वर्तमान समय में स्वास्थ्य एक चिंताजनक मुद्दा है। भारत की स्वास्थ्य प्रणाली बेहद जटिल और बहुआयामी है, जहां सरकारी और निजी दोनों तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं। देश की 1.3 बिलियन से अधिक आबादी इस स्वास्थ्य प्रणाली से लाभान्वित होती है। हाल ही में, भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वास्थ्य को लेकर एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा पर खर्च लगातार घट रहा है। अस्पतालों की बेहतर सुविधाओं, उपचार विकल्पों और दवाओं की उपलब्धता के कारण सामान्य परिवारों के लिए स्वास्थ्य देखभाल का खर्च कम हो रहा है। हालांकि राष्ट्रपति का यह बयान सरकारी अस्पतालों के संदर्भ में रहा होगा। लेकिन, असल में आम लोगों का अनुभव, चाहे वह सरकारी अस्पतालों से जुड़ा हो या निजी अस्पतालों से, इस बयान से मेल नहीं खाता। भारतीय समाज में आर्थिक रूप से मजबूत और कमजोर, दोनों वर्गों के लोग रहते हैं। जहां कुछ लोग साधन-संपन्न हैं, वहीं कई ऐसे भी हैं जो दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि क्या सचमुच सभी वर्गों को समान रूप से किफायती स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो पा रही हैं?
जमीनी हकीकत और लोगों के अनुभव
इस विषय पर असम की रहने वाली तीस वर्षीय उमर बेगम, जो दिल्ली में रहकर हस्तशिल्प का काम करती हैं, कहती हैं, “मेरे परिवार में मेरे पति ही कमाने वाले हैं। मुझे घर से बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं है, इसलिए मैं घर में ही छोटे-मोटे काम करके परिवार की आर्थिक मदद करने की कोशिश करती हूं। हमारे दो बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य संबंधी खर्च सबसे गंभीर विषय हैं। सरकार भले ही मुफ्त इलाज और बेहतर सुविधाओं की बात करती हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है। मैं हस्तशिल्प का काम करती हूं, जिसमें साड़ी, लहंगा और सूट पर मोती चिपकाने का काम शामिल है।”
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वह आगे बटाती हैं, “इस काम के लिए मुझे घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है, और मैं एक घंटे में मात्र 40 रुपये कमा पाती हूं। ऐसे में मेरे लिए कुछ कर पाना आसान नहीं है। आज भी जब परिवार में कोई बीमार होता है तो बहुत डर का सामना करना पड़ता है। कोशिश यही होती है कि हल्की कोई दवा खाकर ठीक हो जाए, क्योंकि हर चीज़ इतनी महंगी हो गई है और आमदनी अभी भी सीमित है। हमारे लिए निजी अस्पताल में जाना बहुत मुश्किल है। इसलिए हम सरकारी अस्पताल की ओर रुख करते हैं। हालांकि वहां भी सुविधाओं की कमी और भीड़भाड़ की समस्या रहती है। इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, और कई बार सोर्स के बिना जल्दी नंबर नहीं आता।”
कोशिश यही होती है कि हल्की कोई दवा खाकर ठीक हो जाए, क्योंकि हर चीज़ इतनी महंगी हो गई है और आमदनी अभी भी सीमित है। हमारे लिए निजी अस्पताल में जाना बहुत मुश्किल है। इसलिए हम सरकारी अस्पताल की ओर रुख करते हैं। हालांकि वहां भी सुविधाओं की कमी और भीड़भाड़ की समस्या रहती है।
सरकारी आँकड़े और वास्तविकता
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, पिछले पांच सालों में कुल स्वास्थ्य व्यय के प्रतिशत के रूप में आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय में लगातार गिरावट देखी गई है, जो 2017-18 में 48.8 फीसद था और 2021-22 में घटकर 39.4 फीसद रह गया। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के लिए बजट आवंटन साल 2017-18 (बजट अनुमान) में 47,353 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 (बजट अनुमान) में 85 फीसद बढ़कर 87,657 करोड़ रुपये किया गया था। 15वें वित्त आयोग द्वारा स्थानीय सरकारों के माध्यम से स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 70,051 करोड़ रुपये का अनुदान प्रदान किया गया। वहीं, 10 दिसंबर 2024 तक, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मौजूदा उप-स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को परिवर्तित करके कुल 1,75,418 आयुष्मान आरोग्य मंदिर स्थापित और संचालित किए जा चुके हैं।
लेकिन, सरकारी अस्पतालों में न सिर्फ लोगों की भीड़ ज्यादा है बल्कि गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के लिए समय पर इलाज हो पाना मुश्किल है। इस पर बंगाल की रहने वाली 35 वर्षीय संताना मलिक, जो अभी दिल्ली में रहकर दर्जी का काम करती हैं, कहती हैं, “मैं पिछले पांच साल से दिल्ली में रहकर दर्जी का काम कर रही हूं। इस पेशे में बहुत भीड़ है, लेकिन काम की उतनी उपलब्धता नहीं है। परिवार की बढ़ती ज़िम्मेदारियां और कम तनख्वाह तनाव बढ़ा रहे हैं। महंगाई लगातार बढ़ रही है, जिससे न सिर्फ घरेलू सामान बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी महंगी होती जा रही हैं। इस स्थिति में हम जैसे गरीब लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। हमारी कोई बचत नहीं है, और यदि घर में कोई बीमार पड़ जाए, तो कर्ज़ लेने की नौबत आ जाती है।”
मैं पिछले पांच साल से दिल्ली में रहकर दर्जी का काम कर रही हूं। इस पेशे में बहुत भीड़ है, लेकिन काम की उतनी उपलब्धता नहीं है। परिवार की बढ़ती ज़िम्मेदारियां और कम तनख्वाह तनाव बढ़ा रहे हैं। महंगाई लगातार बढ़ रही है, जिससे न सिर्फ घरेलू सामान बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी महंगी होती जा रही हैं।
आगे संताना कहती हैं, “मेरा बेटा कुछ समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, और उसका इलाज एम्स में चल रहा है। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, डॉक्टर समय पर देखते हैं और देखभाल भी बढ़िया होती है। लेकिन सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बावजूद मुझे अक्सर इलाज के लिए कर्ज़ लेना पड़ता है। हर जांच-पड़ताल महंगी होती है, जबकि जो जांच महंगी है, उसकी सुविधा अस्पताल में उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। हमें निजी अस्पतालों में जांच करवानी पड़ती है, जिसमें काफी खर्च आता है। कई बार तो दवाइयां भी बाहर की दुकानों से खरीदनी पड़ती हैं। इस स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं काफी कमजोर और असंतोषजनक महसूस होती हैं।”
बजट में स्वास्थ्य सेवाओं को कितना महत्व दिया गया
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, साल 2024-25 के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 90,958.63 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2023-24 के संशोधित अनुमान 80,517.62 करोड़ रुपये से 12.96 फीसद अधिक है। वहीं, 2025-26 के बजट में स्वास्थ्य प्रणाली के लिए 99,858.56 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 11 फीसद अधिक है। लेकिन, आम जनता के अनुभव कुछ और ही बताते हैं। दिल्ली की रहने वाली 40 वर्षीय राधा, जो गार्ड का काम करती हैं, कहती हैं, “जब मैंने नौकरी करने का सोचा, उस समय परिवार में बहुत गरीबी थी और कमाने वाला मेरे अलावा कोई नहीं था। मेरे पति विकलांग हैं। इसलिए वे कोई काम नहीं कर सकते।”
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वह आगे कहती हैं, “परिवार में उनके अलावा हमारे तीन बच्चे हैं, जिनके भविष्य की चिंता बनी रहती है। हर एक चीज़ का दाम आसमान छू रहा है, चाहे वह स्वास्थ्य सेवा हो या दो वक्त की रोटी। घर की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर है, जिसे संभालना आसान नहीं है। पति के इलाज के लिए मुझे लगातार अस्पताल जाना पड़ता है। हालांकि सरकार ने सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, लेकिन ये सुविधाएं सभी को समान रूप से नहीं मिलती। आज भी मजबूर होकर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज से लेकर जांच तक में लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। ऐसे में मेरी आमदनी से अधिक कर्ज़ बढ़ता जा रहा है।”
मेरा बेटा कुछ समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, और उसका इलाज एम्स में चल रहा है। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, डॉक्टर समय पर देखते हैं और देखभाल भी बढ़िया होती है। लेकिन सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बावजूद मुझे अक्सर इलाज के लिए कर्ज़ लेना पड़ता है। हर जांच-पड़ताल महंगी होती है, जबकि जो जांच महंगी है, उसकी सुविधा अस्पताल में उपलब्ध होनी चाहिए।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, निजी स्वास्थ्य बीमा कवरेज में वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 5.8 फीसद थी और 2021-22 में बढ़कर 7.4 फीसद हो गई। हालांकि आंकड़ों से इतर, ज़मीनी हकीकत कुछ और ही दिखाती है। मध्यम, निम्न आय वर्ग और हाशिए पर मौजूद समुदायों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता निजी खर्च एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले दशक में किए गए शोध अध्ययनों से पता चलता है कि स्वास्थ्य में जेब से किए जाने वाले खर्च (ओओपीई) के कारण हर साल 3 से 7 प्रतिशत भारतीय परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं, जबकि ग्रामीण और गरीब राज्यों में इसका असर अधिक होता है। स्वास्थ्य में ओओपीई के कारण वंचित समूहों पर अधिक वित्तीय बोझ पड़ता है।
भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय में से जेब से किए जाने वाले खर्च में 2013-14 के 64.2 फीसद से 2021-22 में 39.4 फीसद की गिरावट जरूर देखी गई है, जो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी भारत के 2020-21 और 2021-22 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमानों के अनुसार एक सकारात्मक संकेतक दिखाता है। लेकिन, इलाज का मतलब सिर्फ अस्पतालों में भरती नहीं, बल्कि रोजाना के स्वास्थ्य पर खर्च के साथ-साथ ओपीडी में चिकित्सा और जांच भी आता है जहां आज भी लोग विशेषकर वंचित समूह जूझ रहे हैं। इसलिए, जरूरी है सरकार न सिर्फ व्यापक पैमाने पर स्वास्थ्य को देखे, बल्कि सभी समुदायों जैसे विकलांग लोग या ऐसे लोग जो क्रानिक रोग से जूझ रहे हैं, उनके लिए बेहतर योजनाएं बनाए।