जब हम कला की बात करते हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि कला कभी भी समाज से अलग नहीं होती। कला समाज की सोच, उसकी सत्ता संरचना और लैंगिक राजनीति को प्रतिबिंबित करती है। वह न सिर्फ़ मनोरंजन का साधन होती है, बल्कि समाज के मूल्यों और भेदभाव को भी सामने लाती है। केरल की प्राचीन नृत्य-नाट्य शैली कथकली लंबे समय तक पुरुषों का एकाधिकार रही है। इसे अक्सर परंपरा के नाम पर सही ठहराया गया। लेकिन, सवाल यह है कि क्या यह सच में परंपरा थी या फिर पितृसत्ता का एक सुविधाजनक औज़ार? जब महिलाएं कथकली के मंच पर उतरीं, तो उन्होंने केवल नृत्य सीखने की कोशिश नहीं की। उन्होंने सवाल उठाए, विरोध का सामना किया और अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष किया। यह यात्रा दिखाती है कि नारीवाद सिर्फ़ समान अधिकार की मांग नहीं करता, बल्कि उन संरचनाओं को भी चुनौती देता है जो असमानता को ‘संस्कृति’ और ‘परंपरा’ के नाम पर वैध बनाती हैं। कथकली में महिलाओं की मौजूदगी यह सिखाती है कि बदलाव तभी संभव है, जब हम परंपरा के नाम पर होने वाले बहिष्करण को पहचानें और उसे बदलने का साहस करें।
पितृसत्ता की जड़ें: कथकली केवल पुरुषों तक सीमित क्यों रही?
कथकली का इतिहास 17वीं शताब्दी से जुड़ा है। यह कला केरल के मंदिरों और राजदरबारों में विकसित हुई। शुरू से ही इसे पुरुषों के लिए ही उपयुक्त माना गया। इसके पीछे कई कारण बताए जाते रहे। जैसे शारीरिक कठोरता, लंबा प्रशिक्षण, देर रात होने वाले प्रदर्शन और ‘पवित्रता’ का तर्क। लेकिन ये कारण पूरी सच्चाई नहीं बताते। असली वजह समाज की पितृसत्तात्मक सोच थी। दिलचस्प बात यह है कि कथकली में पुरुष कलाकार सीता, द्रौपदी और पार्वती जैसे स्त्री पात्रों की भूमिका भी निभाते रहे हैं। इससे साफ़ होता है कि समस्या महिलाओं की क्षमता नहीं, बल्कि उनके प्रवेश पर नियंत्रण थी। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को सार्वजनिक मंचों से दूर रखना एक सोची-समझी राजनीतिक प्रक्रिया रही है। कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं रहे। कई अकादमिक शोध बताते हैं कि कथकली की संरचना में ही लैंगिक पक्षपात मौजूद था, जहां स्त्रीत्व को पुरुष नज़रिये से गढ़ा और प्रस्तुत किया गया। इसलिए, कथकली में महिलाओं का संघर्ष सिर्फ़ एक कला-यात्रा नहीं है, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देने की कहानी भी है।
दिलचस्प बात यह है कि कथकली में पुरुष कलाकार सीता, द्रौपदी और पार्वती जैसे स्त्री पात्रों की भूमिका भी निभाते रहे हैं। इससे साफ़ होता है कि समस्या महिलाओं की क्षमता नहीं, बल्कि उनके प्रवेश पर नियंत्रण थी।
पहली महिला कथकली कलाकार: चावरा पारुकुट्टी अम्मा
कथकली में महिलाओं की भागीदारी की बात करें, तो सबसे पहला नाम चावरा पारुकुट्टी अम्मा (1904–1987) का आता है। पारुकुट्टी एक स्वर्णकार की बेटी थीं। उन्हें बचपन से ही कथकली नृत्य से गहरा लगाव था। जब उन्होंने एक स्थानीय नृत्य विद्यालय में प्रवेश लेने की कोशिश की, तो उन्हें सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि वे एक लड़की थीं। इस अस्वीकृति ने पारुकुट्टी को नहीं रोका। उन्होंने घर पर ही अपने गुरुओं से कथकली का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। 1930 के दशक में उन्होंने मंच पर कथकली का प्रदर्शन करना शुरू किया। उस समय महिलाओं का सार्वजनिक मंच पर नृत्य करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। पारुकुट्टी अम्मा ने केवल स्वयं प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि अन्य महिलाओं को भी कथकली का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने इस कला में महिलाओं के लिए रास्ता खोला। उनके योगदान के कारण उन्हें “कथकली में क्रांति की माँ” कहा जाता है।
1970–80 का दशक: सामूहिक आंदोलन की शुरुआत
साल 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया। इसी वर्ष त्रिपुनिथुरा कथकली केंद्रम में ‘वनिता ट्रूप’ का गठन हुआ। यह पूरी तरह महिलाओं की कथकली मंडली थी। यह एक ऐतिहासिक कदम था। पहली बार महिलाओं ने संगठित होकर यह कहा कि कथकली पर उनका भी अधिकार है। 1970 के दशक के बाद केरल कलामंडलम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी महिलाओं को प्रवेश मिलने लगा। हालांकि यह प्रक्रिया आसान नहीं थी। कई संस्थानों ने शुरुआत में महिलाओं को केवल जेंडर के आधार पर प्रवेश देने से मना कर दिया। महिलाओं को यह लड़ाई अकेले लड़नी पड़ी। उन्हें कभी परिवार के विरोध का सामना करना पड़ा, तो कभी समाज के तानों और संस्थागत भेदभाव का। इसके बावजूद महिलाओं ने कथकली में अपनी जगह बनाई और इस पारंपरिक कला को नए अर्थ और नई आवाज़ दी।
कथकली में महिलाओं की भागीदारी की बात करें, तो सबसे पहला नाम चावरा पारुकुट्टी अम्मा (1904–1987) का आता है। पारुकुट्टी एक स्वर्णकार की बेटी थीं। उन्हें बचपन से ही कथकली नृत्य से गहरा लगाव था। जब उन्होंने एक स्थानीय नृत्य विद्यालय में प्रवेश लेने की कोशिश की, तो उन्हें सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि वे एक लड़की थीं।
कथकली में महिलाओं की यात्रा
कथकली में महिलाओं की यात्रा यह साफ़ करती है कि नारीवाद कोई विचारधारा नहीं, बल्कि एक ज़रूरत है। समानता अपने आप नहीं आती। जब महिलाओं को ‘परंपरा’ और ‘संस्कृति’ के नाम पर किसी मंच से बाहर रखा जाता है, तो यह एक राजनीतिक फ़ैसला होता है। इसे पहचाने बिना बदलाव संभव नहीं है। लंबे समय तक कथकली में केवल पुरुषों को ही ‘प्रामाणिक’ कलाकार माना गया। पुरुष कलाकार स्त्री पात्र निभाते रहे और इसे कला की ऊंचाई कहा गया। लेकिन जब असली महिलाएं मंच पर आने लगीं, तो उन्हें परंपरा तोड़ने वाला बताया गया। यह साफ़ करता है कि सवाल प्रतिभा का नहीं, बल्कि नियंत्रण का था। नारीवाद इसी नियंत्रण को चुनौती देता है। वह पूछता है कि क्यों किसी कला पर एक ही लिंग का अधिकार हो? क्यों ‘ऐसा ही होता आया है’ को अंतिम सच मान लिया जाए और क्यों स्त्री अनुभव को पुरुष नज़रिये से परिभाषित किया जाए?
आज भी कथकली में महिलाओं के लिए राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई गुरु महिलाओं को प्रशिक्षण देने से कतराते हैं। उनसे पुरुष कलाकारों जैसी शारीरिकता अपनाने की उम्मीद की जाती है। उन्हें अक्सर सीमित और कमज़ोर मानी जाने वाली भूमिकाएं दी जाती हैं। पारिश्रमिक और अवसरों में भी असमानता बनी हुई है। कथकली में महिलाओं की मौजूदगी सिर्फ़ एक सांस्कृतिक बदलाव नहीं है। यह सत्ता, परंपरा और जेंडर के सवालों पर सीधी चुनौती है। यह याद दिलाती है कि परंपराएं पवित्र नहीं होतीं। वे राजनीतिक होती हैं—और इसलिए बदली जा सकती हैं।
जब महिलाओं को ‘परंपरा’ और ‘संस्कृति’ के नाम पर किसी मंच से बाहर रखा जाता है, तो यह एक राजनीतिक फ़ैसला होता है। इसे पहचाने बिना बदलाव संभव नहीं है। लंबे समय तक कथकली में केवल पुरुषों को ही ‘प्रामाणिक’ कलाकार माना गया। पुरुष कलाकार स्त्री पात्र निभाते रहे और इसे कला की ऊंचाई कहा गया।
एक युवा कलाकार का अनुभव
22 वर्षीय विस्मया विजयन एर्नाकुलम, केरल के अमृता विश्वविद्यालयम में वित्त और कर में एमबीए की पढ़ाई कर रही है। इसके साथ-साथ वे भरतनाट्यम और कथकली की प्रशिक्षु भी हैं। उनका मानना है कि आज भी एक महिला कलाकार को मंच पर अपनी उपस्थिति को सही ठहराना पड़ता है। बहुत से लोग अब भी सोचते हैं कि कथकली केवल पुरुषों की कला है, क्योंकि इसकी वेशभूषा भारी होती है। वह बताती हैं, “अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। कार्यक्रमों के दौरान ब्रोशर और परिपत्र में कलाकारों के नाम दिए जाते हैं, ताकि दर्शकों को पता चले कि मंच पर प्रस्तुति देने वाली कलाकार एक महिला है। मेरे अनुसार ऐसी जागरूकता बहुत ज़रूरी है।”
चावरा पारुकुट्टी अम्मा की पीढ़ी और आज की पीढ़ी की तुलना करते हुए विस्मया कहती हैं, “पारुकुट्टी अम्मा ने उस समय मंच पर कदम रखा, जब कथकली में महिलाओं की कोई जगह नहीं थी। शुरुआती दौर में यह पूरी तरह पुरुष-प्रधान कला थी और संस्थान भी महिलाओं को प्रवेश नहीं देते थे। आज केरल कलामंडलम और आरएलवी कॉलेज जैसे संस्थानों में लड़कियों को दाखिला मिल रहा है और कई महिलाएं कथकली को अपना पेशा बना रही हैं।” फिर भी वह मानती हैं कि लैंगिक पूर्वाग्रह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी यह सवाल उठते हैं कि क्या महिलाएं कठिन भूमिकाएं निभा पाएंगी। मंदिरों में प्रदर्शन के दौरान पीरियड्स से जुड़ी मान्यताएं भी बाधा बनती हैं। हालांकि, पहले की तुलना में दर्शकों की सोच, संस्थानों का समर्थन और परिवार का सहयोग बेहतर हुआ है।
अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। कार्यक्रमों के दौरान ब्रोशर और परिपत्र में कलाकारों के नाम दिए जाते हैं, ताकि दर्शकों को पता चले कि मंच पर प्रस्तुति देने वाली कलाकार एक महिला है। मेरे अनुसार ऐसी जागरूकता बहुत ज़रूरी है।
ट्रांसजेंडर कलाकार: समावेशिता की नई दिशा
लैंगिक समानता की चर्चा अक्सर सिर्फ पुरुषों और महिलाओं तक सीमित रहती है, लेकिन असली समावेशिता हर लैंगिक पहचान को शामिल करती है। ट्रांसजेंडर समुदाय को कला के क्षेत्र में बहुत देर से अवसर मिले हैं। साल 2022 में पहली बार किसी ट्रांसजेंडर कलाकार को कथकली में मंच मिला। नवंबर 2022 में रेंजुमोल मोहन ने आरएलवी कॉलेज ऑफ म्यूज़िक एंड फाइन आर्ट्स, त्रिपुनिथुरा से अपना अरंगेट्टम किया। उन्होंने भगवान कृष्ण की भूमिका निभाई। यह कथकली के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक क्षण था। इसी वर्ष केरल के कन्हनगड़ ब्लॉक पंचायत ने 15 ट्रांसजेंडर महिलाओं की पहली पेशेवर नृत्य मंडली को बढ़ावा दिया, जिसमें कथकली और यक्षगान का संयोजन था। यह कदम कला में समावेशिता की दिशा में महत्वपूर्ण था।
पिछले दो दशकों में विदेशी महिला कलाकारों ने भी कथकली सीखने में रुचि दिखाई है। साल 2022 में केरल कलामंडलम ने महिला छात्राओं को न केवल प्रवेश दिया, बल्कि उन्हें समान अवसर देने की दिशा में भी कदम उठाए। यह बदलाव लंबे संघर्ष और निरंतर सवाल उठाने का परिणाम है। आज की युवा महिला कलाकार कथकली में नए प्रयोग कर रही हैं। वे स्त्रीवादी विषयों को प्रस्तुत कर रही हैं और पारंपरिक पात्रों की नई व्याख्या दे रही हैं। कथकली में महिलाओं और ट्रांसजेंडर कलाकारों की यात्रा अभी जारी है। यह केवल कला का नहीं, बल्कि समाज में समानता, सम्मान और समावेशिता की ओर बढ़ने का रास्ता है।

