समाजराजनीति क्या अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सांसद रमेश बिधूड़ी की भाषा वर्तमान सत्ता की संरक्षित भाषा नहीं है?

क्या अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सांसद रमेश बिधूड़ी की भाषा वर्तमान सत्ता की संरक्षित भाषा नहीं है?

ऐसा नहीं है कि रमेश बिधूड़ी जैसे व्यक्ति ही सिर्फ जातिवाद और सांप्रदायिकता के ज़हर से भरे हुए हैं। जिस तरह से पूरे देश में घृणा की एक पूरी ज़मीन तैयार की गई है यह उसकी भाषा है। आज देश में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जो भाषा चलन में है उसी भाषा का इस्तेमाल सांसद रमेश बिधुड़ी ने किया। उनके चेहरे पर अपनी इस हरकत के लिए जरा भी शिकन नहीं दिखी। किसी शर्मिंदगी या माफी की जैसे उन्हें ज़रूरत ही नहीं।

नयी संसद में चंद्रयान की सफलता पर बहस चल रही थी यूपी के अमरोहा के सांसद दानिश अली अपनी बात रख रहे थे तभी संसद में एक ऐसा दृश्य दिखा जो संसद की गरिमा को ही नहीं शर्मशार कर रहा था एक लोकतांत्रिक देश के मूल्यों को भी कुचल रहा था। दक्षिणी दिल्ली के बीजेपी के सांसद रमेश बिधूड़ी जिस अभद्र,गालियों से भरी सांप्रदायिक भाषा में बीएसपी सांसद दानिश अली को संबोधित कर रहे थे वह बेहद विद्रुप थी। संसद से जो वीडियो आया है उसमें संसद में जातिसूचक और धर्मसूचक गालियों से संसद रमेश बिधूड़ी अमरोहा के सांसद दानिश अली को संबोधित कर रहे थे और पीछे बैठे दो वरिष्ठ बीजेपी के नेता बेहद अश्लीलता से हंसे जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि रमेश बिधूड़ी जैसे व्यक्ति ही सिर्फ जातिवाद और सांप्रदायिकता के ज़हर से भरे हुए हैं। जिस तरह से पूरे देश में घृणा की एक पूरी ज़मीन तैयार की गई है यह उसकी भाषा है। आज देश में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जो भाषा चलन में है उसी भाषा का इस्तेमाल सांसद रमेश बिधुड़ी ने किया। उनके चेहरे पर अपनी इस हरकत के लिए जरा भी शिकन नहीं दिखी। किसी शर्मिंदगी या माफी की जैसे उन्हें ज़रूरत ही नहीं।

रमेश बिधूड़ी जिस तरह संसद में गालियां बक रह रहे थे और उनके पीछे बैठे सत्ताधारी पार्टी के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद हंस रहे थे वह एक बेहद घिनौना दृश्य था। किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह एक बेहद बहुत शर्मनाक दिन था। लेकिन यह विडम्बना ही है कि अभी तक सांसद रमेश बिधूड़ी के खिलाफ कोई करवाई नहीं हुई। गालियां देना वैसे भी अपराध है और संसद में अनायास एक सांसद का गाली देना तो बहुत गलीच अपराध है। जिस तरह से रमेश बिधूड़ी दानिश अली को धर्म के नाम पर अपशब्द कह रहे थे वह पूरे अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान को गाली देना है। अगर न्यायतंत्र अपना काम कर रहा होता तो गालीबाज सांसद की सदस्यता ख़ारिज हो गई होती। 

ऐसा नहीं है कि रमेश बिधूड़ी जैसे व्यक्ति ही सिर्फ जातिवाद और सांप्रदायिकता के ज़हर से भरे हुए हैं। जिस तरह से पूरे देश में घृणा की एक पूरी ज़मीन तैयार की गई है यह उसकी भाषा है। आज देश में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जो भाषा चलन में है उसी भाषा का इस्तेमाल सांसद रमेश बिधुड़ी ने किया। उनके चेहरे पर अपनी इस हरकत के लिए जरा भी शिकन नहीं दिखी। किसी शर्मिंदगी या माफी की जैसे उन्हें ज़रूरत ही नहीं।

रमेश बिधूड़ी की संसद में दी गयी अल्पसंख्यकों के लिए गाली की ये भाषा का सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आम जनता में तो इन लोगों ने पहले से ही ये जहर भर दिया था और अब जब ये संसद में खड़े होकर उसी अंदाज में बोल रहे हैं तो सीधी सी बात है कि आम जनता में ऐसी गालियों और अपशब्दों का प्रयोग करने का संदेश दे रहे हैं कि जब देश की संसद में एक सांसद अल्पसंख्यक समुदाय के लिए इस तरह की गाली की भाषा का प्रयोग कर सकता है तो आम नागरिकों के लिए तो और सहज हो गया है।

देखा जाए तो ये रमेश बिधूड़ी मौजूदा राज कोई एक व्यक्ति नहीं हैं कुछ समय पहले की ही घटना है ट्रेन में रमेश बिधूड़ी की ही प्रवृत्ति का एक व्यक्ति तीन लोगों को बस इसलिए गोली मार देता है क्योंकि वे मुसलमान थे। लेकिन इस बात के लिए देश के ज़िम्मेदार पद पर बैठे वे लोग माफी भी नहीं मांगते कि उन लोगों का नाम लेते हुए उसने इतने बेगुनाह लोगों की हत्याएं की। इतना ही नहीं उस व्यक्ति ने ट्रेन में लोगों अपने द्वारा की गई हत्या का वीडियो भी बनवाया। सत्ता में बैठे लोग इस बात से जरा भी नहीं आहत होते। ये सब कवायदें सत्ता द्वारा इस तरह के लोगों का संरक्षण है। एक स्कूल की अध्यापिका ठीक यही भाषा हमें नज़र आई उस घटना के दौरान जब मुज़फ्फरनगर की एक अध्यापिका एक अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे को एक बहुसंख्यक समुदाय के बच्चे से स्कूल में पिटवाती है, इसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए।

रमेश बिधूड़ी की संसद में दी गयी अल्पसंख्यकों के लिए गाली की ये भाषा का सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आम जनता में तो इन लोगों ने पहले से ही ये जहर भर दिया था और अब जब ये संसद में खड़े होकर उसी अंदाज में बोल रहे हैं तो सीधी सी बात है कि आम जनता में ऐसी गालियों और अपशब्दों का प्रयोग करने का संदेश दे रहे हैं कि जब देश की संसद में एक सांसद अल्पसंख्यक समुदाय के लिए इस तरह की गाली की भाषा का प्रयोग कर सकता है तो आम नागरिकों के लिए तो और सहज हो गया है।

इसी तरह पिछले दिनों नोयडा के किसी स्कूल की खबर आई थी जिसमें एक स्कूल के कुछ बच्चे रिपोर्टर को बता रहे थे कि हमारे टीचर ने हमें क्लास में ये कहा कि मंदिर बनने से क्या होगा, मंदिर हमें खाने को थोड़ी देगा। कुल मिलाकर बच्चों की बातों से ये समझ में आया कि टीचर एक धर्मनिरपेक्ष विचार की बातें बच्चों को समझा रहा था जो कि किसी भी सही मायने के टीचर का कार्य है।लेकिन वे बच्चे इस बात से बहुत नाराज़ हुए। टीचर पढा रहा था तो जय श्री राम के नारे लगाने लगे। तब जैसा कि बच्चे बता रहे हैं टीचर ने उन्हें थप्पड़ लगाया। ये खबर मीडिया चैनलों पर रिपोर्टर इस तरह बता रहे थे जैसे कहीं आग लगी हुई हो। रिपोर्टर जितना जहर उगल सकता उस टीचर के लिए लगातार उगल रहा था। बच्चे छोटे थे लेकिन साफ-साफ नज़र आ रहा था कि वे किस उन्माद का शिकार हैं। उनकी भाव-भंगिमा और मंदिर और ईश्वर की चिंता बता रही थी कि वे भविष्य के लिए कैसे तैयार हो रहे हैं।

बच्चों का बचपन देखकर चिंता होती है कि इनको इस धार्मिक उन्माद से कैसे बचाया जाये। वहीं कॉमेंट बॉक्स में लोगों के कमेंट देखकर भय लगता है लोग जयश्री राम के नारे लगाते हुए बच्चों को शाबाशी दे रहे थे। भविष्य के बड़े-बड़े दंगाइयों की उपलब्धियों पर निसार होकर उनमें उनकी ही झलक देख रहे थे। कमेंट में जयश्री राम बोलते हुए वे लोग धमकी भरे अंदाज में उस टीचर का नाम जानना चाहते थे जिसने बच्चों को धर्मनिरपेक्षता जैसी बात समझायी थी। पता नहीं उस टीचर की क्या दशा होगी। हर पल डर लग रहा होगा जाने कब भीड़ आकर उसपर हमला कर दे।

संसद का वो दृश्य याद आते ही राही मासूम रजा का उपन्यास ‘आधा गाँव’ याद आ जाता है। याद आ जाता है वह संवाद, “मैं अपना गाँव गंगोली छोड़कर कभी गाजीपुर नहीं गया और तुम मुझे गंगोली छोड़कर पाकिस्तान जाने की बात करते हो”  उन मनुष्यों की पीड़ा का अंदाज़ इस संवाद से मिल जाता है कि जिनके लिए अपना देश धर्म और जाति से कहीं बड़ा था। भाई ,बंधु ,घर-घराने, नाते-रिश्तेदारों से बड़ा था आज उन्हें देशद्रोही कहा जा रहा है। ये बात तय है कि जो लोग इस तरह की भाषा का प्रयोग खुद कर रहे हैं या अपने नुमांइदों से करवा रहे हैं वे इस तरह के अपराधों पर चुप रहकर इस तरह के अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं। वे हर उस अपराध में शामिल जो देश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है। उनके मन्तव्य को उनकी भाषा को उनकी घृणा को जिसे वो अपने भीतर छिपाए हुए हैं उनके संरक्षण में पलते उनके लोग उसे खुलकर बोल रहे हैं।

किसी भी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और अल्पसंख्यक समुदाय की हितों को लेकर ये घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि जब एक अल्पसंख्यक जन प्रतिनिधि को संसद में इस तरह की गालियों अपशब्दों से संबोधित किया जा रहा है तो जो आम अल्पसंख्यक जन हैं वे रोज के अपने दैनिक जीवन में क्या क्या झेलते होंगे। आज देश की एक बड़ी आबादी को उन्माद की तरफ ऐसे धकेल दिया गया है कि वह हर लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले मनुष्य को देशद्रोही, अर्बन नक्सल ,गद्दार जाने क्या-क्या अपशब्द बोल रहा है। ये वही मानसिकता है, वही विचार है जिनके कारण देश में मॉब-लिंचिंग जैसी घटनाएं होती हैं इन्हीं के भड़काऊ भाषणों बयानों के कारण देश में दंगे होते हैं। आज सत्ता इनके किसी भी कुकर्म पर चुप रह कर जिस तरह से इन्हें शय दे रही है उससे तय है कि देश को बहुत गहरे अंधेरे की तरफ ठेला जा रहा है।


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