियां छोड़ देती हैं। इसके अलावा जो औरतें मां नहीं बनना चाहती उन्हें स्वार्थी और समाज की बनाए गए ‘बुरी महिला’ के खांचे में रख दिया जाता है। 

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क्या वाकई में मां बनना एक सुखद एहसास है? 

साल 2018 में डब्ल्यूएचओ द्वारा भारत की महिलाओं पर किए गए एक लंबे शोध में पाया गया कि मां बनने के बाद लगभग 22 प्रतिशत महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन (पीपीडी) का सामना करती हैं। पितृसत्तात्मक समाज द्वारा तय मानकों के कारण एक मां और फिर एक अच्छी मां बनने के लिए औरतें अपने सपनों को छोड़कर अपनी पूरी जिंदगी लगा देती है। अब वह वक्त आ गया है जब हमें यह समझ लेना चाहिए कि औरतों का अस्तित्व सिर्फ मां बनने से ही पूरे नहीं होते।

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

Kirti is the Digital Editor at Feminism in India (Hindi).  She has done a Hindi Diploma in Journalism from the Indian Institute of Mass Communication, Delhi. She is passionate about movies and music.

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