फ़हमीदा रियाज़ः पाकिस्तान की मशहूर नारीवादी शायरा
तस्वीर साभारः Al Jazeera
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“तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

अब तक कहाँ छिपे थे भाई

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

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आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई ।

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिन्दू राज करोगे ?

सारे उल्टे काज करोगे !

अपना चमन ताराज़ करोगे !”

फ़हमीदा रियाज़ की लिखी ये पक्तियां देश में कथित राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और धर्म के नाम पर फसाद पर वार करते हुए लिखी गई है। फ़हमीदा रियाज़ वह शख्सियत थीं जो अपने राजनैतिक विचारों की वजह से हमेशा सत्ता की आंखों में किरकरी बनी रहीं। पाकिस्तान हो या भारत उन्होंने हमेशा जनविरोधी ताकतों के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद रखीं। वह कंट्टरवाद के विरोध में मुखर होकर बोला करती थीं। अपने लेखन संसार में उन्होंने हमेशा अधिकारों, समानता और जनता की अस्मिता को बनाए रखने की पैरवी की।

फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तान की मशहूर शायरा, लेखिका, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नारीवादी थीं। उन्होंने अपनी कलम के सामने कभी किसी ताकत, किसी सरहद और किसी बंधन को नहीं माना। उन्होंने समाज की तमाम बुराइयों, सियासत के जुल्मों और महिलाओं की स्थिति पर बात कर अपनी पहचान बनाई। फ़हमीदा रियाज़, पाकिस्तान में नारीवाद के संघर्षों की प्रमुख आवाज़ थीं।

भारत में हुआ जन्म

फ़हमीदा रियाज़ का जन्म 28 जुलाई, 1946 में उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान जाकर रहने लगा था। उनके पिता का नाम रियाज़-उल-दीन अहमद था। वह एक शिक्षाविद् थे। पिता के सिंध प्रांत में तबादले के बाद उनका परिवार हैदराबाद जाकर रहने लगा था। जब वे चार साल की उनके पिता की मौत हो गई थी। फ़हमीदा रियाज़ की परवरिश उनकी माँ ने की थी। वह बचपन में ही उर्दू और सिंधी साहित्य में रूचि लेने लगी थी। उन्हें फारसी भाषा की भी जानकारी थी। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रेडिया पाकिस्तान के लिए न्यूजकास्टर के तौर पर काम किया।

फ़हमीदा रियाज़ की स्नातक के बाद शादी कर दी गई थी। शादी के बाद वह कुछ समय तक यूनाइटेड किंगडम में रही। वहां उन्होंने उस दौरान बीबीसी उर्दू के लिए काम किया और फिल्म मेकिंग में डिग्री हासिल की। उनकी यह शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी और उन्होंने तलाक ले लिया। उसके बाद उन्होंने वामपंथी राजनैतिक कार्यकर्ता ज़फ़र अली उजान के साथ शादी की थी।

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अपनी रचनाओं से जारी रखा आंदोलन 

फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तान की एक मशहूर मानवाधिकार संरक्षक और उदारवादी आवाज़ थीं। उन्होंने ‘आवाज़’ नाम से अपना एक उर्दू पब्लिकेशन शुरू किया था। फ़हमीदा रियाज़ ने अपनी कविताओं और नज्म़ों से हमेशा पाकिस्तान की हुकूमत की जनविरोधी नीतियों पर सवाल किया। उन्होंने पाकिस्तान के शुरुआती तानाशाह जनरल अय्यूब खान और जनरल जियाउल हक का विरोध किया। 1960 के अंत में उन्होंने अय्यूब खान विरोधी आंदोलनों में हिस्सा लिया। लेकिन जनरल जिया के मार्शल लॉ के ख़िलाफ़ उनकी राजनीति और कविताएं और तेजी से सामने आई। 

जनरल जियाउल हक ने फ़हमीदा रियाज़ की पत्रिका को बंद करा दिया था। उन्हें और उनके पति ज़फ़र को जेल में डाला गया। उनकी राजनैतिक विचारधारा की वजह से दोनों के ख़िलाफ़ कई केस दर्ज किए गए। जनरल जियाउल हक के समय उनपर दस से ज्यादा केस दर्ज हुए। पाकिस्तान में उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ। पाकिस्तान सरकार नें उन्हें भारत का एंजेट तक भी कहा। उसके बाद उन्होंने अपने दो बच्चों और बहन के साथ भारत में शरण ली। भारत में शरण लेने के लिए मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से बात की थी। 

जेल से रिहा के बाद उनके पति भी भारत आकर रहने लगे थे। फ़हमीदा रियाज़ लगभग सात साल भारत में रही थी। निर्वासन के दौरान वह दिल्ली के कई इलाकों में रही। भारत में रहने के दौरान उन्होंने हिंदी सीखी। साल 1988 में जनरल जिया उल हक की मौत के बाद चुनावों में बेनजीर भुट्टो की जीत के बाद वह पाकिस्तान वापस लौट गई थीं।

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फ़हमीदा महिला अधिकारों की पैरवरी करने वाली प्रखर वक्ता थीं। वह अपने लेखन के ज़रिये महिलाओं की बंदिशों की जंजीरों को तोड़ने का काम करती थीं। उन्होंने ‘एक लड़की’, ‘इंकलाबी औरत’, ‘एक औरत की हँसी’, ‘अक्ल़ीमा’ और ‘कब तक’ जैसी नज़्मों में महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखा।

अश्लील होने का लगा आरोप

फ़हमीदा रियाज़ ग़ज़ल, नज़्म, कहानियों के अलावा उपन्यास भी लिखा करती थीं। 1967 में ‘पत्थर की ज़ुबान’ के नाम से उनका पहला साहित्यिक काम छपा था। 1973 में उनकी रचना ‘बदन दरीदाह’ प्रकाशित हुआ। जिसने साहित्यिक जगत में एक सनसनी फैला दी। इस कविता संग्रह में उन्होंने बहुत बेबाकी से अपने अनुभव लिखे थे। उनके कविता संग्रह की आलोचना कर उनपर उत्तेजक, अश्लील और सेन्शुअल होने का आरोप लगाया गया। हालांकि उनकी यह किताब आधुनिक उर्दू साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती है। उनकी लिखी कविताओं और किताबों में ‘धूप’, ‘पूरा चाँद’, ‘आदमी की जिंदगी’ और अन्य हैं। उन्होंने ‘जिंदा बहार’, ‘गोदावरी’ और ‘कराची’ के नाम से उपन्यास भी लिखे। वह अपने क्रांतिकारी और अलग तरह की कविताओं की लेखन शैली की वजह से बहुत प्रसिद्ध थीं। 

1996  में उन्होंने ‘तुम भी हम जैसे निकले’ शीर्षक से भारत की सांप्रदायिकता पर लिखा। उन्होंने ‘माथे पर सिंदूर की रेखा, कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा, क्या हमने दुर्दशा बनाई, कुछ भी तुमको नज़र न आई’ जैसी लाइनों में भारत-पाकिस्तान के बीच बन रहे समान दृश्यों को दिखाते हुए भारतवासियों को आगाह करने की कोशिश की। वे भारत को सांप्रदायिकता के उस रास्ते को अपनाने से रोक रही थी जिस पर चलकर पाकिस्तान ने खुद की स्थिती बेकार बनायी।  

फ़हमीदा रियाज़ ने अपने बेबाक लेखन शैली से पाकिस्तान साहित्य को एक कदम आगे बढ़ाया था। वे खासतौर पर महिलाओं की स्वायत्ता को जाहिर करने के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल किया करती थी। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से महिलाओं को जागरूक किया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और उनकी शारीरिक स्वायत्ता के बारे में अपने विचार कविताओं और नज़्मों के माध्यम से जाहिर किए। ‘गुडिया’ और ‘मुकाबला-ए-हुस्न’ जैसी रचनाओं में उन्होंने महिलाओं की सुंदरता और प्यार के नाम पर होते असमानता के व्यवहार शब्दों में सबके सामने रखा।

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1996  में उन्होंने ‘तुम भी हम जैसे निकले’ शीर्षक से भारत की सांप्रदायिकता पर लिखा। उन्होंने ‘माथे पर सिंदूर की रेखा, कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा, क्या हमने दुर्दशा बनाई, कुछ भी तुमको नज़र न आई’ जैसी लाइनों में भारत-पाकिस्तान के बीच बन रहे समान दृश्यों को दिखाते हुए भारतवासियों को आगाह करने की कोशिश की।

फ़हमीदा महिला अधिकारों की पैरवी करने वाली प्रखर वक्ता थीं। वह अपने लेखन के ज़रिये महिलाओं की बंदिशों की जंजीरों को तोड़ने का काम करती थीं। उन्होंने ‘एक लड़की’, ‘इंकलाबी औरत’, ‘एक औरत की हँसी’, ‘अक्ल़ीमा’ और ‘कब तक’ जैसी नज़्मों में महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखा। फ़हमीदा रियाज़ ने एक अनुवादक के तौर पर भी बेहतर काम किया। भारत में प्रवास के दौरान उन्होंने पाकिस्तान की स्थिति पर ‘क्या तुम पूरा चांद न देखोंगे’ नाम से एक कविता संग्रह लिखा था। यह संग्रह देवनागरी में प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा उन्होंने ‘अपना जुर्म साबित है भी’ लिखा है।

अन्य काम और सम्मान

पाकिस्तान लौटने के बाद फ़हमीदा रियाज़ ने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। 1988-90 के दौरान वह नेशनल बुक कॉउंसिल ऑफ पाकिस्तान में मैनेजिंग डॉयरेक्ट नियुक्त की गई। बेनजीर भुट्टो की सरकार के दूसरे कार्यकाल में वह सांस्कृतिक मंत्रालय से जुड़ीं। साल 2009 में उन्हें उर्दू डिक्शनरी बोर्ड की प्रमुख नियुक्त किया गया था। फ़हमीदा की बेबाक लेखन शैली ने भारतीय उपमहाद्वीप की एक महान शायरा के रूप में पहचान बन गई थीं। साल 1998 में उन्हें ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की तरफ़ से ‘हेलमेन ग्रॉट’ दी गईं। 2005 में सिंध प्रांत की सरकार की ओर से ‘अल-मुफ्ताह सम्मान’ और ‘शेख अयाज़ अवार्ड’ ने भी नवाज़ गया। 2010 में पाकिस्तान सरकार ने साहित्य में योगदान के लिए पुरस्कृत किया। 2014 में पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स ने ‘कलम-ए-फन’ के अवार्ड से नवाज़ा।

फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया में लोकतंत्र की पैरवी करने वाली एक मजबूत आवाज़ मानी जाती हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन जन अधिकारों की हिमायत की। वह हमेशा कंट्टरवाद और तानाशाही के मुख़ालफ़त में रहीं। 21 नवंबर 2018 में लंबी बीमारी के बाद लाहौर में उनकी मौत हो गई थी। जुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने वाली फ़हमीदा रियाज़ का पूरा जीवन विद्रोह था। उनके लेखन में भी यह झलक साफ देखने को मिलती है। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ी को उनके तेवल और बेबाकी से रूबरू कराती रहेंगी।

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तस्वीर साभारः Al Jazeera

स्रोतः

Wikipedia

The Dawn

International The News

The wire

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