स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य पितृसत्तात्मक समाज में हिस्टेरेक्टॉमी और महिलाओं के अनुभव

पितृसत्तात्मक समाज में हिस्टेरेक्टॉमी और महिलाओं के अनुभव

हिस्टेरेक्टॉमी जैसी प्रक्रिया के इन परिणामों की इस वास्तविकता को पितृसत्तात्मक समाज नहीं पचा पता। इससे गुज़री महिलाएं पितृसत्ता के इस विचार का आसानी से शिकार हो जाती हैं, “अब हम औरत कहलाने लायक नहीं हैं, क्योंकि बच्चादानी निकल चुकी है।”

अक्सर महिलाओं के स्वास्थ्य ख़ासकर यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य संबंधित किसी बीमारी की बात आती है तो उसे नज़रअंदाज़ किया जाता है। ख़ासकर गृहिणियों के संबंध में यह और भी स्पष्ट रूप से सामने आता है। इनके स्वास्थ्य से जुड़े ज़रूरी मुद्दों पर समाज इस तरह से चुप्पी लगा देता है या इसे इतना पर्सनल बना देता है, जैसे ये खुले में बात करने लायक मुद्दे हैं ही नहीं। गृहिणियों के संबंध में पितृसत्तात्मक समाज में एक मूलमंत्र का हमेशा से पालन किया जाता है कि इनकी अधीनता को इतना पक्का कर दिया जाए की वे घर की चार दीवारी के अलावा कुछ और सोच भी न सकें। वे भी इसी हाल में जीना सीख लेती हैं।

किसी डॉक्टरी सहायता के अभाव में अपने शरीर की दिक्कतों को पहचानने में असमर्थ रह जाती हैं। उनके स्वास्थ्य के प्रति उनके परिवेश में मौजूद लोगों के लापरवाह रुख़ और घर संभालने की जद्दोजहद के कारण वे भी अपने स्वास्थ्य के प्रति ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ रवैये से जल्द ग्रस्त हो जाती हैं। इस घरेलू भाग-दौड़े के बीच, तुरंत आराम पाने के उद्देश्य से किसी के बताई गई दवाइयों का लंबे समय तक सेवन करने लगती हैं तो नई बीमारियां और जन्मा जाती है। यही नहीं, एक या दो बार दिखाए गए किसी डॉक्टर के पुराने प्रिस्किप्शन की दवाइयों को कम समय में आराम पाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। घर में रहकर काम करना और इस काम के श्रम को कम पहचान मिलना हमारे समाज में लैंगिक अंतर जैसी भेदभावपूर्ण व्यवस्था का ही परिणाम है। 

यहां हम महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित एक ऐसे मुद्दे की बात करने जा रहे हैं जो काफी प्रचलित है। हम बात कर रहे हैं हिस्टेरेक्टॉमी की जिसे आम शब्दों में बच्चादानी निकालना भी कहा जाता है। ‘हिस्टेरेक्टॉमी’ या ‘गर्भाशयोच्छेदन’ एक ऐसी प्रजनन संबंधी सर्जिकल प्रक्रिया/ऑपरेशन है जिसमें एक महिला के शरीर से गर्भाशय को हटाया जाता है। महिलाओं के शरीर में गर्भाशय एक ऐसा अंग है जहां उनके गर्भवती होने पर बच्चा अपना आकार लेता है। हिस्टेरेक्टॉमी के ऑपरेशन के दौरान आमतौर पर पूरा गर्भाशय निकाल दिया जाता है। कई बार डॉक्टर फैलोपियन ट्यूब और अंडाशय को भी निकाल देते हैं। इस प्रक्रिया के बाद पीरियड्स होना बिलकुल बंद हो जाता है यानी इसके बाद गर्भधारण नहीं किया जा सकता है।

हिस्टेरेक्टॉमी के ऑपरेशन करने के चिकित्सकीय कारणों की चर्चा की जाए तो इसमें गर्भाशय कैंसर और अन्य गैर-कैंसरजन्य जैसी गर्भाशय स्थितियां शामिल हैं जैसे फाइब्रॉएड/सिस्ट (गैर-कैंसरजन्य ट्यूमर), एंडोमेट्रियोसिस (पीड़ादायक टिशू जो मासिक धर्म के साथ मोटा होता जाता है जिसके कारण दर्द और रक्स्राव होता है), प्रोलैप्स (पैल्विक अंग का खिसकना) और अन्य गर्भाशय विकार शामिल हैं।

हिस्टेरेक्टॉमी जैसी प्रक्रिया के इन परिणामों की इस वास्तविकता को पितृसत्तात्मक समाज नहीं पचा पता। इससे गुज़री महिलाएं पितृसत्ता के इस विचार का आसानी से शिकार हो जाती हैं, अब हम औरत कहलाने लायक नहीं हैं, क्योंकि बच्चादानी निकल चुकी है।” यह सोच उनके लिए अपनी परेशानी को व्यक्त करना और भी मुश्किल बना देती है। ज्यादातर महिलाओं के पास इस समस्या को दूर करने के लिए संसाधन भी नहीं होते हैं और पर्याप्त जागरूकता का अभाव भी रहता है।

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को अच्छे से पहचाना जाता है। यही कारण है कि मेडिकल फील्ड में महिलाओं की बीमारी का इलाज सामान्य प्रचलित पद्धति से किया जाता है। इसका मुख्य कारण महिलाओं का उनकी शारीरिक स्वायत्तता में कमी का होना क्योंकि ये स्वायत्ता अक्सर पुरुष के हाथ में होती है। शारीरिक स्वायत्तता का यहां मतलब यह है कि मेरा शरीर मेरे लिए है, मेरा अपना है और इससे जुड़े निर्णय लेने का अधिकार केवल मुझे ही है। हम इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे कोई महिला कब माँ बनना चाहे यह उस पर निर्भर करेगा। लेकिन ऐसे फै़सले लेने की यह आज़ादी हमें हाशिये पर रहनेवाली और मिडिल क्लास महिलाओं में कम ही दिखाई पड़ती है। 

भारत में, कई शोध यह बताते हैं कि हिस्टेरेक्टॉमी महिलाओं के लिए एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इस प्रक्रिया के बाद के लंबे समय तक स्वास्थ्य पर पड़नेवाले प्रभावों पर कोई अध्ययन नहीं किया गया है। इसलिए कई बार देखा जाता है कि कई महिलाओं में अक्सर ऑपरेशन के बाद कई सारी भ्रान्तियां पैदा हो जाती हैं। इसका मुख्य कारण डॉक्टर का उन्हें ऑपरेशन के बाद की आवश्यक केयर से जुड़ी हिदायतें न दिया जाना है। कुछ केस में डॉक्टर ही रुचि नहीं दिखाते हैं। उनके लिए महिला मरीज़ मुश्किल ही प्राथमिकता का विषय होती हैं। ज्यादातर गरीब महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में धक्के खाते देखा जा सकता है। जैसे कभी अस्पताल के गेट पर ओपीडी का रास्ता पूछते हुए तो कभी अस्पताल के कोनों में अपने बच्चे और पति के साथ ज़मीन पर चादर बिछाए सुबह से शाम तक लंबा इंतजार करते या फिर सरकार द्वारा आयोजित कैंपों से निकलते।

सीमा अपने शरीर से गर्भाशय के निकल जाने पर खुद से सवाल करती हैं…”क्या मैं खुद को औरत कह सकूंगी? मुझे अजीब लगता है। मैं इसलिए उन औरतों के बीच इसकी बात नहीं करती जो इससे नहीं गुज़री हैं। मेरी गली में कुछ हैं मेरी पड़ोसन जिनकी बच्चेदानी कई साल पहले निकल चुकी है। उनसे अपना हाल साझा कर लेती हूं। बच्चादानी होने और मां बनने से हमारी पहचान और मजबूत होती है। अगर हम मां न बन पाएं तो जीवन ही क्या फिर।”

क्या कहते हैं आंकड़े

भारत में, सबसे पहले हिस्टेरेक्टॉमी से जुड़े डेटा का संकलन साल 2015-16 में, चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4)  में किया गया था। इसमें महिलाओं का प्रजनन की अवस्था की आयु वर्ग में हिस्टेरेक्टॉमी से गुजरने के कारणों के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी इकट्ठा की गई हैं। डेटा के अनुसार हिस्टेरेक्टॉमी अशिक्षित औरतों में और जिनकी कम उम्र में शादी हुई होती है उनमें ज़्यादा प्रचलित है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाली महिलाएं जिनकी स्कूली शिक्षा तक पहुंच नहीं होती है इनमें यह ज़्यादा देखने को मिलता है।

“जैसे शरीर खाली हो गया”

यूपी के हापुड़ की सीमा (56) ने हिस्टेरेक्टॉमी से पहले और बाद की परिस्थिति को फेमिनिज़म इन इंडिया से साझा किया। हिस्टेरेक्टॉमी से पहले की परिस्थिति में उन्होंने बताया कि उन्हें हर महीने सामान्य चक्र से पहले पीरियड्स आता था। यह लगभग 6 से 8 दिन चलता था। हर महीने तेज दर्द के साथ इतनी हेवी ब्लीडिंग होती थी कि एक साथ उन्हें दो सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करना पड़ता था। 

सीमा कहती हैं, “मुझे खुद से लगता था कि शायद बंद होने की कगार पर हैं इसलिए हेवी फ्लो है। स्थानीय डाॅक्टर के पास जाती तो वह भी यही कहते कि पीरियड्स बंद हो जाएंगे और इसके लिए कई दवाइयां लिख देते। लेकिन दो साल तक मेरी स्थिति ऐसी ही बनी रही। रक्तस्राव के साथ-साथ बड़े गाढ़े थक्के भी आते थे। मैं बहुत डर जाती थी क्योंकि हमारी औरतें के स्पेशलिस्ट डाॅक्टर बड़े मंहेंगे होते हैं, इसलिए कभी किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञ से संपर्क नहीं किया था कभी। सालभर बाद जाकर मैंने अपने ईसीजी, अल्ट्रासाउंड के साथ और टेस्ट कराए तो पता चला कि बच्चादानी में गांठ है। इसके उपचार के लिए तुरंत बच्चादानी को निकालना जरूरी था।

दिल्ली की रचना (49) के ऑपरेशन को एक साल बीता है। वह इसे आज भी एक हादसे या भयावह सपने की तरह लेती हैं। वह बताती हैं कि इस सर्जरी के बाद उस हिस्से पर टांके और जख्म से दर्द और भारीपन महसूस होता था। कुछ टांके घुलने और कुछ टांके कटने के दो-तीन महीनों में जाकर महसूस होने लगा कि शरीर में कुछ है ही नहीं।

सीमा अपने शरीर से गर्भाशय के निकल जाने पर खुद से सवाल करती हैं…”क्या मैं खुद को औरत कह सकूंगी? मुझे अजीब लगता है। मैं इसलिए उन औरतों के बीच इसकी बात नहीं करती जो इससे नहीं गुज़री हैं। मेरी गली में कुछ हैं मेरी पड़ोसन जिनकी बच्चेदानी कई साल पहले निकल चुकी है। उनसे अपना हाल साझा कर लेती हूं। बच्चादानी होने और मां बनने से हमारी पहचान और मजबूत होती है। अगर हम मां न बन पाएं तो जीवन ही क्या फिर।”

हिस्टेरेक्टॉमी के ऑपरेशन से पहले और उसके बाद टांके लगने की अवस्था तक महिलाएं अलग अनुभव करती हैं। दिल्ली के छतरपुर की निवासी छाया (59) जिनका हिस्टेरेक्टॉमी का ऑपरेशन दस साल पहले हुआ था वह बताती हैं, “ऑपरेशन के बाद शरीर में बेहद कमज़ोरी महसूस होती थी। कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। कुछ खा लेती हूं तो खाना आज भी नहीं पच पाता है। मिनट-मिनट पर पिशाब आना और टॉयलेट नहीं जाती हूं तो कपड़ों में निकल जाता है। यह बिल्कुल भी सामान्य नहीं है मेरे लिए। ऑपरेशन के बाद कमज़ोरी और वजन का कम होना आज भी जारी है। घर के काम पहले चुटकियों में हो जाते थे। अब वो ताकत भी नहीं रही है।”

दिल्ली की रचना (49) के ऑपरेशन को एक साल बीता है। वह इसे आज भी एक हादसे या भयावह सपने की तरह लेती हैं। वह बताती हैं कि इस सर्जरी के बाद उस हिस्से पर टांके और जख्म से दर्द और भारीपन महसूस होता था। कुछ टांके घुलने और कुछ टांके कटने के दो-तीन महीनों में जाकर महसूस होने लगा कि शरीर में कुछ है ही नहीं। वह कहती हैं, “वह हिस्सा एकदम खाली लगता है, एक खाली कुएं की तरह। मुझे महीने भर आराम करने की सलाह दी गई पर मेरे लिए यह आराम बेकार है क्योंकि हम औरतों की जान जिस चीज में जान होती है वही शरीर से निकल गई है अब।” हिस्टेरेक्टॉमी से जीवन में आई निरसता को यूपी की पूनम (62) इस तरह बयां करती हैं, “अच्छा हुआ मेरे तीन बच्चे होने के बाद मुझे यह हुआ। लेकिन मेरा शरीर अब बेकार है और किसी काम का नहीं है। हम जीने को कितने साल भी जी लें, पर यह खालीपन अंत तक रहेगा।”

हिस्टेरेक्टॉमी से जुड़ा सामाजिक कलंक 

आज भी समाज में बांझपन एक सामाजिक कलंक और लांछन के रूप में देखा जाता है। अविवाहित महिलाओं में हिस्टेरेक्टॉमी जैसी चिकित्सकीय शारीरिक प्रोसीजर होने के बाद कंसीव न कर पाने की संभावना उन्हे बांझपन की श्रेणी में ला खड़ा करती है। जिन औरतों को हिस्टेरेक्टॉमी करवाने की ज़रूरत पड़ती है ऐसे केस में ऑपरेशन से पहले और बाद में पितृसत्तात्मक मानसिकता अपनी भूमिका में आ जाती है। दिल्ली के शाहदरा में रहनेवाली अविवाहित नीरज को अल्ट्रासाउंड समेत अन्य क्लिनिकल टेस्ट कराने के बाद पता चला की उनके गर्भाशय में गांठ है। इसके लिए उन्हे डाॅक्टर ने हिस्टेरेक्टॉमी का सुझाव दिया। कम उम्र में बांझ होने के दंश को झेलने से बचने के लिए उन्होंने शादी हो जाने तक हिस्टेरेक्टॉमी कराने के सुझाव को टालना चुना। उनका कहना है कि, अगर मेरा यूट्रेस रिमूव हो गया तो मेरी शादी नहीं हो पाएगी।

हिस्टेरेक्टॉमी से गुजरी यह महिलाएं पितृसत्तात्मक के साये में अपने चलते-फिरते जीवन में खुद को तलाशना भूल जाती हैं। हिस्टेरेक्टॉमी गर्भाशय संबंधी एक शारीरिक सर्जरी ही नहीं है बल्कि कई वर्जाओं और भ्रांतियों से खुद को ग्रस्त करने का भी ज़रिया है। हिस्टेरेक्टॉमी के विचार को पितृसत्तात्मक समाज में कैसे आकार दिया जाता है इस पर विस्तृत व्यक्तिपरक शोधकार्य मौजूदा दौर में बेहद ज़रूरत है।


Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content