स्वास्थ्यमानसिक स्वास्थ्य मानसिक स्वास्थ्य देखभाल एक विशेषाधिकार नहीं बल्कि ‘अधिकार’ है!

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल एक विशेषाधिकार नहीं बल्कि ‘अधिकार’ है!

वैश्विक स्तर पर केवल 2 फीसदी सरकारें ही अपने स्वास्थ्य बजट में मनोचिकित्सक सुविधाओं पर जोर दे पाती हैं। भारत सरकार का साल 2023-24 का कुल स्वास्थ्य बजट 89,155 करोड़ रूपये है जिसका मानसिक स्वास्थ्य पर कुल हिस्सा 1,199 करोड़ है।

“स्वास्थ्य है तो जहान है” यह बात सही है साथ ही सबतक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बनाने का काम राज्य का है। हर देश के हर नागरिक का अधिकार है कि उस तक सारी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचे। लेकिन भारत जैसे देश में स्वास्थ्य और उससे जुड़ी सुविधाओं तक पहुंच भी एक विशेषाधिकार है। उसमें भी जब बात मानसिक स्वास्थ्य की हो तो वह एक बहुत बड़ा विशेषाधिकार का विषय बनता है चाहे मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी हो या फिर इससे संबंधित इलाज। क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य वह विषय है जिस पर खुलकर और संवेदनशीलता से बात नहीं होती है। साथ ही सामाजिक स्थिति, आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण भी मानसिक स्वास्थ्य के इलाज तक में पहुंच में बाधा बनती है। 

बहुत से लोगों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े उपचार की आवश्यकता हैं और वे अपनी ज़रूरतों के अनुसार देखभाल पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी की कमी, रूढ़िवाद, अलग-अलग पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वालों की मानसिक चिकित्सा तक पहुंच की कमी और थैरेपी के लिए अलग-अलग स्तर पर आर्थिक संसाधनों के कारण बड़ी संख्या में लोग एक चिकित्सक के साथ अपना उपचार कराने के लिए मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। आर्थिक, सब तक समान पहुंच और गुणवत्ता जो एक मरीज की आवश्यकता है वह इस तरह की असमानताओं की वजह से मानसिक चिकित्सा, देखभाल से वंचित रहता है।

हम मॉर्डन दुनिया में रह रहे हैं इस तरह की समस्याएं बढ़ रही है और हर चीज़ के लिए तो गूगल पर नहीं जा सकते है और इंटरनेट से पढ़कर इंसान जागरूक हो सकता है लेकिन समाधान के लिए डॉक्टर की सलाह वास्तव में ज़रूरी है। निजी डॉक्टर बहुत मंहगे हैं तो इसलिए हमारी सरकार और हेल्थ सिस्टम को मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर बहुत निवेश करने की ज़रूरत है।

सरकारी अस्पताल में इलाज लेना बहुत मुश्किल

दिल्ली में रहकर पढ़ाई करने वाली आर्यांशी का कहना है कि बीते साल नंवबर-दिसंबर के दौरान मैं खुद में अलग महसूस कर रही थी इस बारे में मैंने अपनी एक दोस्त से बात की। फिर इसी दौरान उसकी तबीयत खराब हुई और उसकी मम्मी उसके पास आई। मेरी दोस्त भी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से गुजर रही थी। उसने अपनी मम्मी को बताया कि मेरे साथ भी कुछ परेशानियां चल रही है तो मैं भी उनके साथ दिल्ली एम्स में डॉक्टर के पास गई। सबसे पहले तो वहां पर बहुत भीड़ थी, मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा थी। डॉक्टर के पास हर मरीज को देने के लिए मुश्किल से 5-10 मिनट का समय था। मैं पहली बार किसी डॉक्टर के पास गई थी और इतने कम समय में किसी डॉक्टर को क्या बता पाउंगी। मैंने नोटिस किया कि यहां उस तरह से डॉक्टर हम पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और मैं इस सिस्टम से हतोत्साहित हुई। अगर बहुत शुरुआती समय में आप खुद चीजों को समझ भी रहे हैं तो इस तरह की व्यवस्था की वजह से अपने कदम पीछे हटा लेते हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हमें पब्लिक सर्विस में मेंटल हेल्थ केयर पर ध्यान देने की बहुत ज़रूरत है। हम मॉर्डन दुनिया में रह रहे हैं इस तरह की समस्याएं बढ़ रही है और हर चीज़ के लिए तो गूगल पर नहीं जा सकते है और इंटरनेट से पढ़कर इंसान जागरूक हो सकता है लेकिन समाधान के लिए डॉक्टर की सलाह वास्तव में ज़रूरी है। निजी डॉक्टर बहुत मंहगे हैं तो इसलिए हमारी सरकार और हेल्थ सिस्टम को मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर बहुत निवेश करने की ज़रूरत है।

तस्वीर साभारः Thrive Global

मानसिक स्वास्थ्य समस्या को कोई कुछ मानता ही नहीं

कोलकाता की रहने वाले अतिका का कहना है, ”मैं जब कक्षा 12 में थी तो मैंने पहली बार मेडिकल हेल्प ली थी। तब जांच में मेजर डिप्रेशन डाग्यनोज हुआ था और सीबीटी कराने के लिए कहा गया था। उसके बाद में अगले महीने मैं जांच कराने गई जिसमें काफी खर्चा हुआ। हालांकि उसके बाद मैंने कोई थेरेपी नहीं ली और यह कोविड का समय था और मेरे बोर्ड एग्जाम भी सिर पर थे यह मेरे लिए बहुत कठिन समय था। उसके बाद पोस्ट लॉकडाउन कॉलेज में हमारी एक प्रोफेसर ने कहा था कि वे थेरेपी देती है तो मैंने उनके साथ 5-6 सेशन लिए। अचानक से उन्होंने बंद कर दिया। फिर मुझे राज्य सरकार की एक योजना के बारे में पता चला कुछ लोग हमारे घर भी आए उसके बाद में वहां हॉस्पिटल में गई। लेकिन सरकारी अस्पताल में और भी अधिक परेशानी होती है वे उस तरह से ध्यान ही नहीं दे पाते हैं। वे दिन में चार-पांच घंटे देखते हैं और एक इंसान अगर आधा-एक घंटा ले लेता है तो सब लोगों को वो समय ही नहीं मिल पाता है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि इस दिशा में बहुत सुधार होने चाहिए।”

वे आगे कहती है, “मुझे दो बार मेजर डिप्रेशन डाग्यनोज हुआ हालांकि मेरे घर में यह सबको नहीं पता था कि मैं मेंटल हेल्थ ट्रीटमेंट ले रही हूं और एक बार ऐसा हुआ था कि दवाई खाकर मेरी हालात ज्यादा खराब हो गई थी। मैं पूरा दिन बस लेटी रहती थी जब घर में सबके सामने यह बात आई तो उन्होंने मेरी दवाईयां फेंक दी थी। घर वाले मेरी दवाईयों को ही दोष देने लगे थे। मेरे केस में यह हुआ कि मैं अब बहुत जागरूक हो गई हूं मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तो मुझे खुद का ध्यान रखने में मदद मिलने लगी है लेकिन हर किसी के लिए ऐसा नहीं है। मुझे घर में इसके इलाज के लिए कोई सहयोग नहीं मिला था। सरकारी अस्पताल में व्यवस्था सही नहीं है वहां उस संवेदनशीलता और आराम से नहीं सुना जाता है जिसकी कम से कम मुझे ज़रूरत थी। निजी खर्चे पर यह इलाज कराना बहुत मुश्किल है। पारंपरिक रूप से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के बारे में हम कम बात करते हैं लेकिन यह नज़रअंदाज करने वाला विषय वर्तमान में तो बिल्कुल नहीं है।”

तस्वीर साभारः Health Poverty Action

थेरेपिस्ट का समावेशी नज़रिया क्यों है महत्वपूर्ण

इंदौर की रहने वाली सलोनी का कहना है, “साल 2020 की बात है कि जब मुझे पता चला था कि हम थेरेपी ले सकते हैं। तो बहुत पढ़ने और सर्च करने के बाद मुझे एक फ्री थैरेपी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बारे में पता चला वहां से मैंने थेरेपिस्ट से बात की और वह सेशन बहुत खराब था जहां मेरी बात भी नहीं सुनी गई। तो मुझे ये समझ में आया कि फ्री प्लेटफॉर्म मेरे लिए काम नहीं करेंगे। इसके कुछ समय बाद मुझे मेरी दोस्त की बहन से मुलाकात हुई। वह एक साइकोलॉजी की टीचर थी और फ्रीलांसर थेरेपिस्ट के तौर पर भी काम करती थी। वह उम्र में मुझसे 15-20 साल बड़ी थी और मैं उनसे साथ सहज थी। उनकी फीस पांच सौ रूपये थी जो मेरे लिए बहुत ज्यादा थी लेकिन उस वक्त मेरे पास वहीं सबसे बेहतर विकल्प था। कुछ वक्त थेरेपी लेने के बाद मुझे समझ में आया कि अब वो मेरी परेशानियों को नहीं समझ रही है क्योंकि मैंने इस समय के बीच खुद में कई तरह की ग्रोथ की थी। वह बहुत ही पितृसत्तात्मक थी और हालांकि मैंने काफी लंबे समय तक उनकी मदद ली।”

वह आगे कहती है, “उसके बाद मैंने कुछ अलग-अलग थेरेपिस्टो से सेशन लिए लेकिन वहां भी मेरी बात नहीं बनी क्योंकि मेरे बजट 500-800 में जो थेरेपिस्ट है वे बहुत यंग है और मैं उनसे उस तरह से बहुत कनेक्ट नहीं फील कर पाई। वे मेरे स्ट्रगल नहीं समझ पाते हैं तो मेरा जो थेरेपिस्ट ढूढ़ने का स्ट्रगल है वो अभी भी चल रहा है और जो वास्तव में बहुत अनुभवी थेरेपिस्ट है उनकी फीस बहुत ज्यादा है। 2000, 2500 वाले सेशन मैं अफोर्ड नहीं कर सकती हूं तो इस तरह से ना कोई बीमा है, ना कोई अन्य सहयोग तो मैं किसी थेरेपिस्ट से जुड़ नहीं पाई हूं और अभी सही थेरिपिस्ट ढूढ़ने का सफर जारी है। इसलिए मुझे लगता है कि थेरेपी बहुत मंहगी है इससे हर कोई इंसान नहीं ले पाता है। मैं खुद में बहुत प्रिवलेज पाती हूं कि कम से कम कुछ तो अफोर्ड कर पाई और मुझे उससे काफी मदद मिली है। साथ ही थेरेपिस्ट का इंटरसेक्शनल होना बहुत ज़रूरी है उनमें जाति, वर्ग और समुदाय की समझ होने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह की वे एक्ससाइज बताते हैं वे मैं नहीं कर पाती हूं तो पहले ही लेवल पर एक अलगाव महसूस होता है। इसलिए मेंटल हेल्थ थेरेपी में मंहगाई के साथ-साथ इस मुद्दे को ध्यान में रखना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि 8-9 अलग-अलग लोगों से सेशन लेने के बावजूद अबतक कोई मेरे कॉन्टेक्ट में ऐसा नहीं आया है।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिभयाभर में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने से जुड़े निवेश में भारी कमी देखने को मिलती है। सामुदायिक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी व्यवस्था बनाना डब्ल्यूएचओ की सिफारिश है लेकिन दुनियाभर में केवल 25 फीसदी देश ही प्राइमरी केयर में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं को जोड़ पाते हैं। अधिकांश देशों में प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण में प्रगति हुई है लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों और मनोसामाजिक देखभाल के लिए दवाओं की आपूर्ति बनी हुई है। विशिष्ट मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के लिए देखभाल प्राप्त करने वाले लोगों का वैश्विक अनुमान 50 फीसदी के लगभग, अवसाद का सामना करने वालों का 40 फीसद और साइकोच्वाइंस का सामना 29 फीसदी लोगों का वैश्विक औसत प्राप्त हुआ।  

तमाम आंकड़ों से यह साफ होता है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की बड़ी संख्या में लोगों को आवश्यकता है। लेकिन इसका समाधान निकालने वाले कारकों पर ध्यान भी नहीं दिया जा रहा है। साल 1946 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सबसे पहले स्वास्थ्य के अधिकार के तौर पर बात की और संविधान में दर्ज करते हुए कहा कि स्वास्थ्य, प्रत्येक नागरिक का एक मौलिक अधिकार है। किसी भी व्यक्ति की नस्ल, धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक और सामाजिक स्थिति इसमें बाधा नहीं बन सकती है। फिर भी वैश्विक स्तर पर केवल 2 फीसदी सरकारें ही अपने स्वास्थ्य बजट में मनोचिकित्सक सुविधाओं पर जोर दे पाती हैं। भारत सरकार का साल 2023-24 का कुल स्वास्थ्य बजट 89,155 करोड़ रूपये है जिसका मानसिक स्वास्थ्य पर कुल हिस्सा 1,199 करोड़ है।

सलोनी कहती है, “मैं खुद को बहुत प्रिवलेज पाती हूं कि कम से कम मैं कुछ तो अफोर्ड कर पाई और मुझे उससे काफी मदद मिली है। साथ ही थेरेपिस्ट का इंटरसेक्शनल होना बहुत ज़रूरी है। उनमें जाति, वर्ग और समुदाय की समझ होने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह की वे एक्ससाइज वे बताते हैं वे मैं नहीं कर पाती हूं तो पहले ही लेवल पर एक अलगाव महसूस होता है।”   

लोगों के अनुभव, सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि न्यायसंगत मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देना वर्तमान समय में पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। रिसर्च में यह बात सामने आई है कि हाशिये पर रहने वाले समूहों की असमानताओं पर ध्यान केंद्रित करना और उनके अनुभवों से जुड़ा डेटा एकत्र करना बहुत महत्वपूर्ण है। मानसिक स्वास्थ्य कोई विशेषाधिकार नहीं है। यह एक अधिकार और एक विकल्प है। हर व्यक्ति जिसे आवश्यकता है उसे उन देखभाल सुविधाओं तक पहुंचने का पूरा अधिकार है। उचित मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का सिस्टम, स्वास्थ्य बीमा कंपनियों और सरकार द्वारा इसमें अधिक निवेश की ज़रूरत है। मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सा के तंत्र पर अधिक पैसा खर्च कर इससे हर लोगों के लिए अधिक किफायती बनाना होगा ताकि हर वर्ग, समुदाय, लिंग की पहचान रखने वाले लोग आसानी से अपनी मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कर सकें।


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