संस्कृतिकिताबें मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘फरिश्ते निकले’ और बेला बहू का संघर्ष और स्त्री चेतना

मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘फरिश्ते निकले’ और बेला बहू का संघर्ष और स्त्री चेतना

बेला समझती है कि जब उसकी माँ खुद अपने बल पर सब संभाल रही थीं, तो किसी और की मदद की क्या जरूरत थी। वह सोचती है कि जिसकी ढाल खुद्दारी और आत्मसम्मान हो, वह किसी दूसरे के सहारे क्यों जिए?

हर कहानी कुछ नया बुनती है और समाज की कई परतों को खोलती है। वह पाठकों को समाज के उन अनदेखे पहलुओं से रूबरू कराती है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे ही संदर्भों से भरा उपन्यास है मैत्रेयी पुष्पा का लिखा उपन्यास ‘फरिश्ते निकले’। यह उपन्यास समाज के कई ऐसे पहलुओं को सामने लाता है, जो हमारे सोचने के तरीके को बदल देते हैं। यह कहानी एक बड़ा सवाल उठाती है कि असल में फरिश्ता कौन है? हम किन लोगों को समाज का अहम हिस्सा मानते हैं और किसे नजरअंदाज कर देते हैं?

सच में वही साहित्य प्रभावशाली होता है, जो पाठकों के मन पर अपनी छाप छोड़ दे और कुछ गहरे सवाल खड़े कर दे। इस उपन्यास का मुख्य केंद्र बेला बहू है। वह शोषण और साजिशों का सामना करती है, लेकिन हालात के आगे हार नहीं मानती। वह खुद को परिस्थितियों के नाम पर कुर्बान नहीं करती, बल्कि उनसे लड़ती है और स्त्री चेतना की आवाज बनकर उभरती है। यह उपन्यास ग्रामीण जीवन की कड़वी सच्चाई और वहां की महिलाओं के संघर्षों को सच्चाई के साथ दिखाता है।

बेला समझती है कि जब उसकी माँ खुद अपने बल पर सब संभाल रही थीं, तो किसी और की मदद की क्या जरूरत थी। वह सोचती है कि जिसकी ढाल खुद्दारी और आत्मसम्मान हो, वह किसी दूसरे के सहारे क्यों जिए?

यह उपन्यास अलग-अलग अध्यायों में लिखा गया है। कहानी 11 साल की बेला के बचपन से शुरू होती है। उसके पिता की मृत्यु हो जाती है और घर में कई सामाजिक और आर्थिक समस्याएं आ जाती हैं। बेला की माँ शुरू में मेहनत करके अपना जीवन चलाती हैं और सम्मान के साथ रहती हैं। लेकिन गांव के ही शुगर सिंह की मदद मिलने के बाद वे उस पर निर्भर होने लगती हैं। बेला समझती है कि जब उसकी माँ खुद अपने बल पर सब संभाल रही थीं, तो किसी और की मदद की क्या जरूरत थी। वह सोचती है कि जिसकी ढाल खुद्दारी और आत्मसम्मान हो, वह किसी दूसरे के सहारे क्यों जिए?

उसके मन में सवाल उठता है कि क्या औरत के लिए आत्मसम्मान से ज्यादा आराम और सुविधा का आकर्षण बड़ा हो जाता है? हालात ऐसे बनते हैं कि खेलते-खेलते ही बेला की सगाई उससे बहुत बड़े उम्र के शुगर सिंह से कर दी जाती है। बेला इसका विरोध करती है और कुछ समय के लिए शादी टल जाती है, लेकिन आखिरकार उसे शादी करनी पड़ती है। 13 साल की बेला, ‘बेला’ से ‘बेला बहू’ बन जाती है। यह बदलाव उसके लिए बहुत दुखद और पीड़ादायक है। छोटी सी उम्र में ही उसे शारीरिक और मानसिक तकलीफें सहनी पड़ती हैं।

जय सिंह पूछता है, “क्या सभी पुरुषों को मार देना चाहिए?” बेला जवाब देती है, “नहीं, वे इस समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। इस समाज के निर्माण में उनकी भी भागीदारी है। हमें नई पीढ़ी को सही सीख देनी होगी।”

औरत की पहचान तय करता समाज

माँ न बन पाने के कारण समाज उसे अपमानित करता है। यह उसके लिए बहुत दर्दनाक था, क्योंकि वह जानती थी कि उसमें कोई कमी नहीं है। वह हर हाल में यह साबित करना चाहती थी कि वह अधूरी नहीं है। समाज में अक्सर उसी स्त्री को पूर्ण माना जाता है जो माँ बन सके। जैसे औरत की अपनी कोई पहचान ही नहीं है। वह बेटी बनकर जन्म लेती है और माँ बनकर ही उसकी पहचान तय कर दी जाती है। शुगर सिंह के डॉक्टर भारत सिंह की ओर बेला का झुकाव बढ़ने लगता है। जब शुगर सिंह संतान के लिए दूसरी शादी की योजना बनाता है, तो बेला अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए घर छोड़ने का फैसला करती है और भारत सिंह के गांव चली जाती है।

समाज में भारत सिंह की छवि एक सज्जन और आदर्श व्यक्ति की है, लेकिन भीतर से वह कैसा है, यह कोई नहीं जानता। बेला उसके प्रेम में पड़ जाती है, पर उसे इसका बहुत बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है। भारत सिंह के चारों भाइयों द्वारा उसका शोषण होता है। बचपन से द्रौपदी, कैकेयी और मीरा जैसी स्त्रियों की कहानियां सुनते हुए बड़ी हुई बेला खुद को समझाती है कि जब द्रौपदी ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और मीरा ने प्रेम में दुख सहे, तो वह भी सह सकती है। आज भी कई लड़कियां और औरतें त्याग और बलिदान की ऐसी कहानियां सुनकर अपने दर्द को चुपचाप सह लेती हैं। यह संदर्भ हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हमें नई कहानियों की जरूरत है।

समाज में भारत सिंह की छवि एक सज्जन और आदर्श व्यक्ति की है, लेकिन भीतर से वह कैसा है, यह कोई नहीं जानता। बेला उसके प्रेम में पड़ जाती है, पर उसे इसका बहुत बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है।

ऐसी कहानियां जो बेटियों को अपने साहस और आत्मसम्मान की पहचान कराएँ, न कि उन्हें केवल सहने और चुप रहने की सीख दें। इन सब तकलीफों को सहने के बाद जब राजनेताओं को खुश करने के लिए बेला को उनके सामने गुड़िया की तरह पेश किया जाता है, तो वह अब और अधीर हो उठती है। इसी समय वह अपने लिए न्याय लेती है। मौका मिलते ही वह उन पांचों की हत्या कर देती है और अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को रोकती है। लेखिका इस घटना को ‘दूसरे लाक्षागृह’ का नाम देती हैं। यह घटना यह दिखाती है कि लड़कियां कमजोर नहीं होतीं; वे केवल अपनी सहनशीलता और धैर्य से बहुत कुछ सह जाती हैं। स्वाभिमान और स्वतंत्रता के साथ जीना कठिन जरूर होता है, लेकिन असंभव नहीं। वही निर्भरता हमारी आवाज़ छीन लेती है और हमारे हाथ-पैर बंधा देती है। हमें अपनी रक्षा के लिए किसी पुरुष पर निर्भर होने की जरूरत नहीं है।

बेला का यह सवाल भी बिल्कुल जायज है। पाँचों की हत्या के जुर्म में बेला को जेल हो जाती है। जेल में वह फूलन देवी से मिलती हैं। फूलन देवी के साथ हुई बातचीत बेला के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती है। जब वह जेल से बाहर आती है, तो वह डाकुओं के एक समूह के साथ रहने लगती है। अपने जीवन के अनुभवों और पुरुषप्रधान समाज में देखी गई विसंगतियों के आधार पर बेला अजय सिंह, जो डाकुओं का सरगना है, से कहती हैं, “दाऊ, जब खेतों में फसल सड़ने लगती है, तो कीटनाशक डालकर उसे खत्म किया जाता है। अगर ज्यादा खराब हो तो पूरी फसल नष्ट करनी पड़ती है।” अजय सिंह पूछता है, “क्या सभी पुरुषों को मार देना चाहिए?” बेला जवाब देती है, “नहीं, वे इस समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। इस समाज के निर्माण में उनकी भी भागीदारी है। हमें नई पीढ़ी को सही सीख देनी होगी।”

जेल में वह फूलन देवी से मिलती हैं। फूलन देवी के साथ हुई बातचीत बेला के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती है। जब वह जेल से बाहर आती है, तो वह डाकुओं के एक समूह के साथ रहने लगती है।

लेखिका के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है। बदलाव समाज में उचित मूल्य और विचार स्थापित करने के लिए आवश्यक है। लेखिका ने बेला के मनोभाव और तार्किक क्षमता को बहुत बारीकी से दिखाया है। यह बताती है कि गांव में रहने वाली महिलाएँ भी बुद्धिमान होती हैं। अपने जीवन के अनुभवों और उपहास झेलते हुए भी, बेला किसी उच्च शिक्षा प्राप्त महिला से कम नहीं है। अपनी कहानी बताते हुए बेला कहती है—“वक़्त सब सिखा देता है, बिन्नु।” उपन्यास फरिश्ते निकले समाज की कठोर सच्चाइयों और ग्रामीण महिलाओं के संघर्ष को उजागर करता है।

बेला बहू के जीवन के माध्यम से यह दिखाया गया है कि महिलाएं कमजोर नहीं होतीं; वे परिस्थितियों के सामने सहनशीलता और धैर्य दिखाती हैं। यह उपन्यास पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि समाज में महिलाओं के अधिकार, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता कितनी महत्वपूर्ण हैं। बेला का संघर्ष, उसका साहस और उसकी बुद्धिमत्ता यह संदेश देती हैं कि किसी भी प्रकार की निर्भरता महिलाओं की आवाज़ को दबा सकती है, लेकिन अपने आत्मविश्वास और समझ से वे हर परिस्थिति का सामना कर सकती हैं। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि समाज में बदलाव और नई सोच की आवश्यकता है। नई पीढ़ी को यह सिखाना चाहिए कि सहना या चुप रहना ही स्त्रीत्व नहीं है; अपने अधिकार और सम्मान के लिए लड़ना भी स्त्रीत्व की पहचान है।

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