एडिटर्स नोट: जाति की परतें हमेशा महिलाओं के संघर्षों को कई गुना ज़्यादा बढ़ाने का काम करती हैं। जब बात युवा महिलाओं की आती है तो उनके संघर्ष को उजागर करने का कोई स्पेस नहीं होता। ग्रामीण उत्तर भारत के हाशियेबद्ध मुसहर समुदाय की युवा महिलाओं के संघर्ष को उजागर करने की दिशा में है ‘हाशिये की कहानियां‘ अभियान एक पहल है। इसका उद्देश्य ग्रामीण युवा महिलाओं की उन युवा महिलाओं की कहानियों को सामने लाना है, जिनकी तरफ़ अक्सर मुख्यधारा का रुख़ उदासीन होने लगता है। इसी पहल में यह चौथी कहानी है खुशी की। यह लेख स्वाती सिंह ने द रेड डोर एवं क्रिया संस्था द्वारा संचालित यंग विमेन लीडर फ़ेलोशिप के तहत लिखा है।
ज्योति को आज एक बार फिर मज़दूरी पर जाने में देरी हो गई है। तेज़ी के बढ़ते कदम और हाँफती साँसों के बीच ज्योति के दिल में इसबात का डर है कि कहीं आज भी उसकी मज़दूरी कम न हो जाए। उसे पैसों की इनदिनों काफ़ी ज़रूरत है, क्योंकि बीते कई दिनों से उसका भाई काम पर नहीं जा रहा है, जिसके चलते घर में खाने को कोई राशन नहीं है। इसलिए ज्योति आज एक़बार फिर घर का सारा काम जल्दी खतम करके मनरेगा में मज़दूरी करने जाना पड़ रहा है।
सोलह वर्षीय ज्योति अक्सर मज़दूरी करने जाती है, जिससे घर में दो पैसे आ सके। लेकिन इससे उसके ऊपर काम के बोझ में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। उसे हर रोज़ सुबह घर के सारे काम करने पड़ते है और चूल्हे के लिए खेतों से लकड़ियाँ भी इकट्ठा करके लानी पड़ती है। ज्योति की बस्ती में सभी लड़कियों की दिनचर्या ऐसी ही है, जब वह स्कूल जाने की उम्र में चूल्हे-चौके और मज़दूरी के काम में लगी होती है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक के खरगूपुर गाँव की रहने वाली ज्योति को कभी पढ़ने-लिखने का मौक़ा नहीं मिला, जिसकी प्रमुख वजह है उसकी मुसहर जाति।
कभी-कभी ग़ुस्सा आता है मुसहर जाति में जन्म लेने से
जातिगत भेदभाव को लेकर जब मैंने ज्योति से बात कि उसने अपने अनुभव के बारे में बताया, “मेरा पहले बहुत मन करता था कि मैं भी स्कूल पढ़ने जाऊं। लेकिन मेरे घर के आसपास जब कुछ बच्चे पढ़ने जाते तो उनको मुसहर जाति का होने की वजह से अलग-अलग तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता। कभी उनसे बर्तन धुलवाए जाते तो कभी दूर बैठने को कहा जाता। इसलिए उन्होंने ने स्कूल जाना कुछ दिनों बाद बंद कर दिया। इसके बाद जब मैंने घर में स्कूल जाने की बात की कही तो उन बच्चों के साथ हुए भेदभाव की बात कहकर मुझे भी नहीं जाने दिया गया। इसलिए मैं पढ़ नहीं पायी।”
आज भी ज्योति जैसी लड़कियों को अपनी शिक्षा और विकास के अवसर के बजाय मज़दूरी का काम करने को मजबूर होना पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार बीते कुछ सालों में बच्चों का रोज़गार में जुड़ाव का स्तर बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बात मज़दूरी करने को मजबूर बच्चे खेती, कॉटन और चावल की खेती के कामों में मज़दूरी करते हैं।
ज्योति जातिगत भेदभाव के बारे में आगे बताती है कि, ‘हम तो जब खेत में चूल्हे के लकड़ी इकट्ठा करने भी जाते है तो लोग दूर से जातिगत गाली देकर कई बार पत्थर फेंक देते है और अगर कभी किसी हैंडपंप से पानी पी लो तो उसके लिए भी गाली देकर ये कहते है कि मैने उनके पीने के पानी को अशुद्ध कर दिया। ये सब देखकर मेरा बस्ती के बाहर कहीं जाने का मन नहीं करता है। कई बाद डर भी लगता है कि कहीं कभी ऐसा न हो ये सच में हमें मार दें। और बहुत बार हमको भगवान पर ग़ुस्सा भी आता है कि मुझे इस जाति में पैदा ही क्यों किया?‘ जातिगत हिंसा और भेदभाव से जुड़ी खबरें अक्सर हम देखते है-पढ़ते है और भूल जाते है, क्योंकि आज भी इसका शिकार सिर्फ़ समाज के हाशिएबद्ध समुदाय को बनाया जाता है।पर इस हाशिए की सीमा समय के साथ कब और कितनी बदलेगी ये कह पाना मुश्किल है, जो अपने समाज की कड़वी सच्चाई भी है।
बाल मज़दूरी करने को मजबूर ज्योति
ग़ौरतलब है कि जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़ते अपने देश में उत्तर प्रदेश भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देशों में से एक है, जिसकी ज़नसंख्या का स्तर क़रीब ब्राज़ील की कुल ज़नसंख्या के बराबर है। आधुनिक बनते शहरों की लंबी फ़ेहरिस्त वाले उत्तर प्रदेश के गाँव में आज भी ज्योति जैसी लड़कियों को अपनी शिक्षा और विकास के अवसर के बजाय मज़दूरी का काम करने को मजबूर होना पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार बीते कुछ सालों में बच्चों का रोज़गार में जुड़ाव का स्तर बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बात मज़दूरी करने को मजबूर बच्चे खेती, कॉटन और चावल की खेती के कामों में मज़दूरी करते हैं।
जातिगत भेदभाव को लेकर जब मैंने ज्योति से बात कि उसने अपने अनुभव के बारे में बताया, “मेरा पहले बहुत मन करता था कि मैं भी स्कूल पढ़ने जाऊं। लेकिन मेरे घर के आसपास जब कुछ बच्चे पढ़ने जाते तो उनको मुसहर जाति का होने की वजह से अलग-अलग तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता। कभी उनसे बर्तन धुलवाए जाते तो कभी दूर बैठने को कहा जाता। इसलिए उन्होंने ने स्कूल जाना कुछ दिनों बाद बंद कर दिया।
इन चर्चाओं के बीच जब हम बात करते है बाल मज़दूरी के मानक की तो इसके अलग-अलग स्तर है और मानक है। जिसके आधार पर बाल मज़दूरी के स्तर को हम अलग-अलग जगह पर अलग-अलग स्तर पर देख सकते है। लेकिन इन सबके बीच जब हम ज्योति जैसी लड़कियों को घरेलू काम से लेकर मनरेगा में मज़दूरी काम करने को मजबूर देखते है तो इसका प्रभाव साफ़तौर पर उनके विकास के अवसर पर दिखाई पड़ता है, जिसमें वे शिक्षा व विकास के अवसर दूर घर और मज़दूरी के काम में अपना बचपन गुज़ारने को मजबूर दिखाई पड़ती है। नतीजतन उन्हें आसानी से बाल विवाह का शिकार बनाया जाता है।

महिला मज़दूर के बढ़ते आँकडें और लड़कियों का स्कूल ड्रॉप आउट
साल 2017 से उत्तर प्रदेश में मनरेगा में महिलाओं की सीमित भागीदारी को लेकर काफ़ी चर्चाएँ रही है, जिसके बाद सरकार के अनुसार, लगातार इनमें बढ़त देखने को मिल रही है। यानी कि धीरे-धीरे मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जिसे सरकार सफलता के मान रही है। पर इन महिलाओं के बीच में कितनी ज्योति जैसी किशोरियाँ काम करने को मजबूर है, इससे जुड़े आँकड़े कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इसी क्रम में सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की दिशा में महिलाओं की भागीदारी साल 2019-20 में 34.28 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर साल 2022-23 में 37.60 हो चुकी है।
मनरेगा मज़दूरी या फिर अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के रोज़गार के लिए चलायी जाने वाली सरकारी योजनाओं में काग़ज़ों पर बढ़ती महिलाओं की संख्या के आधार पर ये कहना कि अब महिलाओं की स्थिति अच्छी है, ये बिल्कुल भी सही नहीं। क्योंकि जब हम महिला की बात करते है तो हमें उस महिला की सामाजिक प्रस्थिति को भी ध्यान में रखना होगा कि वो किस समुदाय, जाति और स्थिति से है। क्योंकि विकास और रोज़गार के पथ पर आगे बढ़ती महिलाओं के बीच हाशिएबद्ध समुदाय की महिलाओं की भागीदारी एक बड़ा सवाल है।
वहीं दूसरी ओर सात साल से लेकर सत्रह साल तक की उम्र में ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों का स्कूल से ड्रॉप आउट होने का स्तर अपने आप में बड़ी चिंता का विषय है, जिसे साफ़तौर मज़दूर तबके में देखा जा सकता है। जहां ज्योति जैसी लड़कियों के ऊपर घर से लेकर मज़दूरी करके कमाई करने की ज़िम्मेदारी भी थोप दी जाती है, जिसके तले उनके पढ़ने और आगे बढ़ने के सपने कुचल दिए जाते है।
ज्योति अब बस्ती में चलने वाली पाठशाला का हिस्सा बनकर पढ़ना-लिखना सीख रही है। लेकिन इसके बीच में कई बार उसे छुट्टी करके मज़दूरी करने जाना पड़ता है। ज्योति अपने सपने के बारे में बताते हुए कहती है कि, ‘उसका सपना पढ़ने और बीए करने का है। वो बीए करके अपनी ज़िंदगी में सम्मान के साथ जीना चाहती है, जिससे उसको अपनी जाति की वजह से कभी कोई हिंसा-भेदभाव या गाली न सुनना पड़े।‘
About the author(s)
Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

