यह एक ऐसा सफ़र है जहां हम अपने आप को, अपने साथियों को और समाज को समझते हैं। लेकिन जब किसी छात्र को अपनी बुनियादी ज़रूरत पूरी करने के लिए डर, असहजता या अलगाव महसूस करना पड़े, तो उसका शिक्षा का अनुभव अधूरा रह जाता है। अधिकतर शैक्षणिक संस्थानों में टॉयलेट्स सिर्फ़ ‘पुरुष’ और ‘महिला’ के नाम पर होते हैं। यह सिस जेंडर विद्यार्थियों को सुविधा देता है, लेकिन क्वीर, ट्रांसजेंडर और नॉन‑बाइनरी छात्रों को रोज़ाना कई बार डर, शर्म और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि आज जेन्डर‑न्यूट्रल टॉयलेट्स, यानी लैंगिक तटस्थ शौचालयों की मांग महज़ सुविधा नहीं, बल्कि मानवाधिकार, आत्म‑सम्मान और समावेशी समाज की मांग बन चुकी है। जेन्डर‑न्यूट्रल टॉयलेट वह जगह होती है जहां किसी भी पहचान वाले व्यक्ति को लैंगिक विभाजन के डर के बिना अपनी ज़रूरत पूरी करने का अधिकार मिलता है। इन टॉयलेट्स में पर्सनल स्टॉल, गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
इससे छात्रों को डर, घूरने या भेदभाव जैसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता। ये टॉयलेट्स सिर्फ़ सुविधा नहीं देते, बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि तुम यहां बराबरी के हक़दार हो। हमारे देश में लैंगिक विविधता को धीरे‑धीरे स्वीकार किया जा रहा है, लेकिन उच्च शिक्षा संस्थानों में लैंगिक तटस्थ सुविधाओं की स्थिति अभी भी सीमित है। नो स्पेस फॉर सम नामक शोध रिपोर्ट के अनुसार, 46 कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से जब पूछा गया कि क्या उनके परिसर में जेन्डर‑न्यूट्रल टॉयलेट मौजूद हैं, तो लगभग 55 प्रतिशत संस्थानों में ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। केवल लगभग 15 प्रतिशत संस्थानों में ही कुछ समावेशी टॉयलेट मिले। यह आंकड़ा दिखाता है कि अधिकांश संस्थानों में लैंगिक समावेशिता को बुनियादी ढांचे का हिस्सा नहीं बनाया गया है।
पहले वे पुरुष या महिला टॉयलेट का उपयोग करते समय असहज महसूस करते थे। उनके अनुसार, यह जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट उनकी ज़रूरतों को समझने और स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
क्या जेंडर नूट्रल टॉइलेट होना ही काफी है
जहां आंकड़ें एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं, वहीं कुछ पहलें सकारात्मक बदलाव की उम्मीद भी दिखाती है। कोलकाता की जदावपुर यूनिवर्सिटी ने साल 2023 में एलजीबीटीक्यूआईए+ विद्यार्थियों की लंबे समय से चली आ रही मांग पर अपने कैंपस के अंग्रेज़ी विभाग में एक जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट स्थापित किया। विद्यार्थियों ने इसे समुदाय के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना। वहां के एक छात्र संगठन से जुड़ी एक्टिविस्ट शिवदूती मंडल कहते हैं, “पहले वे पुरुष या महिला टॉयलेट का उपयोग करते समय असहज महसूस करते थे। उनके अनुसार, यह जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट उनकी ज़रूरतों को समझने और स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।” दूसरी ओर, कुछ संस्थानों में समावेशी टॉयलेट बनने के बाद भी उनके सही रखरखाव और उपयोग को लेकर समस्याएं सामने आती हैं। कई जगह टॉयलेट तो बनाए गए हैं, लेकिन उनकी साफ-सफाई, देखभाल या विद्यार्थियों के लिए उनकी आसान पहुंच सुनिश्चित नहीं हो पाती। इससे यह साफ होता है कि सिर्फ़ टॉयलेट बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनका सुरक्षित, साफ़-सुथरा और सभी के लिए सहज रूप से उपयोग योग्य होना भी उतना ही ज़रूरी है।
विद्यार्थियों से बातचीत और उनके अनुभवों से यह भी स्पष्ट होता है कि जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट्स की कमी केवल एक भौतिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान से भी जुड़ा मुद्दा है। राज (नाम बदला हुआ), जो एक ट्रांसजेंडर छात्र हैं, बताते हैं, “जब मुझे पुरुष या महिला टॉयलेट में से किसी एक को चुनना पड़ता है, तो मुझे डर और असहजता महसूस होता है। एक बार जब मैं पुरुष टॉयलेट में गया, तो कुछ छात्रों की टिप्पणियों ने मुझे इतना असुरक्षित महसूस कराया कि मैंने कई बार अपनी ज़रूरतों को टालने की कोशिश की। अगर जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट उपलब्ध होते, तो मैं रोज़-रोज़ के इस डर से कुछ राहत महसूस कर पाता।” साल 2014 के नालसा के ऐतिहासिक फैसले को 10 साल हो गए हैं, जिसमें भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पब्लिक टॉयलेट देने का निर्देश दिया था। तब से, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, मैसूर, चेन्नई, इंफाल और वाराणसी जैसे कई शहरों में ‘ट्रांसजेंडर टॉयलेट’ बनाए गए हैं। हालांकि, इन पहलों की पहुंच हर जगह नहीं है।
जब मुझे पुरुष या महिला टॉयलेट में से किसी एक को चुनना पड़ता है, तो मुझे डर और असहजता महसूस होता है। एक बार जब मैं पुरुष टॉयलेट में गया, तो कुछ छात्रों की टिप्पणियों ने मुझे इतना असुरक्षित महसूस कराया कि मैंने कई बार अपनी ज़रूरतों को टालने की कोशिश की।
नालसा के फैसले के बाद क्या आया बदलाव
सना, जो खुद को नॉन-बाइनरी पहचान के रूप में देखती हैं, बताती हैं, “टॉयलेट जाने के समय मुझे अक्सर समझ नहीं आता कि किस टॉयलेट का इस्तेमाल करें, क्योंकि पारंपरिक पुरुष-महिला विभाजन मेरी पहचान को स्वीकार नहीं करता है। अगर जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट हों, तो मैं बिना किसी डर या शर्म के अपनी ज़रूरत पूरी कर सकती हूं।” नालसा के फैसले के तीन साल बाद, साल 2017 में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने गाइडलाइंस जारी कीं, जिसमें कहा गया कि ‘थर्ड जेंडर’ के लोगों को अपनी पसंद के पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करने की इजाज़त होनी चाहिए, चाहे वे पुरुष हों या महिला या ‘अन्य’ जेंडर। हालांकि वास्तव में, ये धरातल पर नहीं होता। लैंगिक पहचान के आधार पर टॉयलेट की सीमाएं कई विद्यार्थियों के जीवन को हर दिन प्रभावित करती हैं।
साल 2014 के नालसा के ऐतिहासिक फैसले को 10 साल हो गए हैं, जिसमें भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पब्लिक टॉयलेट देने का निर्देश दिया था। तब से, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, मैसूर, चेन्नई, इंफाल और वाराणसी जैसे कई शहरों में ‘ट्रांसजेंडर टॉयलेट’ बनाए गए हैं। हालांकि, इन पहलों की पहुंच हर जगह नहीं है।
लैंगिक न्याय केवल महिलाओं के अधिकारों का सवाल नहीं है, बल्कि सभी लैंगिक पहचानों को सम्मान, सुरक्षा और बराबरी देने का मामला है। जब किसी व्यक्ति को अपनी सबसे बुनियादी ज़रूरत पूरी करते समय डर, शर्म या अलगाव महसूस हो, तो यह सिर्फ़ उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं होती। यह हमारे संस्थानों और समाज में मौजूद असमानता को भी दिखाती है। जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वे केवल शारीरिक ज़रूरत पूरी करने की जगह नहीं होते। वे एक सुरक्षित और समावेशी शैक्षणिक माहौल बनाने में मदद करते हैं, जहां लैंगिक विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी विद्यार्थियों को बराबरी का अवसर मिलता है। जब तक शैक्षणिक संस्थान इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक कई विद्यार्थी रोज़ डर, असहजता और अलगाव का अनुभव करते रहेंगे। इन समस्याओं का समाधान केवल टॉयलेट बना देने से नहीं होता।
इसके लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन को संवेदनशील नीतियां बनानी होंगी, विद्यार्थियों की बात सुननी होगी और सुरक्षित डिज़ाइन और नियमित रख- रखाव सुनिश्चित करना होगा। जिन संस्थानों में लैंगिक तटस्थ टॉयलेट बनाए गए हैं, वहां यह भी ज़रूरी है कि वे साफ़-सुथरे, सुरक्षित और सभी विद्यार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध हों। साथ ही, जागरूकता कार्यक्रम भी होने चाहिए ताकि छात्र समझ सकें कि लैंगिक समावेशिता सभी की गरिमा से जुड़ा मुद्दा है। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में 34 साल की ट्रांस-वुमन ग्रेस बानू सवाल करती हैं कि ट्रांस-मेन और क्वीयर लोगों का क्या? हमें अलग टॉयलेट की ज़रूरत नहीं है; हमें जेंडर-न्यूट्रल टॉयलेट चाहिए। इन स्कीम का असर बहुत कम होता है।
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में 34 साल की ट्रांस-वुमन ग्रेस बानू सवाल करती हैं कि ट्रांस-मेन और क्वीयर लोगों का क्या? हमें अलग टॉयलेट की ज़रूरत नहीं है; हमें जेंडर-न्यूट्रल टॉयलेट चाहिए। इन स्कीम का असर बहुत कम होता है।
हमारे समाज में जब न्यायालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी इस दिशा में कदम उठाते हैं, तो यह सकारात्मक संकेत देता है। उदाहरण के लिए, मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने परिसर में जेंडर नूट्रल टॉयलेट बनाए। यह कदम संविधान के सम्मान, समानता और भेदभाव-रहित समाज के मूल्यों को मजबूत करता है। ऐसे छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़े सामाजिक बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं। विद्यार्थियों के अनुभव, शोध के आंकड़ें और सामाजिक चर्चाएं एक ही बात की ओर इशारा करते हैं। लैंगिक आधार पर बने टॉयलेट कई बार उन लोगों की पहचान और गरिमा को अनदेखा कर देते हैं जो पारंपरिक पुरुष और महिला की श्रेणियों में फिट नहीं होते।
इससे कई विद्यार्थियों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में असहजता और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। जेन्डर-न्यूट्रल टॉयलेट केवल एक सुविधा नहीं हैं। वे सम्मान, समावेशिता और समानता के मूल सिद्धांतों को दिखाते हैं। ऐसे टॉयलेट यह संदेश देते हैं कि हर व्यक्ति की पहचान का सम्मान किया जाता है और सभी को बिना डर या शर्म के अपनी ज़रूरतें पूरी करने का अधिकार है। जब तक शैक्षणिक संस्थान इस दिशा में स्थायी और ठोस कदम नहीं उठाएंगे, तब तक हमारे कैंपस पूरी तरह सुरक्षित और स्वागतयोग्य नहीं बन पाएंगे। इसलिए ज़रूरी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसी नीतियां अपनाएं जो हर पहचान वाले छात्र के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करें।

