इंटरसेक्शनलजेंडर महिलाओं के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज भी एक चुनौती है

महिलाओं के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज भी एक चुनौती है

सोशल मीडिया में लड़कियों को उनके अपने नाम से जाना जाता है। वरना घर-समाज में उनकी पहचान उनके घरवालों से होती है। वो किसी की बेटी या किसी के बहन के रूप में ही जानी जाती है।

आधुनिक भारत में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। डिजिटल भारत जैसे राष्ट्रीय अभियान के ज़रिए सरकारें भी लगातार डिजिटल साधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है। सरकार की भी अधिकतर योजनाओं और यहाँ तक की कोरोना वैक्सीन लेने तक के लिए रेजिस्ट्रेशन करवाने के लिए मोबाइल की ज़रूरत पड़ रही है और स्मार्टफ़ोन के साथ सोशल मीडिया भी आज सूचनाओं के आदान-प्रदान में अहम भूमिका अदा कर रही है, लेकिन अफ़सोस आज भी बहुत सी ऐसी युवा लड़कियाँ हैं, जिनके लिए सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।

ग्रेजुएशन कर रही ज्योति (बदला हुआ नाम) के भाई ने उसके साथ बुरी तरह मारपीट की क्योंकि ज्योति ने अपना सोशल मीडिया अकाउंट बनाया था, जिसे उसके भाई ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट में देख लिया था। इसके बाद ज्योति से उसका मोबाइल छीन लिया गया और उसका सुरक्षा के नाम पर परिवार की पाबंदियाँ बढ़ने लगी।

बारहवीं में पढ़ने वाली सुजाता (बदला हुआ नाम) के दोस्तों ने एकदिन अपने दोस्तों के साथ की ग्रुप फ़ोटो सोशल मिडिया पर पोस्ट कर दी, जिसे देखने के बाद सुजाता के घर वालों ने उसे बहुत डाँटा-मारा। इसके बाद सुजाता का किसी भी दोस्त से बात करने या आने-जाने के लिए सख़्त पाबंदी लगा दी गयी। सुजाता के घरवालों का मानना है कि सोशल मीडिया में लड़कियों की फ़ोटो पोस्ट करने से उसकी बदनामी होती है क्योंकि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना गंदी बात है।

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मालूम है ऐसी सोच को सुनकर आपको ताज्जुब होगा और एक पल के लिए आप ये भी सोचेंगें कि ये किसी और देश की बात होगी, पर आपको बताऊँ ये अपने ही देश की बात है। बस फ़र्क़ ये है कि ये इंडिया में नहीं भारत में हो रहा है। जी हाँ, वो इंडिया नहीं, जहां डिजिटल भारत अभियान से देश की तरक़्क़ी हो रही, बल्कि ये भारत जहां डिजिटल भारत जैसे अभियान से लड़कियों को दूर रखने का अभियान ज़ारी है। ज्योति जैसे ऐसे ढ़ेरों परिवार है जो आज भी सोशल मीडिया पर लड़कियों के अकाउंट के बर्दाश्त नहीं कर पाते है और उसे पूरी तरह ग़लत मानते है। उनका मानना है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाली लड़कियाँ और महिलाएँ अच्छी नहीं होती, क्योंकि वहाँ वो अपने विचार रखती है। अपनी पसंद-नापसंद का ज़िक्र करती है। अपनी तस्वीरें साझा करती है और सबसे अहम दूसरे लोगों के संपर्क में आती है।

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महिलाओं की गतिशीलता हमेशा हमलोगों के समाज में बुरा मानी जाती रही है, जो महिला ज़्यादा लोगों से बात करे, जिसकी अपनी समाज में पहचान हो या जो अपने विचारों को बेबाक़ी से सामने रखे, वो कभी भी अपने पितृसत्तात्मक समाज को स्वीकार नहीं होती है। इस सबके बीच, सोशल मीडिया ने गतिशीलता और नेट्वर्किंग को एक नया रूप दिया है, जो बहुत सरल और सहज है। महिलाओं की गतिशीलता और विकास के अवसर को सीमित करने में अपना समाज अपनी आधी से ज़्यादा ताक़त झोंक देता है, कभी सुरक्षा के नाम पर तो कभी शान के नामपर। ताज्जुब को युवा लड़कों की सोच पा भी होता है, जिन्होंने समय के साथ अपनी सोच में कई दिखावटी सुधार किए है, जिसमें वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाली महिला-दोस्तों को तो स्वीकार करते है। वे चाहते है कि तकनीक से लैस युवा लड़कियाँ उनकी दोस्त बने, लेकिन जैसे ही उनके घर की महिलाएँ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू करती है तो ये उनकी तथाकथित शान के ख़िलाफ़ हो जाता है।

महिलाओं की गतिशीलता हमेशा हमलोगों के समाज में बुरा मानी जाती रही है, जो महिला ज़्यादा लोगों से बात करे, जिसकी अपनी समाज में पहचान हो या जो अपने विचारों को बेबाक़ी से सामने रखे, वो कभी भी अपने पितृसत्तात्मक समाज को स्वीकार नहीं होती है।

अक्सर जब मैं किशोरी बैठक में जाती हूँ तो बहुत सारी ऐसी लड़कियों के साथ मिलती हूँ, जिनके घर वालों ने उन्हें स्मार्ट फ़ोन तो दिया, लेकिन किससे बात करेंगीं, कब बात करेंगीं और स्मार्ट फ़ोन में किस ऐप का इस्तेमाल करेंगीं, ये सारे छोटे-बड़े फ़ैसले उनके घरवाले ही करते है। तकनीक ने कई मायनो में हमारे समाज को विकसित किया है, लेकिन जब हमलोग युवा महिलाओं के साथ सुरक्षा के नामपर लगायी जानी वाली पाबंदियों और उसके स्तर को देखते है तो ऐसा मालूम होता है कि कई मायनों में इस तकनीक महिलाओं की ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है।

अगर कोई महिला सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती है तो ग्रामीण परिवेश में उसके चरित्र पर सवाल खड़े करना बहुत आसान हो जाता है। लेकिन ठीक उसी समय लड़कों को इन सारे साधनों से लैस होने और पूरी सत्ता के साथ इस्तेमाल करने में कोई दिक़्क़त नहीं होती। ये भी लैंगिक भेदभाव का ही स्वरूप है, जिसमें लड़कों को लड़कियों से ज़्यादा आज़ादी दी जाती है। सोशल मीडिया सिर्फ़ फ़ोटो पोस्ट करने की जगह नहीं बल्कि ये एक ऐसा मंच है जिससे जुड़ने के बाद हमलोगों की जानकारी के अवसर बढ़ते है। अलग-अलग लोगों से मिलकर, उनके विचारों को जानने का मौक़ा मिलता है। सोशल मीडिया की सबसे अच्छी बात बताते हुए देईपुर की रहने वाली तारा कहती हैं कि ‘सोशल मीडिया में लड़कियों को उनके अपने नाम से जाना जाता है। वरना घर-समाज में उनकी पहचान उनके घरवालों से होती है। वो किसी की बेटी या किसी के बहन के रूप में ही जानी जाती है। और सोशल मीडिया में लड़कियाँ अपनी पसंद और नापसंद के बारे में लिखती है और अपनी बातों को शेयर कर सकती है।‘ पितृसत्तात्मक समाज में सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी लड़कियों के लिए किसी जोखिम से कम नहीं क्योंकि इस मंच में भी महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है जो लड़कियों को अपनी बात कहने से ज़्यादा अपने होने का आत्मविश्वास दिलाता है। 

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तस्वीर साभार : homegrown.co.in

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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