जब भी किसी लव स्टोरी की बात होती है तो ज़्यादातर लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट और हीर-रांझा जैसे नाम उभर कर आते हैं। इन सारी कहानियों में सामाजिक विरोध के बावजूद प्यार को महान माना गया है। इन सभी में प्रेमियों के संघर्ष और बलिदान को नैतिक आदर्श की वैधता दी गई है। लेकिन, समाज में एक बड़ा तबका भी है जो इन प्रेम कहानियों से ख़ुद को जोड़कर नहीं देख पाता क्योंकि उनके रिश्ते, भावनाएं और उनकी पहचान इन कहानियों में मौजूद ही नहीं हैं। भारतीय समाज के हेटेरोनॉर्मेटिव ढांचे से क्वीयर समुदाय की प्रेम कहानियां पूरी तरह से गायब हैं। इनकी प्रेम कहानियां न तो लोक कथाओं में जगह बना पाई हैं न ही लोक संस्कृति में। समाज में अपनी पहचान और यौनिकता के साथ खुलकर जीने के लिए क्वीयर कम्युनिटी को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। यहीं से सवाल उठता है कि क्या लैला-मजनू और हीर-रांझा की प्रेम कहानियों की तरह अगर दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच की प्रेम कहानी होती, तो क्या भारतीय समाज में महान प्रेम कहानी के तौर पर अमर हो पाती या समाज उसे ‘बीमारी’ या ‘वेस्टर्न कल्चर’ कहकर ख़ारिज कर देता?
क्या सच में प्यार लैंगिक रूप से समान है?
भारतीय समाज में प्यार निजी मामला नहीं है बल्कि जाति, धर्म और शादी की शर्तों के साथ स्वीकार किया जाया है। यहां आज भी क्वीयर कम्युनिटी के प्यार को क़ानूनी और सामाजिक किसी भी रूप में बराबरी की जगह नहीं मिल पाई है। यहां पहले से ही तय हो जाता है कि किन प्रेम कहानियों को समाज इजाज़त देगा और किन्हें ख़ारिज कर देगा। प्यार की कल्पना भी लैंगिक पहचान और यौनिकता के दायरे में बंधी हुई है। साल 2018 में होमोसेक्शूएलिटी को अपराध मानने वाले क़ानून धारा 377 के रद्द होने के सालों बाद भी उनके रिश्तों को समाज मान्यता और सम्मान नहीं देता है। भारतीय समाज में प्यार को मान्यता तब मिलती है, जब न सिर्फ उसका अंतिम पड़ाव शादी हो, बल्कि वो हेटेरोनॉर्मेटिव दायरे में हो जहां जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को भी ध्यान रखा जाए। ऐसे में होमोसेक्शुअल शादी जिसे अभी भी क़ानूनी रूप से मान्यता नहीं मिल पाई है, उनके रिश्तों को समाज कैसे स्वीकार कर पाएगा?
भारतीय समाज एक बेहद दकियानूसी समाज है। यहां अक्सर स्ट्रेट व्यक्ति के लिए भी अपने प्रेम का इज़हार एक चुनौती बन जाता है। ऐसे में एक क्वीयर इंसान के तौर पर मैंने हमेशा ख़ुद को अकेला महसूस किया है।
इस विषय पर जयपुर, राजस्थान की शिक्षाविद डॉक्टर संजू सदानीरा कहती हैं, “भारतीय समाज एक बेहद दकियानूसी समाज है। यहां अक्सर स्ट्रेट व्यक्ति के लिए भी अपने प्रेम का इज़हार एक चुनौती बन जाता है। ऐसे में एक क्वीयर इंसान के तौर पर मैंने हमेशा ख़ुद को अकेला महसूस किया है। अपनी पहचान की स्वीकृति के लिए हमेशा एक तीव्र प्यास महसूस की है। यह अनुभव एक तरह से अपने आप को अस्तित्वहीन व्यक्ति के रूप में देखना है, जो बहुत तकलीफ़देह और आत्मसम्मान के लिए गहरी चोट की तरह है।”
प्यार पर परिवार और समाज का कंट्रोल
हमारे भारतीय समाज में प्यार दो लोगों के बीच का रिश्ता या निजी मामला नहीं माना जाता है। इसे परिवार और समुदाय की इज़्ज़त से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से प्यार पर सबसे पहला और कड़ा कंट्रोल परिवार का ही होता है। यहां जब दूसरी जाति और धर्म के बीच के प्यार को लेकर इतनी चुनौतियां हैं, वहां एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के लिए यह और भी कठोर हो जाता है। उनके रिश्तों को अक्सर ‘गलती’, ‘फेज़’ या ‘बीमारी’ कहकर नकार दिया जाता है। इसे ‘एब्नॉर्मल’ मानकर ‘ठीक’ करने की कोशिश की जाती है। क्वीयर व्यक्ति को कई बार शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। कई मामलों में इमोशनल ब्लैकमेलिंग कर जबरदस्ती शादी कर दी जाती है। ख़ास तौर पर जब एलजीबीटीक्यू+ समुदाय का व्यक्ति जाति, धर्म या आर्थिक रूप से हाशिए पर मौजूद मौजूद होता है तो उसका जोख़िम कई गुना बढ़ जाता है। उसके साथ अगर घर में हिंसा होती है, तो न तो वह घर छोड़ कहीं और रह सकता है न ही किसी तरह की कोई मदद मिल पाती है।
मैं पिछले 6 सालों से अपनी पार्टनर के साथ रह रही हूं। लेकिन, मैं इस बात को खुलकर नहीं बता सकती। उसे ‘दोस्त’ बोलना पड़ता है। बहुत दुख होता है जब मेरी ही पार्टनर से मुझे शादी के लिए कन्विंस करने को कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ की एक मल्टीनेशनल कम्पनी में जूनियर इंजीनियर के रूप में काम कर रही प्रिया (बदला हुआ नाम) अपनी पार्टनर के साथ रहती हैं। फेमिनिज़म इन इंडिया से बातचीत के दौरान वह कहती हैं, “मैं पिछले 6 सालों से अपनी पार्टनर के साथ रह रही हूं। लेकिन, मैं इस बात को खुलकर नहीं बता सकती। उसे ‘दोस्त’ बोलना पड़ता है। बहुत दुख होता है जब मेरी ही पार्टनर से मुझे शादी के लिए कन्विंस करने को कहा जाता है। घर-परिवार, पड़ोस या वर्कप्लेस कहीं भी हम अपने रिश्ते के बारे में नहीं बता सकते। स्ट्रेट कपल की तरह हम भी अपने रिश्ते की सामाजिक मान्यता और क़ानूनी बराबरी चाहते हैं।”
क्वीयर होने के कारण अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य
क्वीयर होना केवल पहचान का सवाल नहीं है, यह स्वतंत्रता, समानता जैसे मौलिक अधिकारों का मामला भी है। भारतीय समाज में जहां बाइनरी और हेट्रोनॉर्मेटिविटी को नॉर्मल माना जाता है वहां क्वीयर कम्युनिटी को आए दिन किसी न किसी रूप में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उनका मानसिक स्वास्थ्य हमेशा जोख़िम में रहता है। परिवार और समाज का दबाव, ‘नॉर्मल’ बनने की सलाह, शादी का सामाजिक दबाव और लगातार होने वाला जजमेंट क्वीयर व्यक्तियों को एक तरह के तनाव में रखता है। इसके अलावा सामाजिक भेदभाव से बचने के लिए ज्यादातर लोग अपनी पहचान छुपा कर जीने को मजबूर होते हैं जिससे उनके अंदर एक तरह का डर और असुरक्षा बनी रहती है। यह सब उनकी मानसिक सेहत पर गहरा असर डालते हैं।
प्रीवेंटिव मेडिसिन रिसर्च एंड रिव्यू 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि उत्तर भारत के एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के 66 फीसद व्यक्तियों के जीवन में कभी न कभी आत्महत्या से मौत का खयाल आया।
प्रीवेंटिव मेडिसिन रिसर्च एंड रिव्यू 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि उत्तर भारत के एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के 66 फीसद व्यक्तियों के जीवन में कभी न कभी आत्महत्या से मौत का खयाल आया। ख़ास तौर पर वर्बल एब्यूज का सामना करने वाले मामलों में यह ज्यादा पाया गया। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 के दौरान भी एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के 74 फीसद व्यक्तियों ने तनाव और दूसरी मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा जो बाइनरी और हेट्रोसेक्शुअल लोगों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा था।
मौजूदा क़ानून और सुरक्षा की कमी
भारत में एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के लिए अभी भी कई क़ानूनी पेंच हैं। भले ही धारा 377 हटने के बाद क़ानूनी रूप से होमोसेक्शुअल संबंधों को मान्यता मिल चुकी है। इसके बावजूद कदम-कदम पर इन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। घर, वर्कप्लेस और पब्लिक प्लेस पर उनकी सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं। पुलिस प्रशासन में भी जेंडर आईडेंटिटी और सेक्शुअल ओरियंटेशन को लेकर जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी है। अब चूंकि सिस्टम में भी इसी समाज के लोग मौजूद हैं जो हेट्रोनॉर्मेटिव ढांचे को ही ‘नॉर्मल’ मानते हैं, इस वजह से किसी भी तरह की समस्या होने पर इन्हें ठीक से मदद नहीं मिल पाती है। संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में भले ही देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार मिले हुए हैं, हमारे समाज में सभी को समान नहीं समझा जाता है।
साल 2024 में भारत में भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड),1860 की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के रूप में क़ानूनी सुधार पेश किया गया। इसके बावजूद क्वीयर कम्युनिटी के लिए अभी भी सुरक्षा से जुड़े क़ानून की कमी है। भारतीय न्याय संहिता में नॉन बाइनरी और और ट्रांसजेंडर्स के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं है। हालांकि इसके लिए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 ट्रांसजेंडर की पहचान को मान्यता देने और उनके ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने के लिए एक अच्छी पहल है। इसके बावजूद यह समस्या की गंभीरता को दूर करने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के सदस्यों के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को रोकने के लिए भारतीय न्याय संहिता में कोई विशेष प्रावधान नहीं किए गए हैं।
एक क्वीयर कपल के तौर पर हमें हर दिन भेदभाव का सामना करना पड़ता है। एनिवर्सरी पर स्ट्रेट कपल की तरह हम किसी रेस्टोरेंट वगैरह में प्रोग्राम प्लान नहीं कर पाते। पिछली बार जनगणना के दौरान हमसे असहज करने वाले सवाल पूछे गए। हमारे रिश्ते के लिए उनके पास कोई स्पेसिफिक टर्म ही नहीं है।
दिल्ली के एक एनजीओ में काम करने वाले गुरमीत सिंह (बदला हुआ नाम) ने अपना अनुभव कुछ इस तरह साझा किया, “एक क्वीयर कपल के तौर पर हमें हर दिन भेदभाव का सामना करना पड़ता है। एनिवर्सरी पर स्ट्रेट कपल की तरह हम किसी रेस्टोरेंट वगैरह में प्रोग्राम प्लान नहीं कर पाते। पिछली बार जनगणना के दौरान हमसे असहज करने वाले सवाल पूछे गए। हमारे रिश्ते के लिए उनके पास कोई स्पेसिफिक टर्म ही नहीं है। हम बैंक में जॉइंट अकाउंट नहीं खुलवा सकते, इन्वेस्टमेंट्स और इन्श्योरेंस वगैरह में एक दूसरे को अपना नॉमिनी तक नहीं बना सकते। अस्पताल में एक दूसरे के गार्जियन के तौर पर साइन करने में भी दिक्कत होती है।”
क्यों जरूरी है लैंगिक तौर समान रिश्ते
जब एक कम्युनिटी को अपनी पहचान छुपा कर जीना पड़े, जब कोई जोड़ा विभिन्न ख़तरों की वजह से अपने प्यार और रिश्ते को ज़ाहिर न कर सके, ऐसे में उनके लिए लोकतंत्र और मानवाधिकारों का कोई मायना नहीं रहता। जब परिवार इज़्ज़त के नाम पर हिंसा को जायज़ ठहराए और समाज उसे सपोर्ट करे, जब क्वीयर कम्युनिटी को अपने रिश्तों के लिए क़ानूनी पहचान न मिले तो यह निजी मामला नहीं रह जाता। यह राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह प्रेम को सामाजिक नैतिक मान्यताओं से नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकार के तौर पर देखे। क्वीयर व्यक्तियों को सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है।
इसके लिए सबसे पहले क़ानून में बदलाव करना होगा जो कि अभी भी भेदभाव और ग़ैर बराबरी को बढ़ावा देता है। होमोसेक्शुअल शादियों को मान्यता देना होगा, जिससे उससे जुड़े तमाम क़ानूनों जैसे कि उत्तराधिकार, बच्चा गोद लेना और तमाम तरह के क़ानूनी दस्तावेजों में क्वीयर कपल एक दूसरे को पार्टनर और परिवार के तौर पर दर्ज़ कर सकेंगे। साथ ही इनके साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा के ख़िलाफ़ ख़ास तौर पर क़ानून बनाना उसे सख़्ती से लागू करना भी ज़रूरी है। इसके अलावा हमें समाज में मौजूद जेंडर बाइनरी और हेट्रोनॉर्मेटिव सोच को ख़त्म करने के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है क्योंकि जब तक समाज की सोच में बदलाव नहीं होगा, तब तक क़ानून बनने के बावजूद बराबरी नहीं मिल पाएगी। हमें यह समझना होगा कि प्यार किसी का विशेषाधिकार नहीं बल्कि यह मौलिक अधिकार है जो सभी को समान रूप से हासिल होना चाहिए।

