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गांव में रहनेवाली लड़कियों से यह पूछना कि तुम क्या करना चाहती हो विशेषाधिकार से प्रभावित सवाल लगता है। बहुत सी लड़कियां या तो सरकारी एग्ज़ाम की तैयारी कर रही होती हैं या घर संभाल रही होती हैं। अधिकतर लड़कियों की तो छोटी उम्र में ही शादी हो जाती है। मैं मैनपुरी के जसराजपुर गांव से हूं। मैं जब भी गांव जाती हूं तो वहां की स्थिति को समझने की कोशिश करती हूं। ऐसे में अगर मैं किसी लड़की से पूछती हूं कि वह आगे क्या करना चाहती है, आगे की पढ़ाई के बारे में क्या सोचा है तो वह हंसकर टाल देती है या कहती कि सरकारी एग्जाम की तैयारी कर रही है।

गांव में एक लड़की का पूरा दिन घर के कामों में ही निकल जाता है। बहुत ही संपन्न परिवार होते हैं वे जिनकी लड़कियां शहरों में पढ़ने जाती हैं या फिर उनका नेटवर्क बहुत अच्छा होता है जिसकी वजह से वे अपनी बेटी को शहर भेजने में सहज महसूस करते हैं। मेरे गांव से ज्यादातर लड़के कम उम्र में दिल्ली या नोएडा में आकर किसी फैक्ट्री या दुकान में काम करते हैं। इस हिसाब से हमारे नेटवर्क की मज़बूती कितनी और कहां तक है समझ सकते हैं। समाज में जो व्यक्ति विशेष आर्थिक पहुंच रखते हैं केवल वही लोग बच्चों को शिक्षा दे पा रहे हैं और आर्थिक मजबूती कि स्थिति दलित समाज में बहुत कम है। पहले ही दलित यानि शोषित तबके के पास बुनियादी सुविधाएं जैसे चिकित्सा, साफ पानी और खाने की सुविधाएं सबसे कम पहुंचती हैं। 

क्या कहते हैं आंकड़े ?

बीबीसी में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा मंत्रालय के साल 2016 के आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में पहली से 12वीं कक्षा तक के नामाकंन में दलितों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से ज्यादा है। हालांकि उच्च शिक्षा में वे राष्ट्रीय अनुपात से पीछे हैं। उच्च शिक्षा हासिल करने वालों का राष्ट्रीय औसत 24.3 प्रतिशत है जबकि यह दलितों में 19.1 प्रतिशत है। यह आंकड़े बताते हैं कि दलितों के बच्चे आर्थिक स्थिति के कारण ज्यादा पढ़ नहीं पाते इसलिए आरक्षण की व्यवस्था है ताकि इन्हें ऊपर आने में मदद मिल सके। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों की साक्षरता दर 83.5 फीसद है और महिलाओं की 68.2 फीसद लेकिन अनुसूचित जाति में महिलाओं की साक्षरता दर केवल 56.5 फीसद ही है। वहीं अनुसूचित जनजाति में महिलाओं की साक्षरता दर 49.4 फीसद रही।

गौरतलब है कि यूनिसेफ द्वारा साल 2014 में जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया कि अनुसूचित जाति के बच्चे ऊंची जाति के शिक्षकों द्वारा अपमान, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के कारण स्कूल जाने से कतराते हैं। यही नहीं, जो दलित बच्चे श्रमिक के रूप में काम करते हैं उन्हें उनके श्रम का हिस्सा भी कम दिया जाता है लेकिन अपनी ज़रूरतों को देखते हुए कम उम्र में ही बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर होते हैं। यूनिसेफ के मुताबिक गैर दलित और गैर- आदिवासी समुदायों के 37 फीसद बच्चों के मुकाबले 51 फीसद दलित बच्चे प्राथमिक स्कूलों से बाहर हो जाते हैं। घर में आर्थिक समस्या और बाहर होने वाले उत्पीड़न के कारण बच्चों के प्राथमिक स्कूलों की स्थिति भी बेहद खराब है। इंटरनैशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार भारत में दुनिया के सबसे अधिक बाल मज़दूर हैं। इनमें से अधिकांश बच्चे गरीब, हाशिए के समाज और अनुसूचित जाति /जनजाति से आते हैं।

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लड़कियों के लिए क्यों है दोहरी चुनौती

गांव में शिक्षकों की संख्या में कमी और नीरस वातावरण के कारण लड़कियों में पढ़ाई को लेकर कोई उत्साह नहीं होता। साथ ही घर में रोज़मर्रा के काम के दवाब के कारण लड़कियां पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाती हैं। वहीं, समाज की मानसिकता भी होती है जो यह मानती है कि लड़की के लिए घर में रहकर काम करना ही सही है, बाहर जाएगी तो दस लोगों से मिलेगी-जुलेगी, घर में कलेश होगा और अगर कुछ हो गया तो हम कहां मुंह दिखाने के लायक रहेंगे। जो लड़कियां कॉलेज या कोचिंग जाती हैं वे भी पूरा समय नही दे पाती। मेरे गांव की जुगली बताती हैं, “जब से लॅाकडाउन हुआ है तब से कोचिंग नही जा रही हूं और अब जा भी नही पाएंगे क्योंकि उसके साथ जाने वाली लड़की की शादी हो चुकी है। अकेले जाने से सब मना करते हैं। रास्ता ठीक नही हैं इसलिए घर में ही रहकर तैयारी कर रही हूं।” जुगली आगे बताती हैं कि वह अगर वह अपनी बात घरवालों के सामने रखती हैं तो उन पर और ज्यादा चिल्लाया जाता है ताकि वह चुप रहे। उनके पिता को पसंद नहीं की वह बाहर कहीं जाए। वह बताती हैं कि उनकी बस एक ही दोस्त है जिससे फोन पर ही कभी-कभार बातचीत होती है।

कई लड़कियां ईंट के भट्ठे पर भी काम करती हैं ताकि घर की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक हो सके लेकिन वह भी पास नहीं है। दलितों में ज्यादा गरीबी होने के कारण वे शिक्षा से पिछड़ जाती हैं। वे अपनी रोज़मर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में ही परेशान रहते हैं जिसमें खाना-पीना और अन्य चीजे शामिल हैं जिसका सीधा दवाब लड़कियों पर पड़ता है। जहां जितनी आर्थिक समस्या होती है वहां स्थिति और खराब होती है क्योंकि महिलाओं के पास बाहर जाकर काम करने का कोई विकल्प नही होता जिसके कारण उन्हें घर में ही रह कर सारा काम संभालना होता है। मेरे गांव में मर्द घर का कोई काम नहीं करते हैं और ना ही कोई लड़कियां या औरतें उनसे काम करवाती हैं। घरेलू हिंसा भी इसमें एक बड़ी भूमिका अदा करती है। दलित पुरुष अधिक अपमान और उपेक्षा के चलते ज्यादा कुंठाग्रस्त होते हैं, जिसके कारण दलित महिलाएं सामान्य महिलाओं के मुकाबले अधिक घरेलू हिंसा का सामना करती हैं। एनसीआरबी के साल 2017 में दर्ज किए गए आंकड़ो के मुताबिक घरेलू हिंसा में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी 24.6 फीसद दलित महिलाओं की है। हमारे देश में दलित उत्पीड़न को रोकने के लिए कानून तो लाए गए लेकिन इससे महिला हिंसा पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ा। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ही आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में भारत में हर रोज 10 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। हाथरस केस में हमने देखा भी कि एक दलित परिवार को कितनी जकड़ने की कोशिश की गई।

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आपको लगता होगा कि जातिवाद अब कहां है लेकिन आज भी समाज में दलितों के साथ जातिगत शोषण और हिंसा होती है जिसमें छोटी-बड़ी सभी प्रकार की संस्थाएं शामिल होती हैं। स्कूल और विश्वविघालयों में शिक्षकों का बच्चों के साथ किया जाने वाला जातिवादी व्यवहार भी बड़ा कारण है जिसके कारण कई बच्चें स्कूल जाना पसंद नहीं करते। जातिगत भेदभाव और हिंसा के कारण जहां पुरुषों पर मानसिक और आर्थिक दवाब पड़ता है। वहीं, एक औरत को कई गुना ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है क्योंकि यह पुरुष प्रधान देश है, यहां कुछ भी हो घर के सारे फैसले एक पुरुष की सहमति से होते हैं। हमारे गांव की कई लड़कियां हैं जो इस ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत चुपचाप रह जाती हैं। वे किसी के भी खिलाफ लड़ना नहीं जानती। उन्हें समाज की मूल समस्या, गरीबी, लिंगभेद, जातिवाद और उनके साथ हुए शोषण से जुड़े मुद्दों की समझ उन तक पहुंचनी चाहिए ताकि वे समझ पाएं कि कहां उनके साथ गलत हुआ है।  

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तस्वीर साभार : Counterview

सीखने की प्रक्रिया में हूं, आधी पत्रकार आधी एक्टिविस्ट । लड़की जात हूं मगर कमज़ोर नहीं, समता और समानता ही मेरा धर्म है।

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