भारत में महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में काफी संघर्ष का समना करना पड़ा है, इसका इतिहास सिर्फ अक्षरों या ज्ञान तक समिति नहीं है। यह अब समानता और पहचान की लड़ाई बन चुका है। भारतीय इतिहास में वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेई जैसी महान विदुषी महिलाएं रही हैं । लेकिन मध्यकालीन भारत में सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक गतिविधियों ने महिला शिक्षा को बेड़ियों में जकड़ लिया। इसके बाद औपनिवेशिक काल से शुरू हुआ शिक्षा के लिए जद्दोजहद आज महिलाओं की बुनियादी जरूरतों का हिस्सा बन चुकी है। सरकारी तंत्र स्त्री शिक्षा में विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रही हैं। मौलाना आज़ाद एजुकेशन फाउंडेशन, नया सवेरा योजना, प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम, या बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे योजनाएं महिला सशक्तिकरण की नींव हैं। जो लड़कियों और और महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।
अल्पसंख्यक महिलाओं की ड्रॉपआउट दर में बढ़ोतरी
आज भारत 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की बात कर रहा है। लेकिन इस देश की अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं में आज भी शिक्षा का स्तर सवालों के घेरों में हैं। भारत की शहरी साक्षरता दर 88.9 फीसदी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह 77.5 फीसदी है, जिसमें अल्पसंख्यक महिलाओं का योगदान केवल 65-70 फीसदी है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर अन्य वर्गों की महिलाओं की तुलना में काफी कम हैं। महिलाओं के साथ 3-35 साल के युवा पुरूषों ने कभी औपचारिक शिक्षा में नामांकन नहीं कराया। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ जियोग्राफी, जियोलॉजी एंड एनवायरनमेंट की साल 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम समाज की महिलाओं में 17.6 फीसदी ड्रॉपआउट दर हैं, जो राष्ट्रीय औसत से 13.2 फीसदी अधिक है। कई बार महिलाओं को शिक्षा बीच में ही छोड़ना के लिए मजबूर होना पड़ता हैं ।
आज भारत 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की बात कर रहा है। लेकिन देश की अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं में आज भी शिक्षा का स्तर सवालों के घेरों में हैं। भारत की शहरी साक्षरता दर 88.9 फीसदी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह 77.5 फीसदी है, जिसमें अल्पसंख्यक महिलाओं का योगदान केवल 65-70 फीसदी है।
हांलाकि द वायर में छपे सरकार के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण(एआईएसएचई) साल 2020 -21 के के मुताबिक, कोविड के बाद महिलाओं के शिक्षा में बढ़ोतरी देखी गई, प्रत्येक 1000 पुरूषों में लगभग 503 महिलाओं ने उच्च शिक्षा के लिए नामांकन किया। नामांकन में मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी साल 2012 से 2020 तक बढ़ी है। फ्रंट लाइन में छपे एक लेख के मुताबिक अगर सरकारी रिपोर्टों की बात करें तो साल 1983 में गोपाल सिंह समिति की रिपोर्ट से लेकर 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट और साल 2014 में कुंडू समिति की रिपोर्ट में मुसलमानों की साक्षरता दर 59.1 फीसदी थी । जो राष्ट्रीय औसत से कम आंकी गई और बताया गया कि ऐसे बच्चों का प्रतिशत बहुत ज़्यादा है जो कभी स्कूल नहीं गए।
आर्थिक तंगी, पारिवारिक दबाव और लैंगिक रूढ़ियां
अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली ज्यादतर महिलाओं की शिक्षा के स्तर में गिरावट की वजह समाजिक-आर्थिक के साथ सांस्कृतिक रूढ़ियों, लैंगिक पूर्वाग्रह, सुविधाओं की कमी, सुविधाओं तक पहुंच और स्कूल की दूरी भी है। यह समस्या मुस्लिम महिलाओं में अन्य वंचित वर्ग की महिलाओं की तुलना में और प्रबल हो जाती हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के महिलाओं के अलावा समाज की जिन महिलाओं के समक्ष शिक्षा में ये बाधाएं हैं, वे महिलाएं दूरस्थ शिक्षा (डिस्टेंस लर्निंग) की दिशा में कदम बढ़ाती नजर आ रही हैं। सच्चर समिति की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि बाल विवाह और घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से मुस्लिम समाज की लड़कियों में ड्रॉपआउट दर उच्च है।
जो लड़कियां सामाजिक बंधन तोड़कर पढ़ाई के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं, उनके सामने पैसों की तंगी उनके बढ़ते कदमों को रोक देती हैं । इसके अलावा समाज में जेंडर आधारित भेदभाव आज भी लड़कियों की राह में एक बाधा है।
मध्य प्रदेश की दलित समुदाय से आने वाली अराधना जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा हैं, वे बताती हैं, “मेरे समाज की महिलाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या उनकी आर्थिक स्थिति है, जो लड़कियां सामाजिक बंधन तोड़कर पढ़ाई के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं, उनके सामने पैसों की तंगी उनके बढ़ते कदमों को रोक देती हैं । इसके अलावा समाज में जेंडर आधारित भेदभाव आज भी लड़कियों की राह में एक बाधा है। उचित मार्गदर्शन का अभाव, शादी का पारिवारिक और सामाजिक दबाव भी एक समस्या है। आज भी जातिवाद से ग्रस्त मानसिकता उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों के सामने सामाजिक समस्या बनकर खड़ी है।”
वहीं मुस्लिम समुदाय से आने वाली नाजिया जो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की लॉ की छात्रा हैं और द्राक्षा प्रवीन जो इसी विश्वविद्यालय की एमए हिंदी की छात्रा हैं वे बताती हैं, “हमारे समाज में सबसे बड़ी समस्या मानसिकता हैं। लोग लड़कियों को पढ़ाना ही नहीं चाहते हैं, उनका कहना होता है कि पहले हम पढ़ाई में पैसा लगाएं फिर शादी में लगाना पड़ेगा, दूसरी समस्या परिवार की आर्थिक स्थिति होती है। कुछ लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती हैं, लेकिन कई बार घर की महिलाएं ही समस्या उत्पन्न कर देती हैं। परिवार की तरफ से शादी का दबाव, पढ़ाई के बाद घर ही संभालने के ताने उच्च शिक्षा की राह में बड़ी अड़चन हैं।”
लोग लड़कियों को पढ़ाना ही नहीं चाहते हैं, उनका कहना होता है कि पहले हम पढ़ाई में पैसा लगाएं फिर शादी में लगाना पड़ेगा, दूसरी समस्या परिवार की आर्थिक स्थिति होती है। कुछ लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती हैं, लेकिन कई बार घर की महिलाएं ही समस्या उत्पन्न कर देती हैं।
सरकारी योजनाओं के बावजूद बाधाएं
बैलार्ड ब्रीफ ने गरीबी और सांस्कृतिक मानदंड को लड़कियों की शैक्षिक असमानता का वजह बताया है। एक अध्ययन के मुताबिक अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा का निम्न स्तर आर्थिक तंगी के साथ महिला शिक्षा का बहिष्कार और धर्म के प्रति कट्टरपंथी सोच दर्शाया गया। आर्थिक कमजोरी अल्पसंख्यक महिलाओं की शिक्षा का प्रमुख कारण हैं। रिपोर्ट बताते हैं कि अल्पसंख्यक समुदायों की मासिक आमदनी अन्य समुदाय के लोगों से कम हैं। आमदनी से शिक्षा का प्रभावित होना स्वाभाविक है। ग्रामीण क्षेत्र में 70 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी रहती है जिनकी स्कूल तक पहुंच का न होना भी एक समस्या है।देश प्रगति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आज भी देश के कई हिस्सों में लड़कियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। पितृसत्तात्मक सोच से घिरे समाज में लड़कियों की शिक्षा और काम में बाधा बनी हुई है। अल्पसंख्यक समुदाय में दशकों तक शिक्षा की दूरी ने उन्हें समाज में पीछे बनाए रखा है ।
शिक्षा का अधिकार, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, माध्यमिक शिक्षा के लिए लड़कियों को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना, सर्व शिक्षा अभियान कई राज्य सरकारों ने लड़कियों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए सरकारी भर्ती में आरक्षण व्यवस्था लागू की है । लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय की कई महिलाओं तक पहुंच सीमित होने से वे इसके लाभ से वंचित रह जाती हैं,जिन महिलाों को शिक्षित होने का अवसर मिलता है । उन पर अक्सर शिक्षा के साथ घर परिवार की जिम्मेदारी भी होती है। कई मौकों पर दोनों को संतुलित कर पाना संभव नहीं होता और इस वजह से भी उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है। सरकारी संस्थानों में उचित माहौल का ना मिल पाना भी शिक्षा में रुकावट बनता है। हर साल भारत में 23 मिलियन से अधिक लड़कियां ज़रूरी उत्पादों और स्वच्छता शिक्षा की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। सरकारी संस्थानों में सैनेटेरी नैपकिन की व्यवस्था न होना, स्वच्छता की कमी, पीरियड्स के विषय में उचित जानकारी का न होना स्कूल छोड़ने की वजह बनता है। कई लड़कियां और महिलाएं आज भी पीरियड्स के समय कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, जिससे खून के धब्बों का कपड़े पर लग जाने का खतरा होता है, ऐसे में लड़कियां शर्मिंदगी से बचने के लिए स्कूल नहीं जाती।
हर साल भारत में 23 मिलियन से अधिक लड़कियां ज़रूरी उत्पादों और स्वच्छता शिक्षा की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। सरकारी संस्थानों में सैनेटेरी नैपकिन की व्यवस्था न होना, स्वच्छता की कमी, पीरियड्स के विषय में उचित जानकारी का न होना स्कूल छोड़ने की वजह बनता है।
नीति और सामाजिक बदलाव की ज़रूरत
सामाजिक स्तर पर अल्पसंख्यक महिलाएं दोहरे भेदभाव का सामना करती हैं, एक तरफ जेंडर असमानता तो दूसरी ओर धार्मिक पाबंदियां। कई बार जब सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए लड़कियां उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों का रूख करती हैं, तो उनके सामने शहरों में बढ़ते महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध और हिंसा के मामले परिवार के साथ लड़कियों के कदम को रोक देते हैं । कम उम्र में शादी और आर्थिक दबाव महिलाओं को शिक्षा से दूर रखते हैं। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के लेख इंडियन पैराडॉक्स में बताया गया है कि, जहां शिक्षा का स्तर बेहतर है, वहां अमीर घर की महिलाओं पर पारिवारिक सीमाओं का बोझ है, जिससे वे शिक्षित होने के बावजूद रोजगार के अवसर से वंचित रह जाती हैं। यह सारी समस्याएं अगली पीढ़ी को भी प्रभावित करती हैं।
ये चुनौतियां अलग-अलग नहीं बल्कि परस्पर जुड़ी हुई हैं। सांस्कृतिक रूढ़ियां आर्थिक गरीबी को जन्म देती हैं, जो कि सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। सच्चर समिति की रिपोर्ट ने इसे सामाजिक बहिष्कार करार दिया था, लेकिन अब तक नीतियां समस्या को खत्म नहीं कर सकी हैं। सरकार की नीतियां या पहुंच का न होना आज भी बड़ी समस्या बनी हुई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों की अधिकारों का वकालत करता है। संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 21ए ) आम नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है, जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत और व्यवस्था शिक्षा की राह को मुश्किल बना रहा है। सरकार की शिक्षा नीतियां कागजों पर ही सीमित नजर आती हैं, इनका कार्यान्वयन कमजोर हैं। हाल ही में लिए गए सरकार का फैसला मौलाना आजाद फेलोशिप पर रोक ने कई अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के साथ-साथ अन्य लाभार्थियों की शिक्षा में रुकावट पैदा की है।
अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं की शिक्षा को मजबूत करने के लिए बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं। सांस्कृतिक जागरूकता के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना भी ज़रूरी है। महिलाओं के बीच सुरक्षा, समावेशिता बढ़ाने के लिए छात्रवृति योजनाओं के साथ संस्थानों की हालत में सुधार और महिलाओं के लिए सुलभ करने की आवश्यकता हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं की शिक्षा आज भी कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बाधाओं का सामना कर रही है। आर्थिक तंगी, पारिवारिक दबाव, लैंगिक रूढ़ियां और संस्थागत कमियां उन्हें शिक्षा की राह में पीछे धकेलती हैं। इसलिए इस दिशा में सरकार और समाज को भागीदारी निभाने की ज़रूरत है। क्योंकि महिला सशक्तिकरण केवल उनके व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी है। जब एक लड़की शिक्षित होती है, तो उसके परिवार, समुदाय और भविष्य की पीढ़ियां भी शिक्षित और जागरूक होती हैं। इसलिए महिलाओं की शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है।

