समाजपर्यावरण क्या है इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग?

क्या है इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग?

ब्रेस्टफीडिंग को ग्रीन फीडिंग का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है क्योंकि यह पूरी तरह से प्राकृतिक और टिकाऊ है। इसमें पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह का प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है जो पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है।

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों का सामना कर रही है। पर्यावरणीय संकट दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह से आए दिन भूकंप, बाढ़, सूखा, महामारी जैसी आपदाएं देखने को मिलती रहती हैं। अब हमारे खान-पान की आदतें निजी पसंद-नापसंद तक सीमित नहीं है बल्कि हमारे पर्यावरण और भविष्य को बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग जैसे विचार तेजी से उभर कर सामने आ रहे हैं। ये न केवल खाद्य सुरक्षा और पोषण को प्राथमिकता देते हैं बल्कि धरती और जलवायु को लेकर हमारी ज़िम्मेदारी को भी सामने लाते हैं।

इसके अनुसार भोजन केवल स्वाद और पोषण का ही माध्यम नहीं है बल्कि एक समावेशी और टिकाऊ जीवन शैली का आधार भी है। इसका मकसद स्थानीय, मौसमी और कम संसाधन खपत वाले पर्यावरण के अनुकूल भोजन के विकल्पों को बढ़ावा देना है। जिससे न केवल हमारे भोजन और पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा किया जाए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्वच्छ, स्वस्थ, हरित और समावेशी पर्यावरण की नींव डाली जाए।

ग्रीन फीडिंग को ब्रेस्टफीडिंग से जोड़ने और इस दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने की शुरुआत GIFA यानी जिनेवा इन्फेंट फीडिंग एसोसिएशन और IBFAN इंटरनेशनल बेबी फूड ऐक्शन नेटवर्क ने किया।

क्या है इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग

तस्वीर साभार: Vedanta

इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग दिखने में एक जैसे लगते हैं और इस वजह से बहुत बार इन्हें एक दूसरे के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इनमें काफ़ी ज़्यादा समानताएं हैं लेकिन इन दोनों विचारों में थोड़ा सा फ़र्क भी है। इकोफीडिंग का मतलब ऐसा खाना जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना हमारे भजन और पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा करे जैसे- स्थानीय, मौसमी और जैविक खाना जिसमें किसी भी तरह के रासायनिक और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले साधनों का इस्तेमाल न किया जाए। जबकि ग्रीनफीडिंग इससे थोड़ा और आगे बढ़कर बात करता है, जिसमें पर्यावरण के साथ-साथ समाज और स्वास्थ्य के लिए टिकाऊपन और समावेशिता के पहलू को भी शामिल किया जाता है।

ग्रीनफीडिंग में भोजन के खेत से लेकर थाली तक पहुंचने की प्रक्रिया के दौरान इन सारे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो ग्रीनफीडिंग एक दूरदर्शी और व्यापक विचार है जिसमें इकोफीडिंग को शामिल किया जा सकता है। इसमें ऐसे खाद्य पदार्थ को प्राथमिकता दी जाती है जो मौसम के अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्र में स्थानीय रूप से उपजाए जाते हैं। यानी ऐसा खानपान जो इंसान के भोजन और पोषण संबंधी ज़रूरतों को भी पूरा करे, सेहत के लिए भी अच्छा हो और पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचाए। इसमें संसाधनों का कम से कम इस्तेमाल किया जाता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ और समावेशी भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।

ब्रेस्टफीडिंग को ग्रीन फीडिंग का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है क्योंकि यह पूरी तरह से प्राकृतिक और टिकाऊ है। इसमें पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह का प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है जो पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है।

ग्रीन फीडिंग और ब्रेस्टफीडिंग के बीच संबंध

ब्रेस्टफीडिंग को ग्रीन फीडिंग का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है क्योंकि यह पूरी तरह से प्राकृतिक और टिकाऊ है। इसमें पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह का प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है जो पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है। ग्रीन फीडिंग को ब्रेस्टफीडिंग से जोड़ने और इस दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने की शुरुआत GIFA यानी जिनेवा इन्फेंट फीडिंग एसोसिएशन और IBFAN इंटरनेशनल बेबी फूड ऐक्शन नेटवर्क ने किया। GIFA का मानना है कि ब्रेस्टफीडिंग टिकाऊ पोषण की पहली सीढ़ी है। जबकि दूसरे जानवरों का दूध, लैब में बनाया गया दूध और इसी तरह के दूसरे प्रोसेस्ड शिशु आहार न तो बच्चे के लिए ही पूरी तरह से सुरक्षित और सेहतमंद हैं बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक हैं। ग़ौरतलब है कि ब्रेस्टफीडिंग के महत्त्व को देखते हुए हर साल 1 से 7 अगस्त, वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक के रूप में पूरे दुनिया भर में मनाया जाता है।

तस्वीर साभार: United Nations

इसकी शुरुआत 1990 में हुई थी, फिर 2016 में इसे यूनाइटेड नेशन के सतत विकास लक्ष्यों में शामिल किया गया। 2015 की IBFAN की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि एक किलो शिशु आहार या छोटे बच्चे के दूध को बनाने की प्रक्रिया में होने वाला ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन लगभग 4 किलो कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर होगा । ग़ौरतलब है कि इसमें खुदरा और घरेलू उपयोग के दौरान होने वाले कार्बन फुटप्रिंट को शामिल नहीं किया गया था। 2019 में ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी की डॉक्टर जूली स्मिथ ने फॉर्मूला दूध के उत्पादन के दौरान होने वाले कार्बन फुटप्रिंट पर चिंता जाहिर की थी।

डॉ स्मिथ ने ग्रीनफीडिंग टूल (जीएफटी) बनाया जो फार्मूला दूध के प्रभाव को मापने के लिए इस्तेमाल किया जाता है । फॉर्मूला दूध बनाने के लिए डेयरी उद्योग, फैक्ट्री, प्लास्टिक पैकिंग और ट्रांसपोर्ट की ज़रूरत होती है। जिसके हर पड़ाव पर न केवल ग्रीन हाउस गैसें निकलती हैं बल्कि प्रदूषण और कार्बन फुटप्रिंट जैसी समस्याएं भी पैदा होती हैं जिससे जलवायु और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। जबकि ब्रेस्टफीडिंग में किसी भी तरह के ग्रीन हाउस गैस या कार्बन फुटप्रिंट की कोई संभावना नहीं होती है। यहीं से इस तरह के विचार को बढ़ावा मिला कि सभी उम्र के लोगों के लिए ऐसे खान-पान को बढ़ावा दिया जाए जो शरीर के लिए भी सेहतमंद हो और पर्यावरण के लिए भी अच्छा हो।

ग्रीनफीडिंग क्यों है ज़रूरी

तस्वीर साभार: Australian national University

ग्रीनफीडिंग में स्थानीय और टिकाऊ भोजन को बढ़ावा दिया जाता है जिससे ट्रांसपोर्ट के दौरान होने वाले प्रदूषण को रोका जा सकता है साथ ही इससे स्थानीय किसानों को भी फ़ायदा मिलता है। इसमें ताजा अनाज और फल-सब्जियों को प्राथमिकता दी जाती है जो पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। ग्रीन फीडिंग में भोजन की बर्बादी कम करने के तरीकों को भी बढ़ावा दिया जाता है जैसे कि होटल, मेस या रेस्टोरेंट में बचा हुआ खाना ज़रूरतमंद लोगों में बांट दिया जाए। खाना अगर इंसानों के खाने के लायक न हो तो जानवरों के चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह की पहल कई संस्थान देश भर में कर रही है।

ग्रीनफीडिंग प्राकृतिक संसाधनों जैसे बिजली, पानी और तेल की बचत में भी योगदान देता है जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी है। स्थानीय होने से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है जिससे ग्रीन हाउस गैसों को भी कंट्रोल किया जा सकता है। इसके साथ ही अल्ट्रा प्रॉसेस्ड फूड (UPFs) जिससे मोटापा और जीवन शैली संबंधित बीमारियां बढ़ने का ख़तरा होता है उसे रोकने में ग्रीनफीडिंग कारगर साबित हो सकता है। इससे संतुलित और पौष्टिक भोजन को बढ़ावा मिलता है जो लोगों के स्वास्थ्य में सुधार कर बीमारियों से बचाने में अहम भूमिका निभाता है। जैविक खेती मिट्टी के उपजाऊपन को बढ़ाती है जिससे जैव विविधता बनी रहती है। इसके अलावा यह आर्थिक रूप से भी फ़ायदेमंद है क्योंकि इससे एक तरफ जहां ग़ैर ज़रूरी चीजों की खरीद से बचा जा सकता है वहीं बीमारियों की रोकथाम से मेडिकल पर होने वाले खर्चों को सीमित किया जा सकता है। इन सब के साथ ही ग्रीन फीडिंग पशु-पक्षियों समेत तमाम जीवों के लिए भी फ़ायदेमंद है।

चुनौतियाँ और आगे का रास्ता

ग्रीनफीडिंग आज दुनिया भर की ज़रूरत बन चुका है, इसके बावजूद इसके रास्ते में बहुत सारी चुनौतियां भी हैं जिन पर काम किया जाना चाहिए। सबसे पहले तो हर जगह लोकल और टिकाऊ खाना मौजूद नहीं है ख़ास तौर पर शहरी और खराब जलवायु वाले क्षेत्रों में। इसके अलावा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड आइटम्स की मार्केटिंग और विज्ञापन इतने आकर्षक होते हैं कि उससे बच पाना मुश्किल होता है। इन्हें इस तरह से पेश किया जाता है जैसे कि ये सेहत के लिए बहुत अच्छे हैं। ऐसे में अच्छे खासे जागरूक लोग भी इसके चंगुल में फंस जाते हैं। इसके अलावा कई बार ये इतने महंगे होते हैं कि आम लोग चाह कर भी इनका इस्तेमाल नहीं कर पाते।

ग्रीनफीडिंग आज दुनिया भर की ज़रूरत बन चुका है, इसके बावजूद इसके रास्ते में बहुत सारी चुनौतियां भी हैं जिन पर काम किया जाना चाहिए। सबसे पहले तो हर जगह लोकल और टिकाऊ खाना मौजूद नहीं है ख़ास तौर पर शहरी और खराब जलवायु वाले क्षेत्रों में।

इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार के स्तर पर नीतिगत सुधार करना सबसे अहम है। इसमें अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड आइटम की मार्केटिंग और बिक्री को ठीक से रेगुलेट करना ज़रूरी है। साथ ही लोगों में जागरूकता फैलाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें पता रहे कि वह क्या खा रहे हैं और उसके क्या फ़ायदे और नुकसान है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर किसानों को जैविक और टिकाऊ खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ग्रीन फीडिंग की शुरुआत जन्म से ही होनी चाहिए जिसमें 6 महीने तक ब्रेस्टफीडिंग को बढ़ावा देना अहम कदम है। विज्ञान और तकनीक का मकसद आर्थिक विकास ही नहीं बल्कि सेहत और पर्यावरण के अनुकूल भी होना चाहिए। इसके अलावा हर व्यक्ति को अपने स्तर पर प्रयास करना चाहिए।

इसमें स्थानीय, प्राकृतिक और पौधों पर आधारित भोजन को प्राथमिकता देना, भोजन की बर्बादी को रोकना और प्रोसेस्ड फूड आइटम का कम से कम इस्तेमाल करना शामिल है। इकोफीडिंग और ग्रीनफीडिंग खानपान की एक शैली ही नहीं बल्कि समावेशी विकास का एक विचार है, जो सामाजिक न्याय और समावेशिता को बढ़ावा देता है। यह इस विचारधारा को बढ़ावा देता है कि यह धरती और इसके संसाधन सिर्फ़ हमारे लिए नहीं बल्कि यहां मौजूद सभी जीवों के लिए और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी हैं। इसलिए भोजन का चुनाव करते समय स्वाद, सेहत और सुविधा तक सीमित न रहकर इसे एक ज़िम्मेदारी के रूप में देखना होगा, तभी हम एक सुरक्षित, समावेशी और टिकाऊ भविष्य बना सकते हैं।

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