इंटरसेक्शनलजेंडर मणिपुर से ग़ज़ा तक: लैंगिक हिंसा और विस्थापन का सामना करती महिलाएं

मणिपुर से ग़ज़ा तक: लैंगिक हिंसा और विस्थापन का सामना करती महिलाएं

तालिबान ने कहा कि अफ़गान महिलाओं को अब सार्वजनिक और मनोरंजन पार्कों में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं पूरे देश में महिलाओं के लिए जिम और फिटनेस सेंटर पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तालिबान ने लड़कियों को सिर्फ 12 साल की उम्र या छठी कक्षा तक स्कूल जाने की अनुमति दी गई।

संघर्ष और संकट के समय यौन हिंसा को अक्सर एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। युद्ध, जातीय संघर्ष या आपदाओं के बाद, महिलाएं और अल्पसंख्यक सबसे अधिक हिंसा और शोषण का सामना करते हैं। भारत के मणिपुर में मई 2023 में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जातीय हिंसा ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों की स्थिति और दयनीय बना दी। इस दौरान यौन उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार की कई घटनाएं सामने आईं। जुलाई 2023 में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें दो महिलाओं को नग्न कर घुमाने और यौन हिंसा का शिकार बनाने की घटना ने पूरे देश को हिला दिया।

आखिर कहां है महिलाएं और बच्चे सुरक्षित  

द गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार मणिपुर में फर्जी खबरों के व्यवस्थित प्रसार कर के जानबूझ कर जातीय हिंसा को भड़काने और तेजी से प्रसारित की कोशिश  की गई। दोनों ही समुदायों के घर, चर्च और अन्य धार्मिक स्थलों को जलाया गया, लूटपाट की गई और महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई। हजारों लोग अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए, जहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय(एमएचए) की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में पूर्वोत्तर भारत में हुई हिंसक घटनाओं में से 77 फीसद मणिपुर में हुई। अगस्त 2024 में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में कहा था कि मणिपुर में मौजूदा स्थिति के नतीजन 14,763 स्कूल जाने वाले बच्चे विस्थापित हुए हैं।

हालांकि उन्होंने आगे यह भी बताया कि इन विस्थापित बच्चों में से 93 फीसद से अधिक ने राहत शिविरों के नोडल अधिकारियों की सहायता से अपने आपको निकटतम स्कूलों में दाखिला करा लिया है। राज्य सरकार के गृह मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि मणिपुर में 351 राहत शिविरों में 22,000 से अधिक बच्चे रह रहे हैं। उनमें से 76 अनाथ बच्चे विस्तारित परिवारों के साथ रह रहे हैं, जबकि 121 को बाल गृहों में स्थानांतरित कर दिया गया है। हालांकि इंडियास्पेंड द्वारा की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग में पाए गए  हालत के अनुसार ज़मीनी हक़ीक़त बिल्कुल उलट है। राहत शिविरों में बच्चों के बुनियादी शिक्षा में सख्त कमी देखी गई थी। महिलाओं और बच्चों को युद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में सिर्फ भारत ही नहीं है। दुनिया भर में जहां भी युद्ध और संघर्ष की स्थिति है, वहां पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा दांव पर लगी होती है।

राज्य सरकार के गृह मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि मणिपुर में 351 राहत शिविरों में 22,000 से अधिक बच्चे रह रहे हैं। उनमें से 76 अनाथ बच्चे विस्तारित परिवारों के साथ रह रहे हैं, जबकि 121 को बाल गृहों में स्थानांतरित कर दिया गया है। हालांकि इंडियास्पेंड द्वारा की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग में पाए गए  हालत के अनुसार ज़मीनी हक़ीक़त बिल्कुल उलट है।

इजरायल-फ़िलिस्तीनी संघर्ष में दांव पर रही हजारों महिलाएं

हालांकि अब 15 महीने के नरसंहार के बाद, इजरायल और हमास के बीच युद्ध विराम समझौते के तहत लाखों फिलिस्तीनी उत्तरी ग़ज़ा लौट रहे हैं। लेकिन, 7 अक्टूबर 2023 से लगातार चल रहे इजरायल-फ़िलिस्तीनी युद्ध इस बात का उदाहरण है कि कैसे युद्ध में बच्चे और महिलाएं हिंसा और विस्थापन की दोहरी मार का सामना करती है, जहां इज़रायली सेना द्वारा लगातार महिलाओं और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और हत्या की घटना सामने आती रही। यूनिसेफ़ ने ग़ज़ा को ‘बच्चों के लिए सबसे ख़तरनाक जगह’ बताया था। युद्ध के कारण गज़ा में लाखों नागरिकों ने असहनीय परिस्थितियों में महीनों गुजारे हैं। लाखों महिलाएं और लड़कियां विस्थापित हो गई हैं और 30,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए। यू एन विमेन की एक विश्लेषण के अनुसार अबतक तक ग़ज़ा में इज़रायली सेना द्वारा कथित तौर पर 10,000 से  अधिक महिलाओं की हत्या और 19,000 से अधिक महिलाएं घायल हुई हैं।

तस्वीर साभार: International Rescue Committee

वहीं 3,000 से अधिक महिलाएं विधवा हो गई और अपने पुरुष साथी की मृत्यु के बाद वे घर की नई मुखिया बन गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार 10,000  से ज़्यादा बच्चों ने अपने पिता खो दिए है और हर दिन 37 माताओं की हत्या होती रही। पिछले रिपोर्टों में बताया गया कि 5,500 महिलाएं गर्भवती हैं या स्तनपान करा रही हैं। युद्ध  हो या किसी भी तरह का संघर्ष हो, वो महिलाओं के लिए ज्यादा जोख़िम लाता है। महिलाएं  एक तरफ जहां अपने ही घर में अपने अंतरंग साथी के गुस्से और हिंसा को झेलती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ युद्ध के कारण वो यौन हिंसा, और मानव तस्करी  और विस्थापन जैसे जोखिमों का सामना करती हैं। हिंसा ग्रस्त क्षेत्र में महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों तक पहुँचने में भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो उनके अधिकार, स्वतंत्रता और आजीविका पर एक बाधा  होता है।

युद्ध के कारण गज़ा में लाखों नागरिकों ने असहनीय परिस्थितियों में महीनों गुजारे हैं। लाखों महिलाएं और लड़कियां विस्थापित हो गई हैं और 30,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए। यू एन विमेन की एक विश्लेषण के अनुसार अबतक तक ग़ज़ा में इज़रायली सेना द्वारा कथित तौर पर 10,000 से  अधिक महिलाओं की हत्या और 19,000 से अधिक महिलाएं घायल हुई हैं।

रूस और यूक्रेन में युद्ध के कारण महिलाओं की स्थिति

वैसे तो यूक्रेन में महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन लंबे समय से हो रहा था, लेकिन 2022 में युद्ध की शुरुआत ने इन असमानताओं को और बढ़ा दिया है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के एक अध्ययन के अनुसार, 75 प्रतिशत यूक्रेनी महिलाएं 15 वर्ष की आयु से ही किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार हुई हैं, जिसमें से हर तीन में से एक ने यौन हिंसा का सामना किया है। आम हालातों से परे युद्ध के दौरान, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ़ हिंसा दो से तीन गुना बढ़ जाता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निगरानी दल की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से यूक्रेन में यौन हिंसा के 124 कथित कृत्य सामने आए हैं। वहीं लगभग 12 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं। इनमें से 65 प्रतिशत महिलाएं अभी भी सुरक्षा की तलाश में हैं। लेकिन, तस्करी और शोषण का जोखिम उनके लिए बढ़ गया है। इस स्थिति ने महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा, रोजगार और आवास जैसी मूलभूत सेवाओं तक पहुंच से भी वंचित कर दिया है। 

तस्वीर साभार: UNHCR

यूक्रेन पर रूस के हमले की शुरुआत के बाद से एक अनुमान के अनुसार 3,238 महिलाएं और लड़कियां मारी गई और 4,872 घायल हुई। वहीं लगभग 4 मिलियन आंतरिक रूप से विस्थापितों में से 56 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस वर्ष के लिए पहले के अनुमान निराशाजनक हैं। मानवीय सहायता की आवश्यकता वाले लोगों में से 56 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां हैं यानी 8 मिलियन महिलाएं और लड़कियां हैं। महिलाओं और उनकी आजीविका सुरक्षा पर ये निरंतर हमले बेहद गंभीर प्रभाव करते हैं। यूक्रेन में महिलाओं को सुरक्षा, न्याय, सामाजिक सेवाओं, मानसिक, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और अन्य आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। देश में बेरोजगार के रूप में पंजीकृत लोगों में से 72 प्रतिशत महिलाएं हैं। युद्ध ने लैंगिक हिंसा के जोखिमों को भी बढ़ा दिया है, जिसमें संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा, मानव तस्करी और अंतरंग साथी हिंसा शामिल है। 

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के एक अध्ययन के अनुसार, 75 प्रतिशत यूक्रेनी महिलाएं 15 वर्ष की आयु से ही किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार हुई हैं, जिसमें से हर तीन में से एक ने यौन हिंसा का सामना किया है।

मारी जा रही महिलाएं और पीछे रह जाते बच्चे

यूनिसेफ के रिपोर्टों के अनुसार युद्ध के बढ़ने के बाद से कम से कम 2,406 बच्चे मारे गए या घायल हुए हैं। बच्चों की हताहत होने के अलावा, जिसमें 659 बच्चे मारे गए और 1,747 बच्चे घायल हुए हैं, डेटा की माने तो हर हफ़्ते कम से कम 16 बच्चे मारे गए या घायल हुए हैं। इसके अलावा हमलों के कारण लाखों बच्चों की जान खतरे में है। बच्चे लगातार युद्ध और विवाद का माहौल, लंबे समय से विस्थापन, पानी, बिजली और अन्य जरूरी वस्तुओं सहित जरूरी संसाधनों की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों पर पड़ने वाला असर चौंकाने वाला और अस्वीकार्य है। बच्चे अपने बिस्तरों, अस्पतालों और खेल के मैदानों में मारे गए हैं, जिससे परिवारों को युवा जीवन की हानि या जीवन बदल देने वाली घटनाओं से तबाह होना पड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़ा के बाद महिलाओं की स्थिति  

तस्वीर साभार: Reuters

संघर्ष कहीं भी हों उसके विपरीत परस्थितियों का सबसे प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं पर ही पड़ता है। अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़ा करने के बाद से महिलाओं और लड़कियों की आज़ादी और बुनियादी अधिकारों पर एक के बाद एक पाबंदियां लगा दी गई है। तालिबान ने नैतिकता कानूनों को मंजूरी दी थी जिसकी मानवाधिकार समूहों द्वारा कठोर कहकर आलोचना की गई। इसमें महिलाओं को अपना चेहरा ढंकना और पुरुष अभिभावक के बिना यात्रा करने पर रोक लगाना शामिल था। तालिबान ने कहा कि अफ़गान महिलाओं को अब सार्वजनिक और मनोरंजन पार्कों में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं पूरे देश में महिलाओं के लिए जिम और फिटनेस सेंटर पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तालिबान ने महिलाओं का ब्यूटी सैलून बंद जाना भी बंद कर दिया और लड़कियों को सिर्फ 12 साल की उम्र या छठी कक्षा तक स्कूल जाने की अनुमति दी गई। यूनिसेफ के एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ग़रीबी और असुरक्षा की वज़ह से पहले से मौजूद बाल विवाह में बढ़ोतरी हुई हैं।

तालिबान ने महिलाओं का ब्यूटी सैलून बंद जाना भी बंद कर दिया और लड़कियों को सिर्फ 12 साल की उम्र या छठी कक्षा तक स्कूल जाने की अनुमति दी गई। यूनिसेफ के एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ग़रीबी और असुरक्षा की वज़ह से पहले से मौजूद बाल विवाह में बढ़ोतरी हुई हैं।

युद्ध और मानवीय संकट के समय में महिलाओं और बच्चों पर होने वाले दुष्प्रभावों को अनदेखा करना, मानवता के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का उल्लंघन है। चाहे मणिपुर का जातीय संघर्ष हो, ग़ज़ा का युद्ध, यूक्रेन हो या अफ़ग़ानिस्तान, इन सभी स्थितियों ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेला है। इन संघर्षों में महिलाओं का न सिर्फ उनके अधिकारों का हनन हुआ है, बल्कि यह समाज के भविष्य को भी कमजोर करता है। लैंगिक हिंसा को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना, वैश्विक समुदाय की विफलता को दिखाता है, जहां मानवाधिकारों की रक्षा के दावों के बावजूद महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक खतरा उठाना पड़ता है। समय है कि वैश्विक स्तर पर इन मुद्दों को गंभीरता से लिया जाए, और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नीतियां और हस्तक्षेप सुनिश्चित हो।

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