मुस्लिम महिलाओं के शिक्षित होने के रास्ते में है कितना संघर्ष
तस्वीर साभार: UNICEF
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पुराने जमाने से रीत चली आ रही है कि घर की कमान पुरुषों के हाथ में ही होती है। पुरुष ही घर चलाता है और वही घर के अन्य सदस्यों के जीवन का फैसला भी लेता है। चाहे वह फैसला घर के किसी अन्य सदस्य को मंजूर हो ना हो लेकिन घर के मुखिया यानी पुरुष का फैसला अटल होता है और घर के हर सदस्य को मानना भी पड़ता है। इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता। शादी से पहले पिता के संरक्षण में रहना या भाई के संरक्षण में रहना। शादी के बाद पति के संरक्षण में रहना, यही पितृसत्तात्मक समाज की रीत है। एक स्त्री को हमेशा पुरुषों के संरक्षण में रहना पड़ता है। इसी तरह हमारे परिवारों में एक लड़की कितना पढ़ेगी, क्या पढ़ेगी, कब तक पढ़ेगी, पढ़ेगी भी या नहीं ये सारे फ़ैसले घर के मर्द ही लेते आए हैं।

कॉलेज के दिनों में हमें एक असाइनमेंट दिया गया था। उस समय ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए हम जब एक मोहल्ले में गए थे, वहां मेरी मुलाकात नबीला से हुई जिसकी उम्र मुश्किल से 14 साल रही होगी। मैंने उसे बताया कि मैं कॉलेज से यहां आई हूं और मुझे यहां लड़कियों की शिक्षा को लेकर लोगों से बात करनी है पर यहां पर कोई बात नहीं कर रहा है। उस छोटी सी लड़की ने मुस्कुरा कर कहा, “दीदी यहां पर कोई बात नहीं करता है पढ़ाई को लेकर।” मैंने उससे सवाल किया कि तुम स्कूल जाती हो उसने बहुत दबी आवाज़ में कहा, “नहीं दीदी मैं स्कूल नहीं जाती मैं काम करती हूं।”

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नबीला ने अपने बारे में और अपने परिवार के बारे में मुझे बताया कि वह अपने परिवार में अपने भाई बहन में सबसे बड़ी है उससे छोटे चार भाई हैं। पिता उसके एक रिक्शा चालक हैं और मां घर-घर लोगों के बर्तन धोती है। उसके सभी भाई स्कूल जाते हैं बस नबीला को छोड़कर। नबीला ने आगे बताया कि उसे पढ़ने का तो बहुत शौक है लेकिन उसके पिता का मानना है कि लड़कियां स्कूल जाकर क्या करेंगी। लड़कियों को तो आगे चलकर सिर्फ किचन ही संभालना है। उसके पिता कहते हैं कि अगर नबीला काम नहीं करेगी तो उसके भाई कैसे पढ़ेंगे, वे तो लड़के हैं और उनको तो पढ़-लिखकर नौकरी करनी है। नबीला से बात करके पता चला कि पितृसत्ता ने किस कदर लड़कियों के मन में एक डर पैदा कर रखा है कि वे पढ़ नहीं सकती, उनका जीवन केवल रसोई और घर संभालना है। 

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इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता। शादी से पहले पिता के संरक्षण में रहना या भाई के संरक्षण में रहना। शादी के बाद पति के संरक्षण में रहना, यही पितृसत्तात्मक समाज की रीत है। एक स्त्री को हमेशा पुरुषों के संरक्षण में रहना पड़ता है। इसी तरह हमारे परिवारों में एक लड़की कितना पढ़ेगी, क्या पढ़ेगी, कब तक पढ़ेगी, पढ़ेगी भी या नहीं ये सारे फ़ैसले घर के मर्द ही लेते आए हैं।

हमने नबीला के पिता से भी बात करने की कोशिश की कि आखिर वह ऐसा क्यों करते हैं कि लड़कों को शिक्षा देते हैं और लड़कियों को नहीं। मैंने उन्हें सरकारी योजनाओं के बारे में समझाया और बताया कि सभी को शिक्षा का समान अधिकार है। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज कहां इस बात को मानने वाला था। उसके पिता ने मुझसे काफी अकड़कर कहा कि लड़की को शिक्षा देना हमारे रिवाज के खिलाफ़ है। यह कहानी केवल नबीला की नहीं है, न जाने ऐसी कितनी लड़कियां हैं जिन्हें इस दकियानूसी सोच के आधार पर शिक्षा से दूर रखा जाता है।

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यही होती है हमारे पितृसत्तात्मक समाज की सोच जहां पिता या भाई अपने फ़ैसले लड़कियों पर थोपते हैं। यह बस नबीला का हाल नहीं था। उस इलाके में रहनेवाली हर लड़की शिक्षा से कोसों दूर थी। हमारे समाज में केवल लड़कों को ही शिक्षित करना सही माना जाता है। यह हाल भारत की आधी आबादी का है जहां पर लड़कों को शिक्षा देना कर्त्वय माना जाता है, वहीं लड़कियों को शिक्षा देना गलत। भले ही हम आज कितनी भी बराबरी की बातें कर रहे हैं कि लड़का लड़की एक समान है लेकिन आज भी पितृसत्तात्मक सोच आज भी लोगों पर हावी है। इस्लाम महिलाओं की शिक्षा के खिलाफ कभी नहीं रहा है और कुरान के द्वारा हमेशा संदेश दिया जाता है कि अपने घर की बेटी को पढ़ाएं। लेकिन इस समय धर्म के कुछ ठेकेदार अपने फायदे के लोगों को धर्म के नाम पर गलत संदेश देते हैं और लोग उनकी बातों को आराम से मान लेते हैं। 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार, मुसलमानों की साक्षरता दर 57% से कुछ अधिक थी। बात अगर उच्च शिक्षा की करें तो मुस्लमानों का नामांकन दर राष्ट्रीय औसत 23.6% के मुकाबले 13.8% थी। एक मुस्लिम महिला होने के नाते मुझे भी शिक्षा के लिए कई सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। जब मेरी उम्र मात्र 10 साल थी मैं अपने भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। माता-पिता का पूरा हमेशा से पूरा समर्थन रहा है मेरी शिक्षा को लेकर। वह चाहते थे कि मेरी पढ़ाई अंग्रेजी मीडियम स्कूल से हो। जब मेरे माता-पिता मुझे दाखिले के लिए स्कूल में ले गए थे वहां मेरे मोहल्ले के काज़ी साहब भी अपने बेटे का दाख़िला करवाने आए थे। उन्होंने मेरे पिता से पूछा कि वह मुझे लेकर क्यों उस स्कूल में आए हैं जहां लड़के और लड़कियां साथ पढ़ते हैं। उस वक्त तो वह कुछ नहीं बोले लेकिन शाम में मेरे घर कुछ और लोगों को लेकर आए और मेरे पिता से कहा कि वह अपनी बेटी का दाखिला उस स्कूल में नहीं करवा सकते जहां लड़का और लड़की को साथ बिठाया जाता है और शिक्षा दी जाती है। वे इन सब चीजों के काफी खिलाफ थे।

मुस्लिम महिलाओं के लिए, उनकी दोहरी पहचान उनके लिए शिक्षा प्राप्त करना और भी कठिन बना देती है। अगर उनके परिवार की तरफ से पूरा समर्थन उन्हें मिलता है तो यह पितृसत्तात्मक समाज उनके लिए अलग-अलग चुनौतियां खड़ी कर देता है। मेरी जैसी न जाने तमाम ऐसी कितनी लड़कियां होंगी जिनकी शिक्षा में पितृसत्ता सबसे बड़ी रुकावट बनकर खड़ी है।

उनका मानना था कि अगर लड़कियां कोएड स्कूल में पढ़ेंगी तो मोहल्ले का माहौल और उनकी तालीम दोंनो पर असर होगा। ऐसा मोहल्ले के चंद और लोग मानते थे। इस्लाम का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि एक लड़की किसी गैर लड़के के साथ नहीं पढ़ सकती है और न ही बात कर सकती है। ऐसी ही तमाम बातों को लेकर घंटों इस बात पर वह लोग बहस करते रहे। उनके जाने के बाद मेरे पिता के भी दिमाग में ये सारी बातें गई। मां के लाख समझाने के बावजूद पिता अपनी बात से पीछे नहीं हटे और मेरा उस अंग्रेजी माध्यम स्कूल से एडमिशन कैंसिल करवा दिया।

इसके बाद मोहल्ले से कुछ दूरी पर एक सरकारी स्कूल हुआ करता था जहां केवल लड़कियां ही पढ़ती थीं, मेरा दाखिला उसी स्कूल में करवा दिया गया। धीरे-धीरे जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे-वैसे इस बात की समझ आती गई कि पितृसत्ता किस तरह हावी है लड़कियों की शिक्षा को लेकर। पितृसत्तात्मक सोच के कारण ही मैं अच्छे स्कूल से शिक्षा नहीं ले पाई। मुस्लिम महिलाओं के लिए, उनकी दोहरी पहचान उनके लिए शिक्षा प्राप्त करना और भी कठिन बना देती है। अगर उनके परिवार की तरफ से पूरा समर्थन उन्हें मिलता है तो यह पितृसत्तात्मक समाज उनके लिए अलग-अलग चुनौतियां खड़ी कर देता है। मेरी जैसी न जाने तमाम ऐसी कितनी लड़कियां होंगी जिनकी शिक्षा में पितृसत्ता सबसे बड़ी रुकावट बनकर खड़ी है।

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तस्वीर साभार: UNICEF

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