तपती गर्मी में अपनी झोपड़ी छोड़ने को क्यों मजबूर है इस बस्ती के लोग?
तस्वीर साभार: रेणु
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बनारस ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक के चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती में रहनेवाली सुदामा और बस्ती में रहनेवाले बाकी सभी परिवार आजकल रोज़ ग्यारह बजते ही अपनी झोपड़ी छोड़कर पास के आम के बगीचे में आ जाते हैं और शाम छह बजे तक यही रहते हैं। उनके ऐसा करने की वजह है गर्मी। इस साल उत्तर भारत में गर्मी अपने नए रिकॉर्ड की तरफ़ बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। अभी से ही तापमान 44-48 डिग्री तक जाने लगा है। इस मुसहर बस्ती में किसी भी परिवार के पास पक्की छत नहीं है। सभी अपनी छोटी-छोटी झोपड़ी बनाकर रहने को मजबूर हैं। बढ़ते तापमान की वजह से उन्हें हर रोज़ अपनी झोपड़ी छोड़कर पास के बगीचे में जाना पड़ता है।

इस गाँव की दो मुसहर बस्तियों में जिसमें क़रीब पचास से अधिक परिवार हैं और सभी की स्थिति एक जैसी है। इस तपती गर्मी में जब हम अपनी घर की पक्की छत के नीचे बेहाल हुए जा रहे हैं तो इन परिवारों और छोटे-छोटे बच्चों के बारे में सोचिए कि इनके लिए ये गर्मी किसी आपदा से कम नहीं होती है। इतना ही नहीं, इन बस्तियों में साफ़ पीने के पानी की भी कोई सुविधा नहीं है, इनमें से एक बस्ती में जब मुसहर समुदाय ने हाइवे जामकर हैंडपंप की मांग की तो वहां उनके लिए हैंडपंप लगा गया, लेकिन इसी गांव की दूसरी बस्ती में पानी की क़िल्लत आज भी क़ायम है।

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भीषण गर्मी में खाली पड़ी झोपड़ी

मुसहर दलित वर्ग में आनेवाली सबसे निचली जाति है। मुसहर का शाब्दिक अर्थ है- चूहा खानेवाले। बिहार और उत्तर प्रदेश में ये इस समुदाय के लोग अधिक संख्या में पाए जाते हैं पर सभी जगहों पर इनकी स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है। इनकी बस्तियां आज भी अपनी जाति की वजह से हर गाँव में सबसे बाहरी हिस्से में होती हैं, क्योंकि उन्हें आज भी ‘अछूत’ माना जाता है। कोई भी मुसहर बस्ती में जाना नहीं चाहता है। गाँव के बाहर सिवान (ख़ाली या सूनसान कहे जाने वाले क्षेत्र) में इनकी बस्तियां होती हैं जिनके सामने से शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोज़गार और विकास की हर छोटी-बड़ी योजनाएं गुजर जाती हैं पर इन तक न के बराबर पहुंचती हैं।

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इस साल उत्तर भारत में गर्मी अपने नए रिकॉर्ड की तरफ़ बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। अभी से ही तापमान 44-48 डिग्री तक जाने लगा है। इस मुसहर बस्ती में किसी भी परिवार के पास पक्की छत नहीं है। सभी अपनी छोटी-छोटी झोपड़ी बनाकर रहने को मजबूर हैं। बढ़ते तापमान की वजह से उन्हें हर रोज़ अपनी झोपड़ी छोड़कर पास के बगीचे में जाना पड़ता है।

मुसहर समुदाय को आज भी कई स्तरों पर अलग-अलग तरह से जातिगत भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद जब कोई भी इस समुदाय की परेशानियों को उजागर करने की कोशिश करता है तो उसे प्रशासन की फटकार तो कई बार कार्रवाई भी झेलनी पड़ जाती है। फिर बात मुसहर समुदाय के बच्चों के घास खाने की हो या फिर कुपोषण की वजह से टीबी जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो रही बच्चियों की हो।

चित्रसेनपुर गाँव में ये मुसहर परिवार पिछले पचीस से तीस साल से यहीं रह रहे हैं। इनकी कई पुश्तें यहां ख़त्म भी हो गई। जब भी इन बस्तियों की बदहाली की ख़बर अख़बारों तक पहुंचती है तो तुरंत सरकारी कर्मचारी सर्वे और आवास का फॉर्म भरने के नाम पर यहां पहुंच ज़ाया करते हैं, लेकिन आज तक इनकी स्थिति जस की तस बनी हुई है। न कोई ज़मीन आवंटित हुई और न घर। इसलिए ये मुसहर परिवार बीते कई सालों से खाली पड़ी ज़मीन पर अपना डेरा बनाए हुए हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ सेवापुरी ब्लॉक के इसी गाँव के मुसहर बस्ती की स्थिति ऐसी है। इसके अलावा राने और खरगुपुर गाँव भी ऐसे हैं, जहां की मुसहर बस्ती में आवास और पानी की यही समस्या है।   

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बगीचे में अपने बच्चे को खाना खिलाती एक महिला

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक को साल 2020 में नीति आयोग ने एक मॉडल ब्लॉक बनाने के लिए गोद लिया, जिसमें यह तय किया गया कि इस ब्लॉक के 87 गाँव में सभी सरकारी योजनाओं को सौ प्रतिशत लागू किया जाएगा। पिछले दो सालों में मॉडल ब्लॉक बनाने के नाम पर काफ़ी बजट पास हो चुके होंगें और कई बड़ी बैठक भी हुई होंगी, लेकिन बाक़ी सुविधाएं तो छोड़ दीजिए इन बस्तियों में आवाज़ और साफ़ पीने के पानी के साधन का अभाव तक दूर नहीं हो पाया है।

ऐसी हालत में मॉडल ब्लॉक की कल्पना भी खोखली सी लगती है। जहां हम अपने ब्लॉक के हाशिएबद्ध समुदाय तक पहुंच नहीं बना पाए हैं ऐसे में आख़िर हम किस तरह के मॉडल को पेश करेंगे? कैसे इन गांवों को विकसित कहेंगे जहां आज भी जातिगत भेदभाव के चलते मुसहर बच्चों की भागीदारी नहीं हो पा रही, जहां मनरेगा में रोज़गार की कमान किसी एक समुदाय तक सीमित है और मुसहर समुदाय के लोगों को आज भी बंधुआ मज़दूरी करनी पड़ती है। ये सभी सवाल ज़मीनी है और इन्हें उठाने का मक़सद कोई हंगामा करना नहीं बल्कि सत्ता का ध्यान आकर्षित करना है कि वह सदियों से अभाव को अपनी नियति मान चुके और जातिगत भेदभाव झेल रहे एक समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में काम करे।

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सभी तस्वीरें रेणु द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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