इंटरसेक्शनलजेंडर क्यों हमेशा माँओं से जल्दी से ‘स्लिम और फिट’ होने की उम्मीद की जाती है?

क्यों हमेशा माँओं से जल्दी से ‘स्लिम और फिट’ होने की उम्मीद की जाती है?

बच्चे के जन्म के बाद तुंरत से शरीर की बनावट को पहले जैसा बनाने का भार माँओं के जीवन को कई स्तर पर प्रभावित करता है। कुछ माँओं के लिए जल्दी से वजन कम करने का दबाव, इसके लिए चिकित्सा का सहारा लेना एक खतरा हो सकता है। इस तरह का फितूर जन्म संबंधी चोटों को बदतर बना सकता है और उपचार को कठिन बना सकता है।

“हमारे समाज में एक महिला के पोस्टपार्टम पीरियड को उस संवेदनशीलता से समझा ही नहीं जाता है जिसकी एक अभी-अभी माँ बनने वाली महिला को ज़रूरत है। हमारे आसपास के लोगों का ध्यान इस पर रहता है कि वह कैसी दिखती है बजाय इसके कि वह कैसा महसूस कर रही है। बच्चे को जन्म देने के बाद मैं पूरी तरह बदल गई हूं लेकिन मेरे बाहरी लुक को लेकर कुछ लोगों की परवाह के रूप में उनकी टीका-टिप्पणी चलती रहती है।” यह कहना है जुड़वा बच्चों की माँ मीनाक्षी का। 

मातृत्व एक महिला के जीवन में अनेक तरह के बदलाव लाता है जो उसे अंदर और बाहर से पूरी तरह बदल देता है। बच्चे के साथ जीवन में तालमेल बिठाने में मन और भावनाएं भी बदल रही होती है जिस वजह से उसे खुद का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है। नई माँ के रूप शारीरिक और मानसिक बदलावों के एक दौर से गुजरना पड़ता है लेकिन वहीं प्रसव के बाद ज्यादा जोर महिलाओं पर दोबारा से उसी शारीरिक आकार में आने का भी रहता है जैसा वह बच्चे के जन्म से पहले दिखती है। शेप बैक कल्चर या बाउंस बैक कल्चर का आज के दौर में ख़ासा चर्चा में बना रहता है। महिलाओं पर पोस्टपार्टम अवधि के दौरान शरीर को उसी स्थिति में लौटने का एक दबाव बनाया जाता है।

“मुझे लगातार कहा जाता गया कि ब्रेस्टफीडिंग कराने से प्रेगनेंसी के दौरान बढ़े वजन को कम करने में मदद मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे ऐसा लगता था जैसे जल्द से जल्द मुझे वजन कम करने के लिए कहा जा रहा है।”

ख़ास तौर पर मीडिया में इस तरह की चर्चा होती है और सुझाव दिए जाते हैं। चर्चित अभिनेत्रियों और हस्तियों के जल्दी काम पर लौटने और रैंप पर फिट दिखने की सुर्खियां बनाई जाती हैं। बच्चे के जन्म देने के कुछ सप्ताह बाद मॉडलिंग करना, मैगज़ीन कवर पर दिखाई देती हैं। मशहूर हस्तियां द्वारा नियमित रूप पोस्टपार्टम फिटनेस, पोस्टपार्टम वेटलॉस के हैशटैग के साथ संदेश जारी किया जाता है। इतना ही नहीं इसी कल्चर की वजह से इंटरनेट पर प्रेगंनेसी में बच्चे की डिलीवरी के बाद वजन कम करने के सुझाव एक सेकेंड से भी कम समय में सामने आते हैं। इस तरह के कल्चर में बच्चे के जन्म के बाद महिला को ऊपरी तौर पर सुंदर, स्लिम और फिट दिखने का दबाव महसूस होता है। 

मीडिया जिस तरह से गर्भावस्था और नई माँओं का चित्रण करता है वह अवास्तविक है और इसका उन पर नकारात्मक असर पड़ता है। इलिनोइस यूनिवर्सिटी के द्वारा किये अध्ययन के अनुसार अवास्तविक इमेज और संदेशों के संपर्क में आने से कई नकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा मिलता है। बच्चे के जन्म के बाद उतनी तेजी से वजह कम करे जितनी तेजी से हस्तियां करती है और खुद के शरीर के बारे में सोचने और जब वे ऐसा करने में असमर्थ होती है तो अवसाद, हताशा और निराशा की भावनाएं बढ़ती है।

'मातृत्व नारीवाद' के नज़रिये में माँ होने का अधिकार
फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए रितिका बैनर्जी

दिल्ली की रहने वाली जसकौर (बदला हुआ नाम) ने हाल ही में एक बच्चे को जन्म दिया है। वह कहती हैं, “मुझे लगातार कहा जाता गया कि ब्रेस्टफीडिंग कराने से प्रेगनेंसी के दौरान बढ़े वजन को कम करने में मदद मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे ऐसा लगता था जैसे जल्द से जल्द मुझे वजन कम करने के लिए कहा जा रहा है। मैं नौ महीने की गर्भवती थी, डिलीवरी को हुए अभी नौ महीने का समय भी पूरा नहीं हुआ है लेकिन इतनी जल्दी क्यों है?”

बच्चे के जन्म के बाद औसतन प्रसवोत्तर अवधि चार से आठ महीने या उससे ज्यादा समय तक रहती है जब शरीर धीरे-धीरे संतुलन में आ रहा होता है। चाहे बच्चे साधारण डिलीवरी से हुआ हो या सी-सेक्शन हुआ हो लेकिन डिलीवरी के बाद शरीर को कम से कम दो हफ्ते के आराम की आवश्यकता होती है। बच्चे के जन्म के बाद शरीर का आकार बदलना सामान्य है। गर्भावस्था और प्रसव के बाद शरीर में हार्मोन, नींद, भूख में कई तरह के बदलाव आते हैं। शरीर और दिमाग में असहजता का महसूस होना भी आम बात है। गर्भावस्था के बाद नवजात शिशु की देखभाल के साथ खुद का ख्याल रख पाना एक बहुत बड़ा विशेषाधिकार है। कई अध्ययनों के अनुसार सर्तकता और अन्य व्यवहार नई माँओं पर अवास्तविक उम्मीदों का भार होता है। जैसे वे प्रसव के बाद अपने शरीर को कितना नियंत्रण में रखेंगी और उन्हें किस तरह से खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए आदि।  

द मिंट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकन कॉलेज ऑफ ओब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट के अनुसार नॉर्मल डिलीवरी के चार हफ्ते बाद और सी सेक्शन के छह हफ्ते बाद ही सुरक्षित रूप से व्यायाम कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं जब किसी तरह की कोई परेशानी न हो। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी बहुत ज़रूरी है कि यूटरस वापस से पेल्विक में आ गया है, ब्लीडिंग पूरी तरह से बंद हो गई हो, डिस्चार्ज भी पूरी तरह बंद हो गया हो और टांके भी ठीक हो गए हैं। जन्म के बाद फिर से व्यायाम करने के लिए तैयार होने के लिए कुछ समय लग सकता है। इस समय आराम करने और बच्चे के साथ रहने की आवश्यकता होती है। अगर महिला गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान लगातार व्यायाम कर रही थी तो व्यायाम करने की दिनचर्या जल्दी शुरू हो सकती है क्योंकि लगातार प्रैक्टिस की वजह से मासंपेशियों और शरीर को एक आदत बनी रहती है।

एक के बाद एक समस्या बढ़ती गई

मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली शीतल का कहना है, “बेटे के जन्म के बाद अगर बाहरी तौर पर देखे तो मेरा ज्यादा वजन नहीं बढ़ा कुछ समय के बाद में पहले जैसी ही दिखने लगी लेकिन हकीकत इससे अलग थी। भले ही गर्भावस्था के दौरान बढ़ा हुआ वजन कम हो गया था लेकिन बच्चे के जन्म के बाद यूरीन लीक होने की समस्या ने मुझे इतना परेशान किया कि मैं घर से बाहर जाने को लेकर भी घबराने लगी थी। डिस्चार्ज की समस्या भी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी बाद में लंबे समय तक डॉक्टर की सलाह ली। दो साल होने का समय आ गया है हालत में अब कुछ सुधार आया है लेकिन अभी भी कभी-कभार यूरीन लीक हो जाता है। ये बच्चे को जन्म देने के बाद की वो चीजें जिसके बारें हम न तो किसी खुलकर बात कर पाते हैं और न ही अन्य लोग बाहरी फिटनेस के अलावा किसी चीज के बारे में सोचते हैं।”

वजन के बारे में सोच अच्छी नहीं लगती है

बल्लभगढ़ की रहने वाली मीनाक्षी का कहना हैं, “जुडवां बच्चों के जन्म के बाद जिंदगी पूरी तरह बदल गई। आपके पास अपने बारे में सोचने का तो एक मिनट का समय नहीं रहता है। आपकी नींद पूरी नहीं हो पाती है। बढ़ता वजन और शक्ल कैसी हो रही है इसे देखने का वक्त नहीं मिलता है। डिलीवरी के बाद मेरा लगातार वजन बढ़ रहा था। मैं खाने पर कंट्रोल करती तो ब्रेस्टफींडिग में समस्या होती। जैसे ही बच्चे थोड़े बड़े हुए मुझे कहा जाने लगा था कि अब थोड़ा अपने वजन के बारे में सोच ऐसे तुम अच्छी नहीं लग रही हो। इस तरह से खुद में कई बार बहुत बुरा महसूस करती थी। बच्चे को जन्म देने के बाद आप एक अलग यात्रा पर होते है लेकिन दुनिया आपको कुछ और ही बनना चाहती है।”  

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए रितिका बैनर्जी।

हमारे आसपास के माहौल में हमेशा एक महिला की डिलीवरी के बाद पोस्टपार्टम अवधि का आकलन इस आधार पर करते हैं कि वे कैसी दिखती हैं, बजाय इसके कि वे कैसा महसूस कर रही है। बीबीसी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अकेले पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स 90 फीसदी महिलाओं को प्रसव के बाद प्रभावित करता है। प्लेविक फ्लोर के अधिक टाइट होने, टिश्यू में घाव या नर्व के डैमेज होने के यूरीन लीक होना जैसी स्थिति एक तिहाई लोगों द्वारा अनुभव किया गया है। डायस्टैसिस रेक्टी, जिसमें पेट की मांसपेशिया बढ़े पेट से अगल जगह बना लेती है जिसे पेट में बहुत उभार बना रहता है। इस वजह से कब्ज, पेट में दर्द और यूरीन लीक होने की समस्या बनी रहती है। साथ चलने-फिरने और उठने में जैसी परेशानी 60 फीसदी लोगों को प्रभावित करती है।

बच्चे के जन्म के बाद तुंरत से शरीर की बनावट को पहले जैसा बनाने का भार माँओं के जीवन को कई स्तर पर प्रभावित करता है। कुछ माँओं के लिए जल्दी से वजन कम करने का दबाव, इसके लिए चिकित्सा का सहारा लेना एक खतरा हो सकता है। इस तरह का फितूर जन्म संबंधी चोटों को और खतरनाक बना सकता है और उपचार को कठिन बना सकता है। पोस्टपार्टम समय में नींद पूरी न करना, भावनात्मक रूप से अशांत होना मानसिक और शारीरिक दोनों स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। ऐसे में अपने शरीर के साथ अपने भावनात्मक रिश्ते को मजबूत करना न केवल माँ के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है, शोध से पता चलता है यह बच्चे के लिए भी स्वस्थ है।

मीनाक्षी का कहना हैं, “जुडवां बच्चों के जन्म के बाद जिंदगी पूरी तरह बदल गई। आपके पास अपने बारे में सोचने का तो एक मिनट का समय नहीं रहता है। आपकी नींद पूरी नहीं हो पाती है। बढ़ता वजन और शक्ल कैसी हो रही है इसे देखने का वक्त नहीं मिलता है। डिलीवरी के बाद मेरा लगातार वजन बढ़ रहा था। मैं खाने पर कंट्रोल करती तो ब्रेस्टफींडिग में समस्या होती।”

गर्भावस्था के दौरान होने वाले सभी बदलावों का मतलब है कि पोस्टपार्टम समय वह समय है जो शरीर को आराम, सही पोषण तत्व की पूरी ज़रूरत होती है न कि किसी आकार में वापस लौटने की। द अमेरिकन जर्नल ऑफ ऑब्सेटेटिक्स एंड गायनोकोलॉजी के अनुसार पोस्टपार्टम पीरियड एक्टिव रीजनरेशन और हीलिंग यानी सक्रिय पुनर्जनन और उपचार का समय है। ऐसा कल्चर जो शेप बैक पर जोर देता है वह बॉडी शेमिंग कल्चर को बढ़ावा देता है। गर्भावस्था के बाद खुद की देखभाल करना ही एक विशेषाधिकार और उपलब्धि है। ऐसी संस्कृति में यह और भी कठिन हो जाता है जो माँओं को बहुत कम सामाजिक समर्थन देती है और उनकी नई भूमिका के साथ बेहतर और सहज दिखने की एक अवास्तविक सीमा तय कर देती है।


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