इंटरसेक्शनलजाति दलित समुदाय के भोजन पर नियंत्रण और सांस्कृतिक दमन

दलित समुदाय के भोजन पर नियंत्रण और सांस्कृतिक दमन

मेरे शाकाहारी दोस्त अक्सर हमारे खाने का मज़ाक उड़ाते थे। हम अपने भोजन के बारे में खुलकर कभी बात नहीं करते थे और न ही दोस्तों को घर बुलाने की हिम्मत करते थे, क्योंकि हमारा घर गाँव के बाहर था। हमारे आस-पास मुस्लिम और अन्य वंचित जातियों के लोग रहते थे, जिन्हें भी समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

मेरी माँ बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं और पारंपरिक व्यंजनों की माहिर हैं। लेकिन मेरा खाना बनाने का तरीका उनसे बिल्कुल अलग है। आजकल बाजार में मसालों और सामग्रियों की बहुत विविधता है। अब विदेशों से भी चीज़ें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। मैंने ज्यादातर नए व्यंजन यूट्यूब देखकर सीखे हैं। हमारी माँ ने हमें जो पारंपरिक व्यंजन सिखाए, वे सीमित थे। जब माँ अपनी नानी के घर में रहती थीं, तब गरीबी बहुत थी। खाने की सामग्री जुटा पाना भी मुश्किल होता था। जो भी सीमित चीज़ें घर में होतीं, उसी से स्वादिष्ट खाना बनाना ही उनकी कला थी। माँ आज भी बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं, लेकिन उनकी रेसिपियां सीमित हैं। बाद में, पढ़ाई और काम के सिलसिले में मुझे घर से बाहर जाने का मौका मिला। इससे मुझे देश के कई हिस्सों में घूमने और अलग-अलग तरह के खाने चखने का अवसर मिला। इन अनुभवों ने मेरे खाना बनाने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। अब हमारे घर के किचन में पारंपरिक व्यंजनों के साथ-साथ आधुनिक और नई रेसिपियां भी बनती हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि आज हमारे पास चीज़ें खरीदने के लिए पैसे हैं।

हमारी माँ और दादी-नानी के समय में गरीबी और वंचितता इतनी थी कि वे कई चीज़ें खरीद ही नहीं पाती थीं। उनका खानपान भी इस सीमितता से प्रभावित था। उंच-नीच और जातिगत भेदभाव के कारण हमारा समुदाय अन्य समुदायों से सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अलग-थलग था। इसका असर हमारे खाने पर भी साफ दिखाई देता था। माँ अक्सर कहती थीं कि हमारे घर में दूध, दही, घी नहीं होता था। हम अपने बच्चों को क्या अच्छा खिलाएं? हमारे समुदाय में भैंस का मांस या कभी-कभी मृत जानवरों का मांस ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत था। कई बार लोग इसे खरीद भी नहीं पाते थे, तो मृत जानवरों का मांस लाकर खाते थे। मैंने बचपन में देखा है कि लोग उस मांस को साफ करते, उसके हिस्से अलग करते और उसे पकाते थे। यह सब देखकर समझ आता है कि दलित समुदाय का खाने का इतिहास सिर्फ स्वाद का नहीं, बल्कि संघर्ष और अस्तित्व का भी हिस्सा है।

माँ अक्सर कहती थीं कि हमारे घर में दूध, दही, घी नहीं होता था। हम अपने बच्चों को क्या अच्छा खिलाएं? हमारे समुदाय में भैंस का मांस या कभी-कभी मृत जानवरों का मांस ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत था। कई बार लोग इसे खरीद भी नहीं पाते थे, तो मृत जानवरों का मांस लाकर खाते थे।

जाति, भेदभाव और भोजन की यादें

स्कूल में कथित ऊंची जाति के बच्चे हमसे दूरी बनाए रखते थे। वे हमारी बस्तियों में नहीं आते थे और हमारे खाने को लेकर हमेशा ताने कसते थे। हमारे समुदाय के ज़्यादातर लोग मृत पशुओं को उठाने, उनका मांस काटने और हड्डियां या चमड़ा अलग करने का काम करते थे। इसलिए हमारे मांसाहारी भोजन को लेकर कथित ऊंची जातियों के बच्चों की सोच हमें और अलग-थलग कर देती थी। मेरे शाकाहारी दोस्त अक्सर हमारे खाने का मज़ाक उड़ाते थे। हम अपने भोजन के बारे में खुलकर कभी बात नहीं करते थे और न ही दोस्तों को घर बुलाने की हिम्मत करते थे, क्योंकि हमारा घर गाँव के बाहर था। हमारे आस-पास मुस्लिम और अन्य वंचित जातियों के लोग रहते थे, जिन्हें भी समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता था। हमारे घर में काजू, बादाम, दूध, दही, घी और पनीर जैसी चीज़ें नहीं होती थीं। सच तो यह है कि कथित निम्न जाति से होने से न सिर्फ़ शिक्षा बल्कि खाने-पीने की आदतों पर भी गहरा असर करता है।  

गाँव में मौजूद सामाजिक असमानताएं

जब मैं अपनी नानी के गाँव जाती थी, तो वहां यह भेदभाव और साफ दिखता था। हमें कथित ऊंची जातियों के घर से दूध या छाछ लेने जाना अपमानजनक अनुभव होता था। वे हमें दूध ऊपर से डालकर देते थे ताकि हमारा बर्तन उनके बर्तन को न छू सके। पैसे भी हमें दूर से रखने पड़ते थे। गाँव के नाई हमारे बाल काटने से मना कर देते थे, इसलिए घर के पुरुषों को जैसे मेरे मामा को शहर जाकर बाल कटवाने पड़ते थे। मेरी नानी बहुत समझदार थीं। वे उन पशु के अवशेषों का उपयोग करती थीं जिन्हें बाकी लोग फेंक देते थे। घर में मिर्च पाउडर तक नहीं होता था, फिर भी वह स्वादिष्ट खाना बना लेती थीं। ओजरी और गाय-भैंस के पाए को वह चर्बी में पकाती थीं, जिससे तेल की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यह खाना सस्ता, पौष्टिक और स्वादिष्ट होता था। सर्दियों में दलित परिवार मरे पशुओं की चर्बी शरीर पर लगाते थे ताकि त्वचा न फटे। जब कोई महिला बच्चे को जन्म देती थी, तो उसे घी की जगह चर्बी से बना ‘सिरा’ खिलाया जाता था। जहां ऊंची जातियों में सिरा दूध, काजू और घी से बनता था, वहीं दलित महिलाओं के लिए यह आटा, गुड़ और चर्बी से तैयार किया जाता था।

सर्दियों में दलित परिवार मरे पशुओं की चर्बी शरीर पर लगाते थे ताकि त्वचा न फटे। जब कोई महिला बच्चे को जन्म देती थी, तो उसे घी की जगह चर्बी से बना ‘सिरा’ खिलाया जाता था। जहां ऊंची जातियों में सिरा दूध, काजू और घी से बनता था, वहीं दलित महिलाओं के लिए यह आटा, गुड़ और चर्बी से तैयार किया जाता था।

मृत जानवरों को सुरक्षित रखने का तरीका  

जब किसी बड़े जानवर की मौत होती थी, तो उसके मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा थी। खासकर गर्मियों में, मांस को सुखाकर रखा जाता था ताकि बरसात के दिनों में खाने के काम आ सके। यह काम ज़्यादातर दलित महिलाओं की एक पारंपरिक कला बन गया था। मेरी नानी सिर्फ नमक का इस्तेमाल करके मांस को सहेजती थीं। मांस को लंबी और पतली पट्टियों में काटा जाता था और चूल्हे के ऊपर सुखाया जाता था। चूल्हे से उठने वाला धुआं मांस में एक खास तरह का ‘स्मोकी’ स्वाद भर देता था। हमारी भाषा में इस सूखे मांस को वलोरी या सुक्वानी कहा जाता था। बारिश के दिनों में जब ताज़ी सब्ज़ियां मिलना मुश्किल होता था, तब यही सूखा मांस दाल या दूसरी चीज़ों में मिलाकर पकाया जाता था।

कभी-कभी इसे चूल्हे की आग में सेंक कर भी खाया जाता था। इसका स्वाद सादा लेकिन बेहद स्वादिष्ट होता था। हमारे लिए यह सिर्फ एक खाने की चीज़ नहीं थी, बल्कि हमारे संघर्षों के बीच पोषण और जीवन का हिस्सा था। यह हमारी परंपरा, हुनर और जीने की जिद का प्रतीक थी। खाने की आदतें हमारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा होती हैं। गाँव में मृत जानवर का मांस अलग करना और उसकी चर्बी निकालना हमारे जीवन की एक प्रक्रिया थी, लेकिन ये हमारे साथ भेदभाव का कारण भी बना। देश में अमूमन किसी के पारंपरिक खाने को लेकर घृणा की भावना देखने को मिलती है। लेकिन, ‘खाना’ हमारी पृष्ठभूमि, ज़रूरतों और हमारे सामर्थ्य से तय होती है।

जब किसी बड़े जानवर की मौत होती थी, तो उसके मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा थी। खासकर गर्मियों में, मांस को सुखाकर रखा जाता था ताकि बरसात के दिनों में खाने के काम आ सके। यह काम ज़्यादातर दलित महिलाओं की एक पारंपरिक कला बन गया था। मेरी नानी सिर्फ नमक का इस्तेमाल करके मांस को सहेजती थीं।

आज हजारों दलित समुदाय ने मृत जानवरों का मांस खाना छोड़ दिया है। कई लोग तो पूरी तरह शाकाहारी भी हो गए। लेकिन इसके बावजूद, उनके साथ होने वाला भेदभाव खत्म नहीं हुआ। समाज का रवैया पहले जैसा ही बना रहा। इसी तरह, बहुत से दलितों ने समानता की तलाश में धर्म परिवर्तन किया और बौद्ध धर्म अपनाया। लेकिन इसके बाद भी जातिगत भेदभाव जारी रहा। ‘जाति है कि जाती नहीं’ यह कहावत हमारे समाज की सच्चाई को बखूबी दिखाती है। तकनीकी रूप से हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर रोटी-बेटी का व्यवहार अब भी नहीं बदला है। आज भी साथ बैठकर खाना खाना, एक ही थाली में भोजन करना, या दलित परिवार के घर जाकर भोजन करना अपवाद की तरह माना जाता है। बहुत कम लोग अपनी शादी या त्यौहारों में दलित परिवारों को बराबरी के साथ आमंत्रित करते हैं। अंतरजातीय विवाहों की बात करें तो यह आज भी समाज में बहुत कठिन और दुर्लभ है।

दलित समुदाय का पारंपरिक भोजन गाय का मांस रहा है। पहले लगभग 70 फीसद दलित समुदाय के लोग गाय का मांस खाते थे, क्योंकि यह सस्ता और पौष्टिक होता था। लेकिन धीरे-धीरे गाय को ‘धार्मिक प्रतीक’ बनाकर उसके मांस पर रोक लगाई गई। यह रोक केवल धार्मिक नहीं थी, बल्कि दलितों को सामाजिक और मानसिक रूप से तोड़ने का प्रयास भी थी। स्वतंत्रता के बाद संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्यों को गोहत्या पर रोक लगाने का अधिकार दिया गया। इसके बाद 1955 में प्रिवेंशन ऑफ काउ स्लॉटर एक्ट लागू हुआ। उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गोहत्या पर पूरा प्रतिबंध है, जबकि केरल, गोवा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में यह लागू नहीं है।

भारत में गोमांस पर प्रतिबंध ने दलित समुदायों की पारंपरिक आजीविका को भी गहराई से प्रभावित किया है। मृत पशुओं की खाल निकालना और चमड़े का काम लंबे समय से उनकी जीविका का हिस्सा रहा है। लेकिन इस प्रतिबंध के बाद यह काम लगभग ठप पड़ गया।

गोरक्षा की सबसे पहली सक्रियता पंजाब के नामधारी सिखों से जुड़ी है, जिन्होंने साल 1860 के दशक में गोहत्या का विरोध किया था। यह आंदोलन साल 1880 के दशक में और उसके बाद लोकप्रिय हुआ, और 19वीं सदी के अंत में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का समर्थन प्राप्त किया। ब्रिटिश भारत में 1880 और 1890 के दशक में गोरक्षा से संबंधित कई दंगे हुए। यह आंदोलन आगे चलकर दलितों और वंचितों के खिलाफ सामाजिक विभाजन का भी कारण बना। वहीं नैशनल सैंपल सर्वे ऑफिस 2011–12 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 80 फीसद दलित परिवार मांसाहारी हैं। उनके लिए गोमांस सस्ता और आसानी से मिलने वाला प्रोटीन का प्रमुख स्रोत था। इस तरह, गाय को धार्मिक और राजनीतिक प्रतीक बनाकर एक पूरे समुदाय की आहार संस्कृति और पहचान पर हमला किया गया।

गोमांस पर प्रतिबंध और दलित समुदायों की आजीविका पर असर

भारत में गोमांस पर प्रतिबंध ने दलित समुदायों की पारंपरिक आजीविका को भी गहराई से प्रभावित किया है। मृत पशुओं की खाल निकालना और चमड़े का काम लंबे समय से उनकी जीविका का हिस्सा रहा है। लेकिन इस प्रतिबंध के बाद यह काम लगभग ठप पड़ गया। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि गौरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों पर हिंसक हमलों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2016 की उना में हुई हिंसा जैसी घटनाओं के बाद गुजरात जैसे राज्यों में मृत पशुओं को उठाने और उनकी खाल निकालने का काम बंद हो गया। उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहां चमड़ा उद्योग बड़े स्तर पर था, कई लोगों को अपना पेशा छोड़ना पड़ा। हड्डियों और चर्बी से बनने वाले साबुन और खाद जैसे उत्पादों से भी उनकी अतिरिक्त आय बंद हो गई। धार्मिक और राजनीतिक दबावों ने इन व्यवसायों को ‘अशुद्ध’ कहकर खत्म कर दिया। साथ ही उन्हें वैकल्पिक रोजगार या सरकारी सहयोग नहीं मिला। यह प्रतिबंध सिर्फ आजीविका पर नहीं, बल्कि दलित समुदाय की आर्थिक आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान पर भी प्रहार था।

दलित समुदाय और भोजन पर नियंत्रण

दलित समुदायों के खान-पान पर समाज का सांस्कृतिक दबाव, उनके हाशियाकरण और भेदभाव का प्रतीक है। यह केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, अधिकार और सांस्कृतिक पहचान का सवाल है। भोजन पर नियंत्रण हमेशा से जाति आधारित भेदभाव को बनाए रखने का एक सामाजिक उपकरण रहा है। भारत में खान-पान की परंपराएं धर्म, संस्कृति और सामाजिक दृष्टिकोण से गहराई से जुड़ी हैं। नॉनवेज खाने को लेकर अलग-अलग समुदायों के विचार भिन्न हैं, और इन्हें समझने के लिए इतिहास और समाज की पृष्ठभूमि को देखना ज़रूरी है। खाना केवल पेट भरने की जरूरत नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक माहौल का हिस्सा है। समय के साथ हमारे खाने की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। मेरी नानी, माँ और आज की पीढ़ी के खाने में फर्क साफ दिखाई देता है। शहरीकरण, नौकरी, प्रवास और आर्थिक बदलावों ने इस बदलाव को और तेज़ किया है। आज का खान-पान पहले की पीढ़ियों से काफी अलग है। मेरी नानी के किचन से लेकर हमारी रसोई तक, स्वाद, सामग्री और सोच सब कुछ बदल गया है। इसलिए खाने का चुनाव किसी धर्म, जाति या ‘पवित्रता’ से नहीं, बल्कि जीवन की जरूरतों, परिस्थितियों और समय के बदलाव से तय होता है। असल में खाना पहचान और आज़ादी दोनों का प्रतीक है।

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