इंटरसेक्शनलजेंडर भारत में महिलाएं कैसे बदल रही हैं पर्यटन की दुनिया

भारत में महिलाएं कैसे बदल रही हैं पर्यटन की दुनिया

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन कार्यबल का आधा से ज़यादा हिस्सा महिलाओं का है, जिससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि पर्यटन कई देशों में महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार का बड़ा स्रोत रहा है।

मानविकी और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में यात्रा और पर्यटन सबसे बड़ा उद्योग है। गौरतलब है कि यह देश की जीडीपी में लगभग 6.23 फीसदी योगदान देता है और साल  2011 में कुल रोजगार का करीब 8.78 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से मिला था। हर साल भारत में लगभग 53 करोड़ विदेशी पर्यटक और 56 करोड़ घरेलू पर्यटक यात्रा करते हैं। हालांकि साल 2011 के ट्रैवल एंड टूरिज़्म कॉम्पिटिटिवनेस इंडेक्स में भारत 139 देशों में 68वें स्थान पर था। दुनिया भर में पर्यटन उद्योग को अक्सर सांस्कृतिक जुड़ाव और नए- नए अनुभवों के आदान-प्रदान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस पूरी व्यवस्था को चलाने वाली सबसे मज़बूत कड़ी को सुचारु रूप से चलाने वाली महिलाओं का कभी ज़िक्र ही नहीं किया जाता है। गौरतलब है कि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन कार्यबल का आधा से ज़यादा हिस्सा महिलाओं का है, जिससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि पर्यटन कई देशों में महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार का बड़ा स्रोत रहा है।

भारत भी इससे अलग नहीं है। जहां कभी महिलाओं की भूमिका पर्यटन सेवाओं तक सीमित थी, वहीं आज वे पर्यटन उद्योग की नीति-निर्माता, ट्रैवल गाइड, एडवेंचर विशेषज्ञ, डिजिटल क्रिएटर और सामुदायिक नेता बनकर उभर रही हैं। यह बदलाव केवल एक आर्थिक कहानी नहीं है, बल्कि समाज में महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं, संसाधनों पर नियंत्रण, और पितृसत्तात्मक नियमों को चुनौती देने की कहानी भी है। महिलाओं ने इस क्षेत्र को अधिक संवेदनशील, समावेशी और सुरक्षित बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्रामीण होमस्टे से लेकर बड़े शहरों में संचालित ट्रैवल स्टार्टअप्स तक, भारतीय महिलाएं पर्यटन को न केवल रोज़गार का माध्यम बना रही हैं, बल्कि अपने समुदायों में नए सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत भी कर रही हैं।

मानविकी और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में यात्रा और पर्यटन सबसे बड़ा उद्योग है। गौरतलब है कि यह देश की जीडीपी में लगभग 6.23 फीसदी योगदान देता है और साल  2011 में कुल रोजगार का करीब 8.78 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से मिला था।

पारंपरिक भूमिकाओं से नेतृत्व तक

पर्यटन के क्षेत्र में पहले महिलाएं अक्सर पारंपरिक भूमिकाओं तक ही सीमित रहती थीं। लेकिन धीरे – धीरे महिलाओं ने इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। यूएन वुमन की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में पर्यटन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में ज्यादातर महिलाएं थीं। पर्यटन में 54 फीसदी कर्मचारी महिलाएं हैं, जबकि बाकी दूसरे कामकाज़ के क्षेत्रों में यह संख्या केवल 39 फीसदी है। इससे पता चलता है कि पर्यटन में महिलाओं की भागीदारी बहुत ज़्यादा है।यह क्षेत्र महिलाओं को नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए अधिक अवसर प्रदान करता है, पर्यटन मंत्रियों में 23 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि कुल मंत्रियों में यह संख्या 20.7 फीसदी है।

 यूएन वुमन की साल 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक,  इस क्षेत्र में मध्य प्रदेश का महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन स्थल कार्यक्रम न केवल कई महिलाओं के जीवन को बदल रहा है, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका के बारे में, रूढ़िवादी धारणाओं को बदलने में भी मदद कर रहा है। भारत में घरेलू कामों तक सीमित रहने वाली महिलाएं अब पर्यटकों को गाइड कर रही हैं, सोलो ट्रैवल कर रही  है, होमस्टे चला रही हैं और भारतीय पर्यटन की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में अपना योगदान दे रही हैं।  एशिया वुमन न्यूज  मुताबिक, इंदौर और लखनऊ जैसे टियर 2 शहरों में महिलाओं के नेतृत्व में यात्रा नियोजन में तेजी देखी जा रही है, जिसमें इंदौर में हर साल 31 फीसदी  की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

यू एन वुमन की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में पर्यटन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में ज्यादातर महिलाएं थीं। पर्यटन में 54 फीसदी कर्मचारी महिलाएं हैं, जबकि बाकी दूसरे कामकाज़ के क्षेत्रों में यह संख्या केवल 39 फीसदी है।

सुरक्षा और संवेदनशीलता का नया ढांचा

इंडिया टुडे में छपे भारत के सबसे बड़े ट्रैवल समुदाय हॉलिडेआईक्यू की रिपोर्ट अनुसार, भारत के शीर्ष 50 उभरते पर्यटन स्थलों में कुल आवास का 13 फीसदी होमस्टे हैं। वहीं 207 जगहों में कुल 1,663 होमस्टे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में होमस्टे की संख्या सबसे अधिक है। उत्तर भारत में मनाली, कुल्लू और उत्तराखंड के कई स्थानों के साथ-साथ राजस्थान के कुछ हिस्सों में होमस्टे हैं, जिन्हें भारतीय यात्री बहुत पसंद करते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं पर्यटन क्षेत्र को एक नए रोजगार के रूप में अपना रही हैं। उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आतिथ्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है। जिन महिलाओं के घरों में अतिरिक्त कमरे हैं, वे इन स्थानों को पर्यटकों के लिए आरामदायक आवास में बदल रही हैं। ये होमस्टे पर्यटकों को स्थानीय मेजबानों के साथ रहने की सुविधा प्रदान करते हैं, और कभी कभी  कम समय के लिए निशुल्क भी होते हैं, जिससे उन्हें वहां की संस्कृति, परंपराओं और खान-पान से जुड़ने का अवसर मिलता है। 

स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प और परंपराओं को बढ़ावा देकर, महिला उद्यमी उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थायी आय के स्रोत का ज़रिया भी बन रही हैं। साथ ही सुरक्षा, और कम खर्च की दृष्टि से भी लोग खासकर महिलाएं होमस्टे में रुकना पसंद करती हैं। महिलाएं जब पर्यटन के निर्णयकारी पदों पर होती हैं, तो यात्राओं का डिज़ाइन अधिक समावेशी, संवेदनशील और सुरक्षित बनता है। आउटलुक ट्रेवलर और टोलूना ने साल 2024 में भारत की  महिलाओं के यात्रा पैटर्न और उनके अनुभवों पर आधारित एक सर्वेक्षण किया जिसमें 1,214 महिलाओं को शामिल किया गया था । लगभग 90 फीसदी महिलाएं यात्रा की जगह चुनते समय सबसे पहले सुरक्षा को देखती हैं। इसके अलावा, 59 फीसदी  महिला यात्रियों ने बताया कि उन्हें यात्रा के दौरान कभी-न-कभी हिंसा का सामना करना पड़ा है। इस कारण, सुरक्षित, आरामदायक आवास महिलाओं के लिए और भी ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।आंकड़ों से पता चलता है कि 20 फीसदी महिलाएं होमस्टे कैंप में रहना पसंद करती हैं। 

उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आतिथ्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है। जिन महिलाओं के घरों में अतिरिक्त कमरे हैं, वे इन स्थानों को पर्यटकों के लिए आरामदायक आवास में बदल रही हैं।

चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं

डुअल टूरिज़्ममें छपी, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ ) और संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन (यूएनडब्ल्यूटीओ) की रिपोर्टें बताती हैं कि पर्यटन क्षेत्र में महिलाएं अक्सर ऐसे काम करती हैं, जिनका उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता है। खासकर परिवार के ही चलाए जाने वाले छोटे व्यवसायों में। इक्वैलिटी इन टूरिज़्म की रिपोर्ट के मुताबिक, वरिष्ठ नेतृत्व पदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है, जबकि कम सुरक्षित और कम वेतन वाले पदों में उनकी संख्या अधिक है। महिलाओं को अक्सर नेतृत्व से बाहर रखा जाता है,  लेकिन वे उन पदों में अधिक संख्या में मौजूद होती हैं, जो पारंपरिक देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों को उजागर करते हैं या जिनमें केवल दिखावटी भूमिकाएं होती हैं, जैसे कि साफ-सफाई और रिसेप्शन की भूमिकाएं। इसे व्यावसायिक भेदभाव के रूप में जाना जाता है, जो वेतन में महत्वपूर्ण अंतर का कारण बनता है , जिसके तहत उद्योग भर में महिलाएं अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में 14.7 फीसदी कम कमाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र विश्व व्यापार संगठ की क्षेत्रीय रिपोर्ट बताती है कि इस क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन तीन से पांच घंटे अधिक देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियों में व्यतीत करती हैं। कई महिलाओं के लिए पारिवारिक या सामाजिक दायित्व, देखभाल और बच्चों की देखभाल आदि के कारण इस तरह के नियमित काम को निभाना मुश्किल हो जाता है। इसका कारण यह है कि समाज में यह उम्मीद  की जाती है कि महिलाएं अपने करियर की तुलना में घर और परिवार को प्राथमिकता दें। साइंस डायरेक्ट के मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी, पर्यटन में नौकरी की गुणवत्ता पुरुषों और महिलाओं के बीच भिन्न होती है, जहां महिलाओं को अपने पुरुष सहकर्मियों की तुलना में खराब कामकाजी परिस्थितियों के कारण लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

साइंस डायरेक्ट के मुताबिक,  विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी, पर्यटन में नौकरी की गुणवत्ता पुरुषों और महिलाओं के बीच भिन्न होती है, जहां महिलाओं को अपने पुरुष सहकर्मियों की तुलना में खराब कामकाजी परिस्थितियों के कारण लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

पर्यटन क्षेत्र में महिलाओं के काम में यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है । खास तौर पर आतिथ्य क्षेत्र में इसकी घटनाएं काफी अधिक हैं।हालांकि पुरुष भी हिंसा की घटनाओं की रिपोर्ट करते हैं । लेकिन इससे महिलाओं, कम उम्र की महिलाओं और कम वेतन वाली नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं के प्रभावित होने की संभावना अधिक होती है। इसकी एक चुनौती पर्यावरण प्रदूषण भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अभी से कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो साल 2034 तक पर्यटकों का पैदा किया जाने वाला कचरा हर साल बढ़कर 205 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। यह दुनिया में बनने वाले कुल ठोस कचरे का लगभग 7 फीसदी होगा। यानी पर्यटन बढ़ने के साथ-साथ पर्यावरण पर उसका नकारात्मक असर भी बहुत तेज़ी से बढ़ सकता है।

सुधार के लिए कदम 

पर्यटन मंत्रालय, राज्य सरकारों और निजी कंपनियों को ऐसी नीतियां तैयार करनी चाहिए, जो महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें नेतृत्व पदों में पहुंचने के लिए मदद करें। पर्यटन केवल महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि उन सभी व्यक्तियों के लिए भी सुरक्षित होना चाहिए ,जो समाज पर हाशिए पर रह रहे हैं । महिलाओं को नीति निर्माण की भूमिकाओं में शामिल किया जाना चाहिए। जब तक नीतियों में महिलाओं, विकलांग समुदाय के व्यक्तियों और ट्रांस, क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों का दृष्टिकोण शामिल नहीं होगा । तब तक पर्यटन के क्षेत्र को समावेशी नजरिए से नहीं देखा जा सकता है।  

भारत में पर्यटन क्षेत्र केवल यात्राओं और व्यवसाय का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव, लैंगिक समानता और आर्थिक आज़ादी का एक ज़रिया बनता जा रहा है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी यह दिखाती है कि पर्यटन अब केवल उपभोक्तावाद  पर केंद्रित उद्योग नहीं रहा है। यह समान हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व का माध्यम बन रहा है। फिर भी, वेतन असमानता, नेतृत्व में कमी, लैंगिक हिंसा, और परिवार की देखभाल जैसी चुनौतियां बताती हैं कि यात्रा की यह राह अभी पूरी तरह सुरक्षित या समान नहीं है। अगर पर्यटन को सच में समावेशी, संवेदनशील और टिकाऊ बनाना है, तो नीति निर्माण से लेकर स्थानीय स्तर तक महिलाओं, ट्रांस,क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों या हाशिये पर रह रहे व्यक्तियों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

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