समाजविज्ञान और तकनीक ए. ललिता: इंजीनियर बनने वाली पहली भारतीय महिला| #IndianWomenInHistory

ए. ललिता: इंजीनियर बनने वाली पहली भारतीय महिला| #IndianWomenInHistory

साल 1965 में वह वीमंस इंजीनियरिंग सोसायटी ऑफ लंदन की सदस्या बनीं। एक ब्रिटिश कारखाने की उनकी यात्रा को कई समाचार पत्रों ने कवर किया और महिला आधारित पत्रिकाओं ने उनका इंटरव्यू घोषित किया।

इंजीनियरिंग को हमेशा से पुरूष प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा है। ऐसे में चार महीने की बेटी के साथ एक किशोर विधवा होने से लेकर भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनने तक ए. ललिता का जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं है। सामाजिक दवाब में एक सख्त प्रतिबंधित जीवन जीने के बजाय उन्होंने पुरूष प्रधान क्षेत्र इंजीनियरिंग में अपना करियर बनाया। उन्होंने दुनिया के सामने यह साबित कर दिखाया कि वह सामाजिक बाधाओं को पार कर सकती हैं, साथ ही उन्होंने अन्य महिलाओं के लिए भी ऐसा करने के अवसर पैदा किए।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा  

ललिता का जन्म 27 अगस्त 1919 को चेन्नई में मध्यमवर्गीय तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता भी एक इंजीनियर थे। उनका पूरा नाम अय्यलसोमायाजुला ललिता था। उस समय के सामाजिक मानदंडो को मानते हुए ललिता की 15 वर्ष की आयु में शादी कर दी गई थी। शिक्षा के महत्व को समझते हुए उनके पिता ने यह सुनिश्चित किया उनकी बेटी दसवीं तक की पढ़ाई पूरी करें। शादी के तीन साल बाद 1937 में ललिता के पति का देहांत हो गया। रूढ़िवादी समाज में जहां विधवा महिलाओं को दया की नज़र से देखा जाता है वहां उन्होंने आगे बढ़ना चुना। आत्मनिर्भर और स्वतंत्र बनने के लिए सारी बाधाओं को चुनौती देते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखने का फैसला लिया। अपने परिवार के सहयोग से ललिता ने चेन्नई के क्वीन मैरी कॉलेज से प्रथम डिविजन के साथ इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई की शुरुआत

तस्वीर साभारः Blush

परीक्षा के रिजल्ट के बाद उन्होंने डॉक्टरी को अपना पेशा बनाने के बारे में सोचा क्योंकि उस समय कई महिलाएं चिकित्सा के क्षेत्र में आगे बढ़ रही थी। बाद में उन्होंने डॉक्टरी न करने के फैसले के साथ इंजीनियरिंग में अपना करियर बनाना तय किया। उस दौर में उनका यह फैसला सबके लिए बहुत चौकाने वाला था क्योंकि भारत में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महिलाएं नहीं थी। ललिता पढ़ने में होशियार थी और उन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। उन्होंने कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास (सीईजी) में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। साल 1943 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की और भारत की पहली महिला इंजीनियर बनीं। उन्होंने जमालपुर रेलवे वर्कशॉप में एक साल की अप्रेंटिसशिप के साथ अपना प्रशिक्षण पूरा किया।

पढ़ाई के बाद बतौर इंजीनियरिंग की नौकरी 

1944 में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वह एक सहायक इंजीनियर के रूप में शिमला में भारत के केंद्रीय मानक संगठन में शामिल हो गईं। इस नौकरी ने उनके सिंगल पैरेंट और काम के बीच संतुलन बनाए रखा। उन्होंने यह नौकरी दो साल तक की। इस बीच, उन्होंने इंस्टीट्यूशन ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स, लंदन, की स्नातक परीक्षा भी दी। अपने पिता के कहने पर उन्होंने शोध में मदद करने के लिए नौकरी छोड़ दी। ललिता के पिता के पास कई पेटेंट थे, जिनमें जेलेक्ट्रोमोनियम, धुआं रहित ओवन और बिजली की लौ निर्माता शामिल हैं। वह वित्तीय कारणों से 1948 के बाद इसे जारी नहीं रख सकीं और एसोसिएटेड इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्रीज (AEI) में शामिल हो गईं। कलकत्ता की एईआई शाखा में इंजीनियरिंग विभाग और बिक्री विभाग में काम किया। 

साल 1943 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की और भारत की पहली महिला इंजीनियर बनीं। उन्होंने जमालपुर रेलवे वर्कशॉप में एक साल की अप्रेंटिसशिप के साथ अपना प्रशिक्षण पूरा किया।

एईआई में ट्रांसमिशन लाइन डिजाइन करने वाले डिजाइन इंजीनियर के रूप में उन्होंने बहुत संतोषजनक काम किया था। उनके काम में सुरक्षात्मक गियर, सबस्टेशन लेआउट और कॉन्ट्रेक्ट के निष्पादन की समस्याओं को हल करना भी शामिल है। भारत में सबसे बड़े भाखड़ा नांगल बांध के लिए बिजली के जनरेटर पर काम में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। एईआई में उनके उत्कृष्ट कार्यो ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंजीनियरिंग समुदाय का अधिक ध्यान केंद्रित किया।

एक कॉनट्रेक्ट इंजीनियर के रूप में, एईआई इंजीनियरों को बार-बार स्थापना स्थलों और उन संगठनों के कार्यालयों का दौरा करना पड़ता था जो आयातित उपकरण खरीदते थे। इंस्टीट्यूशन ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स, लंदन की परिषद ने उन्हें 1953 में उन्हें एक सहयोगी सदस्य के रूप में चुना और 1966 में वह पूर्ण सदस्य बन गईं।

साल 1964 में उन्हें पहले अंतरराष्ट्रीय कॉन्फेंस इंजीनियरिंग और साइंस (आईसीडब्ल्यूईएस) न्यूयार्क में हिस्सा लिया। यह महिला इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था।

विश्व में भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व 

ललिता ने बतौर इंजीनियर अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल की। साल 1964 में उन्हें पहले अंतरराष्ट्रीय कॉन्फेंस इंजीनियरिंग और साइंस (आईसीडब्ल्यूईएस) न्यूयार्क में हिस्सा लिया। यह महिला इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था। इसके बाद महिला इंजीनियरों के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों में शामिल हुई। साल 1965 में वह वीमंस इंजीनियरिंग सोसायटी ऑफ लंदन की सदस्या बनीं। एक ब्रिटिश कारखाने की उनकी यात्रा को कई समाचार पत्रों ने कवर किया और महिला आधारित पत्रिकाओं ने उनका इंटरव्यू घोषित किया।

तस्वीर साभारः Swarajya

अपने पेशेवर करियर के अलावा, वह कई महिला संगठनों में भी शामिल थीं, जिनमें अखिल भारतीय महिला सम्मेलन और भारतीय महिलाओं का राष्ट्रीय संघ शामिल है। वह महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की वकालत करती थीं। उनका मानना था कि मर्दों की तरह महिलाओं की शिक्षा और रोज़गार के अवसरों तक समान पहुंच होनी चाहिए। उन्होंने इन आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किया।

ए. ललिता ने विधवाओं के पुनर्विवाह का भी समर्थन किया। वह 1977 में काम से सेवानिवृत्त हुईं जिसके बाद उन्होंने अपनी बहन के साथ दक्षिणी भारत में यात्रा करना शुरू की। 1979 में 60 वर्ष की आयु में ब्रेन एन्यूरिज्म से पीड़ित होने के कुछ सप्ताह बाद 12 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई।

स्रोतः

  1. All Together
  2. The Better India
  3. The Hindu

About the author(s)

Srishti

मेरा नाम सृष्टि है और मैं जामिया मिलिया इस्लामिया से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हूं। मुझे घूमना-फिरना और तरह-तरह का खाना चखना पसंद है।

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