इंटरसेक्शनलजेंडर डिजिटल आज़ादी के बीच पितृसत्ता और जातिगत हिंसा का विस्तार

डिजिटल आज़ादी के बीच पितृसत्ता और जातिगत हिंसा का विस्तार

एक वक्त था, जब इंटरनेट सीमित ही मिलता था और इसका इस्तेमाल बहुत जरूरी कामों के लिए किया जाता था। लेकिन आज लोगों के लिए इंटरनेट की अधिक उपलब्धता ने ऑनलाइन मंच को हिंसा के रूप में बदल दिया है, बल्कि इसका इस्तेमाल व्यक्ति को धमकी देने और गरिमा को भंग करने के लिए किया जाने लगा है।

ऑनलाइन या सोशल मीडिया के माध्यम से किसी के साथ जाति, जेंडरऔर वर्ग आधारित हिंसा करना आज के दौर में एक आम बात बन गई है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोगों के लिए अपनी बात रखने, अपनी आवाज उठाने, संगठित होने का मंच बनकर सामने आया है, तो वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन होने वाली हिंसा में इजाफा देखा जा रहा है, जो हिंसा का एक नया रूप है। इस तक पहुंच बनाना बहुत आसान है, वहां अपनी पहचान आसानी से छुपाई जा सकती है, जिसके लिए आपको न तो बहुत जानकारी की ज़रूरत है और न ही किसी की मदद की। इसके माध्यम से बिना नाम के या दूसरे नाम से अनजान प्रोफाइल बना कर किसी को भी टारगेट करना आसान है। इस तरह की प्रोफाइल ज्यादातर बिना किसी पहचान के बनी होती हैं और कुछ प्रोफाइल के बायो में, हिन्दू, ब्राह्मण,राजपूत जैसे नाम होते हैं, जिसमें खासकर महिलाओं और लड़कियों को जाति और धर्म के नाम पर निशाना बनाया जाता है। 

एक वक्त था, जब इंटरनेट सीमित ही मिलता था और इसका इस्तेमाल बहुत जरूरी कामों के लिए किया जाता था। लेकिन आज लोगों के लिए नेट की अधिक उपलब्धता ने ऑनलाइन मंच को हिंसा के रूप में बदल दिया है, बल्कि उसका इस्तेमाल व्यक्ति को धमकी देने और गरिमा को भंग करने के लिए किया जाता है। जो हिंसा का एक आम रूप बन गया है। आज बहस स्क्रीन के सामने होती है। बहुत बार यह पता नहीं होता है कि स्क्रीन के पीछे किससे बात कर रहे हैं। वह कौन है, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। रॉयटर्स में छपे, साल 2023 में एस्या सेंटर नामक शोध के अनुसार, सोशल मीडिया भारतीयों के दैनिक उपयोग में सबसे आगे है, और ऐसे ऐप्स पर लोग औसतन 3.2 घंटे प्रतिदिन व्यतीत करते हैं। इसके अलावा भारत में साल 2024 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 14 से 16 साल की उम्र के लगभग 90 फीसदी बच्चे स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे थे। हालांकि अब यह संख्या और बढ़ चुकी होगी।

ऑनलाइन या सोशल मीडिया के माध्यम से किसी के साथ जाति, जेंडर और वर्ग आधारित हिंसा करना आज के दौर में एक आम बात बन गई है।ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोगों के लिए अपनी बात रखने ,अपनी आवाज उठाने, संगठित होने का मंच बनकर सामने आया है, तो वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन होने वाली हिंसा में इजाफा देखा जा रहा है, जो हिंसा का एक नया रूप है।

डिजिटल युग में जातिगत हिंसा 

भारत में जाति एक सच है, जो अब प्रत्यक्ष सामने न आकर अलग-अलग परतों में सामने खुलती है। आजकल डिजिटल दुनिया के दौर में लोग किसी को सीधा जाति के नाम से निशाना बनाने को लेकर परहेज करते हैं। लेकिन डिजिटल प्लेटफोर्म में जाति को अलग रूपों में देखा जा सकता है। इस विषय पर पिथौरागढ़ के एक कॉलेज की छात्रा एकता बताती हैं, “मैंने सीधे तौर पर ऑनलाइन हिंसा का सामना नहीं किया है, जहां कोई सीधा जाति सूचक शब्द सुनने को मिलें। लेकिन लोग यहां भी जाति देखकर फॉलो करते हैं। अगर ऑनलाइन किसी से बात होती है, तो वह पहले उपनाम पूछते हैं। क्योंकि हमारे समाज के लोगों की रुढ़िवादी मानसिकता ऐसी बन चुकी है, जिसमें वह दूसरों का उपनाम जानना जरूरी समझते हैं। यह भेदभाव इतना है कि आजकल कोई लड़का-लडकी रिश्ते में आने से पहले भी जाति पूछते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी ही जाति की लड़की चाहिए होती है। समाज का डर इस कदर हावी हो चुका है कि वह खुद कोई चुनौती लेने के लिए तैयार नहीं हैं।”

सोच वही है और हिंसा भी वही है। फर्क वस इतना है कि अब स्थान अलग हो गया है, रॉयटर्स में छपे डेटा रिपोर्टल नामक शोध के अनुसार, भारत में 500 मिलियन लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं।इसके साथ ही भारत में यूट्यूब उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन, फेसबुक की 403 मिलियन, इंस्टाग्राम की 481 मिलियन और स्नैपचैट की 213 मिलियन है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रति उपयोगकर्ता औसत मासिक डेटा खपत साल 2025 में 399 गुना बढ़कर लगभग 24 गीगाबाइट हो गई थी, जो कि साल 2014 में 62 मेगाबाइट थी और दुनिया में सबसे अधिक खपत में से एक थी। बहुत से लोग अपनी आम दिनचर्या साझा करते हैं, जिनमें कुछ ही समय में अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचाते है।एक तरफ जहां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोगों की आवाज बनकर उभरा है। उन लोगों को भी अपनी बात कहने का मौका मिला है, जिनकी पहुंच से ऐसे मंच दूर रहे हैं। उन लोगों तक भी इंटरनेट की आसान पहुंच ने एक तरफ जहां जिंदगी आसान बनाई है, वहीं दूसरी तरफ हिंसा करने वालों के लिए खुले रास्ते भी अख्तियार किए हैं। यहां महिला विरोधी, धर्म विरोधी, जाति विरोधी कंटेंट बनाने वालों की कमी नहीं है, जो अपनी नफरत और पूर्वाग्रहों के आधार पर नफरत फैलाते हैं। 

अगर ऑनलाइन किसी से बात होती है, तो वह पहले उपनाम पूछते हैं। क्योंकि हमारे समाज के लोगों की रुढ़िवादी मानसिकता ऐसी बन चुकी है, जिसमें वह दूसरों का उपनाम जानना जरूरी समझते हैं। यह भेदभाव इतना है कि आजकल कोई लड़का-लडकी रिश्ते में आने से पहले भी जाति पूछते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी ही जाति की लड़की चाहिए होती है।

स्त्री-विरोध कंटेन्ट और शरीर पर नियंत्रण

समाज ने महिलाओं को बराबर की भूमिका में अब तक स्वीकार नहीं किया है। यह सच है कि, आज जहां व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, जैसे न जाने कितने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं, जिनमें कुछ विचारक अपने विचार साझा करते हैं। अच्छी पोस्ट ,समाज को जागरूक करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ एक ऐसे लोगों की फौज बन कर तैयार हो रही है, जो बिना किसी तर्क, सोचविचार और तथ्य के अपनी बात साझा कर रहे हैं। इनके लिए सामाजिक जिम्मेदारी जैसी कोई चीज नहीं है। यह अपनी बात कहने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। इसके अलावा सोशल मीडिया के जरिए भी एक ऐसी महिला की छवि पेश करने की कोशिश की जा रही है, जो संस्कारों से भरी हो।

 इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार, भारत में 30 फीसदी महिलाएं शारीरिक यौन हिंसा का सामना करती हैं, जो बताता है कि महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। इसके अलावा, सोशल मिडिया में महिलाओं को सेक्सुअली कॉमेंट्स किए जाते हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक, बीते दिनों एक तेलुगु अभिनेत्री ने साइबरबाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और उन्होंने आरोप लगाया कि कई टेलीविजन एंकरों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों और यूट्यूब चैनलों ने अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए उनके शरीर का घृणित और अपमानजनक तरीके से वर्णन किया और एआई की निर्मित अश्लील सामग्री भी पोस्ट की, जिससे कई प्लेटफार्मों पर उनकों हिंसा का सामना करना पड़ा। यह बताता है कि महिलाओं के लिए ऑनलाइन स्पेस भी सुरक्षित नहीं रहा है, जहां उनकी शक्ल पहनावे ,शरीर की बनावट को लेकर खुले आम कमेंट्स लिखे जा रहे हैं।

लोग बहुत सेक्सुअल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो सुनने में भी रूह हिला देते हैं। जब भी मैं अपना इंस्टाग्राम अकाउंट देखती हूं, जहां कोई लड़की थोड़ा अपनी पसंद के कपड़े पहनकर वीडियो पोस्ट करती है, तो बहुत नकारात्मक कमेंट्स उनकी पोस्ट में होते हैं। इसलिए मेरे अंदर भी यह डर अक्सर बना रहता है, कि कौन से कपड़े पहनकर वीडियो बनाना चाहिए और कौन से नहीं।

कानून और जवाबदेही की ज़रूरत

सोशल मीडिया में कंपनियों ने जो नियम बनाए हैं, ये बहुत सीमित है, जिस कारण ऑनलाइन कॉमेंट्स करने वालों की पहचान करना कठिन है। बस ब्लॉक और रिपोर्ट का ऑप्शन दिया गया है, जो पर्याप्त नहीं है। इस विषय पर पिथौरागढ़ कॉलेज में पढ़ रही प्रियंका बताती हैं, “मेरा अकाउंट प्राइवेट है, क्योंकि मैं नहीं चाहती किसी तरह के कॉमेंट्स और मैसेज मेरे फोन में आएं, क्योंकि सार्वजनिक करने में एक तरह डर बना रहता है। लोग बहुत सेक्सुअल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो सुनने में भी रूह हिला देते हैं। जब भी मैं अपना इंस्टाग्राम अकाउंट देखती हूं, जहां कोई लड़की थोड़ा अपनी पसंद के कपड़े पहनकर वीडियो पोस्ट करती है, तो बहुत नकारात्मक कमेंट्स उनकी पोस्ट में होते हैं। इसलिए मेरे अंदर भी यह डर अक्सर बना रहता है, कि कौन से कपड़े पहनकर वीडियो बनाना चाहिए और कौन से नहीं।” 

द हिंदू में छपी एक खबर के अनुसार, महिलाएं अपने खिलाफ होने वाली हिंसा में शर्मिंदगी और डर के कारण चुप रहती हैं। इसके साथ ही ज्यादातर महिलाएं इस तरह की हिंसा को नजरअंदाज करती हैं या तो ऐसे अकाउंट को ब्लॉक कर देती हैं। लेकिन अब ज़रूरत है कि टेक कम्पनियां महिला सुरक्षा को लेकर कानून बनाए, इस तरह के कंटेंट को जल्द हटाने को लेकर, और टेक कंपनी की जवाबदेही को लेकर, जो आज के दौर के लिए बहुत जरूरी कदम है। इसके बिना चंद सेकंड में फैलने वाली नफरत को नहीं रोका जा सकता है। खासकर जब निशाना किसी खास वर्ग विशेष को बनाया जा रहा हो। सोशल मीडिया के दौर में जहां पितृसत्तात्मक ,रूढ़िवादी, जातिवादी सोच के लिए जागरूकता फैलाई जा सकती थी, तब इस तरह की लहर चल रही है कि कैसे अपने से कम वर्ग को आसानी से निशाना बनाया जाए। यह आज एक संवेदनशील विषय है, जिसको लेकर जागरूकता फैलाएं जाने की जरूरत है। ऑनलाइन हिंसा के विरुद्ध मजबूत कानून लाकर ही इस हिंसा का सामना किया जा सकता है। नहीं तो मानवीय संवेदना डिजिटल प्लेटफार्म के जरिए हाशिए में आ जाएगी, जो कि एक चिंताजनक विषय है।

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content