शादियां हमेशा से सामाजिक आयोजन रही हैं। इनमें परिवार, समुदाय और सांस्कृतिक मूल्य एक साथ आते हैं। पहले शादी निजी और पारिवारिक अवसर मानी जाती थी। लेकिन, सोशल मीडिया के दौर में शादियों का स्वरूप बदल गया है। अब शादी केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक ‘प्रदर्शन’ बनती जा रही है। उसे जीने के साथ-साथ दिखाना भी ज़रूरी माना जाने लगा है। आज शादियां कंटेंट में बदल गई हैं। वेडिंग रील्स, ब्राइडल इंफ्लुएंसर और सजे-धजे समारोह सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं। रंगीन लहंगे, फूलों से सजा मंच और सिनेमाई एंट्री सामान्य दृश्य बन गए हैं। ऊपर से यह सब आकर्षक और खुशियों से भरा लगता है। लेकिन, इसके नीचे एक गंभीर समस्या छिपी है। यह महिलाओं पर थोपे जा रहे वर्ग आधारित और जेंडर आधारित दबावों को सामान्य बनाता है।
अमूमन सोशल मीडिया पर दिखने वाली शादियां अवास्तविक उम्मीदें पैदा करती हैं। खासकर दुल्हनों से एक तयशुदा छवि में फिट होने की अपेक्षा की जाती है। सुंदर दिखना, मुस्कुराते रहना और हर पल परफेक्ट दिखाना ज़रूरी बना दिया जाता है। अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं के लिए यह दबाव अलग रूप लेता है। यह उनकी आत्म-छवि, चिंता और भावनात्मक श्रम को बढ़ाता है। यह समझना जरूरी है कि कैसे पितृसत्ता डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के साथ खुद को ढाल लेती है। वह दबाव को सुंदरता में बदल देती है और उसे ‘चॉइस’ के नाम पर छुपा देती है।
शादी की रील्स देखकर मुझे अक्सर अपने लुक को लेकर बहुत असुरक्षा महसूस होती है। ऑनलाइन जो दुल्हनें दिखती हैं, उनकी त्वचा एकदम बेदाग़ होती है। उनका मेकअप बहुत प्रोफेशनल होता है और महंगे मेकअप आर्टिस्ट उन्हें तैयार करते हैं। मेरे चेहरे पर दाग़ हैं और मेरे इलाके में ऐसे मेकअप आर्टिस्ट भी नहीं हैं। जब मैं ये रील्स देखती हूं, तो डर लगने लगता है।
इंस्टाग्राम की भव्य शादियां और नॉर्मल होने का भ्रम
सोशल मीडिया की सबसे ताक़तवर विशेषताओं में से एक है बार-बार दोहराव। जब एक जैसी वेडिंग रील्स बार-बार हमारी स्क्रीन पर आती हैं एक जैसे शरीर, एक जैसी लाइटिंग, एक जैसे कपड़े, एक जैसे डांस और एक जैसी लग्ज़री तो जो असामान्य है, वह भी सामान्य लगने लगता है। धीरे-धीरे एक ही तरह की शादी, एक ही तरह की दुल्हन और एक ही तरह की खूबसूरती ‘नॉर्मल’ बना दी जाती है। इंस्टाग्राम वर्ग, भूगोल और संसाधनों के फर्क को छुपा देता है। महानगरों की वे दुल्हनें, जिनके पास स्किन डॉक्टर, महंगे मेकअप आर्टिस्ट, कोरियोग्राफर, वेडिंग प्लानर और प्रोफेशनल वीडियोग्राफर की पूरी टीम होती है, वही तस्वीरें हर किसी की फ़ीड में दिखती हैं। वहीं ऐसे फ़ीड हाशिये के समुदाय की महिलाओं के लिए एक चुनौती या समस्या हो सकती है। प्लेटफॉर्म इन शादियों का कोई सामाजिक या आर्थिक संदर्भ नहीं देता। वह सिर्फ़ तुलना करना सिखाता है। इस तुलना का नतीजा प्रेरणा नहीं, बल्कि एक जैसी आकांक्षाओं का निर्माण होता है।
अमूमन विविधता गायब हो जाती है। स्त्रीत्व, सुंदरता और शादी का सिर्फ़ एक ही मॉडल सामने आता है, जिसे आदर्श बना दिया जाता है। हरियाणा के पटौदी की रहने वाली 24 वर्षीय निशा कहती हैं, “शादी की रील्स देखकर मुझे अक्सर अपने लुक को लेकर बहुत असुरक्षा महसूस होती है। ऑनलाइन जो दुल्हनें दिखती हैं, उनकी त्वचा एकदम बेदाग़ होती है। उनका मेकअप बहुत प्रोफेशनल होता है और महंगे मेकअप आर्टिस्ट उन्हें तैयार करते हैं। मेरे चेहरे पर दाग़ हैं और मेरे इलाके में ऐसे मेकअप आर्टिस्ट भी नहीं हैं। जब मैं ये रील्स देखती हूं, तो डर लगने लगता है। अगर मैं वैसी नहीं दिखी तो? अगर मुझे खुद को अच्छा नहीं लगा तो? या दूसरों को मेरा लुक पसंद नहीं आया तो?” निशा की बात एक अहम नारीवादी सवाल की ओर इशारा करती है कि सुंदरता को आखिर क्यों महिलाओं की ज़िम्मेदारी बना दी जाती है?
मेरी शादी अगले साल है और मेरे पार्टनर मुझे अक्सर वेडिंग रील्स भेजते रहते हैं। मैं कभी खुलकर कुछ नहीं कहती लेकिन लगातार दिखती भव्य शादियां मुझे डराती हैं। मैं शर्मीली हूं और मुझे लगता है कि शायद मुझसे भी वैसा ही परफ़ॉर्म करने की उम्मीद की जा रही है। यह दबाव शब्दों से नहीं, तस्वीरों से बनता है।
स्त्री का शरीर और अवास्तविक मानदंड
वेडिंग रील्स में अमूमन तैयार, चमकते हुए चेहरे दिखते हैं। जैसे शरीर कोई प्रोडक्ट हो, कोई जीता-जागता अनुभव नहीं। आम तौर पर निम्न, मध्यम या कोई भी हाशिये का व्यक्ति या जिसे इस चमक-धमक में रुचि न हो, उसके लिए संसाधनों की कमी या ऐसे मानदंडों में रुचि न होना एक सामाजिक असमानता है या बहुत ही सामान्य कारक। लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में वह उसे अपनी निजी कमी लगने लगती है। नारीवादी विचारधारा में इस बात ने जगह बनाई है कि स्त्री का शरीर सामाजिक नियंत्रण का अहम माध्यम है। इंस्टाग्राम की वेडिंग संस्कृति इस नियंत्रण को और मज़बूत करती है। यह यह संदेश देती है कि शादी के दिन एक स्त्री की क़ीमत इस बात से तय होती है कि वह कथित उच्चवर्गीय सुंदरता के मानकों में कितनी फिट बैठती है। असल में समस्या ‘सुंदर’ दिखने की इच्छा नहीं है। समस्या यह है कि सिर्फ़ एक ही तरह की सुंदरता को स्वीकार्य बना दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि शादी की खुशी से पहले ही आत्म-निगरानी शुरू हो जाती है। त्वचा, वज़न, बाल, मुस्कान और दूसरों की स्वीकृति को लेकर चिंता हावी हो जाती है।
जब उत्सव श्रम बन जाए: शादी एक प्रदर्शन
आज की शादियों में वेडिंग रील्स या वीडियो के दबाव के कारण जोड़े सिर्फ़ शादी में शामिल नहीं होते। उनसे उम्मीद की जाती है कि वह नाचे, मुस्कराए, रोए और प्रेम को कैमरे के सामने सुंदर तरीके से दिखाए। शादी अब एक जीवन में एक अहम अनुभव नहीं, बल्कि कंटेंट के रूप में लाइक्स, शेयर और फॉलो के माध्यम से सिमटती जा रही है। लेकिन, यह दबाव जेंडर आधारित होता है। दूल्हे और उनका परिवार अक्सर इस दृश्य से बाहर रहते हैं। वहीं दुल्हन और उसका परिवार शादी को ‘सोशल मीडिया योग्य’ बनाने का भावनात्मक और दृश्यात्मक बोझ उठाते हैं। सोशल मीडिया सीधे आदेश नहीं देता, लेकिन बार-बार दिखने वाली तस्वीरें और वीडियो धीरे-धीरे यह तय करने लगते हैं कि एक ‘अच्छी शादी’ कैसी होनी चाहिए। दिल्ली की 28 वर्षीय विधि कहती हैं, “मेरी शादी अगले साल है और मेरे पार्टनर मुझे अक्सर वेडिंग रील्स भेजते रहते हैं। मैं कभी खुलकर कुछ नहीं कहती लेकिन लगातार दिखती भव्य शादियां मुझे डराती हैं। मैं शर्मीली हूं और मुझे लगता है कि शायद मुझसे भी वैसा ही परफ़ॉर्म करने की उम्मीद की जा रही है। यह दबाव शब्दों से नहीं, तस्वीरों से बनता है।”
वेडिंग इंफ्लुएंसर संस्कृति इस दबाव को और सामान्य बना देती है। शादी अब निजी रिश्ता नहीं, एक मार्केटेबल इवेंट बन जाती है। दुल्हन का लुक, वेन्यू, डिज़ाइनर और फ़ोटोग्राफ़र सब टैग किए जाते हैं। भावनाएं भी कंटेंट बन जाती हैं। अक्सर यह नहीं बताया जाता कि ये शादियां स्पॉन्सर्ड भी होती हैं।
सोशल मीडिया आम तौर पर ‘अच्छी दुल्हन’ और ‘परफेक्ट शादी’ की परिभाषा भी तय कर देती है। जो महिलाएं संकोची हैं या भव्यता में सहज नहीं हैं, उनके लिए यह डर पैदा करता है कि वे किसी को निराश न कर दें। सोशल मीडिया कंटेंट का असर समय के साथ बदलता है। जो वेडिंग रील्स कभी दूर के सपने लगती थीं, शादी नज़दीक आते ही बेचैनी पैदा करने लगती हैं। इंदौर की 26 वर्षीय अंजली कहती हैं, “पहले वेडिंग रील्स मुझे सिर्फ़ खूबसूरत लगती थीं। लेकिन अब, जब मेरी शादी नज़दीक है, वही रील्स मुझे खुद से तुलना करने पर मजबूर करती हैं। उत्साह धीरे-धीरे डर में बदल रहा है।” यह दिखाता है कि पितृसत्ता कैसे महिलाओं को पहले से ही आत्म-नियंत्रण सिखाती है। वेडिंग रील्स शादी से पहले ही निगरानी और चिंता पैदा कर देती हैं।
इंफ्लुएंसर संस्कृति और शादी का बाज़ार
वेडिंग इंफ्लुएंसर संस्कृति इस दबाव को और सामान्य बना देती है। शादी अब निजी रिश्ता नहीं, एक मार्केटेबल इवेंट बन जाती है। दुल्हन का लुक, वेन्यू, डिज़ाइनर और फ़ोटोग्राफ़र सब टैग किए जाते हैं। भावनाएं भी कंटेंट बन जाती हैं। अक्सर यह नहीं बताया जाता कि ये शादियां स्पॉन्सर्ड भी होती हैं। उन्हें ‘ड्रीम वेडिंग’ की तरह दिखाया जाता है। इससे यह भ्रम बनता है कि ऐसी शादियां सामान्य और सबके लिए संभव हैं। यह भ्रम वर्ग और जाति की असमानताओं पर टिका होता है। इंस्टाग्राम पर दिखाई जाने वाली शादियाँ अक्सर आर्थिक और सामाजिक विशेषाधिकार का नतीजा होती हैं। लेकिन यह संदर्भ गायब रहता है। कथित ऊंची जाति के लोगों और शहरी मध्यवर्ग की शादियां एलिगेंट और एसथेटिक मानी जाती हैं। वहीं दलित, आदिवासी और हाशिये के समुदाय के उत्सव या तो दिखाए नहीं जाते या उन्हें मूलधारा से हटा दिया जाता है, या कई बार लाउड भी करार दिया जाता है। सोशल मीडिया एक तरह से तय करता है कि कौन सा उत्सव सम्मान और मूलधारा के योग्य है।
असल में वेडिंग रील्स अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या उनकी लगातार मौजूदगी है, या असमान और अवास्तविक तत्वों को हमारे सामने पड़ोसने की है। यह बताता है कि क्या सुंदर और स्वीकार्य है। यह दबाव परिवार नहीं, बल्कि एल्गोरिदम पैदा करता है। शादी को सोशल मीडिया से वापस लेने का मतलब उत्सव को नकारना नहीं है। इसका मतलब साधारण शादियों और असली खुशियों को जगह देना है। नारीवादी नज़रिया हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम जो देखते हैं, वह हमें खुद को देखने का तरीका कैसे सिखाता है। जब तक यह सवाल नहीं उठेगा, वेडिंग रील्स सपनों के साथ-साथ डर भी गढ़ती रहेंगी।

