समाजकैंपस बेगम अनीस खानः धर्मनिरपेक्षता के पाठ को अपने स्कूल में स्थापित करने वाली शिक्षाविद्

बेगम अनीस खानः धर्मनिरपेक्षता के पाठ को अपने स्कूल में स्थापित करने वाली शिक्षाविद्

उस दौर में जब हैदाराबाद के समाज में पर्दा वर्तमान से कही ज्यादा मजबूत था उन्होंने खुद से एक पहल की। साल 1965 उन्होंने अपने बगीचे में एक छोटे से स्कूल के रूप में नस्र की शुरुआत की थी।

आज के दौर में जहां स्कूलों में बच्चों को उनके धर्म के नाम पर निशाना बनाकर पीटा या पिटवाया जा रहा हैं ऐसे समय में बेगम अनीस खान के स्कूल में स्थापित धर्मनिरपेक्षता के माहौल को जानना और उसका अनुसरण करना इस वक्त की पहली ज़रूरत है। बेगम अनीस खान एक शिक्षाविद् थीं। उन्होंने ताउम्र अपने जीवन में स्कूली शिक्षा व्यवस्थ्या को बेहतर और सामावेशी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने हैदराबाद में नस्र एजुकेशनल सोसायटी की स्थापना की थी। बिना सुर्खियों में आए वे चुपचाप अपना काम करने में विश्वास करती थीं। 

बेगम अनीस खान का जन्म हैदराबाद के एक जाने-माने परिवार में हुआ था। उन्होंने हमेशा खुद को अभिजात वर्ग से अलग रखा और इसी का परिणाम था उनके द्वारा चलाया जाने वाला स्कूल। अपनी खानदानी विरासत से अलग उन्होंने समाज के लिए काम करने को चुना। उस दौर में जब हैदाराबाद के समाज में पर्दा वर्तमान से कही ज्यादा मजबूत था उन्होंने खुद से एक पहल की। साल 1965 उन्होंने अपने बगीचे में एक छोटे से स्कूल के रूप में नस्र की शुरुआत की थी। शुरुआत में उनके स्कूल में चार टीचर और 12 विद्यार्थी थे। उस समय में वह एक ऐसी महिला प्रमुख का उदाहरण बनीं जिन्होंने सभी सामाजिक और पितृसत्तात्मक बंधनों को तोड़ने हुए खुद के निजी मूल्यों को हासिल किया।

“मेरी ये ख्वाहिश थी कि बच्चियां हर फील्ड में मर्दों के काबिल रहे। मेरे स्कूल की लड़कियां हर फील्ड में आगे रहे। आज में ये बहुत गर्व से बोल सकती हूं कि मेरी बच्चियां हर फील्ड में माहिर हैं। डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं और खेलों में हैं जिस क्षेत्र में वे जा रही हैं उसमें कामयाबी हासिल कर रही हैं।”

लड़कियों की शिक्षा को दिया बढ़ावा

स्कूल विस्तार के लिए बाद में उनके परिवार ने भी उनका सहयोग दिया। उनकी बहन, उनके पति, दोनों बेटियां और एक बेटा भी इसमें शामिल हुए। एक छोटी सी जगह पर शुरू हुई क्लास में हर साल एक क्लास जुड़ती गई। जल्द ही इस तरह से स्कूल तैयार हुआ। इस संगठन के तहत हैदराबाद के चार अलग-अलग जगहों पर नस्र स्कूल खोलें गए। बेगम की इस पहल का मकसद गरीबी के चक्र को खत्म करना और उज्जवल भविष्य को बनाने के लिए शिक्षा को महत्व देने पर जोर देने का था। बेगम अनीस का मानना था, “मेरी ये ख्वाहिश थी कि बच्चियां हर फील्ड में मर्दों के काबिल रहे। मेरे स्कूल की लड़कियां हर फील्ड में आगे रहे। आज में ये बहुत गर्व से बोल सकती हूं कि मेरी बच्चियां हर फील्ड में माहिर हैं। डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं और खेलों में हैं जिस क्षेत्र में वे जा रही हैं उसमें कामयाबी हासिल कर रही हैं।” 

बेगम खान का कदम मुस्लिम समाज में ख़ासतौर पर लड़कियों की शिक्षा के लिए तत्कालीन समाज में एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आया। अधिकांश कॉन्वेंट स्कूल में मुसलमान अपने बच्चों भेजने में सहज नहीं थे। रूढ़िवादी मुसलमान, उनके द्वारा स्थापित नस्र स्कूल में अपनी बेटियों को भेजने में ज्यादा सुरक्षित महसूस किया करते थे। हालांकि उनका स्कूल किसी विशेष धर्म और समुदाय के लिए बिल्कुल नहीं था। बाद में उन्होंने स्कूल में को-एजुकेशन सिस्टम लागू किया। इसके लिए उन्हें कई कीमत भी चुकानी पड़ी लेकिन शिक्षा की एक समावेशी संस्थान बनाने के सपने के बीच उन्होंने किसी भी चुनौती को बाधा नहीं बनने दिया।

उनके नेतृत्व में नस्र एजुकेशन सोसायटी का विस्तार हुआ और हैदाराबाद में शैक्षिक उत्कृष्टता का एक प्रतीक बन गई। वह हमेशा से सब तक शिक्षा की समान पहुंच के विजन पर काम करती रही। उनकी इसी विरासत का सबसे उल्लेखनीय पहलू हैदराबाद के सोमाजीगुडा में हाशिये की लड़कियों के लिए स्कूल खोलना है। उनकी संस्थान ने न केवल लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा की सुविधा की बल्कि शिक्षा को सुचारू रूप से चलाने के लिए मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और भोजन जैसे आवश्यक संसाधनों को भी शामिल किया। वह गरीबी को शिक्षा के अधिकार के बीच बाधा को खत्म करने में विश्वास रखती थीं।

नस्र स्कूल और हैदराबाद में शिक्षा उत्थान

तस्वीर में मध्य में बेगम अनीस खान। तस्वीर साभारः Twitter

नस्र स्कूल की एसएससी पाठ्यक्रम से शुरुआत हुई थी लेकिन 1978 में बदलाव करते हुए आईसीएससी से मान्यता हासिल की। इसके एक दशक बाद 1988 में 11वीं और 12वीं में आईएससी पाठ्यक्रम अपनाया। अन्य विषय के साथ-साथ अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने वाला हैदराबाद का एकमात्र आईएससी स्कूल बन गया। साल 1996 में उनके स्कूल की एक शाखा बंजारा हिल्स में स्थापित की गई। बेगम ने लड़कियों के लिए एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में हर संभव प्रयास किए। 

उनकी संस्थान ने न केवल लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा की सुविधा की बल्कि शिक्षा को सुचारू रूप से चलाने के लिए मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और भोजन जैसे आवश्यक संसाधनों को भी शामिल किया।

शिक्षा के ज़रिये धर्मनिरपेक्षता को किया मजबूत

हैदराबाद के धर्मनिरपेक्ष माहौल की नींव को मजूबत करने और बच्चों में वह संदेश देने के लिए उनके स्कूलों में हर धर्म के त्योहार को मनाने का चलन है। धर्मनिरपेक्षता की तहबीज़ और रवायत को बनाए रखने के लिए नस्र में ईद, क्रिसमस, दीवाली और होली समान रूप से मनाया जाता था। द स्क्रोल में प्रकाशित लेख में लेखिका अरुंधति राय लिखती हैं कि उन्होंने कभी अपनी धर्मनिरपेक्षता का बखान नहीं किया। उन्होंने शब्दों के बजाय हमेशा फैसले लेने पर जोर दिया। अलग-अलग धर्मों के बच्चे अपनी नमाज या प्रार्थनाएं अलग-अलग करते थे बाकी सब अलग करते थे। धर्म को नकारा नहीं गया बल्कि उसे उचित स्थान दिया गया। नस्र स्कूल में पढ़ने के अनुभव पर वे आगे लिखती हैं कि 1980 के दशक के हैदराबाद में यह आसान नहीं था। छोटे-मोटे कारणों से सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए और स्कूल में भय व्यापत हो गया। स्कूल में समूह में परिवार वाले हम लड़कियों को लेने आते और उन्हें घर छोड़ा जाता। अगले दिन हम ऐसे स्कूल लौटते जैसे कुछ हुआ ही न हो। 

नस्र स्कूल में अपनी शिक्षिकाओं को आंटी कहा जाता था। जिसके चलते सभी लड़कियां बेगम अनीस को “अनीस आंटी” कहकर बुलाती थी। बीते महीने 16 अगस्त को एक बीमारी के चलते 80 साल की उम्र में बेगम अनीस खान ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका जाना शिक्षा जगत और वर्तमान के धार्मिक उन्मादी समय के लिए एक बड़ी हानि है क्योंकि उन्होंने हमेशा इंसानियत को आगे बढ़ाने और सिखाने का काम किया। उन्होंने धर्मनिरपेक्ष देश और समाज का मूल्य शिक्षा के ज़रिये बच्चों को सिखाया। जिस दौर में महिलाओं के द्वारा संचालित संस्थाएं ना के बराबर थी और लड़कियां के स्कूल खोलना एक बहुत ही अलग फैसला था उस समय में उन्होंने अपनी दृढ़ता की वजह से यह अकल्पनीय उपलब्धि हासिल की थीं। उन्होंने हमेशा शिक्षा के प्रति समर्पित होकर चुपचाप तरीके से लगन के साथ काम किया। बेगम अनीस खान की मृत्यु के बाद उनके विद्यार्थी जिस तरह से उनके योगदान का ज़िक्र कर रहे हैं और उन्हें श्रद्धाजंलि दे रहे हैं यही उनके आजीवन काम का परिणाम है।   


स्रोतः

  1. Scroll.in
  2. Siasat.com
  3. Deccan Chronicle
  4. Thesportsgrail.com

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