इस किताब को पढ़ते हुए जो एक सवाल लगातार दिमाग में चलता रहा कि आखिर ये देश किसका है? क्या गरीब होना देश की नागरिकता से बेदखल होना है। यह एक ज़रूरी किताब है, जो देश और नागरिक जीवन की सच्चाइयों को कई स्तरों पर खोलती है। साथ ही, अपनी कहानी को मजबूत और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाती है। पूंजीपति और सत्ता में बैठे लोग मजदूरों को इंसान के तौर पर कम देखते हैं, उनसे ज्यादा काम लेना और कम से कम मजदूरी देना उनका एजेंडा होता है। वीरेन डंगवाल की कविता की पंक्ति है कि बेईमान सजे-बजे हैं, तो क्या हम मान लें कि बेईमानी भी एक सजावट है ? कातिल मज़े में हैं, तो क्या हम मान ले कि क़त्ल करना एक मज़ेदार काम है? मसला मनुष्य का है, तो हम हरगिज़ नहीं मानेंगे कि मसले जाने के लिए ही बचा है मनुष्य।
‘कोई एक सईदा’ किताब खासतौर पर विस्थापित महिला मजदूरों के जीवन पर आधारित है, जो गरीब होने के साथ महिला होने के दंश को झेलने के लिए भी मजबूर हैं। इसमें ऐसे अनगिनत मनुष्यों का जीवन है, जिसे जानने के लिए किताब एक दृष्टि देती है। अंग्रेजी में प्रकाशित नेहा दीक्षित की बहुचर्चित-पुरस्कृत किताब ‘द मेनी लाइव्स ऑफ सैयदा एक्स’ का हिन्दी में अनुवाद प्रभात सिंह ने किया है, जो रूपांतरित होकर ‘कोई एक सईदा’ नाम से हिन्दी की दुनिया में दाखिल हुई है। समाज में वे कौन लोग हैं, जो दुनिया को अपनी पीठ पर खींच रहे हैं और कहीं दर्ज नहीं होते। एक दशक भर का गहरा शोध और लगभग नौ सौ लोगों के साक्षात्कारों के बाद लिखी गई। इस किताब में हाशिए पर चलते अरबों लोगों का जीवन ही नहीं बल्कि समकालीन इतिहास का दस्तावेज भी है।
‘कोई एक सईदा’ किताब खासतौर पर विस्थापित महिला मजदूरों के जीवन पर आधारित है, जो गरीब होने के साथ महिला होने के दंश को झेलने के लिए भी मजबूर हैं। इसमें ऐसे अनगिनत मनुष्यों का जीवन है, जिसे जानने के लिए किताब एक दृष्टि देती है।
हाशिए की आवाज़ें और सत्ता का दबाव
इस किताब को जब नेहा लिख रही थी, तो उनको कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जब वो रिपोर्टिंग कर रही थी, तो उन्हें लगातार एसिड अटैक और बलात्कार की धमकियां मिल रही थीं, जिसकी उन्होंने पुलिस में शिकायत भी की। लेकिन पुलिस भी उन्हीं लोगों के साथ खड़ी दिखती थी, जो ताकत और पूंजी के प्रतिनिधि थे और धमकियां दे रहे थे। उन्होंने इस किताब पर काम करते हुए मजदूर महिलाओं के बीच बैठकर लंबी बातचीत की। उन्होंने सामूहिक चर्चाएं कीं, अनौपचारिक साक्षात्कार लिए, खुलकर बात की और साथ ही सुव्यवस्थित प्रश्नावली के माध्यम से भी उनकी बातें सुनीं, तो वे सारी मजदूर महिलाएं उन्हें बहनापे की दृष्टि से देखने लगीं। नेहा लिखती हैं कि उनकी इस प्रतिक्रिया ने न केवल मेरे विशेषाधिकार और अपने डर के बारे में ठहर कर सोचने की सहूलियत को रेखांकित किया, बल्कि उम्मीद को प्रतिरोध का हथियार बनाने की उनकी लगातार कोशिश भी जाहिर की।
इस किताब में उन्होंने एक साधारण और बेनाम भारतीय महिला की कहानी असाधारण ढंग से लिखी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के चलते हुए दंगों के बाद सईदा अपने छोटे बच्चों और पति के साथ बनारस को छोड़कर दिल्ली आ जाती है। एक ग़रीब विस्थापित मज़दूर के रूप में, वह दिल्ली में अनेक कामों को आज़माती है, जींस के धागों की तुरपाई से लेकर नमकीन बनाने तक, बादामों से गिरी निकालने से लेकर चाय की छलनी बनाने तक पचास से ज़्यादा काम, ताकि उसकी घरेलू ज़रूरतें पूरी होती रहें। ऐसे काम जिनमें एक दिन की छुट्टी लेने का मतलब है, काम से हाथ धो बैठना। अगर देखा जाए तो ये पूरी किताब बहुत से दुखों का कभी न खत्म होने वाला काफिला है, जहां व्यवस्था के पास इनके बस तरह-तरह के फरमान हैं। इन्हें कभी शरणार्थी के नाम पर कभी अल्पसंख्यक के नाम पर और हमेशा तो गरीब के नाम से ही जाना जाता है।
इस किताब को जब नेहा लिख रही थी, तो उनको कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जब वो रिपोर्टिंग कर रही थी, तो उन्हें लगातार एसिड अटैक और बलात्कार की धमकियां मिल रही थीं, जिसकी उन्होंने पुलिस में शिकायत भी की। लेकिन पुलिस भी उन्हीं लोगों के साथ खड़ी दिखती थी, जो ताकत और पूंजी के प्रतिनिधि थे और धमकियां दे रहे थे।
सईदा का संघर्ष और चुप्पी से नारे तक का सफर
इस किताब में एक जगह वह लिखती हैं कि कुछ जगहों पर, जहां लोग सोचते या यकीन करते हैं । वे भावनाएं और अनुभव उन्हीं लोगों ने उनसे साझा किया है। मजदूर आंदोलन और सईदा की भागीदारी बहुत अधिक समझदार और सुलझे लोग नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई । मजदूरों के आंदोलन में सईदा भी जाती है और हाथ में पोस्टर लेकर नारा लगाती है। हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। पहली बार सईदा किसी सामूहिक सामाजिक न्याय के आंदोलन का हिस्सा बनी थी, जहां कमजोरों के अधिकार के पक्ष में लोग नारे लगा रहे थे, गीत गा रहे थे, सईदा के लिए ये एकदम नई बात थी। वह याद करते हुए कहती है कि तब उसके बदन में जैसे किसी ने नई ऊर्जा भर दी हो। आंदोलन में शामिल होने के लिए बहुत सालों बाद सईदा ने अपने कपड़ों में इस्त्री की। मुंह पर बेसन मलकर नहाया और बालों को करीने से कंघी करके संवारा। इसी तरह सज धज कर। तमाम मजदूर महिलाएं आंदोलन में आईं थी। यह प्रतिरोध का मार्च उनके लिए एकदम नये त्योहार की तरह था। एक ऐसा त्योहार जो उन्होंने पहले के जीवन में कभी नहीं मनाया था।
हालांकि घर लौटने पर अधिकांश महिलाओं को सजा मिली लेकिन सईदा को महसूस हुआ कि ये आंदोलन जैसे उसके वजूद का कोई हिस्सा है, जिसे अब तक उसने छिपा रखा था जो अचानक जाग उठा था। दूसरे पतियों की तरह अकमल ने उसे कोसा भी नहीं और उसने सईदा के लिए खाने की थाली परोसी।अगले दिन 20 दिसंबर को मजदूरों की ऐतिहासिक रैली हुई, जिसमें मजदूर महिलाओं के साथ यूनिवर्सिटी के ढेरों छात्र डफली बजाते हुए नारा लगाते चल रहे थे। वे पूंजीवाद पर हल्ला बोल का नारा लगाते और मजदूर महिलाएं उसे दोहराती। हालांकि उन्हें पूंजीवाद शब्द का अर्थ नहीं पता था। लेकिन उन्हें उस आंदोलन में खड़े छात्रों पर भरोसा था। आंदोलन खत्म होने के बाद उसकी बेटी रेशमा ने उसको को ताना मारा कि इतना खून खराबा इतना शोर शराबा और थाना पुलिस के बाद, मजदूरी तुम सिर्फ 10 रुपये ही बढ़वा पाई हो। उसने गर्व से कहा हां इस तरह हर महीने 600 रुपये की आमदनी बढ़ती है, जिससे सब्जियां खरीद सकते हैं। दंगों में उजड़ते जीवन और महिलाओं की स्थिति बनारस से लेकर दिल्ली दंगो तक सईदा का जीवन न जाने कितनी बार उजड़ा था। लेकिन जो जीवन दंगो से उजड़ा उसकी भयावहता से रूह कांप जाती है। कोई भी त्रासदी हो, उसका पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कहीं ज्यादा सामना करना पड़ता है।
आंदोलन में शामिल होने के लिए बहुत सालों बाद सईदा ने अपने कपड़ों में इस्त्री की। मुंह पर बेसन मलकर नहाया और बालों को करीने से कंघी करके संवारा। इसी तरह सज धज कर। तमाम मजदूर महिलाएं आंदोलन में आईं थी। यह प्रतिरोध का मार्च उनके लिए एकदम नये त्योहार की तरह था। एक ऐसा त्योहार जो उन्होंने पहले के जीवन में कभी नहीं मनाया था।
छोटे हक़ की बड़ी लड़ाई
दिल्ली दंगे के अंत में कैंप जाने के लिए, जब सईदा घर से निकली तो अपनी बेटी रेशमा को अपने पीछे छुपाकर निकली। क्योंकि दंगो में महिलाओं से यौन-अपराध होना आम खबर थी। गुजरात दंगे में बिलकिस बानो और परिवार की अन्य महिलाओं के साथ हुई यौन हिंसा तो सामने आ ही गई। लेकिन न जाने ऐसे कितने अपराध होते हैं, दंगों के समय जिनका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं होता। यह वही समय था, जब कई बड़े मीडिया घराने जनता के पक्ष में खड़े होने की अपनी पुरानी परंपरा छोड़कर कॉरपोरेट हितों के साथ खड़े होने लगे थे। उन्होंने भूख, गरीबी, अशिक्षा, असमानता और भेदभाव जैसे ज़रूरी मुद्दों को पीछे कर दिया और उनकी जगह बाज़ार के सामान और कंपनियों का प्रचार करना शुरू कर दिया। दिल्ली में मॉल्स खुलने लगे, मजदूरों के शोषण की एक चमकदार जगह, जहां जितनी रोशनी है। अपने कामगारों के लिए उतना ही अंधेरा। इस किताब को पढ़ते हुए मुझे लगा कि दुनिया में अगर कोई मजदूरों की सच में चिंता करता है, तो वे लोग हैं, लाल झंडे वाले जो उनके हक़ की बात करते हैं। इसी उपन्यास के एक अंश में ललिता मजदूर आंदोलन के लिए कहती भी है कि अरे लाल झंडा वाले होंगें। उन्होंने इनके लोगों को भोजपुर में देखा है। इनके चक्कर में मत पड़ो नहीं तो हमारी नौकरी चली जाएगी। ऐसा नहीं था कि ललिता राजनीति और राजनीतिक दलों को बहुत जानती थी। लेकिन वह जानती थी कि बगावत या जिसे लोग क्रांति कहते हैं, उसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
ललिता मुसहर समुदाय की थी और बिहार के भोजपुर से आई थी, जहां उसने लाल झंडे वाले लोगों को भूमिहीनों के लिए लड़ते और मरते देखा था। उस वर्ग-संघर्ष की लड़ाई में उसने शहादतें देखी थीं। ललिता का परिवार जिस ज़मींदार के यहां बंधुआ मज़दूरी करता था, उसी परिवार के एक युवक ने उनकी मदद की। वह लड़का प्रगतिशील सोच रखता था और दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। उसी की कोशिशों से ललिता का परिवार गाँव से बाहर निकल सका। उसने उन्हें दिल्ली लाकर अपने घर में रहने की जगह दी और सहारा दिया। किताब में जितने स्त्री चरित्र दिखते हैं। सब की सब मेहनतकश और जुझारू महिलाएं हैं। वह हर जगह पुरुषों के बराबर ही काम कर रही हैं। लेकिन उन्हें मजदूरी पुरुषों से कम मिलती है। यह किताब घरेलू कामगारों के जीवन और उनके संघर्षों को बहुत अर्थपूर्ण और गहराई से समझाती है। इस किताब में सारे चरित्र सईदा के आसपास दिखते रहते हैं, सबके जीवन के संघर्ष अलग हैं। लेकिन उनका गरीब होना और महिला होने का दंश एक जैसा होता है। सईदा के साथ एक और त्रासदी जुड़ी थी कि वह एक अल्पसंख्यक समुदाय की महिला थी, जिसके लिए सत्ता नफरत की जमीन बना रही थी।

