इंटरसेक्शनलजेंडर क्यों हमें डिजिटल स्वास्थ्य के क्षेत्र में समावेशी नज़रिये को शामिल करने की ज़रूरत है

क्यों हमें डिजिटल स्वास्थ्य के क्षेत्र में समावेशी नज़रिये को शामिल करने की ज़रूरत है

डिजिटल स्वास्थ्य या डिजिटल स्वास्थ्य सेवा एक व्यापक अवधारणा है जिसमें स्वास्थ्य देखभाल और प्रौद्योगिकी शामिल है। डिजिटल हेल्थ सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सेवाओं को शामिल करते हुए स्वास्थ्य की समस्याओं और चुनौतियों को दूर करने का काम करता है।

आप अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं, तुरंत डॉक्टर की सलाह की ज़रूरत है, दवाई की ज़रूरत है, इसके लिए उसी वक्त अस्पताल की ओर रूख़ करने की ज़रूरत नहीं है। एक डॉक्टर और उसके परामर्श द्वारा बताई गई दवाई घर पर ही महज एक फोन कॉल की दूरी पर है। आज के समय में डिजिटल तकनीक हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गई है। दैनिक जीवन के हर छोटे-बड़े काम के लिए डिजिटल विकल्प हमारे सामने बनते जा रहे हैं। स्वास्थ्य के संदर्भ में विशेषतौर पर कोविड-19 महामारी के बाद डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ोत्तरी देखी गई है। यही कारण है कि डिजिटल हेल्थ का क्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन साथ ही विस्तार से इस विषय पर चर्चा करने के समय कई तरह के सवाल भी हमारे समाने खड़े हैं। डिजिटल हेल्थ क्या है? डिजिटल हेल्थ जेंडर के लिहाज से कितनी समावेशी है? आदि के बारे में आइए चर्चा करते हैं।

डिजिटल हेल्थ क्या है?

डिजिटल स्वास्थ्य या डिजिटल स्वास्थ्य सेवा एक व्यापक अवधारणा है जिसमें स्वास्थ्य देखभाल और प्रौद्योगिकी शामिल है। डिजिटल हेल्थ सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सेवाओं को शामिल करते हुए स्वास्थ्य की समस्याओं और चुनौतियों को दूर करने का काम करता है। डिजिटल हेल्थ और इसके दायरे की परिभाषाएं कई मायनों में स्वास्थ्य और चिकित्सा सूचना से मेल खाती है। टेक टॉर्गेट नामक वेबसाइट में छपी जानकारी के अनुसार डिजिटल हेल्थ ऐप, हेल्थ सेक्टर का डिजिटल ट्रांसफोरमेशन है। इसमें मोबाइल हेल्थ ऐप, इलैक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड, इलैक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, पहनने योग्य डिवाइस (वियरलेबल डिवाइस), टेलीहेल्थ, टेलीमेडिसिन शामिल है।  

1990 के बाद से दुनियाभर में इलैक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स को अपनाने में तेजी देखी गई है। डिजिटल हेल्थ में मल्टी डिसीपलिनरी डोमेन में बहुत से स्टेकहॉलडर्स शामिल है जैसे क्लीनिकल, रिसर्चर, वैज्ञानिकों के साथ स्वास्थ्य देखभाल के बहुत से अनुभवी, डेटा मैनेजमेंट आदि। दुनिया के पितृसत्तात्मक रवैये की वजह से डिजिटल हेल्थ सेक्टर में जेंडर की अवधारणा की अदृश्यता साफ दिखती है। लेकिन हमें यह जानना बहुत ज़रूरी है कि डिजिटल स्वास्थ्य की योजनाओं में लैंगिक असमानता हर स्तर जैसे डिजाइन, उपयोग के तरीके को कैसे प्रभावित कर सकती हैं। साथ ही इस तरह की असमानताएं मौजूदा स्तिथि को और बड़ा कैसे करती है। 

द लैंसेट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार  इस दृष्टिकोण से हम देखते हैं ऐप डिजाइन में पहुंच की कमी और बहिष्कार, डिजिटल नेतृत्व में लैंगिक असमानता, लैंगिक रूढ़िवाद आधारित डिजिटल स्वास्थ्य महिलाओं को नुकसान पहुंचा रहा है।

डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में जेंडर की भूमिका

डिजिटल टेकनोलॉजी आज बड़े स्तर स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण के लिए इस्तेमाल हो रही है। हालांकि इस बात को अक्सर नज़अंदाज़ कर दिया जाता है कि डिजिटल स्वास्थ्य जेंडर न्यूट्रल नहीं है और यह हर किसी के लिए समान तौर पर काम नहीं करता है। कुछ मामलों में तो डिजिटल टेक्नोलॉजी मौजूद लैंगिक असमानताओं को कायम रखने का काम करती है और इसका बढ़ता इस्तेमाल इन्हें बढ़ा भी सकती है। कुछ मामलों में यह निजता और सुरक्षा के खतरे बढ़ा सकती है। ख़ासतौर पर उन समुदायों के लिए जो कई स्तरों पर असमानताओं का सामना कर रहे हैं। इस तरह से डिजिटल स्वास्थ्य के क्षेत्र में लैंगिक समानता और जेंडर के नज़रिये को अपनाने की बेहद आवश्यकता है।   

स्वास्थ्य के क्षेत्र में समावेशी नारीवाद

डिजिटल स्वास्थ्य, स्वास्थ्य देखभाल, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, अवैतनिक कामों के भार में कमी के द्वारा लैंगिक समानता को बढ़ा सकती है। फिर भी, डिजिटल हेल्थ को शायद ही लैंगिक समानता के नज़रिये से डिजाइन किया गया हो। द लैंसेट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार  इस दृष्टिकोण से हम देखते हैं ऐप डिजाइन में पहुंच की कमी और बहिष्कार, डिजिटल नेतृत्व में लैंगिक असमानता, लैंगिक रूढ़िवाद आधारित डिजिटल स्वास्थ्य महिलाओं को नुकसान पहुंचा रहा है। विशेष तौर पर यह नस्लीय और क्षेत्रीय अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को। डिजिटल स्वास्थ्य की लैंगिक असमानताओं से निपटने के लिए इंटरसेक्शनल नारीवाद नज़रिये से शोध को फ्रेमवर्क करने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। 

तस्वीर साभारः Tateeda Global

इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट में तर्क दिया है कि महामारी के दौरान यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं सहित स्वास्थ्य सेवाओंं का पुनर्वितरण महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है। डिजिटल हेल्थ आमने-सामने की देखभाल जो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा करती है जैसे बच्चों को संभालना, घरेलू काम, अपर्याप्त वित्त और समय को कम करती है। डिजिटल हेल्थ डेटा और स्वास्थ्य के बारे में हर नई जानकारी के माध्यम से महिलाओं के सशक्त करती है। डिजिटल स्वास्थ्य के इस्तेमाल में ध्यान देने की बात यह कि यह लैंगिक समानता के नज़रिये से शायद ही कभी डिजाइन किया गया हो। इस क्षेत्र में साफ दिखता है कि महिलाओं के लिए डिजिटल समाधान अभी भी एक विशिष्ट क्षेत्र है। नस्लीय, जातीय अल्पसंख्यकों और कम आय वाली महिलाएं या अन्य हाशिये के समुदाय का प्रतिनिधित्व भी कम है इसलिए डिजिटल स्वास्थ्य में लैंगिक असमानताओं को खत्म करना ज्यादा अधिक महत्वपूर्ण है। 

इंटरसेक्शनल नारीवाद, असमानता के इस ढांचे को जांचने में मदद करता है कि जेंडर कैसे अन्य सामाजिक पहचान जैसे नस्ल, क्षेत्र, सामाजिक-आर्थिक, यौनिकता और विकलांगता के साथ जुड़ता है और जिस वजह से हाशिये पर रहने वाले समुदाय को खराब स्वास्थ्य देखभाल परिणामों का सामना करना पड़ता है। असमानता और भेदभाव से बनी दुनिया में डिजिटल हेल्थ सुविधाओं को इंटरसेक्शनल लैंस से देखने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि यह न केवल जेंडर बल्कि सामाजिक-आर्थिक पहलू से भी जुड़ा है। स्वास्थ्य असमानताओं को खत्म करने के लिए पारस्परिक असमानताओं को खत्म करना चाहिए।

महिलाओं के पक्ष को नज़रअंदाज़

स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक तौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य के पक्ष को नज़रअंदाज और उन्हें कम करके आंकने का चलन रहा है। इसी दृष्टिकोण की वजह से उनकी आवश्यकतों को कुछ समझा ही नहीं जाता है। डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में भी अधिकतर टूल महिला स्वास्थ्य की ज़रूरत और प्राथमिकता पर जोर ही नहीं डालते हैं। रॉक हेल्थ के अनुसार साल  2011 के बाद से केवल 3 फीसदी यूएस कमर्शियल डिजिटल हेल्थ वेंचर ने महिला स्वास्थ्य पर ध्यान देना और उसे फंड देना शुरू किया है। इसी तरह हेल्थ ऐप डिजाइनों में भी पूर्वाग्रह देखने को मिलता है। कई स्वास्थ्य ऐप्स लैंगिक आधारित भाषा और डिजाइन पर विकसित किए गए है। प्रतीक, रंग और भाषा के आधार पर विश्लेषण से मालूम होता है कि पुरुष आधारित ऐप अधिक जेंडर न्यूट्रल थे लेकिन महिलाओं के लिए बने ऐप अधिक रूढ़िवादी डिजाइन, गुलाबी रंग, दिन और फूलों के डिजाइन बनाए हुए है। पुरुषों के फिटनेस ऐप ताकत और मांसपेशियों की मजबूती पर जोर देते दिखते है वही स्त्रियों के ऐप में पतला होने और स्त्रीत्व पर ध्यान दिया गया है। साथ ही स्त्रियों के ऐप में विविधता को काफी हद तक नज़रअंदाज किया गया है। 

दुनिया के पितृसत्तात्मक रवैये की वजह से डिजिटल हेल्थ सेक्टर में जेंडर की अवधारणा की अदृश्यता साफ दिखती है। लेकिन हमें यह जानना बहुत ज़रूरी है कि डिजिटल स्वास्थ्य की योजनाओं में लैंगिक असमानता हर स्तर जैसे डिजाइन, उपयोग के तरीके को कैसे प्रभावित कर सकती हैं।

डिजिटल हेल्थ ऐप की भाषा और विषय भी जेंडर के आधार पर होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को के विश्वविद्यालय के छात्रों में शारीरिक गतिविधि बढ़ाने के लिए अपने खुद के टेक्स्ट मैसेजिंग अध्ययन में इसके बारे में पता किया। इन मैसेज में यह शामिल था कि व्यायाम आपको दूसरों से अधिक आकर्षक बनाएगा। ब्यूटी स्टैर्डड का ऐसा दबाव किशोरों और विश्वविद्यालय के लिए विशेषरूप से हानिकारक है। इसके अलावा इन ऐप्स की डिजाइनिंग में शामिल लैंगिक मानदंड और रूढ़िवाद पुरुष सोच जेंडर माइनॉरिटी को भी नुकसान पहुंचा सकती है। उदाहरण के लिए प्री-प्रेगनेंसी केयर अमेरिका में अधिक शिशु मृत्यु दर से जुड़ी है। क्योंकि पूर्वाग्रहों की वजह से कुछ पेरेटिंग ऐप पिता के लिए है और कुछ मेल ओरिएटिंड ऐप मानते है कि शिशु की देखभाल के लिए पुरुष अशिक्षित है और उनकी देखभाल में रूचि ही नहीं है।  

महिलाओं के स्वास्थ्य में बदलाव के लिए डिजिटल क्षमता स्पष्ट है। इसके इस्तेमाल से महिला और अन्य वर्ग की स्वास्थ्य निगरानी और गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। डिजिटल स्वास्थ्य महिला डेटा अंतर और आमने-सामने सेवाओं के अंतर को दूर करता है। ख़ासतौर पर जिसने महिला स्वास्थ्य को प्रभावित किया है विशेषकर जब यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की आती है। पीरियड्स और ओव्यूलेशन ट्रैकर ऐप बड़ी मात्रा में अज्ञात डेटा देते है जो ऐतिहासिक रूप से क्लीनिक ट्रायल में महिलाओं की बहिष्कार से पैदा हुए असंतुलन को दूर करने में मदद कर सकते हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी साथ ही सेवाओं तक लोगों की पहुंच को आसान बनाती है। हालांकि गरीब और विकासशील देशों में महिलाओं और हाशिये के वर्ग के बीच डिजिटल गैप की वजह से यह दूर अभी भी बड़े स्तर पर बनी हुई है। महिलाओं और गरीब वर्ग के लोगों के पास फोन न होना और इंटरनेट तक पहुंच न होना पहला कारण है। 

समान पहुंच के अलावा इस क्षेत्र में अन्य बाधाएं भी व्याप्त है। जैसे एक अध्ययन में सामने आई जानकारी के अनुसार 85 फीसद महिलाएं ने कहा था कि वे ऑनलाइन हेल्थ सूचना पर भरोसा नहीं करती हैं। गोपनीयता के लिहाज से शामिल प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें विशेष तौर पर एसआरएच के विज्ञापन पसंद नहीं है। खराब डिजाइन, महिलाओं की स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी में उम्र, जातीयता, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और मौजूदा स्वास्थ्य स्थितियों के अनुकूल होती है। जानकारी को बहुत ही नीरस और अरूचि सामग्री में प्रस्तुत किया गया है। डाटा प्राइवेसी एक बड़ा और संवेदनशील विषय है जिस वजह से डिजिटल हेल्थ टूल पर कम विश्वास भी किया जाता है। 

तस्वीर साभारः Wolters Kluwer

महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति एक क्रांतिकारी प्रगति के रूप में प्रतिष्ठित 19 बिलियन का फेमटेक सेक्टर पहनने योग्य वस्तुओं और ऐप्स से लेकर डायग्नोस्टिक्स तक सब कुछ कवर करता है। लेकिन महिलाएं हर स्तर पर इसमें आश्वस्त नज़र नहीं आती हैं। यह बात यह भी स्पस्ष करती हैं कि उन्हें क्या चाहिए और उनके स्वास्थ्य से जुड़ी सटीक, अनुकूल और प्रासंगिक जानकारी ही उनकी मांग है। इस तरह के अंतर को मिटाकर डिजिटल हेल्थ हर स्तर पर जेंडर के नज़रिये से अपनी क्षमता को और बेहतर करने का काम कर सकता है। 

डिजिटलीकरण ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा महत्वपूर्ण व्याधान किया है लेकिन महिला स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा हिस्सा अभी भी डिजिटल टेक्नोलॉजी से दूर है। बीते समय में कुछ स्टार्ट अप में मेस्ट्रुएशन, फर्टिलिटी, आहार-पोषण जैसे महिला स्वास्थ्य के विषयों पर ध्यान दिया गया है लेकिन अभी बहुत व्यापता से महिला स्वास्थ्य पर काम होने की आवश्यकता है। डिजिटल हेल्थ टूल में विशिष्ट स्वास्थ्य मुद्दों से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक ऐसी सेवाओं तक महिलाओं की पहुंच में सुधार करने की क्षमता है जिसमें बाज़ार को इस पर रणनीति और फोकस करने की ज़रूरत है। 


स्रोतः

  1. Wikipedia
  2. Thrive
  3. The Lancet

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