इंटरसेक्शनलजेंडर रोमांटिक रिश्तों में पितृसत्तात्मक नियंत्रण और ‘अच्छी लड़की’ की राजनीति

रोमांटिक रिश्तों में पितृसत्तात्मक नियंत्रण और ‘अच्छी लड़की’ की राजनीति

रिश्तों में नियंत्रण अक्सर आदेश या नियमों की तरह नहीं आता है, बल्कि वह चिंता, प्यार और सुरक्षा की भाषा के रूप में सामने आता हैं। जैसेकि सुरक्षा के नाम पर और दोस्तों के साथ बाहर जाने में रोकटोक करना, ढंग के कपड़े पहनकर जाओ, शारीरिक हिंसा, परिवार और दोस्तों से दूर करना, मौखिक हिंसा और अपमान करना आदि।

हमारे समाज में प्यार को अक्सर एक निजी, भावनात्मक और स्वाभाविक अनुभव के रूप में देखा जाता है। इसे दो लोगों के बीच अपनापन, आज़ादी और भरोसे पर टिका रिश्ता माना जाता है। लेकिन इस कल्पना के पीछे एक असहज सच्चाई भी छिपी होती है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जैसे परिवार, जेंडर, जाति, धर्म और समुदाय महिलाओं की यौनिकता और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, उसी तरह प्रेम संबंध भी पितृसत्तात्मक समाज में सत्ता से मुक्त नहीं होते। प्यार के रिश्ते भी सामाजिक ढांचे और शक्ति संबंधों से प्रभावित होते हैं। यह नियंत्रण कई बार रोमांटिक रिश्तों के भीतर ही दिखाई देता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि आदेश, परंपरा और नियमों के उल्लंघन जैसे कठोर शब्दों की जगह उन्हें ‘फ़िक्र’, ‘प्यार’, ‘भलाई’ या ‘रिश्ता बचाने’ के नाम पर पेश किया जाता है। इस तरह प्रेम के नाम पर नियंत्रण सामान्य और स्वीकार्य बना दिया जाता है।

इसमें अक्सर लड़कियों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी इच्छाएं, आज़ादी, निर्णय और सपने सब उस रिश्ते में जो पार्टनर हैं, उसके हिसाब से देखे और सोचे। इसी को ध्यान में रखते हुए, कथित ‘अच्छी लड़की’ की जो छवि है, रिश्तों में एक मिसाल के तौर पर पेश की जाती है। वो जो ज्यादा सवाल न करे और दूसरों की बात को मानती रहे। चाहे वह कितनी भी असहज महसूस क्यों न करे। यह दबाव एकदम से खुले तौर पर नहीं थोपा जाता, बल्कि धीरे-धीरे रोजाना बातों के माध्यम से और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से गढ़ा जाता है। समस्या तब और गहरी हो जाती है, जब इस नियंत्रण को लड़की की जिम्मेदारी बना दिया जाता है। अगर रिश्ता असहज है, तो कहा जाता है कि लड़की एडजस्ट नहीं कर पा रही है। इस तरह विक्टिम ब्लेमिंग भी इसका एक पहलू है, जिसमें महिलाओं और लड़कियों को ही दोषी ठहरा दिया जाता है।  

एक बार जब मैं बिना बताए अपने ऑफिस के किसी मित्र के साथ बाहर घूमने चली गई, तो मेरे पार्टनर ने सवाल खड़े किए कि मैं उसके साथ क्यों गई और मुझे ज्यादा लड़कों से दोस्ती बनाए रखने की ज़रूरत नहीं है। इन सबका कारण उसने ये बताया कि उसे मेरी बहुत चिंता है और मुझसे बहुत प्यार करता है।

अच्छी लड़की की सामाजिक रचना

‘अच्छी लड़की’ होना कोई जन्मजात पहचान नहीं है, बल्कि समाज और परिवार इस भूमिका को गढ़ते हैं, जहां लड़कियों को कम बोलने, अपनी इच्छाओं को सीमित रखने और रुढ़िवादी नियमों के अनुसार काम करने की उम्मीद की जाती है। अमूमन परिवार, स्कूल, धर्म और मीडिया,सब मिलकर यह तय करते हैं कि एक अच्छी लड़की कैसी दिखेगी, कैसे बात करेगी और किन सीमाओं में रहेगी और जब खुद के लिए कोई पार्टनर चुनेगी तो वो भी उन्हीं के अनुसार होना चाहिए। इस विषय पर बैंगलोर में रहकर इंजीनियरिंग कर रही कोमल (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “मैं अपनी पसंद के लड़के से शादी कर सकती हूं। लेकिन, मेरे परिवार वालों का कहना है कि लड़का हिन्दू धर्म का होना चाहिए। अगर गलती से भी मुझे कोई मुस्लिम समुदाय का लड़का पसंद आ गया और मेरे घर वालों को पता चल गया तो बवाल हो जाएगा।” 

इससे साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह परिवार और समाज जाति और धर्म की आड़ में लड़कियों की पसंद को कथित ‘अच्छी लड़की’ के किरदार में जबरदस्ती फिट करने की कोशिश करते हैं। यही सामाजिक संरचना आगे चलकर प्रेम के रिश्तों में भी देखने को मिलती है, जब कोई लड़की रिलेशनशिप में आती है, तो अक्सर उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह अच्छी लड़की बनी रहे, जिस कारण कभी-कभी यह खूबसूरत एहसास एक नियंत्रण के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसके साथ ही लड़कियों को महसूस कराया जाता है कि अगर वह सच में प्यार करती है, तो उसे एडजस्ट करना ही होगा। यहीं से रिश्तों में असंतुलन शुरू हो जाता है, जिसमें महिलाएं और लड़कियां खुद को साबित करती रहती हैं बिना किसी गलती के ताकि रिश्तों को बचाया जा सके।  

मैं प्राइवेट जॉब करती हूं, इसलिए मैं ज्यादातर रात को ही सबसे बात कर पाती हूं। कभी -कभी बात थोड़ी ज्यादा देर तक हो जाती है, तो मेरा बॉयफ्रेंड मुझे बोलता है कि इतनी देर से किस के साथ बात कर रही हो, अगर में बता भी दूं कि अपनी दोस्त या बहन से बात कर रही हूं। तब भी उसे स्क्रीनशॉट देकर सबूत देना पड़ता है। यह सब करना मुझे बिकुल भी अच्छा नहीं लगता है।

प्यार के नाम पर नियंत्रण के तरीके 

रिश्तों में नियंत्रण अक्सर आदेश या नियमों की तरह नहीं आता है, बल्कि वह चिंता, प्यार और सुरक्षा की भाषा के रूप में सामने आता हैं। जैसेकि सुरक्षा के नाम पर और दोस्तों के साथ बाहर जाने में रोकटोक करना, ढंग के कपड़े पहनकर जाओ, शारीरिक हिंसा, परिवार और दोस्तों से दूर करना, मौखिक हिंसा और अपमान करना आदि। इस विषय पर कोमल बताती हैं, “एक बार जब मैं बिना बताए अपने ऑफिस के किसी मित्र के साथ बाहर घूमने चली गई, तो मेरे पार्टनर ने सवाल खड़े किए कि मैं उसके साथ क्यों गई और मुझे ज्यादा लड़कों से दोस्ती बनाए रखने की ज़रूरत नहीं है। इन सबका कारण उसने ये बताया कि उसे मेरी बहुत चिंता है और मुझसे बहुत प्यार करता है। इसलिए वो ऐसे बोल रहा है। लेकिन कई बार वो ताने भी दिया करता था कि मेरी सैलरी उससे ज्यादा है, इसलिए मुझे कोई भी लड़का मिल जाएगा।” 

आगे वह बताती हैं, “कुछ महीनों से अब हम रिलेशनशिप में नहीं हैं। थोड़ा अकेलापन तो लगता है। लेकिन, अब मैं खुद को आज़ाद महसूस करती हूं क्योंकि मुझे अब बाहर जाने के लिए किसी से भी परमिशन लेने की ज़रूरत नहीं है। मैं जहां चाहूं, अपनी मर्जी से आ और जा सकती हूं।” इसी तरह उत्तराखंड के देहरादून की रहने वाली आलिया (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “मैंने रिलेशनशिप में उतना नियंत्रण का सामना नहीं किया है। लेकिन, मेरा बॉयफ्रेंड मुझे कहता है कि छोटे कपड़े पहन कर बाहर मत जाया करो, क्योंकि आजकल लड़कियों के साथ बहुत सी घटनाएं हो रही हैं।” हालांकि हम रोजमर्रा की घटनाओं को नकार नहीं सकते हैं। लेकिन इसकी आड़ में जो नियंत्रण को बढ़ावा मिल रहा है उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। 

मैं अपनी पसंद के लड़के से शादी कर सकती हूं। लेकिन, मेरे परिवार वालों का कहना है कि लड़का हिन्दू धर्म का होना चाहिए। अगर गलती से भी मुझे कोई मुस्लिम समुदाय का लड़का पसंद आ गया और मेरे घर वालों को पता चल गया तो बवाल हो जाएगा।

सोशल मीडिया की निगरानी और हिंसा में बढ़ोतरी 

डिजिटल युग में यह नियंत्रण और भी गहरा हो गया है। अमूमन चिंता और प्यार के नाम पर इतनी रात को किससे बात कर रही हो, फोन चेक करना, स्क्रीनशॉट भेजने को कहना, मीडिया में इतनी ज्यादा एक्टिव क्यों रहती हो, बात-बात पर टोकने जैसी बातें आज आम है। इस विषय पर पालमपुर की रहने वाली कंचन (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “मैं प्राइवेट जॉब करती हूं, इसलिए मैं ज्यादातर रात को ही सबसे बात कर पाती हूं। कभी -कभी बात थोड़ी ज्यादा देर तक हो जाती है, तो मेरा बॉयफ्रेंड मुझे बोलता है कि इतनी देर से किस के साथ बात कर रही हो। अगर मैं बता भी दूं कि अपनी दोस्त या बहन से बात कर रही हूं, तब भी उसे स्क्रीनशॉट देकर सबूत देना पड़ता है। यह सब करना मुझे बिकुल भी अच्छा नहीं लगता है। लेकिन, प्यार के कारण कुछ बोल नहीं सकती हूं।” साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह से सोशल मीडिया भी एक नियंत्रण का कारण बनता जा रहा है। 

आजकल लड़कियों के साथ यौन हिंसा के मामले भी बढ़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की साल 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  अपने साथी के साथ संबंध रखने वाली सभी किशोर लड़कियों में से लगभग एक चौथाई, यानी क़रीब 1.9 करोड़ लड़कियां, 20 साल की उम्र तक अंतरंग साथी की हिंसा का अनुभव कर चुकी होती हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अंतरंग साथी की हिंसा का स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इससे चोटें, अवसाद, चिंता, अनियोजित गर्भधारण, यौन संचारित संक्रमण और कई अन्य शारीरिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं होने की संभावना बढ़ सकती है। इसके अलावा डिजिटल हिंसा के मामले भी आए दिन सामने आते रहते हैं।

यूएन वुमन की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल लाखों महिलाएं और लड़कियां डिजिटल हिंसा से प्रभावित होती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि 16 से 58 फीसदी महिलाओं ने इस प्रकार की हिंसा का अनुभव किया है। प्यार के नाम पर रिश्तों में किया जाने वाला नियंत्रण दरअसल पितृसत्ता का ही एक रूप है, जिसे अच्छी लड़की की नैतिकता के ज़रिए सामान्य बना दिया जाता है। यह नियंत्रण चिंता, सुरक्षा और प्यार की भाषा में छिपा होता है, लेकिन महिलाओं की आज़ादी और निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है। ज़रूरत है कि प्रेम को बराबरी, सहमति और सम्मान के साथ समझा जाए, न कि त्याग और चुप्पी की अपेक्षा के रूप में।

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content