समाजराजनीति क्या बीजेपी का राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी टिकट देने का इरादा है?

क्या बीजेपी का राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी टिकट देने का इरादा है?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की 33 फीसदी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है। हालांकि इस ‘पवित्रकाम’ का असर देखने के लिए देश को लंबा इंतजार करना होगा। परिसीमन और जनगणना के बाद ही इसका असर दिखाई देगा। यही वजह है कि विपक्ष द्वारा सरकार की नीयत पर सवाल उठाया जा रहा है।

“महिलाओं के नेतृत्व में विकास के अपने सकंल्प को आगे बढ़ाते हुए हमारी सरकार आज प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर रही है। इस विधेयक का लक्ष्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी का विस्तार करना है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, इसके माध्यम से हमारा लोकतंत्र और मजबूत होगा।” लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश होने से कुछ ही मिनट पहले पीएम मोदी ने ये बात कही थी। 19 सितंबर के दिन यह बिल नए संसद भवन में पेश होने वाला पहला बिल था। पीएम मोदी ने उस दिन कहा था कि इस ‘पवित्र काम’ के लिए शायद ईश्वर ने मुझे चुना है और 19 सितंबर की तारीख इतिहास में अमरत्व को प्राप्त करने जा रही है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की 33 फीसदी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है। हालांकि इस ‘पवित्रकाम’ का असर देखने के लिए देश को लंबा इंतजार करना होगा। परिसीमन और जनगणना के बाद ही इसका असर दिखाई देगा। यही वजह है कि विपक्ष द्वारा सरकार की नीयत पर सवाल उठाया जा रहा है। ये तक कहा जा रहा है कि आने वाले चुनावों में ही 33 फीसदी महिलाओं को टिकट दे दिया जाए। आंकड़ों पर गौर करें तो मौजूदा समय में लोकसभा में महिला सासंदों की हिस्सेदारी केवल 14.39 फीसदी है जो पहली लोकसभा के लगभग 5 फीसदी के आंकड़े से 17वीं लोकसभा तक आते-आते 15 फीसदी पर भी नहीं पहुंच पाई है। वहीं दूसरी ओर देशभर की सभी विधानसभाओं में महिला विधायकों की औसतन हिस्सेदारी भी दहाई का आंकड़ा पार करने का इंतजार कर रही है।

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सभी विधानसभाओं में महिलाओं की औसतन हिस्सेदारी केवल 8% है। 9 दिसंबर 2022 को लोकसभा में दिए आंकड़ों के अनुसार केवल 10 राज्यों की विधानसभाओं में महिला विधायकों की संख्या 10 फीसदी से ज्यादा थी। इन राज्यों में दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़, पंजाब, झारखंड और पश्चिम बंगाल शामिल है। साफ है कि जब टिकट ही नहीं दिया जाएगा तो 33 फीसदी तक कैसे पहुंचा जाएगा। कई राज्यों में चुनाव होने में बहुत कम समय बचा है। ऐसे में महिला आरक्षण बिल को संसद से पास कराने वाली बीजेपी चाहे तो इन चुनावों में 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देकर एक अच्छा संदेश दे सकती है। बिना कानून के भी ये पहल की जा सकती है क्योंकि उसे लागू होता देखने के लिए महिलाओं को अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा और तब तो राजनीतिक दल इसके लिए बाध्य हो ही जाएंगे।

मौजूदा समय में लोकसभा में महिला सासंदों की हिस्सेदारी केवल 14.39 फीसदी है जो पहली लोकसभा के लगभग 5 फीसदी के आंकड़े से 17वीं लोकसभा तक आते-आते 15 फीसदी पर भी नहीं पहुंच पाई है।

महिला आरक्षण विधेयक के लिए लड़ाई लड़ने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ता निशा सिद्धू कहती है, “राजी-खुशी से कोई महिलाओं को टिकट नहीं देना चाहता। महिलाओं को टिकट देने के मामले में मंशा बिल्कुल साफ़ नहीं है। अगर ऐसी मजबूरी न हो कि महिला राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली है या किसी के ससुर या पति का निधन हो गया या किसी कारणवश उस घराने का पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकता है तब जाकर महिलाओं का नंबर आता है।” निशा आगे कहती हैं कि कानून तो पास कर दिया है लेकिन जब तक वो लागू नहीं हो जाता तब तक महिलाओं का हश्र तो वही रहेगा जैसा अभी है। बीजेपी एक पहल कर सकती थी लेकिन उसकी नीयत इस मामले में साफ़ नहीं है।

संसद से नारी शक्ति बिल को पास हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है। चुनाव आयोग 9 अक्टूबर को 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा कर चुका है। बीजेपी 9 अक्टूबर तक राजस्थान में अपने उम्मीदवारों की पहली, छत्तीसगढ़ में दूसरी और मध्य प्रदेश में चौथी सूची जारी कर चुकी है। तीनों ही राज्यों में बीजेपी खुलकर ये घोषणा नहीं कर रही है कि वो 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देंगी। क्या बीजेपी इन तीनों राज्यों के चुनाव में महिलाओं की 33 फीसदी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ रही है? अभी तक जितनी सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा हुई है उनके आधार पर हमने इसका विश्लेषण किया है जिसमें भाजपा की कथनी और करनी में फर्क साफ नज़र आता है।

सबसे पहले छत्तीसगढ़ पर नज़र डालते हैं। छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने 9 अक्टूबर तक 85 उम्मीदवारों का एलान कर दिया है। 85 में से महिला प्रत्याशियों की संख्या कुल 14 है। यानी पार्टी से 16.47 फीसदी महिलाओं को ही टिकट मिला है। इस राज्य में 90 विधानसभा सीट है और 5 सीटों पर उम्मीदवारों का एलान बाकी है। अगर बची हुई सभी सीटों पर महिलाओं को टिकट मिल भी गया तब भी ये 33 फीसदी तक नहीं पहुंचेगा। इस पर छत्तीसगढ़ बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष शालिनी राजपूत ने कहा कि अभी 5 उम्मीदवारों का एलान बाकी है। महिलाओं को लगभग 17-18 टिकट देने का अनुमान था। बीजेपी ने हमेशा कोशिश की है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट मिले।

तस्वीर साभारः Scroll.in

छत्तीसगढ़ सबसे दिलचस्प राज्य है। टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के मुताबिक़ राज्य निर्वाचन आयोग के आकंड़ों के मुताबिक कुल मतदाता 2,03,80,079 है। यहां महिला वोटर पुरुष वोटर से भी ज्यादा है। पुरुष मतदाताओं की संख्या 1.01 करोड़ है और महिला मतदाताओं की संख्या 1.02 करोड़ है। एक कमाल का तथ्य ये भी है कि कुल 90 विधानसभा सीटों में आधी से ज्यादा सीट तो ऐसी हैं जहां महिला वोटर की तादाद पुरुषों से ज्यादा है। ऐसे में कानून के धरातल पर उतरने से पहले ही बीजेपी कम से कम 33 फीसदी टिकट महिलाओं को टिकट देकर एक अच्छी पहल कर सकती थी।

इन आंकड़ों को जब शालिनी राजपूत को बताकर हमने सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि ये संगठन का विषय है। जब नारी शक्ति वंदन कानून लागू होगा तब तो हम 33 फीसदी देंगे ही लेकिन अभी टिकट वितरण की जो बात है वो हमारे उच्च पदाधिकारियों और हमारे केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वे क्या सोच रहे हैं। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि काफी मंथन के बाद तय होता है कि किसको टिकट देना है और किसको नहीं। महिला मोर्चा की तरफ से हमने मांग रखी कि अधिक से अधिक महिलाओं को टिकट दिया जाए। अभी 14 टिकट महिलाओं को दिए गए है। हम तो यहां छोटी सी चीज सोच रहे हैं कि विधानसभा चुनाव जीतना है। केंद्रीय नेतृत्व की सोच बहुत बड़ी है। वे हर पहलू पर विचार कर रहे हैं और उसके हिसाब से तय कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में टिकट पाने वाली महिला उम्मीदवारों का राजनीतिक परिवार से नाता

छत्तीसगढ़ में अब तक जिन 14 महिलाओं को टिकट मिला है उनमें 2 तो सांसद ही है। बीजेपी ने भरतपुर-सोनहत सीट से रेणुका सिंह और पत्थलगांव से सासंद गोमती साय को टिकट दिया है। रेणुका सिंह सरगुजा से सांसद है और केंद्र सरकार में मंत्री भी। गोमती साय रायगढ़ से सांसद है और पूर्व में जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। सरायपाली (एससी) सीट से बीजेपी ने सरला कोसरिया को टिकट दिया है। सरला राज्यसभा सांसद रह चुके रेशम लाल जांगडे की छोटी बेटी है। खल्लारी सीट से अलका चंद्राकर बीजेपी उम्मीदवार है। वो भी राजनीतिक परिवार से आती है। उनके पिता स्वर्गीय भुवन चंद्राकर सरपंच रह चुके है।

खज्जी विधानसभा सीट से गीता साहू मैदान में है। उनके पति सरपंच रह चुके हैं और बीजेपी किसान मोर्चा के जिला प्रभारी है। गीता साहू राजनांदगांव की जिला पंचायत अध्यक्ष है। प्रतापपुर (एसटी सीट) से शंकुतला सिंह पोर्थे को टिकट मिला है। शंकुतला के ससुर तेजसिंह पोर्थे जनसंघ के जमाने से बीजेपी के करीबी रहे थे। चंद्रपुरसीट से संयोगिता सिंह जूदेव प्रत्याशी है। उनके पति स्व. युद्धवीर सिंह जूदेव बीजेपी से विधायक रह चुके थे। लैलूंगा (एसटी सीट) से सुनीति सत्यानंद राठिया चुनाव लड़ेंगी। वो पहले भी विधायक रह चुकी है। 2013 विधानसभा चुनाव के दौरान दायर हलफनामे में उनकी संपत्ति 4.6 करोड़ थी। 2018 में इस सीट से उनके पति सत्यानंद राठिया ने चुनाव लड़ा था जिसमें उनकी हार हुई थी। उस चुनाव के वक्त उनकी संपत्ति 5.6 करोड़ थी। वहीं लता उसेंडी कोंडागांव से चुनाव लड़ेंगी। ये सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित है। 2018 चुनाव के दौरान उनकी संपत्ति पौने दो करोड़ रुपये थी। लता महिला एंव बाल विकास विभाग मंत्री रह चुकी है। उनका परिवार राजनीति से जुड़ा रहा है। उनके पिता स्व. मंगलराम उसेंडी सुंदरलाल पटवा सरकार के समय में विधायक रहे थे।

छत्तीसगढ़ बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष शालिनी राजपूत ने कहा कि अभी 5 उम्मीदवारों का एलान बाकी है। महिलाओं को लगभग 17-18 टिकट देने का अनुमान था। बीजेपी ने हमेशा कोशिश की है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट मिले।

जशपुर (एसटी सीट) से रायमुनि भगत अपनी ज़िंदगी का पहला विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। ये वही रायमुनि है जिन्होंने पत्थलगड़ी आंदोलन के दौरान गाड़े गए पत्थरों को उखाड़ा था। 2005 में पहली बार जिला पंचायत अध्यक्ष बनी थी। कुल 3 बार इस पद पर रह चुकी हैं। सामरी सीट एसटी के लिए आरक्षित है। यहां से उधेश्वरी पैकरा बीजेपी की प्रत्याशी है। उनके पति सिद्धनाथ पैकरा संसदीय सचिव रह चुके हैं। उधेश्वरी दो बार शंकरगढ़ जिला पंचायत की अध्यक्ष रह चुकी है। वो बीजेपी की प्रदेश उपाध्यक्ष भी है। धमतरी से रंजना दीपेंद्र साहू बीजेपी की उम्मीदवार है। 2018 में विधायक का चुनाव जीती थी। तब उनकी संपत्ति 1.6 करोड़ रुपये थी। इनके अलावा भटगांव से लक्ष्मी राजवाड़े, सारंगढ़ (एससी सीट) से शिवकुमारी चौहान चुनाव लड़ेंगी। शिवकुमारी जिला पंचायत सदस्य रही है।

बीजेपी की अभी तक घोषित महिला प्रत्याशियों में परिवारवाद साफ दिखाई दे रहा है। वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी कहते हैं, “जिन महिलाओं को टिकट मिला है उनमें से बहुत कम ऐसी है जिनका राजनीतिक कद बड़ा है। ये कहा जा सकता है कि बीजेपी ने उन्हीं सीटों पर महिलाओं को उतारा है जिन पर कांग्रेस मजबूत है। ऐसे में अगर महिला प्रत्याशी हार भी जाए तो बीजेपी को फ़र्क नहीं पड़ेगा और विधानसभा में पुरुष ही ज्यादा संख्या में पहुंचेंगे।”

राजस्थान में भी बीजेपी प्रतिशत नहीं बता पा रही

तस्वीर साभारः Mint

राजस्थान में अपनी पहली लिस्ट में बीजेपी ने 41 प्रत्याशियों के नाम का एलान किया। इसमें से केवल 4 महिला उम्मीदवार है। इनमें भी एक सीट (विद्याधर नगर) पर तो सासंद दीया कुमारी को उतारा गया है जो पूर्व जयपुर राजपरिवार से आती है। अन्य तीन सीटों में हिण्डौन (एससी) से राजकुमारी जाटव, सुजानगढ़ (एससी) से संतोष मेघवाल और बागीदौरा (एसटी) से कृष्णा कटारा को मैदान में उतारा है। हालांकि 159 प्रत्याशियों की घोषणा बाकी है।

कृष्णा कटारा बांसवाड़ा नगरपालिका की अध्यक्ष रही हैं और फिलहाल बीजेपी की प्रदेश मंत्री है। वहीं हिंडौन से बीजेपी प्रत्याशी राजकुमारी जाटव 2013 में विधायक चुनी गई थी। पिछले चुनाव में टिकट कटा था लेकिन इस बार फिर से टिकट मिल गया। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुई और बीदासर पंचायत समिति की प्रधान रही संतोष मेघवाल चुरु जिले की सुजानगढ़ विधानसभा से प्रत्याशी है। पिछले चुनाव में निर्दलीय लड़ी थी और हार गई थी। कानून लागू होने से पहले भी क्या 33 फीसदी सीटों पर महिलाओं को चुनाव लड़ाया जाएगा या नहीं इस सवाल पर राजस्थान भाजपा नेता सुमन शर्मा का कहना है कि वे प्रतिशत नहीं बता सकती। उन्होंने कहा कि बीजेपी हमेशा महिलाओं के बारें में सोचती है अगर नहीं सोचती तो सालों से लटका हुआ महिला आरक्षण बिल संसद से पास नहीं होता।

मध्य प्रदेश बीजेपी भी 33 फीसदी का आंकड़ा घोषित नहीं कर रही

मध्य प्रदेश में बीजेपी ने 9 अक्टूबर तक कुल 136 सीटों पर टिकटों का बंटवारा कर दिया है। इन 136 सीटों में केवल 16 महिलाओं को टिकट मिला है। यानी अभी तक केवल 11.7 फीसदी महिलाओं को टिकट मिला है। 33 फीसदी टिकट बंटवारे के लिए लगभग 75 महिलाओं को टिकट देना पड़ेगा। फिलहाल 94 सीट पर घोषणा बाकी है और इनमें से लगभग 59 टिकट महिलाओं को दिए जाएंगे तब जाकर 33 फीसदी का कोटा पूरा होगा। क्या बीजेपी का मध्य प्रदेश में 33 फीसदी महिलाओं को टिकट देने का इरादा है या नहीं इस सवाल को जब हमने मप्र बीजेपी प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा से पूछा तो उन्होंने कहा कि हम कोई कोटा फिक्स नहीं कर रहे हैं। हम 33 फीसदी का आंकड़ा घोषित नहीं कर रहे क्योंकि अभी कानून लागू नहीं हुआ है लेकिन कानून लागू होगा तो उसका पालन करेंगे। उन्होंने कहा कि हम महिलाओं को सशक्त करने की सोच को बढ़ाते आएं है और आगे भी बढ़ाएंगें।

मध्य प्रदेश में भी अन्य राज्यों जैसी स्थिति

तस्वीर साभारः Hindustan Times

छत्तीसगढ़ की तरह मध्यप्रदेश में भी आंकड़ों के मुताबिक़ घोषित 16 महिला प्रत्याशियों में से अधिकतर राजनीतिक परिवार से आती हैं। शुरुआत गोविंदपुरा सीट से तो यहां से कृष्णा गौर चुनाव लड़ेंगी। उनके ससुर बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश के सीएम रह चुके हैं। कृष्णा भोपाल नगर निगम की महापौर भी रह चुकी है। वहीं अमरवाड़ा (एसटी सीट) से मोनिका बट्टी बीजेपी की उम्मीदवार है। मोनिका भी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती है। उनके पिता स्व. मनमोहन शाह बट्टी साल 2003 में विधायक थे और वो गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे हैं।

देवास विधानसभा से गायत्री राजे पवार बीजेपी की प्रत्याशी है। उनके पति तुकोजीराव पवार मंत्री रह चुके हैं। निधन के बाद बीजेपी ने गायत्री को अपना उम्मीदवार बनाया था और वो जीतने में कामयाब भी रही। सबलगढ़ से सरला रावत चुनाव लड़ रही हैं। सरला भी राजनीतिक परिवार से आती है। उनके ससुर स्व. मेहरबान सिंह रावत विधायक थे। बीजेपी ने उन्हें लगातार नौ बार टिकट दिया था। पेटलावद से निर्मला भूरिया चुनाव लड़ेंगी। जनता ने निर्मला को 4 बार विधायक चुना है। एक बार कांग्रेस से और 3 बार बीजेपी के टिकट पर जीत चुकी हैं। उनके पिता भी राजनीति से जुड़े थे। पिता स्व. दिलीप सिंह भूरिया सांसद थे।

इंदौर-4 सीट से मालिनी गौड़ को टिकट मिला है। इस सीट पर उनके परिवार का 30 सालों से दबदबा है। वे इस विधानसभा से 2008 से 3 बार चुनाव जीत चुकी है। इंदौर नगर निगम की महापौर भी रही है। घोंडाडोंगरी से गंगा बाई उइके चुनावी मैदान में है। उनके पति स्व. सज्जन सिंह उइके विधायक थे। गंगा राज्य महिला आयोग की सदस्य रह चुकी है। चाचौड़ा से प्रियंका मीणा मैदान में है। प्रियंका के पति प्रद्युमन सिंह मीणा दिल्ली में आईआरएस अधिकारी है। ये वही सीट है जिस पर कभी उप चुनाव लड़कर दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश सीएम की कुर्सी पर बैठे थे।

एससी के लिए आरक्षित डबरा सीट से इमरती देवी को टिकट मिला है। महिला एंव बाल विकास मंत्री रह चुकी हैं। पहली बार 2008 में विधायक बनी थी। मार्च 2020 में जब सिंधिया ने बगावत की थी तो बीजेपी में शामिल हो गई थी। मनीषा सिंह, जयसिंह नगर विधानसभा से चुनाव लड़ेंगी। मनीषा वर्तमान में विधायक है। जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। इसके अलावा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष भी रही है। बीजेपी ने शिवराज सरकार में आदिम जाति कल्याण मंत्री मीना सिंह को मानपुर विधानसभा का टिकट थमाया है। मीना इसी सीट से 2003 से लगातार जीतती आ रही है। वहीं सीधी सांसद रीति पाठक को सीधी विधानसभा से टिकट दिया गया है और पूर्व विधायक और मंत्री रही ललिता यादव को छतरपुर से लड़ने का काम सौंपा गया है।

महिला अधिकार कार्यकर्ता निशा सिद्धू कहती है, “राजी-खुशी से कोई महिलाओं को टिकट नहीं देना चाहता। महिलाओं को टिकट देने के मामले में मंशा बिल्कुल साफ़ नहीं है। अगर ऐसी मजबूरी न हो कि महिला राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली है या किसी के ससुर या पति का निधन हो गया या किसी कारणवश उस घराने का पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकता है तब जाकर महिलाओं का नंबर आता है।”

परासिया (एससी सीट) से ज्योति डहेरिया चुनाव लड़ेंगी। साल 2008 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के टिकट पर चुनाव लड़ी थी और हारी थी। वहीं सैलाना विधानसभा (एसटी सीट) से पूर्व विधायक संगीता चारेल चुनाव लड़ेंगी। 2013 में जब पहली बार सैलाना सीट पर बीजेपी को जीत मिली थी तो इसकी नायिका संगीता ही थी। इसके बावजूद पिछले चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया था। बीजेपी ने भीकनगांव (एसटी सीट) से नंदा ब्राहमणे को प्रत्याशी घोषित किया है। 2013 में भी चुनाव लड़ी थी लेकिन कांग्रेस की झूमा सोलंकी से हार गई थी।

इन तीनों ही राज्यों में आखिर बीजेपी खुलकर क्यों नहीं कह पा रही है कि वो महिलाओं को 33 फीसदी टिकट देगी? इसका कारण जानने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन से बात की। उनका कहना है, “पार्टी को डर है कि अगर उसने 33 फीसदी सीटों पर महिलाओं को उतार दिया तो विरोधी पार्टी उनके सामने बड़े चेहरों को उतार देगी। इसलिए कानून के लागू होने का इंतजार किया जा रहा हैं।” छत्तीसगढ़ से इतर राजस्थान और मध्य प्रदेश में फिलहाल कई सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा बाकी है। ऐसे में अभी भी बीजेपी के पास महिलाओं की भागीदारी का विस्तार करने का एक अच्छा मौका है। नहीं तो कानून लागू होने पर तो पार्टियों को टिकट देना ही होगा। आखिर क्यों नहीं महिलाओं को लंबा इंतजार कराए बिना टिकट थमा दिए जाते।


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