इंटरसेक्शनलजेंडर थाली से शरीर तक भोजन के ज़रिए महिलाओं पर नियंत्रण की राजनीति

थाली से शरीर तक भोजन के ज़रिए महिलाओं पर नियंत्रण की राजनीति

महिलाओं के संदर्भ में भोजन पर नियंत्रण उनके शरीर पर अधिकार जताने, उनके व्यवहार को काबू में रखने और उनसे तय भूमिकाओं को मनवाने का एक असरदार तरीका रहा है। यह नियंत्रण कभी धार्मिक पवित्रता के नियमों के रूप में सामने आया, कभी परंपरा और सम्मान की आड़ में और आज के दौर में डायट, फिटनेस और आदर्श शरीर की भाषा में।

भोजन को आमतौर पर स्वास्थ्य और शारीरिक ज़रूरत के हिसाब से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन एक नारीवादी दृष्टि से देखने पर यह साफ पता चलता है कि भोजन कभी भी सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं रहा है। इतिहास में यह सामाजिक सत्ता, नैतिकता और नियंत्रण की राजनीति से गहराई तक जुड़ा रहा है। महिलाओं के संदर्भ में भोजन पर नियंत्रण उनके शरीर पर अधिकार जताने, उनके व्यवहार को काबू में रखने और उनसे तय भूमिकाओं को मनवाने का एक असरदार तरीका रहा है। यह नियंत्रण कभी धार्मिक पवित्रता के नियमों के रूप में सामने आया, कभी परंपरा और सम्मान की आड़ में और आज के दौर में डायट, फिटनेस और आदर्श शरीर की भाषा में।

नारीवादी चिंतन यह सवाल उठाता है कि आखिर महिलाओं को ही संयम, त्याग और अनुशासन का बोझ क्यों उठाना पड़ता है। यह कहानी केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग हर समाज की है, जहां भोजन के ज़रिए महिलाओं के  शरीर को नियंत्रित किया गया। इस संदर्भ में भोजन केवल पोषण का विषय नहीं रह जाता, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्णय और उनके शरीर पर अधिकार की लड़ाई का एक अहम मैदान बन जाता है, जहां सवाल सिर्फ खाने का नहीं, बल्कि खुद के लिए फैसले लेने के अधिकार का है।

इतिहास में यह सामाजिक सत्ता, नैतिकता और नियंत्रण की राजनीति से गहराई तक जुड़ा रहा है। महिलाओं के संदर्भ में भोजन पर नियंत्रण उनके शरीर पर अधिकार जताने, उनके व्यवहार को काबू में रखने और उनसे तय भूमिकाओं को मनवाने का एक असरदार तरीका रहा है।

भोजन त्याग की सामाजिक राजनीति

प्राचीन समाजों में भोजन को पवित्रता से जोड़ा गया। महिलाओं के शरीर को पवित्रता और नैतिकता का प्रतीक मानते हुए, उनके खाने-पीने पर खासतौर पर नियम लगाए गए। हिंदू समाज में व्रत-उपवास अक्सर महिलाओं से जुड़े रहे हैं, जिनमें महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार और पति की भलाई के लिए भोजन त्यागे। इसी तरह, ईसाई और इस्लामी परंपराओं में भी उपवास हैं, लेकिन सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि इन नियमों का नैतिक बोझ अक्सर महिलाओं पर अधिक पड़ता है। उपवास को संयम, त्याग और अच्छी महिला की पहचान से जोड़ दिया गया। यहां भोजन त्याग आध्यात्मिक साधना से अधिक सामाजिक अनुशासन का रूप ले लेता है। महिलाओं के जीवन चक्र के हर चरण पीरियड्स, गर्भावस्था, प्रसव और मातृत्व के साथ अलग-अलग तरह के भोजन संबंधी नियम जोड़े जाते रहे हैं।

समाज में कई जगह पीरियड्स के दौरान महिलाओं को अपवित्र मानते हुए रसोई में प्रवेश से रोका जाता है। इस दौरान दूध, दहीं, अचार, खट्टे या ठंडे माने जाने वाले खाद्य पदार्थों से दूरी रखने की हिदायत दी जाती है। इन नियमों को अक्सर परंपरा या धार्मिक मान्यता के नाम पर सही ठहराया जाता है, जबकि इनके पीछे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण कम ही मिलते हैं। वहीं गर्भावस्था के समय भी महिलाओं को खाने-पीने को लेकर लंबी सूची थमा दी जाती है। उन्हें कौन सी सब्ज़ी गर्मी करेगी, कौन-सा फल बच्चे के लिए नुकसानदेह होगा और क्या खाने से प्रसव कठिन हो जाएगा बताया जाता है। द लैंसेट और ब्रिटिश मेडिकल जर्नलमें प्रकाशित शोध बताते हैं कि पोषण से जुड़े ऐसे सामाजिक प्रतिबंध कई बार महिलाओं को ज़रूरी पोषक तत्वों से वंचित कर देते हैं।

हिंदू समाज में व्रत-उपवास अक्सर महिलाओं से जुड़े रहे हैं, जिनमें महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार और पति की भलाई के लिए भोजन त्यागे। इसी तरह, ईसाई और इस्लामी परंपराओं में भी उपवास हैं, लेकिन सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि इन नियमों का नैतिक बोझ अक्सर महिलाओं पर अधिक पड़ता है।

 द न्यूयॉर्क टाइम्स के छपे अध्ययन के मुताबिक, ह्यूस्टन के बेयलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन में मनोचिकित्सा की प्रोफेसर एमेरिटस और खाने के विकारों की विशेषज्ञ डॉ. हिल्डे ब्रुच के अनुसार, एनोरेक्सिया नर्वोसा (एक व्यक्तित्व विकार जो खुद को भूखा रखने की ओर ले जाता है) का सामना करने वाली 90 फीसदी से अधिक लोग महिलाएं हैं। अलग-अलग संस्कृतियों में भोजन नियमों के ज़रिए महिला शरीर पर नैतिक और सामाजिक नियंत्रण कायम रखा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) की रिपोर्टें भी इस ओर इशारा करती हैं कि गर्भावस्था और मातृत्व में संतुलित आहार ज़रूरी है, ना कि अंधविश्वास पर आधारित रोक-टोक। बावजूद इसके, कई जगह इन नियमों का पालन करवाने का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि महिला के शरीर को निरंतर निगरानी और अनुशासन में रखना रहा है। इस तरह भोजन, जो पोषण और जीवन का साधन है, महिलाओं के लिए नियंत्रण और सामाजिक आदेश का औज़ार बन जाता है।

महिला शरीर और भोजन नियंत्रण का इतिहास

भोजन के ज़रिये अनुशासन केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू जीवन में भी साफ दिखता है। दुनिया के कई हिस्सों में, खासकर दक्षिण एशिया और अफ्रीका में, महिलाएं घर में सबसे बाद में खाना खाती हैं। कई बार बचा हुआ खाना उनके हिस्से आता है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट इस बात पर रोशनी डालती है कि कैसे भोजन का असमान वितरण महिलाओं और लड़कियों में कुपोषण का कारण बनता है। यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और लैंगिक भेदभाव का नतीजा है। यहां भोजन एक चुपचाप काम करने वाला अनुशासन बन जाता है। जो महिला को सिखाता है कि उसकी ज़रूरतें सबसे आखिर में हैं। अंग्रेज़ों के शासन के समय में महिलाओं के शरीर को सभ्य और अनुशासित बनाने की नई अवधारणाएं उभरीं। यूरोप और अमेरिका में 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं के लिए हल्का, सीमित और नियंत्रित भोजन सभ्यता और नारीत्व का प्रतीक बना। भारी या ज़्यादा खाना असंयम और नैतिक कमजोरी से जोड़ा गया। इतिहासकार बताते हैं कि यह दौर महिलाओं के शरीर को सामाजिक मानकों में ढालने का था। जहां भोजन संयम एक नैतिक गुण घोषित किया गया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) की रिपोर्टें भी इस ओर इशारा करती हैं कि गर्भावस्था और मातृत्व में संतुलित आहार ज़रूरी है, ना कि अंधविश्वास पर आधारित रोक-टोक। बावजूद इसके, कई जगह इन नियमों का पालन करवाने का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि महिला के शरीर को निरंतर निगरानी और अनुशासन में रखना रहा है।

 कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध के मुताबिक 1920 के दशक में डायटिंग को महिलाओं के आत्म-नियंत्रण और नैतिक श्रेष्ठता से जोड़ा गया। यहां भोजन प्रतिबंध स्वास्थ्य से ज़्यादा सौंदर्य और सामाजिक स्वीकृति का सवाल बन गया। आज भी मीडिया और विज्ञापन महिलाओं को यह संदेश देते हैं कि कम खाना, पतला रहना और नियंत्रित दिखना ही सफलता है। सवाल उठता है कि भोजन के ज़रिये अनुशासन का बोझ ज़्यादातर महिलाओं पर ही क्यों डाला गया। समाजशास्त्री मानते हैं कि इसका संबंध महिलाओं की पारंपरिक भूमिकाओं से है। उन्हें त्याग, सेवा और सहनशीलता का प्रतीक बनाया गया।
भोजन त्याग को उनके नैतिक चरित्र से जोड़ दिया गया, जबकि पुरुषों के लिए भरपेट खाना शक्ति और श्रम का प्रतीक बना रहा।

महिला शरीर पर नियंत्रण का विरोध 

हाल के दशकों में महिलाएं इस अनुशासन का प्रतिरोध भी कर रही हैं। नारीवादी लेखन और आंदोलनों ने यह सवाल उठाया है कि अच्छी महिला होने की शर्त भूखा रहना क्यों है? आज खाने का अधिकार केवल पोषण नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मनिर्णय और आज़ादी का मुद्दा बन रहा है। बॉडी पॉज़िटिविटी और हेल्थ एट एवरी साइज़ (एचएईएस ) जैसे आंदोलनों ने डायटिंग कल्चर को चुनौती दी है। हालांकि शिक्षा और जागरूकता बढ़ी है, फिर भी भोजन से जुड़ा अनुशासन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी कई घरों में महिलाओं का खाना प्राथमिकता नहीं है। आज भी विज्ञापन उन्हें कम खाने की सीख देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह अनुशासन परंपरा की जगह लाइफस्टाइल कहलाता है।

महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि दुनिया भर में भोजन के ज़रिए होता रहा है। यूरोप, अमेरिका, एशिया और अफ्रीका का इतिहास दिखाता है कि क्या खाना है, कितना खाना है, और किस शरीर को सही माना जाए ये फैसले अक्सर महिलाओं के अपने नहीं रहे हैं। समाज और संस्कृति ने संयम और त्याग को महिलाओं के सौंदर्य का गुण मानकर भोजन को नियंत्रण का औज़ार बना दिया। फेमिनिस्ट दृष्टि से यह चुनौतीपूर्ण है। भोजन के ज़रिए महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण कोई निजी या सांस्कृतिक मामला नहीं है, बल्कि सत्ता और अनुशासन की राजनीति है। धर्म, परंपरा और आधुनिक डायट संस्कृति तीनों ही महिलाओं से संयम और त्याग की अपेक्षा करती हैं, जबकि निर्णय का अधिकार उनसे छीन लिया जाता है। नारीवादी दृष्टिकोण में यह साफ़ तौर देखा जा सकता है कि भोजन केवल पोषण नहीं, बल्कि सम्मान, स्वास्थ्य और आत्मनिर्णय का सवाल है। एक समान और न्यायपूर्ण समाज वही होगा, जहां महिलाएं अपने शरीर और अपने खाने के बारे में बिना डर, शर्म और निगरानी के खुद  फैसला कर सकें।

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