इंटरसेक्शनलजेंडर शरीर और शर्म से बाज़ार तक: जेंडर और भोजन की राजनीति

शरीर और शर्म से बाज़ार तक: जेंडर और भोजन की राजनीति

एक रिपोर्ट के अनुसार, जब मशहूर शो ‘खाना खज़ाना’ शुरू होने वाला था, तो पहले एक महिला होस्ट को चुना गया था क्योंकि यह माना जाता था कि कुकिंग शो की होस्ट महिला ही होनी चाहिए। बाद में यह धारणा बदली और शो की मेजबानी संजीव कपूर ने की।

क्या आपने कभी सोचा है कि टीवी या सोशल मीडिया पर दिखने वाले खाने-पीने के विज्ञापन हमें क्या दिखाते हैं? अमूमन वजन घटाने वाले खाद्य पदार्थ, डाइट स्नैक्स या सलाद के विज्ञापनों में महिलाएं दिखाई देती हैं। वहीं प्रोटीन पाउडर, एनर्जी ड्रिंक या मांसाहारी भोजन के विज्ञापनों में ज़्यादातर पुरुष दिखाए जाते हैं। यह कोई संयोग नहीं है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति है, जो हमें बताती है कि ‘असली मर्द’ क्या खाते हैं और ‘आदर्श महिला’ को क्या खाना चाहिए। भोजन किसी भी वव्यक्ति के जीवन के लिए जरूरी है, लेकिन बाज़ार और पितृसत्तात्मक सोच ने इसे भी स्त्री और पुरुष के खानों में बांट दिया है। इस बंटवारे में क्वीयर या लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान लगभग गायब है। यह जरूरी है कि हम समझें कैसे खाने के ज़रिए जेंडर की धारणाएं बनाई जाती हैं और कैसे वे हमारी पसंद, शरीर और पहचान को प्रभावित करती हैं।

पुरुषों की थाली: ताकत और पौरुष की छवि

एक रिपोर्ट के अनुसार, खाने को ‘मैस्क्क्यूलीन’ और ‘फेमनिन’ श्रेणियों में बांटने की शुरुआत 19वीं सदी के अंत में अमेरिका से हुई। उससे पहले परिवार के सभी लोग लगभग एक जैसा भोजन करते थे। लेकिन साल 1870 के बाद विज्ञापनों और बाज़ार ने यह धारणा बनानी शुरू की कि महिलाओं को हल्का भोजन, सलाद और मिठाइयां पसंद होती हैं, जबकि पुरुषों को मांस और भारी भोजन चाहिए। उस समय की रसोई किताबों में भी महिलाओं से कहा जाता था कि वे अपने पति की पसंद का खाना बनाएं। यह तक लिखा जाता था कि अगर पत्नी अच्छा खाना न बनाए तो पति भटक सकता है। इस तरह खाना भी रिश्तों और नैतिकता से जोड़ दिया गया। दुख की बात है कि आज भी 21वीं सदी में ‘हल्का खाना महिलाओं के लिए’ और ‘भारी खाना पुरुषों के लिए’ जैसी सोच मौजूद है।

आज के विज्ञापनों में प्रोटीन, मांस और एनर्जी ड्रिंक को खास तौर पर पुरुषों से जोड़ा जाता है। जब भी ताकत या ऊर्जा से जुड़े उत्पाद का प्रचार होता है, तो अक्सर भारी वजन उठाते या पसीने में भींगे पुरुष दिखाए जाते हैं। इससे यह संदेश दिया जाता है कि पुरुष का शरीर एक मशीन है, जिसे ज्यादा से ज्यादा ताकतवर बनाना चाहिए।

बाज़ार और मर्दानगी की छवि

आज के विज्ञापनों में प्रोटीन, मांस और एनर्जी ड्रिंक को खास तौर पर पुरुषों से जोड़ा जाता है। जब भी ताकत या ऊर्जा से जुड़े उत्पाद का प्रचार होता है, तो अक्सर भारी वजन उठाते या पसीने में भींगे पुरुष दिखाए जाते हैं। इससे यह संदेश दिया जाता है कि पुरुष का शरीर एक मशीन है, जिसे ज्यादा से ज्यादा ताकतवर बनाना चाहिए। ऐसे विज्ञापन यह भी बताते हैं कि भोजन का मकसद स्वाद नहीं, बल्कि ‘ईंधन’ है। यानी खाना सिर्फ शरीर को ताकत देने का साधन है। इसके उलट, सलाद या शाकाहार को अक्सर कमजोरी या फेमनिन होने से जोड़ दिया जाता है। हालांकि रेड मीट और भारी खाना ताकत और प्रभुत्व का प्रतीक बना दिया जाता है। यह सोच पुरुषों को एक सीमित पोषण समझ की ओर धकेल देती है, जहां संतुलित आहार की जगह सिर्फ प्रोटीन और सप्लीमेंट्स पर ज़ोर दिया जाता है।

कुकिंग और जेंडर की रूढ़ियां

खाना बनाना भी लंबे समय तक महिलाओं का काम माना गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, जब मशहूर शो ‘खाना खज़ाना’ शुरू होने वाला था, तो पहले एक महिला होस्ट को चुना गया था क्योंकि यह माना जाता था कि कुकिंग शो की होस्ट महिला ही होनी चाहिए। बाद में यह धारणा बदली और शो की मेजबानी संजीव कपूर ने की। विशेषज्ञों का मानना है कि खाना बनाना किसी एक जेंडर का काम नहीं है। यह एक ज़रूरी जीवन कौशल है, जो हर व्यक्ति को आना चाहिए। भोजन को स्त्री और पुरुष के खानों में बाँटना एक सामाजिक और बाज़ारी प्रक्रिया है। इससे न केवल हमारी खाने की आदतें प्रभावित होती हैं, बल्कि हमारी पहचान और आत्मछवि भी बनती है। जरूरी है कि हम इन रूढ़ियों को पहचानें और समझें कि भोजन का संबंध जेंडर से नहीं, बल्कि पोषण, स्वाद और स्वास्थ्य से है। जब हम इस सोच को बदलेंगे, तभी हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ पाएंगे जहाँ हर व्यक्ति अपनी पसंद का भोजन बिना किसी जेंडर लेबल के चुन सके।

एक रिपोर्ट के अनुसार, जब मशहूर शो ‘खाना खज़ाना’ शुरू होने वाला था, तो पहले एक महिला होस्ट को चुना गया था क्योंकि यह माना जाता था कि कुकिंग शो की होस्ट महिला ही होनी चाहिए। बाद में यह धारणा बदली और शो की मेजबानी संजीव कपूर ने की।

महिलाओं की थाली और लैंगिक अल्पसंख्यकों का नजरिया

बाज़ार ने महिलाओं के लिए भोजन को एक नैतिक परीक्षा बना दिया है। कम कैलोरी और लो-फैट उत्पाद खास तौर पर महिलाओं से जोड़े जाते हैं। संदेश यह दिया जाता है कि महिला का शरीर हमेशा सुधार की प्रक्रिया में है और उसे अपने वजन पर लगातार नज़र रखनी चाहिए। मिठाइयों और चॉकलेट के विज्ञापनों में महिलाओं को भावनात्मक या आकर्षक अंदाज़ में खाते दिखाया जाता है। एक तरफ उन्हें कम खाने की सलाह दी जाती है, दूसरी तरफ मीठा उनका “छुपा सुख” बताया जाता है। इस तरह खाना आनंद नहीं, बल्कि अपराध-बोध से जुड़ जाता है।

घर की रसोई में भी महिला को त्याग और सेवा की छवि में दिखाया जाता है। उसकी खुशी खुद खाने में नहीं, बल्कि परिवार को खिलाने में दिखाई जाती है। मुख्यधारा के विज्ञापनों में क्वीयर और ट्रांस समुदाय की मौजूदगी लगभग नहीं के बराबर है। भोजन को हमेशा स्त्री और पुरुष के पारंपरिक ढांचे में पेश किया जाता है। इसके उलट, क्वीयर समुदाय में खाना किसी एक जेंडर का काम नहीं माना जाता। यहां रसोई एक सुरक्षित जगह भी हो सकती है, जहां लोग अपनी पहचान के साथ सहज महसूस करते हैं। भोजन उनके लिए सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, अपनापन और पहचान से जुड़ा माध्यम भी है।

पैकेजिंग और भाषा भी जेंडर भेद को मजबूत करती है। गुलाबी और हल्के रंग महिलाओं से, जबकि गहरे और चमकीले रंग पुरुषों से जोड़े जाते हैं। ‘लो-फैट’ और ‘कंट्रोल’ जैसे शब्द महिलाओं के लिए, जबकि ‘पावर’ और ‘एनर्जी’ पुरुषों के लिए इस्तेमाल होते हैं।

रंग, भाषा, एल्गोरिदम और समाज पर पड़ता प्रभाव

पैकेजिंग और भाषा भी जेंडर भेद को मजबूत करती है। गुलाबी और हल्के रंग महिलाओं से, जबकि गहरे और चमकीले रंग पुरुषों से जोड़े जाते हैं। ‘लो-फैट’ और ‘कंट्रोल’ जैसे शब्द महिलाओं के लिए, जबकि ‘पावर’ और ‘एनर्जी’ पुरुषों के लिए इस्तेमाल होते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम भी इसी सोच को दोहराते हैं। महिलाओं को डाइट फूड और पुरुषों को प्रोटीन से जुड़े सुझाव ज्यादा दिखाए जाते हैं। इस तरह भोजन के ज़रिए जेंडर आधारित धारणाएं चुपचाप समाज में बनी रहती हैं। भोजन के इस लैंगिक बाज़ारीकरण का असर समाज पर गहराई से पड़ता है। इसका सबसे चिंताजनक परिणाम पोषण में बढ़ती असमानता है। महिलाओं को अक्सर ‘हल्का’ या ‘डाइट’ भोजन बेचने की कोशिश की जाती है। इससे उनके भीतर कम खाने और पतला दिखने का दबाव बनता है। कई बार यह दबाव कुपोषण और खाने से जुड़े विकारों तक ले जाता है। दूसरी ओर, पुरुषों को वसा और प्रोटीन से भरपूर भारी भोजन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसे ताकत और मर्दानगी से जोड़ा जाता है। इसका नतीजा जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के रूप में सामने आता है। इस तरह बाज़ार दोनों के स्वास्थ्य के साथ खेलता है।

खाने को ‘मैस्क्क्यूलीन’ और ‘फेमनिन’ श्रेणियों में बांटने की शुरुआत 19वीं सदी के अंत में अमेरिका से हुई। उससे पहले परिवार के सभी लोग लगभग एक जैसा भोजन करते थे। लेकिन साल 1870 के बाद विज्ञापनों और बाज़ार ने यह धारणा बनानी शुरू की कि महिलाओं को हल्का भोजन, सलाद और मिठाइयां पसंद होती हैं, जबकि पुरुषों को मांस और भारी भोजन चाहिए।

यह भेदभाव बचपन से शुरू हो जाता है। बच्चों के लिए गुलाबी और नीले रंग की अलग-अलग पैकिंग वाले स्नैक्स बाज़ार में उतारे जाते हैं। इससे बच्चों को यह संदेश मिलता है कि लड़कों और लड़कियों की पसंद अलग होनी चाहिए। छोटे बच्चों के मन में जेंडर के तय ढांचे बैठा दिए जाते हैं। यह सोच उनके स्वाभाविक विकास को सीमित करती है। वे अपनी पसंद से ज़्यादा समाज की उम्मीदों के अनुसार ढलने लगते हैं। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के एक शोध अनुसार, भोजन के विज्ञापनों में पुरुषों का वर्चस्व साफ़ दिखता है। टीवी विज्ञापनों में लगभग 75 प्रतिशत पात्र पुरुष होते हैं। महिलाओं की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत से भी कम है। शोध यह भी बताता है कि लड़कों को लड़कियों की तुलना में भोजन के विज्ञापन अधिक दिखाए जाते हैं। इन विज्ञापनों में अक्सर खेल और शारीरिक ताकत को दिखाया जाता है। इसके विपरीत, ब्रांडेड फास्ट फूड के विज्ञापन देखने के बाद लड़कियों की भोजन खपत में लगभग 100 कैलोरी तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि वे इन विज्ञापनों से अधिक प्रभावित होती हैं।

भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है। वह समाज के मूल्यों और सत्ता संबंधों को भी दिखाता है। अगर भोजन को सच में पोषण और देखभाल का माध्यम बनाना है, तो हमें बाज़ार की बनाई इन सीमाओं पर सवाल उठाने होंगे। उत्पादों को गुलाबी और नीले रंग में बांटने के बजाय उनकी असली गुणवत्ता और स्वाद पर ध्यान देना ज़रूरी है। हमें ऐसे समाज की कल्पना करनी चाहिए जहां हर शरीर, हर पहचान और हर भूख को बराबर सम्मान मिले। थाली में मौजूद जेंडर भेद को पहचानना और उसे चुनौती देना बदलाव की पहली सीढ़ी है। तभी हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ सकेंगे जहां भोजन और स्वाद पर किसी एक जेंडर का दावा न हो, बल्कि वह सबके लिए समान रूप से खुला हो।

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