राजकुमारी गुप्ता: काकोरी कांड में हथियार पहुंचानेवाली इस क्रांतिकारी को इतिहास ने दर्ज नहीं किया| #IndianWomenInHistory
तस्वीर साभार: Jagran Josh
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भारत पर दो सौ साल चलनेवाले अंग्रेज़ों के शासन की शुरुआत से ही इसके ख़िलाफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों में कई लड़ाइयां लड़ी गईं। अलग-अलग कालखंण्डों में आज़ादी के लिए हुए विद्रोहों में स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी भी रही, लेकिन मुख्यधारा इतिहास में इनमें से केवल कुछ को ही जगह दी गई। ज्यादातर महिला स्वतंत्रता सेनानी उपेक्षित रहीं। जैसे संन्यासी विद्रोह में शामिल देवी चौधरानी, कर्नाटक की रानी चेन्नामा, झांसी की झलकारी बाई, लखनऊ की उदा देवी, संथाल हूल की नायिका फूलो और झानो मुर्मू, प्रितिलता वाडेदार, राजकुमारी गुप्ता इत्यादि। यहां उल्लेखित यह नाम उन तमाम नामों का एक छोटा-सा हिस्सा हैं जिनके प्रति इतिहासकारों की उपेक्षा ने उन्हें दस्तावेज़ों के किसी कोने में पड़ी धूल खाती फाइलों तक ही समेट दिया। 

इससे ज्यादा हमें कुछ पता है तो वह यह कि आज़ादी के लिए हुए आंदोलनों में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। हम इतना जानकर न सिर्फ़ संतुष्ट हो जाते हैं बल्कि गर्व से फूल जाते हैं। हममें से कुछ ने ही, कभी यह जानने की कोशिश की होगी कि ये महिलाएं कौन थीं। उनकी आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति कैसी थीं। उनके लिए घर की चौखट से बाहर निकालना कितना आसान/मुश्किल था और वे कौन से कारण थे जिन्होंने इन्हें आज़ादी के बाद वापस घरों में धकेल दिया?

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विषय में बात करते ही, हमारे पास पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी लिस्ट होती है। यहां तक कि मोटे तौर पर हमें इनके कार्यक्षेत्र भी कंठस्थ हैं लेकिन जब महिला स्वतंत्रता सेनानियों की बारी आती है तब हमें चार-पांच नाम ही याद आते हैं और उनके योगदान के नाम पर मुश्किल से उतनी ही पंक्तियां। ऐसी ही एक सेनानी थीं राजकुमारी गुप्ता।

विडंबना यह है कि जिन पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में हमें पढ़ाया जाता है, उनमें भी अधिकतर उच्चवर्गीय थे। स्थानीय विद्रोहों और आम घरों से आनेवाले स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख हमें बेहद कम मिलता है। अगर स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी धारा की बात करें, तो पाएंगे कि इस धारा में उपेक्षितों की संख्या बढ़ जाती है, जबकि इस धारा से जुड़ी महिला क्रांतिकारियों का उल्लेख ही नहीं होता। 

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बीसवीं सदी में होनेवाले आंदोलनों में महिलाओं का शामिल होना, उनका चारदिवारी से बाहर आना, सार्वजनिक जीवन में शामिल होना हमें एक बड़ा परिवर्तन ज़रूर लग सकता है लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी। महिलाओं के प्रति पुरुष नेताओं का दृष्टिकोण पूरी तरह पारंपरिक ही था। तत्कालीन घोर पितृसत्तात्मक समाज में जो विशेषाधिकार पुरुषों के पास थे उसके कारण स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व भी उनके पास ही था। इस कारण इन नेताओं ने महिलाओं की माँ, बहन, पोषक, देवी जैसी पारंपरिक छवि को ही प्रोत्साहित किया।

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9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड को अंजाम देनेवाले क्रांतिकारियों को रिवॉल्वर मुहैया करवाने की जिम्मेदारी राजकुमारी की थी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। राजकुमारी अपने कपड़ों के अंदर हथियार छिपाकर, ऊपर से खादी पहनकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया करती थीं।

स्वतंत्रता संग्राम में शामिल उच्चवर्गीय परिवार से आनेवाली महिलाओं को कई बार घर के पुरुषों का प्रोत्साहन प्राप्त था। वहीं मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों की जो महिलाएं स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थीं, उनमें से कुछ महिलाओं के परिवारों ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। इन महिलाओं को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ी। यहां मैं ऐसी ही एक महिला कॉमरेड का उल्लेख करना चाहूंगी जिन्हें इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसकी यह हक़दार हैं। इनकी देशभक्ति और बहादुरी निश्चित ही हमारे लिए प्रेरणादायक हैं।

इन महिला कॉमरेड का नाम राजकुमारी गुप्ता था। इनका संबंध हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएसन से था। बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में साल 1902 में कानपुर के बांदा में जन्मी राजकुमारी के पिता एक पंसारी थे। राजकुमारी की शादी महज़ तेरह साल की उम्र में मदन मोहन गुप्ता से कर दी गई थी। मदन कांग्रेस के कार्यकारिणी समीति के सदस्य थे। राजकुमारी और मदन दोंनो इलाहाबाद में महात्मा गांधी और चन्द्रशेखर आज़ाद से जुड़े थे।

राजकुमारी जैसे-जैसे आंदोलनो में भाग लेने लगीं, अंग्रेज़ो का अत्याचार देखकर उन्हें यह लगने लगा कि केवल अहिंसा के रास्ते आज़ादी नहीं मिल सकेगी। इसके बाद वह चन्द्रशेखर आज़ाद से न सिर्फ जुड़ी बल्कि बिना अपने पति और ससुरालवालों को बताए गुप्त सूचनाएं और सामग्री दूसरे क्रान्तिकारियों तक पहुंचाने लगीं। बाद में वह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएसन के इलाहाबाद ग्रुप में शामिल हो गई।

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फ़िल्ममेकर और लेखिका सागरी छाबड़ा को दिए साक्षात्कार में राजकुमारी कहती हैं, “हमको जो करना था हमने किया। हम ऊपर से गांधीवादी थे, नीचे से क्रांतिकारी।” इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि काकोरी की घटना में इतनी अहम ज़िम्मेदारी निभाने के बाद भी इस घटना से जुड़े अन्य क्रांतिकारियों के साथ हमें राजकुमारी का उल्लेख तक नहीं मिलता।

9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड को अंजाम देनेवाले क्रांतिकारियों को रिवॉल्वर मुहैया करवाने की जिम्मेदारी राजकुमारी की थी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। राजकुमारी अपने कपड़ों के अंदर हथियार छिपाकर, ऊपर से खादी पहनकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया करती थीं। सुरुचि थापर की किताब, ‘वीमन इन द इंडियन नैशनल मूवमेंट:अनसीन फेसेज़ एंड अनहर्ड वॉइसेज (1930-1942)’ के अनुसार एक बार जब वह हथियार पहुंचाने जा रही थीं तब इन्हें खेतों गुज़रते हुए गिरफ़्तार कर लिया गया। जब इनकी गिरफ्तारी के विषय में इनके ससुरालवालों को पता चला तब उन्होंने न केवल राजकुमारी को घर से बेदखल कर दिया बल्कि वीर भगत नामक स्थानीय अखबार के माध्यम से यह भी ऐलान कर दिया कि उनका राजकुमारी से कोई रिश्ता नहीं है। साथ ही इनके मायकेवालों ने भी इनसे रिश्ता खत्म कर लिया।

1930, 1932 और 1942 में राजकुमारी को जेल में गुज़ारने पड़े। इन्होंने अपना बाकी जीवन अकेले ही बिताया। फ़िल्ममेकर और लेखिका सागरी छाबड़ा को दिए साक्षात्कार में राजकुमारी कहती हैं, “हमको जो करना था हमने किया। हम ऊपर से गांधीवादी थे, नीचे से क्रांतिकारी।” इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि काकोरी की घटना में इतनी अहम ज़िम्मेदारी निभाने के बाद भी इस घटना से जुड़े अन्य क्रांतिकारियों के साथ हमें राजकुमारी का उल्लेख तक नहीं मिलता।

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तस्वीर साभार: Jagran Josh

स्रोत:

Wikipedia
The Better India

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