संस्कृति सरस्वती देवीः हिंदी सिनेमा जगत की शुरुआती महिला संगीतकारों में से एक| #IndianWomenInHistory

सरस्वती देवीः हिंदी सिनेमा जगत की शुरुआती महिला संगीतकारों में से एक| #IndianWomenInHistory

साल 1920 में उन्होंने अपने गायन करियर की शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो मुंबई से की थी। वह और उनकी बहन मानेक होमजी दोनों मिलकर प्रसिद्ध प्रोग्राम ‘होमजी सिस्टर्स ऑर्केस्ट्रा’ होस्ट किया करती थी।

सरस्वती देवी, हिंदी सिनेमा जगत की शुरुआती दौर की महिला संगीत निर्देशकों में से एक थीं। 1930 और 40 के दशक में उन्होंने कई लोकप्रिय हिंदी फिल्मों को संगीतमय किया था। वह बॉम्बे टॉकीज की ‘अछूत कन्या’ में अपने म्यूजिक स्कोर से लेकर ‘मैं बन के चिरिया बोलू रे’ जैसे प्रसिद्ध गीतों के लिए जानी जाती हैं। यह वह दौर था जब महिलाओं का सिनेमा जगत में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था।

शुरुआती जीवन

सरस्वती देवी का जन्म 1912 में पारसी परिवार में हुआ था। इनके घर का माहौल बहुत संगीतमय था। इन्होंने विष्णु नारायण भटखंडे के तहत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। उसके बाद उन्होंने लखनऊ के मैरिस कॉलेज से संगीत की शिक्षा हासिल की थी। उनका नाम खुर्शीद मिनोचर होमजी था। संगीत के क्षेत्र में काम करने के लिए उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा था। हालांकि कला-संगीत में होमजी बहनों की कोई शुरुआती रिकॉर्डिंग नहीं है।

साल 1920 में उन्होंने अपने गायन करियर की शुरुआत ‘ऑल इंडिया रेडियो’ मुंबई से की थी। वह और उनकी बहन मानेक होमजी दोनों मिलकर प्रसिद्ध प्रोग्राम ‘होमजी सिस्टर्स ऑर्केस्ट्रा’ होस्ट किया करती थी। जल्द ही होमजी बहनों के रूप में उन्होंने पहचान बना ली थी। वे सितार, मैंडोलिन और दिलरूबा भी बजाया करती थी। इसके बाद उनकी मुलाकात हिमांशु राय, बॉम्बे टाकीज से संस्थापक से हुई जो शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किसी व्यक्ति को ढूढ़ रहे थे। उन्होंने देवी को फिल्मों में काम करने का ऑफर दिया। उस समय महिलाएं फिल्मों में मुश्किल से ही काम करती थी। जब महिलाओं का संगीत और फिल्मों में काम करने को बुरा माना जाता था। समाज द्वारा उनके परिवार को अच्छा नहीं माना जाता था। सरस्वती देवी और उनकी बहन के फिल्म जगत में काम करने को इसी नज़र से देखा गया।

उनके काम करने का पारसी समुदाय ने भी बहुत विरोध किया था। बॉम्बे टाकीज में कुछ पारसी लोग भी काम करते थे जिन्होंने उनका विरोध किया। इसके बाद उनका नाम छिपाकर काम करने की बात तय की गई। राय ने होमजी बहनों के नाम बदलकर उन्हें सरस्वती देवी का नाम दिया। उनकी बहन जो कंपनी में अभिनय का काम भी काम करती थी उन्हें चंद्रप्रभा नाम दिया गया। देवी ने लगातार 1961 तक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। सरस्वती देवी को गाने की रिहर्सल करने के लिए घंटो बिताने के लिए जाना जाता था। सरस्वती देवी बेहतर प्रस्तुति के लिए गैर-गायक अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को बेहतरीन तरीके से गाने के लिए प्रिशिक्षित और देर तक रिहर्सल कराती थी ताकि बेहतर प्रस्तुति दी जा सके।

तस्वीर साभारः wikidata

बॉम्बे टाकीज से की संगीत की शुरुआत

साल 1935 में उन्हें पहली बार फिल्मों में काम करने का मौका मिला। फिल्म ‘जवानी की हवा’ पहली फिल्म थी जिसमें उन्होंने काम किया। इस फिल्म में देविका रानी मुख्य किरदार में थी। उस समय वे कलाकारों को गाना भी सिखाती थी क्योंकि प्लेबैंक सिंगिग का दौर नहीं था। साल 1936 में उन्होंने फिल्म ‘जन्मभूमि’ में संगीत दिया। यह फिल्म भारतीय स्वतंत्रता अभियान के तहत रिलीज हुई थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा के पहले देशभक्ति गीत ‘जय जय जननी जन्मभूमि’ को तैयार किया जिसे जे.एस. कश्यप ने लिखा था। गाने का कोरस बाद में बीबीसी की भारतीत समाचार सेवा की सिग्नेचर ट्यून बनी।

अछूत कन्या के लोकप्रिय गीत ‘बन के चिड़िया’ से लेकर कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने मीरा के जीवन पर सून पेड से सितार (कंगन, 1939), मन बावन लो सावन जाया रे (बंधन, 1940), झूले के संग झूलो (झूला, 1941) और लोकप्रिय गीत चल चल रे नौजवान (बंधन) जैसे को गीतों को धुन दी। सरस्वती ने 1939 में नवजीवन फिल्म के लिए प्रसिद्ध गायक और अभिनेता हंसा वाडकर की आवाज़ में चार गाने रिकॉर्ड किए थे। देवी ने 1941 तक बॉम्बे टाकीज में काम किया था। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद उन्होंने मिनर्वा मूवीटोन के लिए संगीत रचना शुरू की और आगे चलकर स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर भी काम किया था। 

उनकी आखिरी रचना 1961 में ‘बाबा सा री लाडली’ के लिए थी। साल 1980 में 68 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। सरस्वती देवी का हिंदी सिनेमा जगत में अतुलनीय योगदान हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा और संगीत के प्रति समपर्ण के चलते पुरुष प्रधान समाज में सफलता हासिल की है। ये सरस्वती देवी का संगीत के प्रति प्रेम ही है कि उन्होंने अपनी पहचान बदलकर काम किया। सरस्वती देवी ने अपने जीवन में छह बच्चों को गोद लिया था और उनका पालन-पोषण किया था। 

नये संगीतकारों ने संवारा उनका संगीत

सरस्वती देवी ने अपने संगीत के जरिये हिंदी सिनेमा जगत को नई उपलब्धियों पर पहुंचाया था। उनका काम उनके बाद वाले संगीत के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए प्रेरणादायी बना। किशोर कुमार और आर.डी.बर्मन जैसे नए संगीतकारों ने अपने स्वयं के संगीत के माध्यम से उनकी धुनों को आगे बढ़ाया। उनका गीत ‘कोई हमदम न रहा’ बाद में अशोक कुमार द्वारा फिल्म जीवन नैय्या, 1936 और किशोर कुमार द्वारा फिल्म झुमरू, 1961 में गाया गया था। यह किशोर कुमार के सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक बन गया था। फिल्म पड़ोसन (1968) का लोकप्रिय गीत ‘चतुर नार करके श्रृंगार’ मूल रूप से फिल्म झूला (1941) के लिए सरस्वती देवी द्वारा संगीतबद्ध किया गया था।

स्रोतः

  1. Wikipedia
  2. Outlook.com
  3. Livemint

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content