समाजपर्यावरण ईको एंग्ज़ायटीः जलवायु परिवर्तन की घटनाएं कैसे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रभावित करती हैं

ईको एंग्ज़ायटीः जलवायु परिवर्तन की घटनाएं कैसे लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रभावित करती हैं

कुछ लोग, जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले प्रभावों के कारण मनौवैज्ञानिक तौर पर प्रभावित होते है जिसे ईको एंग्जायटी कहा जाता है। इसे ‘क्लाइमेट एंग्जायटी’ भी कहा जाता है। 

अधिक सर्दी, गर्म होती धरती, हीटवेव्स, बाढ़, तूफान, सूखा, बारिश का हर साल भीषण रूप में आना जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख वजह है। लगातार प्राकृतिक आपदाओं के आने की वजह से पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने का सवाल हमारे सामने खड़ा है। जलवायु परिवर्तन आज के समय की एक वास्तविकता है और यह पृथ्वी के भविष्य के लिए एक खतरा है। लगातार आनेवाली आपदाओं से जान-माल का भारी नुकसान तो होता ही है साथ ही यह लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। भले ही व्यक्ति आपदा से फौरी तौर पर प्रभावित क्यों न हो और किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में ही क्यों न हो। पर्यावरणीय नुकसान और आपदाओं से होनेवाले डर को ‘ईको एंग्जायटी’ कहा जाता है। आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से जानते हैं ईको एंग्जायटी के बारे में।

ईको एंग्जायटी क्या है?

अगर आप जलवायु परिवर्तन, लगातार मौसम में होनेवाले अतिरेक्त बदलाव, प्राकृतिक आपदाओं जैसी घटनाओं को लेकर चिंतित हैं, अगर इस तरह की चिंताएं आपको लगातार प्रभावित कर रही हैं, आपको सोने में परेशानी होती हैं, आप पृथ्वी के भविष्य को लेकर ज्यादा सोचते हैं जिस वजह से किसी चीज पर ध्यान नहीं लगा पाते हैं इसकी एक वजह यह कि शायद आप ईको एंग्जायटी का सामना कर रहे हैं। कुछ लोग, जलवायु परिवर्तन की वजह से होनेवाले प्रभावों के कारण मनौवैज्ञानिक तौर पर प्रभावित होते हैं जिसे ईको एंग्जायटी कहा जाता है। इसे ‘क्लाइमेट एंग्जायटी’ भी कहा जाता है। 

लगातार आनेवाली आपदाओं से जान-माल का भारी नुकसान तो होता ही है साथ ही यह लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। भले ही व्यक्ति आपदा से फौरी तौर पर प्रभावित क्यों न हो और किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में ही क्यों न हो। पर्यावरणीय नुकसान और आपदाओं से होनेवाले डर को ‘ईको एंग्जायटी’ कहा जाता है।

शोधकर्ताओं ने पर्यावरण के साथ मनुष्य के संबंधों और चिंताओं का वर्णन करने के लिए ईको एंग्जायटी टर्म को गढ़ा है। साल 2017 में प्रकाशित अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (एपीए) ने ईको एंग्जायटी को ‘पर्यावरण विनाश का एक पुराना डर बताया।’ द गार्डियन में प्रकाशित लेख के मुताबिक क्लाइमेट साइकोलॉजी एलायंस की कैरोलिन हिकमैन कहती हैं कि सैकड़ों लोग उनसे संपर्क कर रहे हैं और समर्थन की तलाश में हैं। वह आगे कहती हैं कि ईको एंग्जायटी पैथोलॉजिकल नहीं है। यह जलवायु संकट के लिए एक वैध प्रतिक्रिया है। इस तरह का महसूस करना मानसिक रूप से स्वस्थ होना है। असली परेशानी यह है कि हम अपनी भावनाओं को कैसे मैनेज करते हैं।

क्या ईको एंग्जायटी एक बीमारी है?

ईको एंग्जायटी न तो एक क्लीनिकल डायग्नोस है और न ही एक डिसऑर्डर। लेकिन यह एक बहुत ही बड़ी चिंता है कि लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। ईको एंग्जायटी डाट.कॉम के अनुसार आधिकारिक तौर पर ईको एंग्जायटी को किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक बीमारी नहीं माना जाता है। ईको एंग्जायटी एक स्पेक्ट्रम है जो कुछ लोगों को अन्य की तुलना में ज्यादा प्रभावित करता है। पर्यावरण के लिए चिंता होना एक तरह से तर्क संगत है इसलिए तो इसे किसी तरह का विकार या बीमारी नहीं कहा जा सकता है। लेकिन ईको एंग्जायटी कभी-कभी ज्यादा हो सकती है और यह पहले से मौजूद किसी चिकित्सीय स्थिति के साथ मिलकर बहुत बढ़ सकती है।

हफपोस्ट में प्रकाशित लेख के अनुसार महिलाओं में भी बड़ी संख्या में इस तरह की परेशानी देखने को मिलती है। लेख के अनुसार ऐडो, जो 13-36 साल के लोगों के साथ काम करती हैं उसका कहना है कि ईको एंग्जायटी महिलाओं में बहुत आम है। लगभग 70 फीसदी महिलाएं में वर्तमान की पर्यावरणीय स्थिति को लेकर बहुत चिंतित रहती हैं। पर्यावरण फैक्टर कैसे फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं इसको लेकर वे बहुत चिंतित रहती हैं। 

किन मामलों में ईको एंग्जायटी गंभीर हो जाती है

ईको एंग्जायटी एक तरह से सामान्य डर और चिंता है जो पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति से सामने आती है। अगर इको एंग्जायटी की वजह से आपका दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है तो इसके बारे में चिकित्सीय परामर्श लेना आवश्यक है। इसमें सिरदर्द, दर्द, जी घबराना, पसीना आना और कपकपाहट जैसी परेशानियां हो सकती है। कुछ गंभीर मामलों में ईको एंग्जायटी घुटन या डिप्रेशन का बड़ा कारण बन जाती है। वास्तव में ईको एंग्जायटी हर इंसान को एक तरह से प्रभावित नहीं करती है। ये उन लोगों के लिए प्रचलित है जो पर्यावरण की सुरक्षा और उसके लिए अधिक सजग है। यह बहुत संभव है कि प्रकृति के नुकसान को देखते हुए ऐसे लोग अपरोधबोध की स्थिति में पहुंच सकते हैं। भविष्य की चिंता, पृथ्वी ग्रह और बच्चों के जीवन के बारे में सोचकर ऐसे भाव ज्यादा आते हैं।

ईको एंग्जायटी एक नया टर्म है लेकिन बहुत सारे अध्ययनों और शोध में इससे जुड़ी जानकारियों में यह सामने आया है कि लोग इससे प्रभावित होते है। द गार्डियन में प्रकाशित लेख के मुताबिक इंग्लैंड में हुए एक सर्वे के अनुसार जलवायु संकट की वजह से युवा लोगों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। रॉयल कॉलेज ऑप साइयक्रैटिक्स के अनुसार सामान्य आबादी की तुलना में युवाओं पर ईको एंग्जायटी का असर अधिक है। सर्वे के अनुसार इंग्लैंड में आधे से अधिक बाल और किशोर मनोवैज्ञानिक, मरीजों में राज्य के पर्यावरण स्थिति को लेकर तनाव में देख रहे हैं।

तस्वीर साभारः Natural History Museum

द लैसेंट में प्रकाशित ग्लोबल स्टडी के अनुसार 16 से 25 साल के युवाओं में पर्यावरण की खराब स्थिति की वजह से तनाव अधिक है। भारत समेत अन्य नौ देशों में हुए इस अध्ययन के अनुसार युवा और बच्चें जलवायु परिवर्तन के लिए अधिक चिंतित है। अध्ययन में शामिल सभी देशों में 84 प्रतिशत पर्यावरण के लिए अधिक चिंतित दिखें। लगभग आधे से अधिक लोगों के अंदर दुख, चिंता, गुस्सा, अपराधबोध, असहाय जैसे भाव थे। लगभग 45 प्रतिशत लोगों का कहना था कि जलवायु परिवर्तन को लेकर उनके मन नकारात्मक विचार आते हैं। हफपोस्ट में प्रकाशित लेख के अनुसार महिलाओं में भी बड़ी संख्या में इस तरह की परेशानी देखने को मिलती हैं। लेख के अनुसार ऐडो, जो 13-36 साल के लोगों के साथ काम करती है उसका कहना है कि ईको एंग्जायटी महिलाओं में बहुत आम है। लगभग 70 फीसदी महिलाएं में वर्तमान की पर्यावरणीय स्थिति को लेकर बहुत चिंतित रहती हैं। पर्यावरण फैक्टर कैसे फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं इसको लेकर वे बहुत चिंतित रहती हैं। 

दुनियाभर में तमाम शोध और अध्ययनों से बात स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से लोग मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रभावित हो रहे हैं। बच्चे, युवा, महिलाओं से लेकर हर वर्ग और लिंग के लोग में प्रकृति में होने वाले बदलावों के लेकर चिंतित हैं। ईको एंग्जायटी, पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील होने की एक वजहों में से है। मेडिकल न्यूज़ टुडे के अनुसार ईको एंग्जायटी को दूर करने के लिए पर्यावरण को बचाने के कदमों पर काम किया जाए। जीवन में सकारात्मक तरीके से पर्यावरण हित की आदतों को लाया जाएं। ईको एंग्जायटी वाले लोगों को इस विषय में बात करनी चाहिए। सामुदायिक प्रयासों के तहत अन्य लोगों में पर्यावरण के लिए जागरूकता फैलानी चाहिए। आशावादी बनकर हर स्तर पर पर्यावरण के हित के लिए काम करना चाहिए।

आज पर्यावरण हमारे लिए एक भीषण समस्या बन गई है। बीते साल अगर भारत की बात करे तो यहां लगभग हर दिन आपदाओं का सामना किया गया है। ऐसी स्थितियों से लोगों के मन पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन यह स्थितियां और विकराल रूप ने ले इसके लिए हमें प्रकति को बचाने के लिए कदम उठाने चाहिए। जलवायु परिवर्तन के संकट को खत्म करने के लिए सरकारों से कड़े सवाल करने होंगे। कठोर नीतियों पर चलने के लिए खुद को तैयार रखकर अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी बहुत ज़रूरी है।


Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content