जसिंता केरकेट्टा झारखण्ड की युवा कवि, कहानीकार, समाजसेवी और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे अपनी कविताओं और कहानियों में आदिवासियों के मुद्दों को बड़ी ही संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती हैं। वैसे तो वे अपनी कविताओं के लिए ज़्यादा मशहूर हैं, लेकिन हाल ही में उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है औरत का घर। इसे राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। किताब बताती है कि बाकी समाजों की तरह आदिवासी समाज भी कमियों से अछूता नहीं है। इसमें आदिवासी समुदाय में पहले से मौजूद कुछ स्त्री-विरोधी प्रथाओं का ज़िक्र है।किताब की भूमिका में ही वे लिखती हैं कि इस समाज के पुरुष जब ‘समाज’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उससे उनका मतलब पुरुषों के समाज से होता है। इसी तरह ‘पुरखा’ शब्द में केवल ‘पुरुष पुरखा’ शामिल होते हैं। इसके अलावा, शहर के संपर्क से आदिवासी समाज में आ रहे बदलावों, जो नकारात्मक ज़्यादा हैं, इनको भी इस किताब में कहानियों के ज़रिए बखूबी दर्शाया गया है।
हालांकि आज के समय में आदिवासी समाज शिक्षित हो रहा है। लेकिन अक्सर मुख्यधारा के समाज में रोज़गार के लिए जिस तरह के कौशल चाहिए होते हैं, इस शिक्षा से उनमें उन कौशलों का विकास नहीं हो पा रहा है। ऐसे में न तो वे खेती-बाड़ी ही सम्भाल पा रहे हैं और न ही उन्हें नौकरी मिल रही हैं। इससे उनमें रोष पनप रहा है। किताब की अलग-अलग कहानियां आदिवासी समाज में मौजूद अलग-अलग समस्याओं पर नज़र डालती हैं। कुछ कहानियां यह सवाल भी उठाती हैं, कि किस तरह से जब तक महिला पुरुष की मार और हिंसा सहती रहती है, तब तक समाज को कोई आपत्ति नहीं होती है। लेकिन जब महिला हिंसा का विरोध करती है, तब उसे चरित्रहीन मान लिया जाता है। उसे लेकर इस तरह की अफवाहें भी फैलने लगती हैं कि ज़रूर किसी दूसरे मर्द से उसका रिश्ता है और इसीलिए वह ऐसा कर रही है।
जसिंता केरकेट्टा झारखण्ड की युवा कवि, कहानीकार, समाजसेवी और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे अपनी कविताओं और कहानियों में आदिवासियों के मुद्दों को बड़ी ही संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती हैं। वैसे तो वे अपनी कविताओं के लिए ज़्यादा मशहूर हैं, लेकिन हाल ही में उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है औरत का घर।
आखिर औरत का घर कहां है?
किताब एक ऐसा अहम सवाल उठाती है, जिससे न सिर्फ आदिवासी महिलाएं, बल्कि हर एक महिला खुद को जोड़ पाएगी। सवाल यह है कि आखिर औरत का घर कहाँ है? देखा जाए तो मुख्यधारा के समाज में भी लड़कियों को बचपन से यही शिक्षा दी जाती है कि उनके पति का घर ही उनका असल घर होगा। जबकि पति के घर में भी न तो उनको सम्पत्ति का अधिकार मिलता है और न ही वह मान-सम्मान जिसकी वे हकदार हैं। जसिंता लिखती हैं कि झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय में एक रिवाज़ ऐसा है, जिसके तहत पुरुष सदस्य के मरने के बाद उसकी आत्मा को घर वापस लाया जाता है। एक कमरा दिया जाता है और उस कमरे में पुरखों का निवास माना जाता है।
जबकि महिलाओं के मामले में वे ऐसा नहीं करते। महिलाओं की आत्मा को वे रस्म-रिवाज़ करके वापस मायके भेज देते हैं। मायके वाले भी आत्मा को घर न ले जाकर बीच रास्ते में कहीं छोड़ देते हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि जीते जी तो महिला का कोई घर नहीं होता है। लेकिन मरने के बाद भी उसे घर नसीब नहीं होता है। इस तरह, ‘औरत का घर’ कहानी, जो इस किताब का शीर्षक भी है, सवाल उठाती है कि महिला चाहे अविवाहित हो या विवाहित उसे घर कहीं नहीं मिलता, हर जगह उसका केवल इस्तेमाल होता है। किसी और समाज की तरह ही आदिवासी समाज में भी महिलाओं से यही अपेक्षित होता है, कि वे घर-परिवार की जिम्मेदारियां तो निभाएं। लेकिन अपने अधिकारों की बात न करें।
झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय में एक रिवाज़ ऐसा है, जिसके तहत पुरुष सदस्य के मरने के बाद उसकी आत्मा को घर वापस लाया जाता है। एक कमरा दिया जाता है और उस कमरे में पुरखों का निवास माना जाता है। जबकि महिलाओं के मामले में वे ऐसा नहीं करते। महिलाओं की आत्मा को वे रस्म-रिवाज़ करके वापस मायके भेज देते हैं।
रंगभेद से लेकर ऑनर किलिंग तक
आदिवासी समाज में पहले से जो समस्याएं थीं, वो तो थीं ही। लेकिन अब कुछ नई समस्याएं भी शामिल होती जा रही हैं। खासतौर पर ‘काली’ नामक कहानी इस मुद्दे को उठाती है, कि किस तरह से शहरों की तरह आदिवासियों में भी रंग को लेकर भेदभाव बढ़ने लगा है ,और गोरी लड़कियों को ज़्यादा तवज्जो दी जाने लगी है।इस कहानी का केंद्र एक लड़की है। वहीं ‘मंझर’ कहानी में कहानी का पात्र एक लड़का है, जिसे उसके काले रंग की वजह से कोई नहीं अपनाता। ‘रेशमा’ और ‘फीस’ कहानियां बलात्कार के मुद्दे को उठाती हैं। ‘रेशमा’ कहानी में बलात्कारी घर का ही होता है और पूरा परिवार और समाज इस बात को यह कहकर छुपाता है कि इससे गाँव की ही बदनामी होगी। बलात्कारी पूरी तरह आज़ाद घूमते हैं, उलटा समाज लड़की के ही चरित्र पर सवाल उठाने लगता है।
कुछ कहानियां इस मुद्दे को भी छूती हैं कि किस तरह से शादी के बाद किसी महिला को शादी में रहने के लिए मजबूर किया जाता है, भले ही वह कितना भी संघर्षपूर्ण क्यों न हो। इसके अलावा ‘अन्तिम वार’ कहानी विवाहेतर यानी शादी के बाहर किसी अन्य व्यक्ति से जुड़े संबंधों के मुद्दे पर बात करती है। आदिवासी समाज में पहले विवाहेतर संबंध इतना बड़ा मसला नहीं थे। लेकिन मुख्यधारा के समाज से संपर्क की वजह से अब वहां भी ये खून-खराबे की वजह बन रहे हैं। जैसा कि इस कहानी में एक महिला का पति विवाहेतर संबंध के शक में उसकी हत्या कर देता है। इसी तरह ‘जईतबोरा’ कहानी साफ तौर पर दिखाती है कि किस तरह से आदिवासी समाज में भी शादी से पहले लड़के-लड़कियों के संबंधों पर रोक लगाने की कोशिश की जाने लगी है, जबकि पहले इसे नैसर्गिक माना जाता था।
‘रेशमा’ कहानी में बलात्कारी घर का ही होता है और पूरा परिवार और समाज इस बात को यह कहकर छुपाता है कि इससे गाँव की ही बदनामी होगी। बलात्कारी पूरी तरह आज़ाद घूमते हैं, उलटा समाज लड़की के ही चरित्र पर सवाल उठाने लगता है।
हताशा और आशा की किताब
यह किताब आदिवासियों के मुद्दों को दर्शाने वाली हिन्दी भाषा में लिखी गई एक बेहतरीन और संवेदनशील किताब है। कहानी के संवाद बहुत सहज हैं। यह न सिर्फ आदिवासी समाज, बल्कि मुख्यधारा के समाज के लिए भी अपनी खामियों पर नज़र डालने का और आत्मचिंतन का एक मौका है। किताब की भाषा सरल है और मुद्दों को कहानियों के रूप से प्रस्तुति से वे पढ़ने में काफी दिलचस्प हो जाते हैं। किताब आपको बांधे रखेंगी और सोचने पर मजबूर करेगी। कुछ कहानियां एक उम्मीद की किरण भी जगाती हैं और चीज़ों को एक नए नज़रिए से सोचने का मौका देती हैं। इन्हें पढ़कर आप एक किस्म की शांति और तसल्ली महसूस करेंगे। ‘रिश्ता’ ऐसी ही कहानी है, जो महिला और पुरुष के संबंधों को सही-गलत से परे देखने का एक मौका देती है। ‘खेतों में उग रहे भगवान’ कहानी शादी संस्था पर सवाल उठाती है और साथ ही शादी में रहते हुए भी महिला और पुरुष की आत्मनिर्भरता की बात करती है।
इसी तरह से ‘सहयात्री’ कहानी भी रिश्तों पर, पुरुषों की सामाजिक कंडीशनिंग पर एक नए सिरे से सोचने का नज़रिया पेश करती है, ताकि रिश्ते नियंत्रण का ज़रिया न बन जाएं। इसके अलावा कुछ कहानियां ऐसी भी हैं, जिनमें आदिवासी समाज के लोग मिलकर बातचीत करके किसी समस्या का हल निकालते हैं। ये दिखाती हैं कि किस तरह से आदिवासी समाज एक लचीला समाज है, जो बदलाव के लिए तैयार है। इसमें महिलाओं के प्रतिरोध, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने और उससे बाहर निकलने का रास्ता बनाने की कहानियां भी हैं। इस तरह से इस संकलन की कहानियां हताशा और आशा को संतुलित करते हुए इसे एक परिपूर्ण संग्रह बनाती हैं। ‘औरत का घर’ आदिवासी महिलाओं के जीवन, संघर्ष और प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह किताब दिखाती है कि पितृसत्ता और भेदभाव से आदिवासी समाज भी अछूता नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यही उभरता है कि एक महिला का अपना घर आखिर कहां है? कहानियां केवल समस्याएं नहीं बतातीं, बल्कि बदलाव और उम्मीद की संभावना भी जगाती हैं।

