इंटरसेक्शनलग्रामीण भारत डिजिटल युग में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है?| नारीवादी चश्मा

डिजिटल युग में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है?| नारीवादी चश्मा

डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देने वाली वैश्विक संस्था GSMA की तरफ़ से हाल ही में जारी 'मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट, 2022' से पता चलता है।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में घर से बाहर कदम निकालती महिलाएं, आवाज़ बुलंद करती महिलाएं, लिखती-पढ़ती गतिशील महिलाएं या फिर अपने विचारों को साझा करती और अपने ज्ञान को बढ़ाती महिलाएं क़तई पसंद नहीं होती हैं। ऐसा होना इसलिए स्वाभाविक है, क्योंकि पितृसत्ता कभी भी महिलाओं को बराबरी की जगह नहीं देती है, यही पितृसत्ता का मूल है। इसलिए जैसे ही महिलाएं पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए आगे कदम बढ़ाती हैं तो वे पूरे समाज को खटकने लगती हैं। ऐसी कोई भी गुंजाइश न हो इसके लिए समाज महिलाओं को शुरू से ही जेंडर आधारित भेदभाव के माध्यम से उन्हें सत्ता के हर स्वरूप से उचित दूरी बनाए रखने के लिए हिंसा को बढ़ावा देने लगता है।

चूंकि ‘संचार’ सशक्तिकरण का एक प्रभावी अंग है और ये अपने आप में एक मज़बूत सत्ता भी है जो बेहद सहजता से किसी भी इंसान को विकास करने की सुलभता देती है, फिर बात चाहे उसके ज्ञान को बढ़ाने की हो या फिर उसकी गतिशीलता, विचार शक्ति और परिपेक्ष्य को वृहत करने की। इन सबमें संचार सबसे अहम भूमिका अदा करता है। इसीलिए जब भी बात भारतीय महिलाओं को डिजिटल युग से जोड़ने और उनकी भागीदारी तय करने की आती है तो हमारे आसपास ऐसी बातें सुनाई देने लग जाती हैं:

“लड़कियां मोबाइल चलाएंगी तो बिगड़ जाएंगी”

“महिलाओं को डिजिटल चीजें सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है”

“लड़कियां ऑनलाइन क्लास में पढ़कर क्या करेंगीं”

“डिजिटल काम सीखकर क्या करेगी, करना तो उसे चूल्हा-चौका ही है”

अब तक ये सिर्फ़ बातें लगती थीं लेकिन अब इन बातों का प्रभाव भी सामने आने लगा है। डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देने वाली वैश्विक संस्था GSMA की तरफ़ से हाल ही में जारी ‘मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट, 2022′ से पता चलता है कि महामारी ने ‘एक बड़े डिजिटल गैप’ को भी उजागर किया है। यह रिपोर्ट कहती है कि मोबाइल और इंटरनेट तक पहुंच के बिना ऐसे लोगों के और अधिक पीछे छूट जाने का खतरा है। कोरोना महामारी के दौर में हमने ये देखा और अनुभव किया है कि सूचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, ई-कॉमर्स और वित्तीय सेवाओं के लिए मोबाइल और इंटरनेट तक पहुंच बहुत कितनी ज़्यादा जरूरी है।

अगर हम डिजिटल जेंडर गैप की वजहों और इनकी जड़ों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो इसकी पहली वजह पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचा है, जो महिलाओं के विकास, शिक्षा, अवसर, गतिशीलता और यौनिकता पर शिकंजा बनाए रखने के लिए उन्हें इससे जुड़ी हर संभावना से दूर रखता है। फिर चाहे वह मोबाइल फ़ोन हो या फिर इंटरनेट।

लेकिन इन सबके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -5) के अनुसार भारत में आधे से अधिक महिलाओं (53.9 फ़ीसद) के पास मोबाइल फोन तो है, लेकिन इनमें से केवल 22.5 फ़ीसद महिलाएं ही वित्तीय लेन-देन के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं। पितृसत्तात्मक सोच के तहत बचपन से ही जेंडर आधारित भेदभाव के आधार पर की जाने वाली कंडीशनिंग का ये प्रभाव है कि आधी से अधिक महिलाओं के पास उनका अपना मोबाइल फ़ोन नहीं है क्योंकि उनके घर में फ़ोन की कमांड सिर्फ़ पुरुषों को दी जाती है, इस तर्ज़ पर कि ‘औरतों को फ़ोन की ज़रूरत क्या है?’ इसलिए एनएफएचएस-5 के आंकड़े बताते हैं कि केवल एक तिहाई भारतीय महिलाएं ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 12वीं से अधिक की शिक्षा पाने वाली 72 फ़ीसद से अधिक महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं। वहीं पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई करने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 8 फ़ीसद है। बड़ी उम्र की महिलाओं की तुलना में युवा महिलाओं/लड़कियों के इंटरनेट इस्तेमाल की संभावना अधिक होती है। इसमें भी जिनके पास पैसा और संसाधन अधिक है, उनके ही पास इंटरनेट प्रयोग करने की संभावना अधिक है।

इंडिया स्पेंड में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, भारत में डिजिटल जेंडर गैप (डिजिटल लैंगिक विभाजन) स्पष्ट है और यह साफ दिखता है। एशियन डेवलपमेंट बैंक और सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म लिंक्डइन की 2022 की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, “इस अंतर का यह अर्थ भी है कि महिलाएं श्रम बाजार में उन अवसरों से वंचित हो जाती हैं, जहां पर डिजिटल कुशलता की मांग होती है।”

वैश्विक संस्था GSMA की तरफ़ से हाल ही में जारी ‘मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट, 2022’ से पता चलता है कि महामारी ने ‘एक बड़े डिजिटल गैप’ को भी उजागर किया है। यह रिपोर्ट कहती है कि मोबाइल और इंटरनेट तक पहुंच के बिना ऐसे लोगों के और अधिक पीछे छूट जाने का खतरा है।

लैंगिक भेदभाव आधारित कंडीशनिंग की वजह से समाज में महिलाओं पर हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी तय करने के लिए बाधा का सामना करना पड़ता है। आगे बढ़ने पर उन्हें संघर्ष का सामना करना पड़ता है। समाज उन्हें सक्षम बनाने की बात तो करता है लेकिन इन सबके साथ हम वो स्पेस भूल जाते हैं जहां महिलाएं उस सक्षमता का इस्तेमाल कर सके और आगे बढ़ सकें। इसका नतीजा है कि यह डिजिटल जेंडर गैप महिलाओं से संचालित व्यवसायों को निम्न-तकनीक और कम राजस्व पैदा करने वाले क्षेत्रों जैसे- खाद्य और हस्तशिल्प तक ही सीमित कर देता है, जहां पर भविष्य में प्रगति करने के बहुत ही कम अवसर होते हैं। निजी शोध संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी  (सीएमआईई) के अनुसार 2017 और 2020 के बीच लगभग 2.1 करोड़ महिलाएं श्रम मानचित्र से बाहर हो गई थीं। आर्थिक जगत में इसी क्रम में महिलाओं के संदर्भ में ये रिपोर्ट दुःखद है कि कोरोना महामारी आने से पहले ही भारत में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों में कमी आ रही थी।

अगर हम डिजिटल जेंडर गैप की वजहों और इनकी जड़ों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो इसकी पहली वजह पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचा है, जो महिलाओं के विकास, शिक्षा, अवसर, गतिशीलता और यौनिकता पर शिकंजा बनाए रखने के लिए उन्हें इससे जुड़ी हर संभावना से दूर रखता है। फिर वो मोबाइल फ़ोन हो या फिर इंटरनेट। इसे परिवार और समाज में इज़्ज़त से भी जोड़ा जाता है कि अगर कोई महिला फ़ोन चलाती है तो उसे ख़ासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में ग़लत नज़रों से देखा जाता है। ये वही ग़लत नज़रें होती है जो महिला के चरित्र का मूल्यांकन करती है, जिसके चलते महिलायें ऑनलाइन क्लास से लेकर नौकरी के ऑनलाइन आवेदन तक से दूर होती चली जाती है।

इसके बाद दूसरा प्रमुख कारण है- गाँव-शहर का विभाजन। इंडिया में सारा विकास होता है और भारत आज भी रोटी, कपड़ा और मकान के सवाल से जूझ रहा होता है। यही ज़मीनी सच्चाई है, इसी वजह से शहरी महिलाओं के पार मोबाइल फ़ोन उपलब्ध होता है और ग्रामीण महिलाएँ इससे दूर रहती है। इसका सीधा प्रभाव उनके काम में भी पड़ता है, जिसकी वजह से ग्रामीण महिलाएँ तकनीक काम से दूर आज भी ज़्यादातर मज़दूरी संबंधित कामों में ही अपनी भागीदारी कर पाती है।

ये कुछ ऐसी बुनियादी वजहें है जो अशिक्षा, जागरूकता का अभाव, जेंडर आधारित भेदभाव, आर्थिक सशक्तिकरण में महिलाओं की सीमित भागीदारी जैसी अलग-अलग समस्याओं के कारक बनते है। इसी क्रम में डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन (DEF), दिल्ली द्वारा 2021 में असम, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा की 10,000 शहरी और ग्रामीण महिलाओं पर एक सर्वे किया गया। इस सर्वे के अनुसार 82 फ़ीसद ग्रामीण महिला उद्यमी डिजिटल रूप से साक्षर नहीं हैं। इनमें से 80 फ़ीसद महिलाओं ने कहा कि उन्होंने कभी भी पेटीएम, गूगल पे या भीम जैसे डिजिटल भुगतान ऐप का उपयोग नहीं किया है। ये सभी आंकड़े अपने भारतीय समाज की सच्ची तस्वीर सामने रख रहे है, जिन पर हमें विचार करने की ज़रूरत है और इस बात का मूल्यांकन करने की ज़रूरत है कि विकास और डिजिटल युग के दौर में आधी आबादी कहाँ है?


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