इंटरसेक्शनलशरीर फ़ीमेल प्लेज़र प्रोडक्ट्स का पनपता बाज़ारः सशक्तिकरण या केवल मुनाफा!

फ़ीमेल प्लेज़र प्रोडक्ट्स का पनपता बाज़ारः सशक्तिकरण या केवल मुनाफा!

फ़ीमेल प्लेज़र सम्बन्धी उत्पादों की बात करें तो आज ऑनलाइन स्टोर्स पर ऐसे कई उत्पादन केवल आसानी से उपलब्ध हैं, बल्कि इनका एक पूरा का पूरा बाज़ार ही उभरकर सामने आया है, जिन्हें महिलाएं खुद को प्लेज़र देने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।

पितृसत्तात्मक समाज में कई विषयों पर बात करना वर्जित है। ऐसे ही वर्जित विषयों में से एक फीमेल प्लेज़र है। महिलाएं सदियों से एक ऐसी दुनिया में जी रही हैं, जिसमें पुरुषों के प्लेज़र यानी खुशी को प्राथमिकता दी जाती है और उन्हें बचपन से ऐसा बना दिया जाता है कि वे अपने शरीर और अपने प्लेज़र को समझने का प्रयास ही नहीं कर पाती हैं। साथ ही हमारे घरों में इतनी निजता भी नहीं होती कि कोई महिला खुद से खुद के प्लेज़र को समझने की कोशिश करने के लिए मास्टरबेशन जैसे प्राकृतिक तरीकों को अपना सके और न ही उसे इसके सुरक्षित तरीके ही बताए जाते हैं। हमारे समज में यह धारणा भी मौजूद है कि मास्टरबेशन तो सिर्फ़ पुरुषों का अधिकार है और केवल वे ही मास्टरबेशन करते हैं। 

इसी तरह से मुख्यधारा की पॉर्न सामग्री के केंद्र में भी पुरुषों का ही प्लेज़र होता है और महिला का चित्रण पुरुष को प्लेज़र देनेवाली निष्क्रिय भूमिका में किया जाता है। अफ़सोस की बात यह है कि अधिकांश पुरुषों के लिए सेक्स के बारे में जानने का एकमात्र ज़रिया यही मुख्यधारा की पॉर्न सामग्री होती है। फ़ीमेल प्लेज़र पर न सिर्फ़ बात करना वर्जित है, बल्कि इससे जुड़े उत्पादों की दुनिया में भी लंबे समय तक पुरुष ही केंद्र में रहे हैं। इस बाज़ार में महिलाओं का समावेश बहुत हाल की परिघटना है। आज लैंगिक समानता, यौन अधिकारों से जुड़े और नारीवादी आंदोलनों की वजह से फीमेल प्लेज़र पर संवाद कुछ हद तक बढ़ा है। इसके साथ ही कई उत्पादों के विज्ञापनों में भी अब फ़ीमेल प्लेज़र को प्रमुखता से दर्शाया जाने लगा है। साथ ही अब ऐसी पॉर्न सामग्री भी तैयार की जाने लगी है जिसके केंद्र में महिला और उसका प्लेज़र होता है। 

इस किस्म के उत्पादों से महिलाओं को अपने शरीर और अपनी इच्छाओं पर कुछ हद तक एजेंसी भी मिलती है। आजकल की भागदौड़ भारी ज़िंदगी में उनके लिए ये स्ट्रेस बस्टर का काम भी करते हैं, लेकिन क्या महिलाओं की यौन स्वतंत्रता और उनका प्लेज़र केवल उत्पादों के इस्तेमाल पर ही निर्भर है?

फ़ीमेल प्लेज़र सम्बन्धी उत्पादों की बात करें तो आज ऑनलाइन स्टोर्स पर ऐसे कई उत्पादन केवल आसानी से उपलब्ध हैं, बल्कि इनका एक पूरा का पूरा बाज़ार ही उभरकर सामने आया है, जिन्हें महिलाएं खुद को प्लेज़र देने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। इनमें अंतरंगता के क्षणों को आनंददायक बनाने का दावा करनेवाले तरह-तरह के लुब्रिकेंट्स से लेकर सेक्स टॉयस, वाइब्रेटर्स, डिल्डो औक कामुक साहित्य तक शामिल हैं। ये महिलाओं को खुद के प्लेज़र की तलाश करने और उसे समझने का मौका देते हैं।

अगर इन उत्पादों उपलब्धता की जानकारी के प्रसार की बात करें तो आज कई महिलाएं अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर भी इनके बारे में जानकारी देती हुई मिल जाएगी। महिलाओं का प्लेज़र बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा बन गया है और महिलाओं को आकर्षित करने के लिए कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन इन उत्पादों के इस्तेमाल से कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू जुड़े हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है। यह सच है कि इन उत्पादों की आसानी से उपलब्धता ने कुछ महिलाओं के लिए इन्हें खरीद सकना और इस्तेमाल कर सकना आसान बनाया है। इस किस्म के उत्पादों से महिलाओं को अपने शरीर और अपनी इच्छाओं पर कुछ हद तक एजेंसी भी मिलती है। आजकल की भागदौड़ भारी ज़िंदगी में उनके लिए ये स्ट्रेस बस्टर का काम भी करते हैं, लेकिन क्या महिलाओं की यौन स्वतंत्रता और उनका प्लेज़र केवल उत्पादों के इस्तेमाल पर ही निर्भर है? क्या किसी मशीन की मदद से जल्दी से प्लेज़र हासिल कर लेना ही असली आज़ादी है या फिर बाज़रवाद महिलाओं के प्लेज़र की नई परिभाषाए गढ़ रहा है और उन्हें इन मशीनों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए रितिका बनर्जी

बाज़ार में महिलाओं के प्लेज़र में मददगार और इसे बढ़ाने का दावा करनेवाले जिस तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं उनके नकारात्मक पहलुओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। पहली बात जो ध्यान में रखी जानी चाहिए वह ये है कि इन उत्पादों की कीमत काफ़ी ज़्यादा होती है, इन्हें खरीद सकना हरेक महिला के बस की बात नहीं, ये ऐसी महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं जिनके पास न सिर्फ़ इन्हें खरीदने के लिए पैसा हो बल्कि इन्हें इस्तेमाल करने के लिए निजता भी हो। ये उत्पाद कहीं न कहीं इस मानसिकता को पोषित कर रहे हैं कि यौन स्वतंत्रता और यौन सशक्तिकरण का मतलब उपभोक्तावाद है। सबके सब अपने उत्पादों को इसी बात की आड़ लेकर बेच रहे हैं कि हम तो आपको सशक्त कर रहे हैं। ये सभी मशीनों के बिना किए जानेवाले, इंसानों के साथ किए जानेवाले एहसासों से भरे सेक्स को कमतर करार दे रहे हैं और इंसानों के बीच की दूरी को बढ़ा रहे हैं। कोई नहीं बताता कि इन्हें इस्तेमाल करके शारीरिक ज़रूरतें ज़रूर पूरी हो सकती हैं, लेकिन भावनात्मक नहीं।

इसके अलावा प्लेज़र देने वाले उत्पादों का अनुचित उपयोग, जैसे कि उन्हें पर्याप्त चिकनाई के बिना उपयोग करना या उन्हें बहुत ज़ोर से शरीर में डालना, चोट या दर्द का कारण बन सकता है। इसलिए यह ज़रूरी होता है कि उपयोगकर्ता को इनके उचित उपयोग और इनके इस्तेमाल में किस तरह की सावधानियां बरतने की ज़रूरत है, इसकी जानकारी हो। कुछ अन्य उत्पाद जैसे कि योनि में चिकनाई बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जानेवाले लुब्रिकेंट्स के भी अपने नुकसान हो सकते हैं। इनमें से कुछ लुब्रिकेंट्स का इस्तेमाल योनि के प्राकृतिक पीएच संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे योनि में संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। 

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए श्रेया टिंगल

सशक्तिकरण को उत्पादों के इस्तेमाल से जोड़ना बाज़ार का एक हथकंडा ही है। हम बिना किसी उत्पाद के इस्तेमाल के भी खुद को प्लेज़र दे सकते हैं। यह समझना ज़रूरी है कि हम इन उत्पादों का इस्तेमाल बाज़ार के दबाव में आकर कर रहे हैं या फिर हमें सच में इनकी ज़रूरत है। बाजार और प्लेजर के अनेक पहलू है। बाजार ने अलग-अलग तरह के उत्पादों को भारी मात्रा में बाजार में उतारते हैं जो महिलाओं की खुशी और यौन संतुष्टि को बढ़ाने के उद्देश्य से होते हैं। हालांकि, ये उद्योग अक्सर अवास्तविक शारीरिक मानकों को बढ़ावा देते हैं और सुंदरता की संकीर्ण परिभाषा को बढ़ावा देते हैं, जो महिलाओं की आत्म-सम्मान और शरीर की छवि पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

हमें यह समझने की भी आवश्यकता है कि पूंजीवाद पितृसत्तात्मक संरचनाओं को कैसे कायम रखता है जो महिलाओं के शरीर और यौनिकता को नियंत्रित और विनियमित करते हैं। पूंजीवाद अक्सर वास्तविक यौन मुक्ति और भलाई पर लाभ को प्राथमिकता देता है। बाजार के लिए वास्तव में महिलाओं की खुशी का पहलू मुनाफे के बाद आता है। इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ विचार करके हम एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देना होगा जिसमें खुलकर फीमेल प्लेजर पर बातचीत हो और शरीर के बारे में जानकारी और उसकी ज़रूरतों के बारे में सजग हो न कि उसकी सोच पर उपभोक्तावाद का प्रभाव हो।

सशक्तिकरण को उत्पादों के इस्तेमाल से जोड़ना बाज़ार का एक हथकंडा ही है। हम बिना किसी उत्पाद के इस्तेमाल के भी खुद को प्लेज़र दे सकते हैं। यह समझना ज़रूरी है कि हम इन उत्पादों का इस्तेमाल बाज़ार के दबाव में आकर कर रहे हैं या फिर हमें सच में इनकी ज़रूरत है।   

फीमेल प्लेजर पर बाजार का निवेश तो बढ़ रहा है और इससे जुड़े उत्पादों की भी बाढ़ आ रही है लेकिन पुरुषों के लिए अभी भी यह एक अनसुलझी पहेली है इस बारे में उन्हें भी शिक्षित करना बहुत ज़रूरी है। प्लेजर एक व्यापक अवधारणा है, यह केवल ऑर्गेज़्म तक सीमित नहीं है। इसके अलग-अलग पहलू है जिनके बारे में संवाद होना ज़रूरी है। बाजारीकरण और मुनाफे के बीच मूल विषय पीछे न छूट जाए क्योंकि फीमेल प्लेजर को लेकर संकीर्णता, रूढ़िवाद और नकारात्मकता है जिसके दूर करना बहुत ज़रूरी है। 


सोर्सः

  1. Open Magazine

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