इतिहास स्प्रिंट क्वीन ऑफ इंडिया कहलाने वाली खिलाड़ी सागरदीप कौर| #IndianWomenInHistory

स्प्रिंट क्वीन ऑफ इंडिया कहलाने वाली खिलाड़ी सागरदीप कौर| #IndianWomenInHistory

साल 2004 सगारदीप कौर के जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। उन्हें एथेंस ओलंपिक के लिए भारतीय 4x400 मीटर रिले टीम की रिजर्व खिलाड़ी के रूप में चुना गया। मुख्य टीम में एस. गीता, के.एम. बीना मोल, चित्रा सोमन और राजविंदर कौर शामिल थीं।

भारत के खेल जगत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो एक समय चमकते सितारों की तरह उभरते हैं, लेकिन समय के साथ गुमनामी में चले जाते हैं। सागरदीप कौर ऐसी ही एक एथलीट थीं, जिन्हें कभी ‘स्प्रिंट क्वीन ऑफ इंडिया’ कहा जाता था। पंजाब की मिट्टी में जन्मी सागरदीप कौर ने अपनी तेज़ दौड़ से देश को कई गौरवपूर्ण पल दिए। उन्होंने 2002 की एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह सिर्फ़ एक सफल एथलीट नहीं थीं, बल्कि एक मां और पंजाब पुलिस की अधिकारी भी थीं।

उनकी ज़िंदगी उपलब्धियों से भरी थी, लेकिन 23 नवंबर 2016 को हरियाणा के कैथल ज़िले के पास गुहला के नज़दीक एक कथित सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। यह हादसा आज भी कई सवाल छोड़ जाता है। सागरदीप कौर की मौत के चार साल बाद, साल 2020 में, उनकी बहन रत्तनदीप कौर ने #JusticeForSagardeep अभियान भी शुरू किया। इस अभियान को कई प्रमुख एथलीटों का समर्थन मिला। परिवार ने उनकी मौत की दोबारा जांच की मांग की। धीरे-धीरे सागरदीप की कहानी सिर्फ़ एक दुर्घटना की नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई बन गई।

सागरदीप कौर ऐसी ही एक एथलीट थीं, जिन्हें कभी ‘स्प्रिंट क्वीन ऑफ इंडिया’ कहा जाता था। पंजाब की मिट्टी में जन्मी सागरदीप कौर ने अपनी तेज़ दौड़ से देश को कई गौरवपूर्ण पल दिए। उन्होंने 2002 की एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

प्रारंभिक जीवन और एथलेटिक्स की शुरुआत

सागरदीप कौर का जन्म 24 सितंबर 1981 को पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम शहर में हुआ था। वह एक साधारण परिवार में पली-बढ़ीं। उनके पिता सुखसागर सिंह और मां स्वर्णजीत कौर ने अपनी बेटियों को हमेशा आत्मनिर्भर और मज़बूत बनने के लिए प्रेरित किया। तीन भाई-बहनों में उनकी बहन रत्तनदीप कौर बाद में पंजाब पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर बनीं। उनका खेलों से जुड़ाव स्कूल के दिनों में शुरू हुआ। उन्होंने ट्रैक पर दौड़ना शुरू किया और जल्द ही उनकी प्रतिभा सबका ध्यान खींचने लगी। पंजाब के ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के लिए खेल आसान नहीं था, लेकिन सागरदीप ने हर चुनौती का सामना किया। उनकी मेहनत और तेज़ी ने उन्हें राज्य स्तर पर पहचान दिलाई।

उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ में अपनी खास पहचान बनाई। बाद में वह खेल कोटा के तहत पंजाब पुलिस में भर्ती हुईं और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर बनीं। यह नौकरी उन्हें आर्थिक सुरक्षा देने के साथ-साथ बेहतर प्रशिक्षण के अवसर भी देती थी। 2000 के दशक की शुरुआत में, जब भारतीय महिला रिले टीम उभर रही थी, सागरदीप कौर ने उसमें अपनी मज़बूत जगह बनाई। सागरदीप की कहानी उन हज़ारों भारतीय लड़कियों की कहानी है जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचती हैं। उनके सफर में परिवार का समर्थन और पुलिस की नौकरी ने अहम भूमिका निभाई। लेकिन उनकी असमय और रहस्यमयी मौत ने यह सवाल छोड़ दिया कि क्या भारतीय खेल जगत में महिलाओं की उपलब्धियों को वह सम्मान और न्याय मिल पाता है, जिसकी वे हक़दार हैं।

उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर दौड़ में अपनी खास पहचान बनाई। बाद में वह खेल कोटा के तहत पंजाब पुलिस में भर्ती हुईं और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर बनीं। यह नौकरी उन्हें आर्थिक सुरक्षा देने के साथ-साथ बेहतर प्रशिक्षण के अवसर भी देती थी।

एथलेटिक्स करियर की अहम उपलब्धियां

सगारदीप कौर का एथलेटिक्स करियर साल 2002 में अपने शिखर पर पहुंचा। इसी साल उन्होंने श्रीलंका के कोलंबो में हुई 14वीं एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में महिलाओं की 4×400 मीटर रिले दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। भारतीय टीम में सगारदीप के साथ सोमा बिस्वास, सुनीता दहिया और जे.जे. शोभा शामिल थीं। तीन टीमों के बीच हुए फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन किया। यह जीत भारतीय महिला एथलेटिक्स के लिए बेहद अहम मानी गई। उस दौर में भारतीय महिला रिले टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत हो रही थी। सगारदीप इस बदलाव का अहम हिस्सा थीं और उनकी मेहनत ने टीम की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई।

साल 2003 में बेंगलुरु में आयोजित नेशनल सर्किट मीट में सगारदीप ने 200 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता। उन्होंने यह दौड़ 24.33 सेकंड में पूरी की। इस प्रतियोगिता में मंजीत कौर ने स्वर्ण और मुक्ति साहा ने रजत पदक हासिल किया। सगारदीप की तेज़ दौड़ ने उन्हें राष्ट्रीय रैंकिंग में जगह दिलाई। इसी दौरान वे पंजाब पुलिस की टीम का भी अहम हिस्सा बनीं। साल 2003 में पेरिस में हुई विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में वे भारतीय टीम के साथ शामिल हुईं। हालांकि टीम शुरुआती दौर में ही बाहर हो गई, लेकिन सगारदीप को अंतरराष्ट्रीय स्तर का महत्वपूर्ण अनुभव मिला। उनकी उपलब्धियां खासतौर पर पंजाब की युवा महिला एथलीट्स के लिए प्रेरणा बनीं।

साल 2003 में बेंगलुरु में आयोजित नेशनल सर्किट मीट में सगारदीप ने 200 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता। उन्होंने यह दौड़ 24.33 सेकंड में पूरी की। इस प्रतियोगिता में मंजीत कौर ने स्वर्ण और मुक्ति साहा ने रजत पदक हासिल किया। सगारदीप की तेज़ दौड़ ने उन्हें राष्ट्रीय रैंकिंग में जगह दिलाई।

ओलंपिक तक का सफर और राष्ट्रीय सम्मान

साल 2004 सगारदीप कौर के जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। उन्हें एथेंस ओलंपिक के लिए भारतीय 4×400 मीटर रिले टीम की रिजर्व खिलाड़ी के रूप में चुना गया। मुख्य टीम में एस. गीता, के.एम. बीना मोल, चित्रा सोमन और राजविंदर कौर शामिल थीं। इस टीम ने ओलंपिक में ऐतिहासिक सातवां स्थान हासिल किया। हालांकि सगारदीप को मैदान पर उतरने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी तैयारी, मेहनत और टीम भावना को महत्वपूर्ण माना गया। ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतियोगिता का हिस्सा बनना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। पूर्व डीजीपी और पंजाब बास्केटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजदीप सिंह गिल ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि सगारदीप 21वीं सदी के पहले दशक की पंजाब की शीर्ष ट्रैक एथलीट्स में से एक थीं।

उन्होंने मंजीत कौर, मंदीप कौर और राजविंदर कौर जैसी खिलाड़ियों के साथ पंजाब का नाम रोशन किया। साल 2002 में एशियन मीट के लिए चुनी गई 43 एथलीट्स की भारतीय टीम में सगारदीप का चयन उनकी प्रतिभा और मेहनत का प्रमाण था। ओलंपिक के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर खेलना जारी रखा। हालांकि, समय के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं। सगारदीप कौर की जीवन यात्रा यह दिखाती है कि कैसे एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली लड़की अंतरराष्ट्रीय मंच और ओलंपिक तक पहुंची। उनका सफर भारतीय खेल जगत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और संघर्ष की कहानी को भी सामने रखता है।

साल 2004 सगारदीप कौर के जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। उन्हें एथेंस ओलंपिक के लिए भारतीय 4×400 मीटर रिले टीम की रिजर्व खिलाड़ी के रूप में चुना गया। मुख्य टीम में एस. गीता, के.एम. बीना मोल, चित्रा सोमन और राजविंदर कौर शामिल थीं।

एथलेटिक्स में असाधारण उपलब्धियों के बावजूद, सगारदीप कौर का निजी जीवन लगातार संघर्षों से घिरा रहा। वर्ष 2007 में स्पेन में एथलेटिक्स कोच सतनाम सिंह से विवाह के बाद वे 2010 में भारत लौटीं। दो बेटियों की माँ सगारदीप न सिर्फ़ पंजाब पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर थीं, बल्कि अपनी खेल ट्रेनिंग भी जारी रखे हुए थीं। परिवार के अनुसार, वे घर की एकमात्र कमाने वाली थीं। 23 नवंबर 2016 को ट्रेनिंग के दौरान सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। हालांकि, हादसे की परिस्थितियों को लेकर परिवार ने शुरू से सवाल उठाए। पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट और एफआईआर के विवरणों में विरोधाभास सामने आए।

पुलिस ने सतनाम सिंह पर गलत जानकारी देने का केस दर्ज किया, लेकिन 2018 में उन्हें बरी कर दिया गया। हाई कोर्ट ने भी साल 2019 में दोबारा जांच की याचिका खारिज कर दी। अगस्त 2020 में सगारदीप के भाई ने #JusticeForSagardeep अभियान शुरू किया, जिसे कई नामी खिलाड़ियों और छात्रों का समर्थन मिला। बावजूद इसके, 2025 तक मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। सगारदीप कौर की कहानी भारतीय महिला खिलाड़ियों की उस हकीकत को उजागर करती है, जहां करियर, परिवार और सुरक्षा के बीच संतुलन एक बड़ी चुनौती बन जाता है। उनकी असमय मौत न सिर्फ़ खेल जगत की क्षति है, बल्कि न्याय व्यवस्था और महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

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