इंटरसेक्शनलLGBTQIA+ सेक्स एजुकेशन के अभाव में क्वीयर समुदाय की बढ़ती असुरक्षाएं और चुनौतियां

सेक्स एजुकेशन के अभाव में क्वीयर समुदाय की बढ़ती असुरक्षाएं और चुनौतियां

डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स ने क्वीयर समुदाय के लिए जुड़ाव, बातचीत और पहचान के नए अवसर खोले हैं, खासतौर पर, उस जगह पर जहां सार्वजनिक जीवन में क्वीयर अस्तित्व अब भी हाशिए पर है। लेकिन ये प्लेटफ़ॉर्म केवल संभावनाओं का विस्तार नहीं करते, बल्कि अपने साथ नई असुरक्षाएं और हिंसा भी लेकर आते हैं।

डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स ने क्वीयर समुदाय के लिए जुड़ाव, बातचीत और पहचान के नए अवसर खोले हैं, खासतौर पर, उस जगह पर जहां सार्वजनिक जीवन में क्वीयर अस्तित्व अब भी हाशिए पर है। लेकिन ये प्लेटफ़ॉर्म केवल संभावनाओं का विस्तार नहीं करते, बल्कि अपने साथ नई असुरक्षाएं और हिंसा भी लेकर आते हैं। द हिन्दू में साल 2019 में छपी एक खबर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में एक 24 वर्षीय व्यक्ति ने एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़के का अपहरण कर लिया था। गौरतलब है कि दोनों की दोस्ती ग्राइंडर पर हुई थी, जो कि क्वीयर समुदाय के लोगों के लिए एक डेटिंग प्लेटफॉर्म है। इसी तरह एक अन्य घटना में, एक 20 वर्षीय युवक को उसी ऐप पर मिले एक व्यक्ति से मिलने के बाद सामूहिक बलात्कार, हमले और जबरन वसूली का सामना करना पड़ा। कई शोध बताते हैं कि क्वीयर लोगों के लिए ऑनलाइन डेटिंग कई तरह के खतरे और नुकसान लेकर आती है।

क्वीनस्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी साल 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, गे डेटिंग ऐप्स से जुड़े अपराधों की जड़ भारतीय समाज में मौजूद क्वीयर लोगों के प्रति डर और सेक्स को लेकर नकारात्मक सोच में है। इसलिए यह शोध एक ऐसे सेक्स-पॉज़िटिव नज़रिए की बात करता है, जिसमें सेक्स को गलत या अनैतिक मानने के बजाय आनंद, सहमति और अधिकार के रूप में समझा जाए। इसलिए हिंसा के इन प्रत्यक्ष नजर आने वाले रूपों के अतिरिक्त, ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफॉर्म जिस तरह से सेक्स और यौन-संबंधित जानकारी तक आसान पहुंच उपलब्ध कराते हैं। वह एक ऐसे समाज में जहां उचित यौन शिक्षा का अभाव हो, क्वीयर लोगों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। जहां एक ओर डेटिंग ऐप्स में कम उम्र में ही क्वीयर लोगों के लिए साथी खोजना और सहमति से यौन संबंध में शामिल होना आसान बन गया है। वहीं दूसरी ओर, सेक्स एजुकेशन का अभाव उनके लिए खुद के शरीर और इच्छाओं के साथ उलझन, अस्थिरता और असुरक्षा की स्थिति बन सकती है।

क्वीनस्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी साल 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, गे डेटिंग ऐप्स से जुड़े अपराधों की जड़ भारतीय समाज में मौजूद क्वीयर लोगों के प्रति डर और सेक्स को लेकर नकारात्मक सोच में है। यह शोध एक ऐसे सेक्स-पॉज़िटिव नज़रिए की बात करता है, जिसमें सेक्स को गलत या अनैतिक मानने के बजाय आनंद, सहमति और अधिकार के रूप में समझा जाए।

डेटिंग ऐप्स, अधूरी जानकारी और यौनिक असुरक्षा

इन डेटिंग ऐप्स पर उपलब्ध जानकारी तक पहुंच एक प्रकार के यौन समाजीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके चलते समाज की प्रचलित अवधारणाएं धीरे–धीरे व्यक्ति की धारणाओं में शामिल हो जाती है। यूनेस्को की साल 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक अध्ययन में पाया गया बच्चे और युवा ऑनलाइन विभिन्न प्रकार की सामग्री के संपर्क में आ रहे हैं, जिनमें से कुछ अधूरी या गलत जानकारी हानिकारक हो सकती है। हाल के वैश्विक आकलन बताते हैं कि 18-20 साल की उम्र के आधे से ज़्यादा यानी 54 फीसदी  युवा, जिन्होंने बचपन में इंटरनेट का नियमित उपयोग किया था, वह किसी न किसी रूप में ऑनलाइन यौन हिंसा का सामना किए हैं।  

जहां काम्प्रीहेन्सिव सेक्शुअल एजुकेशन (सीएसई) यौन संबंध में व्यक्तिगत आनंद और संतोष का माध्यम बना सकता है, वहीं इसके अभाव में इन प्लेटफ़ॉर्मों पर होने वाला आभासी समाजीकरण सेक्स के अर्थों को विकृत कर सकता है। इससे व्यक्ति की अपनी पहचान के प्रति स्वीकार्यता और इच्छा के बारे में असुरक्षा पैदा हो सकती है। साथ ही उसके लिए निकटता से जुड़ी तात्कालिक इच्छाओं को नियंत्रित और अनुशासित कर पाना बेहद मुश्किल बन सकता है। ग्राइंडर जैसी ऐप्स अब कमजोर डेटा नेटवर्क औ दूर-दराज़ की बस्तियों तक भी पहुंच रही है। इसलिए उनकी आभासी सामाजिकता के प्रभावों से निपटने के लिए व्यापक सेक्शुअल एजुकेशन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।

यूनेस्को की साल 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक अध्ययन में पाया गया बच्चे और युवा ऑनलाइन विभिन्न प्रकार की सामग्री के संपर्क में आ रहे हैं, जिनमें से कुछ अधूरी, गलत जानकारी हानिकारक हो सकती हैं। वैश्विक आकलन बताते हैं कि 18-20 साल की उम्र के 54 फीसदी युवा, जिन्होंने बचपन में इंटरनेट का नियमित उपयोग किया था वह किसी न किसी रूप में ऑनलाइन यौन हिंसा का शिकार हुए हैं।  

क्वीयर डेटिंग ऐप्स और व्यापक सेक्शुअल एजुकेशन की कमी 

अंतरराष्ट्रीय प्लैन्ड पेरेंटहुड फ़ेडरेशन (आईपीपीएफ) के फ्रेमवर्क के अनुसार, व्यापक सेक्शुअल एजुकेशन उन शिक्षण-पद्धतियों पर केंद्रित है, जो युवाओं को अपनी यौनिकता को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों स्तरों पर समझने और उसे स्वस्थ रूप से अनुभव करने में सहायक होती हैं। ऐसी शिक्षा का उद्देश्य केवल बीमारियों और अनचाहे गर्भधारण को रोकना भर नहीं है, बल्कि ऐसे आवश्यक जीवन-कौशल को सिखाना भी है, जो यौन संबंधों को सम्मानजनक, भेदभाव-रहित, सहमति-आधारित और आत्म-विकासकारी बना सकें। जहां एक ओर सेक्शुअल एजुकेशन का रूढ़िवादी दृष्टिकोण शादी तक संयम बरतने पर बल देता है। वहीं सीएसई यौनिकता को अधिकार और आज़ादी के क्षेत्र के रूप देखती है और पूरी जानकारी के आधार पर निर्णय लेने के कौशल और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से सोचने के महत्त्व पर जोर देती है, जो यौनिकता के प्रयोगों को सुरक्षित और संतोषजनक बनाने के लिए जरूरी हैं। 

सेक्शुअल एजुकेशन डेटिंग ऐप्स का प्रयोग करने वाले युवा क्वीयर व्यक्तियों के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण हैं, जिनकी यौनिकता से जुड़ी अनुभूतियां अक्सर भावनात्मक, संबंधपरक या शैक्षणिक तरीक़े से नहीं, बल्कि अधिकतर शारीरिक यौन अनुभवों के माध्यम से होती है। नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के साल 2018 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 14 से 17 साल की उम्र के किशोरों ने यौन साथी खोजने के लिए ग्रिंडर ऐप का इस्तेमाल किया। इस तरह वयस्कों के लिए बनाया गया यह ऐप नाबालिग लोगों के लिए बहुत बार ख़तरनाक भी साबित होता है। इनके साथ यौन शोषण, हिंसा और लूट की घटनाएं आसानी से की जा सकती है। ऐसी स्थिति में, उनके लिए इस गतिविधि के बारे में पर्याप्त जानकारी होना आवश्यक है, जो कि न सिर्फ चिकित्सकीय जोखिमों तक सीमित हो, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चिंताओं के संदर्भ में भी बात करे। सीएसई इन बाद के पहलुओं पर बल देती है और उनका समर्थन करती है। लेकिन भारत में यौन शिक्षा कार्यक्रमों ने इन महत्वपूर्ण चिंताओं की अक्सर उपेक्षा या नज़रंदाज़ किया है।

हिंदुस्तान टाइम्स मेंसाल  2021 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीईआरटी ने स्कूलों को एलजीबीटीक्यू  समुदाय से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एक मॉड्यूल तैयार किया था, जिसे एन सीपीसीआर और दक्षिणपंथी समूहों के विरोध के बाद वापस ले लिया गया और विविध यौन रुझानों को मान्यता देने और उनकी ज़रूरतों के बारे में बात करने का यह प्रयास साकार नहीं हो सका।

सेक्स एजुकेशन और सरकार की अनदेखी

हालांकि भारत परिवार नियोजन नीति के माध्यम से सेक्स एजुकेशन पर विचार करने वाला प्रारंभिक देशों में से एक था। उस समय का दृष्टिकोण सिर्फ जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए निवारक उपायों पर केंद्रित था। इसके अलावा, साल 1990 के दशक में एचआईवी और अन्य यौन-संक्रमित रोगों के भय ने विमर्श को प्रभावित किया, जिसमें क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों को संवेदनशील आबादी के रूप में प्रस्तुत किया गया। यहां ध्यान शरीर के शारीरिक स्वास्थ्य और संक्रमण के नियंत्रण पर अधिक था, जबकि यौनिकता के साथ स्वस्थ संबंध स्थापित करना, जो सीएसई  का मुख्य उद्देश्य है, लगभग अनुपस्थित रहा। हालांकि कुछ पहलें ज़रूर हुई हैं।

सांस्कृतिक नैतिकताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण सेक्शुअल एजुकेशन अब भी काफी पीछे रह गयी है। जब सेक्शुअल एजुकेशन के उद्देश्य से बनाए गए किसी कार्यक्रम में यौनिकता के प्रश्न पर ही कोई संवाद न हो या उसे मान्यता न मिले, तो क्वीयर समुदाय के यौनिकता का शैक्षणिक बातचीत में शामिल होना काफी दूर की बात है। धारा 377 के रद्द होने के बाद होमोसेक्शूएलिटी ने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन तब भी यह स्कूलों-कक्षाओं पाठ्यकर्मों और शैक्षणिक चर्चाओं से गायब है। युवा क्वीयर व्यक्तियों के लिए अपनी यौनिकता के अनुभव उनके विकास और प्रगति में बाधक भी बनते हैं। फिर भी शैक्षणिक क्षेत्र इसे स्वीकार करने में सफल नहीं रहा।

साल 1990 के दशक में एचआईवी और अन्य यौन-संक्रमित रोगों के भय ने विमर्श को प्रभावित किया, जिसमें क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों को संवेदनशील आबादी के रूप में प्रस्तुत किया गया। यहां ध्यान शरीर के शारीरिक स्वास्थ्य और संक्रमण के नियंत्रण पर अधिक था, जबकि यौनिकता के साथ स्वस्थ संबंध स्थापित करना, जो सीएसई  का मुख्य उद्देश्य है, लगभग अनुपस्थित रहा।

हिंदुस्तान टाइम्स में साल  2021 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीईआरटी ने स्कूलों को एलजीबीटीक्यू  समुदाय से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए एक मॉड्यूल तैयार किया था, जिसे राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और दक्षिणपंथी समूहों के विरोध के बाद वापस ले लिया गया और विविध यौन रुझानों को मान्यता देने और उनकी ज़रूरतों के बारे में बात करने का यह प्रयास साकार नहीं हो सका। आउटलुक इंडिया के मुताबिक, साल 2024 में एक संशोधित प्रारूप प्रस्तुत किया गया, जिसमें लैंगिक समावेशन की बात तो की गई, लेकिन क्वीयरनेस पर इसमें बिलकुल चर्चा नहीं हुई । भारतीय शिक्षा व्यवस्था में यौनिकता के प्रति व्याप्त अज्ञानता और उदासीनता को दिखने वाली ये घटनाएं संकेत देती हैं, कि क्वीयर व्यक्तियों के पास अपने आत्मबोध और पहचान से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए आवश्यक संसाधनों का अभाव है।

डिजिटल डेटिंग ऐप्स ने क्वीयर समुदाय के लिए जुड़ाव, पहचान और अभिव्यक्ति के नए रास्ते तो खोले हैं, लेकिन ये रास्ते उस समाज में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकते, जहां यौनिकता को लेकर चुप्पी, डर और नैतिक नियंत्रण हावी हों। जब सेक्शुअल एजुकेशन अधूरी या पूरी तरह अनुपस्थित होती है, तब ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म क्वीयर युवाओं के लिए सीखने का एक जोखिम भरा माध्यम बन जाते हैं। ऐसे में असुरक्षा केवल व्यक्तिगत लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि एक संरचनात्मक विफलता का संकेत है, जिसमें अनुचित शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक भेदभाव शामिल हैं। सीएसई क्वीयर युवाओं को केवल यौन जोखिमों से बचाने का साधन नहीं है, बल्कि यह उन्हें अपने शरीर, इच्छाओं, सीमाओं और सहमति को समझने की भाषा देती है। आज ज़रूरत इस बात की है कि सेक्शुअल एजुकेशन को केवल स्कूलों की कक्षाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, खास तौरपर डेटिंग ऐप्स की नीतियों और डिज़ाइन से भी जोड़ा जाए, तब ही शायद सुरक्षित और समावेशी समाज की कल्पना की जा सकती है। 

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