इंटरसेक्शनलजेंडर ग्रीन ब्यूटी का भ्रम और महिलाओं पर बढ़ता दबाव

ग्रीन ब्यूटी का भ्रम और महिलाओं पर बढ़ता दबाव

औद्योगिक क्रांति के बाद सौंदर्य प्रसाधन एक ‘वस्तु’ बन गए। इन्हें बड़े पैमाने पर बनाया और बेचा जाने लगा। बीसवीं सदी में विज्ञापन उद्योग ने इन्हें उपभोक्तावाद से जोड़ दिया। यहीं से कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और पर्यावरण प्रदूषण के बीच एक खतरनाक रिश्ता शुरू हुआ।

विश्व में सौंदर्य प्रसाधनों का इतिहास बहुत पुराना और रोचक है। इसकी शुरुआत लगभग 6000 वर्ष पहले, प्राचीन मिस्र से मानी जाती है। उस समय सौंदर्य प्रसाधन केवल सजने-संवरने का साधन नहीं थे। वे धन, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी थे। मिस्र की कला में दिखने वाला गहरा आईलाइनर पुरुष और महिलाएं दोनों इस्तेमाल करते थे। प्राचीन समाजों में हल्दी, काजल, मेंहदी और प्राकृतिक तेलों का उपयोग आम था। ये सभी चीजें प्रकृति से जुड़ी थीं। इनका इस्तेमाल स्थानीय परंपराओं और पर्यावरण के संतुलन के साथ होता था। उस दौर में सौंदर्य और प्रकृति के बीच एक सामंजस्य था। समय के साथ यह परिभाषा पूरी तरह बदल गई। औद्योगिक क्रांति के बाद सौंदर्य प्रसाधन एक ‘वस्तु’ बन गए। इन्हें बड़े पैमाने पर बनाया और बेचा जाने लगा। बीसवीं सदी में विज्ञापन उद्योग ने इन्हें उपभोक्तावाद से जोड़ दिया। यहीं से कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और पर्यावरण प्रदूषण के बीच एक खतरनाक रिश्ता शुरू हुआ।

इस दौर में गोरे रंग और चिकनी त्वचा को सुंदरता का वैश्विक मानक बना दिया गया। इन कृत्रिम मानकों को हासिल करने के लिए रासायनिक उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ। इसका असर पर्यावरण पर पड़ा। धीरे-धीरे यह एक बड़े पर्यावरणीय संकट में बदल गया। कॉस्मेटिक इंडस्ट्री की मार्केटिंग मूल रूप से महिलाओं के लिए रही है। पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि उनका मूल्य उनके रूप-रंग से जुड़ा है। जैसे ही वे किशोरावस्था में प्रवेश करती हैं, उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि उनकी त्वचा, बाल और यहां तक कि शरीर की प्राकृतिक गंध में भी सुधार की ज़रूरत है। यह सोच महिलाओं को केवल उपभोक्ता नहीं बनाती। यह उनके शरीर को एक ‘अनुशासित शरीर’ में बदल देती है। इस शरीर को समाज के तय मानकों के अनुसार लगातार सुधारा, छिपाया और नियंत्रित किया जाता है।

जैसे ही वे किशोरावस्था में प्रवेश करती हैं, उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि उनकी त्वचा, बाल और यहां तक कि शरीर की प्राकृतिक गंध में भी सुधार की ज़रूरत है। यह सोच महिलाओं को केवल उपभोक्ता नहीं बनाती। यह उनके शरीर को एक ‘अनुशासित शरीर’ में बदल देती है। इस शरीर को समाज के तय मानकों के अनुसार लगातार सुधारा, छिपाया और नियंत्रित किया जाता है।

महिलाओं पर आकर्षक दिखने के रूढ़िवादी मानक

महिलाओं पर आकर्षक दिखने के रूढ़िवादी मानक थोपे जाते हैं। आज सोशल मीडिया और विज्ञापनों ने इन मानकों को और मज़बूत कर दिया है। यह दबाव अक्सर साफ़ तौर पर दिखाई नहीं देता। इसे ‘सेल्फ-केयर’ और ‘सेल्फ-लव’ जैसी सुंदर भाषा में पेश किया जाता है। लेकिन हकीकत में यह महिलाओं पर मानसिक और सामाजिक दबाव डालता है। अगर कोई महिला मेकअप नहीं करती, तो उसे लापरवाह कहा जाता है। अगर वह ज़्यादा मेकअप करती है, तो उसे बनावटी माना जाता है। यह दोहरा मापदंड महिलाओं को लगातार अपराधबोध में रखता है। इसी अपराधबोध का फायदा बाज़ार उठाता है। महिलाओं को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे कभी पूरी नहीं हैं। उन्हें बेहतर बनने के लिए नए उत्पादों की ज़रूरत है। यह अंतहीन सुधार की प्रक्रिया महिलाओं का समय, पैसा और मानसिक ऊर्जा लगातार खींचती रहती है।

ग्रीन ब्यूटी और ज़िम्मेदार उपभोग का भ्रम

बढ़ते पर्यावरणीय संकट और रसायनों को लेकर बढ़ती चिंता के बीच ग्रीन ब्यूटी और सस्टेनेबल कॉस्मेटिक्स का चलन तेज़ हुआ है। इन उत्पादों को पर्यावरण-अनुकूल, कम रासायनिक और नैतिक उत्पादन वाला बताया जाता है। इन्हें आमतौर पर ऊंची कीमतों पर बेचा जाता है। इनके साथ रिसायक्लेबल पैकेजिंग और क्रुएल्टी-फ्री होने के दावे जोड़े जाते हैं। कंपनियां कहती हैं कि इनसे प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे। यह भी दावा किया जाता है कि ये प्लास्टिक कचरा और जल प्रदूषण कम करने में मदद करते हैं। साथ ही, उपभोक्ताओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की बात कही जाती है। लेकिन ग्रीन ब्यूटी की यह तस्वीर पूरी तरह साफ़ नहीं है। कई बार यह केवल ग्रीनवॉशिंग बनकर रह जाती है। कंपनियां बिना ठोस प्रमाण के खुद को सस्टेनेबल या नेचुरल बताने लगती हैं। असल उत्पादन प्रक्रिया में बड़े बदलाव नहीं दिखते, लेकिन मार्केटिंग ज़रूर बदल जाती है।

इन उत्पादों की ऊंची कीमतें एक और बड़ी समस्या है। ये उत्पाद अमूमन निम्न या मध्यम वर्ग की महिलाओं के लिए नहीं होते। ऐसे में सुरक्षित और कम रासायनिक उत्पाद एक विशेष वर्ग का अधिकार बन जाते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पर्यावरण बचाने की ज़िम्मेदारी अक्सर उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है।

इन उत्पादों की ऊंची कीमतें एक और बड़ी समस्या है। ये उत्पाद अमूमन निम्न या मध्यम वर्ग की महिलाओं के लिए नहीं होते। ऐसे में सुरक्षित और कम रासायनिक उत्पाद एक विशेष वर्ग का अधिकार बन जाते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पर्यावरण बचाने की ज़िम्मेदारी अक्सर उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है।

खासकर महिलाओं पर जिनसे ये उम्मीद की जाती है कि वे सुंदर भी दिखें और ‘नैतिकता’ का भी ध्यान रखे। वहीं, बड़ी कंपनियों और उनके उत्पादन ढांचों पर सवाल बहुत कम उठते हैं। यह पारिस्थितिक अपराधबोध की राजनीति का हिस्सा है, जहां सिस्टम बदलने के बजाय व्यक्तिगत चुनाव को समाधान बताया जाता है।

रासायनिक जोखिम और स्वास्थ्य पर असर

सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग केवल सामाजिक दबाव का सवाल नहीं है। यह एक गंभीर स्वास्थ्य मुद्दा भी है। कॉस्मेटिक और पर्सनल केयर उत्पादों में कई तरह के रसायन होते हैं। इनके लंबे समय तक होने वाले प्रभावों की जानकारी अक्सर सामने नहीं लाई जाती। एक औसत महिला रोज़ 12 से 20 अलग-अलग उत्पादों का इस्तेमाल करती है। वहीं पुरुषों के लिए यह संख्या 6 से 8 के बीच होती है। एनवायर्नमेंटल वर्किंग ग्रुप के अनुसार, महिलाएं रोज़ औसतन 168 अलग-अलग रसायनों के संपर्क में आती हैं। ये रसायन त्वचा के ज़रिए या सांस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं। इन उत्पादों में एंडोक्राइन डिस्रप्टिंग केमिकल्स, पीएफ़एएस और भारी धातुएं पाई जाती हैं। ये हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करती हैं। लंबे समय में यह शरीर के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। खासतौर पर स्किन लाइटनिंग क्रीम बेहद नुकसानदेह साबित हुई हैं।

एक औसत महिला रोज़ 12 से 20 अलग-अलग उत्पादों का इस्तेमाल करती है। वहीं पुरुषों के लिए यह संख्या 6 से 8 के बीच होती है। एनवायर्नमेंटल वर्किंग ग्रुप के अनुसार, महिलाएं रोज़ औसतन 168 अलग-अलग रसायनों के संपर्क में आती हैं।

इनमें पारा यानी मरकरी खतरनाक मात्रा में पाया गया है। वैश्विक मानकों के अनुसार, सौंदर्य प्रसाधनों में पारे की सीमा 1 पीपीएम होनी चाहिए। लेकिन कई जांचों में कुछ क्रीमों में 20,000 पीपीएम से भी ज़्यादा पारा मिला है। पारा किडनी, लिवर और नर्वस सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसी तरह, बालों को सीधा करने वाले हेयर रिलैक्सर्स में मौजूद फॉर्मल्डिहाइड और एस्ट्रोजेनिक रसायन कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं। शोध बताते हैं कि इन रसायनों का असर केवल इस्तेमाल करने वाली महिला तक सीमित नहीं रहता। गर्भावस्था के दौरान इनके संपर्क से भ्रूण के विकास पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इससे बच्चों में न्यूरोडेवलपमेंट से जुड़ी समस्याएं पैदा होने का जोखिम बढ़ जाता है।

कॉस्मेटिक उद्योग से बढ़ता प्रदूषण और महिलाओं पर असर

कॉस्मेटिक उद्योग से होने वाला कचरा सिर्फ रसायनों तक सीमित नहीं है। इसका दायरा बहुत बड़ा है। कई ब्यूटी उत्पादों में माइक्रोप्लास्टिक होता है। यह नालियों के ज़रिये नदियों और समुद्र तक पहुंच जाता है। ये छोटे प्लास्टिक कण समुद्री जीवों के शरीर में जाते हैं। बाद में यही हमारी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बनते हैं। इसके अलावा, शैम्पू की बोतलें, क्रीम के जार और पैकेजिंग से निकलने वाला प्लास्टिक कचरा लैंडफिल में जमा हो रहा है। इससे पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ता है। सौंदर्य उत्पादों से होने वाला प्रदूषण सभी पर समान असर नहीं डालता। इसमें पर्यावरणीय अन्याय साफ़ दिखाई देता है। 400 अरब डॉलर का यह वैश्विक उद्योग रंग, नस्ल और सामाजिक स्थिति के आधार पर मार्केटिंग करता है। शोध बताते हैं कि हल्की त्वचा वाली महिलाओं की तुलना में गहरी त्वचा वाली महिलाओं के शरीर में थैलेट्स और पैराबेंस जैसे ज़हरीले रसायन अधिक पाए जाते हैं। गहरे स्किन टोन वाले उपभोक्ता एथनिक हेयर प्रोडक्ट्स की खरीदारी नौ गुना अधिक करते हैं। इन उत्पादों में रसायनों की मात्रा भी ज़्यादा होती है।

वजाइना की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले डॉचिंग उत्पादों के विज्ञापन खास तौर पर गहरे स्किन टोन वाली महिलाओं को लक्षित करते हैं। इसके कारण उनके शरीर में डायथाइल थैलेट का स्तर 150 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है।

स्वास्थ्य पर पड़ता सीधा असर

वजाइना की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले डॉचिंग उत्पादों के विज्ञापन खास तौर पर गहरे स्किन टोन वाली महिलाओं को लक्षित करते हैं। इसके कारण उनके शरीर में डायथाइल थैलेट का स्तर 150 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। यह रसायन प्रजनन क्षमता और भ्रूण के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। ब्यूटी सैलून में काम करने वाली महिलाएं अक्सर हाशिए के समुदायों या प्रवासी समूहों से आती हैं। वे दिनभर टोल्यूनि, एसीटोन और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स जैसे रसायनों के संपर्क में रहती हैं। अधिकतर छोटे सैलूनों में हवा की निकासी की सही व्यवस्था नहीं होती। इससे जहरीले रसायन हवा में जमा रहते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से दमा, त्वचा रोग, माइग्रेन और सांस की बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। प्रजनन से जुड़ी समस्याओं का खतरा भी बढ़ता है। यह दिखाता है कि सौंदर्य मानकों का दबाव महिलाओं के मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाता है।

बॉडी हेयर और सामाजिक दबाव और पिंक टैक्स

महिलाओं के शरीर के बाल लंबे समय से सामाजिक नियंत्रण का विषय रहे हैं। समाज महिलाओं से “साफ़, मुलायम और बालरहित” शरीर की उम्मीद करता है। वहीं पुरुषों के शरीर के बालों को स्वाभाविक माना जाता है। रेज़र, वैक्स और हेयर रिमूवल क्रीम जैसे उत्पादों के ज़रिये बॉडी हेयर को समस्या बताया गया है। विज्ञापन बालों वाले शरीर को अस्वच्छ और अनाकर्षक दिखाते हैं। इसका असर महिलाओं के आत्मविश्वास और शरीर की छवि पर पड़ता है। इस दबाव के साथ पिंक टैक्स भी जुड़ा है। पिंक टैक्स वह अतिरिक्त कीमत है जो महिलाओं को समान उत्पादों के लिए चुकानी पड़ती है। सिर्फ “महिलाओं के लिए” लेबल और गुलाबी पैकेजिंग के कारण दाम बढ़ा दिए जाते हैं। यह कोई सरकारी टैक्स नहीं, बल्कि बाज़ार की रणनीति है। यह दिखाता है कि कैसे लैंगिक असमानता को मुनाफ़े में बदला जाता है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

क्यों है ये नारीवादी मुद्दा और क्या हो समाधान

नारीवादी नज़रिये से देखें तो महिलाओं पर दोहरा बोझ है। एक ओर उनसे सुंदर दिखने की उम्मीद की जाती है। दूसरी ओर पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल दी जाती है। महिलाओं को महंगे सस्टेनेबल उत्पाद खरीदने की सलाह दी जाती है। लेकिन बड़ी कंपनियों और सौंदर्य मानकों पर कोई दबाव नहीं डाला जाता। यह पारिस्थितिक अपराधबोध की राजनीति है। समाधान सिर्फ ग्रीन प्रोडक्ट खरीदने में नहीं है। ज़रूरत है उन सौंदर्य मानकों को चुनौती देने की जो इस मांग को पैदा करते हैं। साथ ही, सौंदर्य उत्पादों पर सख़्त नियामक निगरानी जरूरी है। कॉस्मेटिक उद्योग, प्रदूषण और महिलाओं का स्वास्थ्य एक गंभीर मानवाधिकार का सवाल है। ज़रूरत है ऐसी सौंदर्य सोच की जो महिलाओं को उनके प्राकृतिक रूप में स्वीकार करे। सेल्फ केयर को केवल व्यक्तिगत उपभोग नहीं, बल्कि सामूहिक स्वास्थ्य और पर्यावरण से जोड़कर देखना होगा। जागरूकता, कड़े कानून और सामाजिक बदलाव ही एक सुरक्षित और बराबरी वाला भविष्य बना सकते हैं। यह समय है कि हम सौंदर्य के इन नुकसानदेह मानकों से बाहर निकलें और एक स्वस्थ, टिकाऊ जीवन की ओर बढ़ें।

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