भारत में मजदूर आंदोलनों का इतिहास केवल मजदूरों के आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की लड़ाई की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, बराबरी और सम्मान के लिए किए गए लंबे संघर्ष का इतिहास भी है। भले ही इसमें महिलाओं की भूमिका अक्सर कम दिखाई देती है, जबकि असलियत तो यह है कि भारत की श्रम शक्ति का एक बड़ा हिस्सा हमेशा से महिलाएं रही हैं। चाहे वह खेतों में काम करने वाली महिलाएं हों, कपड़ा मिलों में काम करने वाली मजदूर महिलाएं, बीड़ी बनाने वाली मजदूर महिलाएं, घरेलू कामगार या फिर आज के दौर में स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही क्यों न हों, उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में अपना अहम योगदान दिया है। भले ही उसे अनदेखा ही क्यों न कर दिया गया हो। श्रम और रोजगार मंत्रालय की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 15 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में काम करने वाली महिलाओं का अनुपात (डब्ल्यूपीआर) साल 2023-24 में 40.3 फीसदी हो गया है। इससे साफ तौर पर देखा जा सकता है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। लेकिन इस भागीदारी के पीछे कई महिलाओं ने संघर्ष किया।
सी आर फाउंडेशन में साल 2021 में छपे एक लेख के मुताबिक, साल 1890 में 10,000 श्रमिकों का एक विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ। अन्य मांगों के साथ-साथ, कामकाजी महिलाओं ने प्रस्तावित साप्ताहिक अवकाश की मांग भी इसमें शामिल थी। इसके बाद पूरे देश में, हर मिल और हर क्षेत्र में यूनियनें गठित हुईं। बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाएं इन यूनियनों का अभिन्न अंग बन गईं। औद्योगीकरण वाले क्षेत्रों में महिलाओं ने बड़ी संख्या में काम किया। वहीं साल 1913 में, बंबई में कुल 1,10,033 श्रमिकों में से लगभग 22,402 महिला श्रमिक थीं, जो कुल कार्यबल का 20 फीसदी थीं। उन मिलों में हालात बेहद दयनीय थे। श्रम कानूनों के अभाव में मानव श्रम का अत्यधिक शोषण होता था।
साल 1913 में, बंबई में कुल 1,10,033 श्रमिकों में से लगभग 22,402 महिला श्रमिक थीं, जो कुल कार्यबल का 20 फीसदी थीं।उन मिलों में हालात बेहद दयनीय थे। श्रम कानूनों के अभाव में मानव श्रम का अत्यधिक शोषण होता था।
औपनिवेशिक भारत और महिला श्रमिकों की आवाज़
भारत में संगठित ट्रेड यूनियन आंदोलनों की शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में हुई। साल 1918 में मद्रास लेबर यूनियन भारत की पहली पंजीकृत यूनियन बनी। इस दौर में कपड़ा मिलों, तंबाकू उद्योग, चाय बागानों और घरेलू काम में बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती थीं, लेकिन उनकी मजदूरी कम और काम की परिस्थितियां बहुत जटिल थीं। उस समय कुछ महिला नेताओं ने श्रमिक आंदोलनों में अपनी भागीदारी निभाई और अधिकारों की मांग के लिए अपना योगदान दिया। उन्हीं में से एक थीं, अनसूया साराभाई जिन्हें भारत की पहली महिला ट्रेड यूनियन नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों को संगठित किया और महिलाओं को यूनियन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
साथ ही वंचित महिलाओं के साथ काम किया और स्थानीय मिल श्रमिकों के 36 घंटे के काम करने की शिफ्ट के बारे में जानने के बाद उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उन्होंने महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में मजदूर महिलाओं के लिए न्यूनतम वेतन और बेहतर कामकाजी स्थितियों की मांग की। इस हड़ताल से न केवल 35 फीसदी वेतन बढ़ोतरी हई, बल्कि मजदूर महिलाएं भी संगठित हुईं। इसके बाद साल 1920 में अखिल भारतीय व्यापार संघ कांग्रेस (एआईटीयूसी) की स्थापना हुई और इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर शामिल किया गया।
अनसूया साराभाई जिन्हें भारत की पहली महिला ट्रेड यूनियन नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों को संगठित किया और महिलाओं को यूनियन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। साथ ही वंचित महिलाओं के साथ काम किया और स्थानीय मिल श्रमिकों के 36 घंटे के काम करने की शिफ्ट के बारे में जानने के बाद उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
इस तरह बंगाल जैसे क्षेत्रों में, संतोष कुमारी देवी, डॉ. प्रभावती दास गुप्ता, सकीना बेगम और सुधा रॉय जैसी महिलाओं ने जूट मिलों और अन्य उद्योगों में महिलाओं को संगठित किया। वर्तमान में, जूट मिलों में बहुत कम महिलाएं कार्यरत हैं और उनमें से लगभग सभी दिहाड़ी मजदूर हैं। लेबर फाईल में छपे एक लेख के मुताबिक, स्वर्गीय कमलपति रॉय, जो बंगाल में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी)की एक शाखा की महासचिव थी, उन्होंने कहा था कि जूट मिलों में महिलाओं का एकमात्र काम सफाईकर्मी का है। कई बहाने बनाकर जूट उद्योग में महिलाओं को व्यावहारिक रूप से रोजगार से बाहर कर दिया गया है। उस समय ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बहुत कम थी।
आज़ादी के बाद कानून और अधिकारों की लड़ाई
साल 1947 में भारत को आज़ादी तो मिल गई। लेकिन कार्यस्थल पर महिलाओं की स्थिति में सुधार धीमा रहा। साल 1950-60 के दशक में, भाग्यम्मा जैसी दक्षिण भारतीय नेताओं ने कपड़ा और अन्य उद्योगों में महिलाओं को संगठित किया। साल 1956 में आंध्र प्रदेश के गठन से पहले, आंध्र प्रदेश और हैदराबाद राज्य में जूट, कपड़ा, तंबाकू और बीड़ी के सबसे बड़े उद्योग थे। इन उद्योगों में बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती थीं। इन उद्योगों का कार्य वातावरण बेहद अस्वच्छ और हानिकारक था और उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती थी। फिर भी, गरीबी के कारण महिलाएं वहां काम करने के लिए मजबूर थीं। ऐसे में भाग्यम्मा ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और साथ ही महिलाओं को देश-विदेश में अपने संघर्षों में जुझारू होने के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा प्रमीला ताई महेंद्र तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष के दौरान एक सक्षम और कुशल कार्यकर्ता थीं। वे कूरियर के रूप में काम करती थीं और कई बार हथियार पहुंचाने में उन्होंने बड़ी बहादुरी दिखाई।
भाग्यम्मा ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और साथ ही महिलाओं को देश-विदेश में अपने संघर्षों में जुझारू होने के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा प्रमीला ताई महेंद्र तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष के दौरान एक सक्षम और कुशल कार्यकर्ता थीं। वे कूरियर के रूप में काम करती थीं और कई बार हथियार पहुंचाने में उन्होंने बड़ी बहादुरी दिखाई।
साल 1970 के दशक में असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हुई, जब इला भट्ट ने 1972 में सेल्फ-एम्पलॉयड वीमन एसोसिएशन (सेवा) नामक महिला व्यापार संघ की स्थापना की थी। यह संगठन उन महिलाओं को एक मंच देने के लिए बनाया गया था, जो पारंपरिक अर्थों में किसी फैक्ट्री या कंपनी में काम नहीं करती थीं, बल्कि छोटे-मोटे स्व-रोज़गार या अस्थायी काम से अपनी आजीविका चलाती थीं।इस संगठन ने केवल मजदूरी या काम की शर्तों की बात नहीं की, बल्कि महिलाओं को बैंकिंग सेवाओं, स्वास्थ्य, बीमा, प्रशिक्षण और नेतृत्व के अवसरों से भी जोड़ा। सेवा के अनुभव ने यह महत्वपूर्ण समझ विकसित की कि आज के दौर में भारत के लगभग 90 फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। जिनमें घरेलू कामगार, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता और खेत मजदूर महिलाएं अभी भी श्रम कानूनों और सामाजिक सुरक्षा से काफी हद तक बाहर हैं। इसलिए उनके अधिकारों की लड़ाई के लिए पारंपरिक ट्रेड यूनियन मॉडल से अलग और अधिक लचीली रणनीतियों की जरूरत है।
वर्तमान में सशक्तिकरण और नई चुनौतियां
आज महिला ट्रेड यूनियनवादियों की नई पीढ़ी सोशल मीडिया, सामुदायिक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से अपने अधिकारों की आवाज़ उठा रही हैं। गिग वर्कर्स, घरेलू कामगार और देखभाल श्रमिक जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की संगठित आवाज़ तेजी से उभर रही हैं। इन प्रगति के बावजूद, असमान वेतन, सीमित संस्थागत समर्थन और सामाजिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके कई कारण हैं, क्योंकि महिलाएं कई बाधाओं का सामना करती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जैसी महिलाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। इसके बावजूद उन्हें अक्सर कम वेतन, अस्थायी रोजगार और सीमित सामाजिक सुरक्षा मिलती है। एक प्रमुख बाधा अवैतनिक घरेलू जिम्मेदारियों से संबंधित है, जो महिलाओं पर असमान रूप से बोझ डालती हैं, जैसे कि बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और घर के कामकाज आदि। इकनॉमिक टाइम्स में छपी टाइम यूज़ सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाएं अपने दैनिक समय का 7.2 घंटे ऐसे कार्यों में व्यतीत करती हैं,जिससे उनके लिए सवैतनिक रोजगार के सीमित अवसर बचते हैं।
इला भट्ट ने 1972 में सेल्फ-एम्पलॉयड वीमन एसोसिएशन (सेवा) नामक महिला व्यापार संघ की स्थापना की थी। यह संगठन उन महिलाओं को एक मंच देने के लिए बनाया गया था जो पारंपरिक अर्थों में किसी फैक्ट्री या कंपनी में काम नहीं करती थीं, बल्कि छोटे-मोटे स्व-रोज़गार या अस्थायी काम से अपनी आजीविका चलाती थीं।
आइडियाज़ फॉर इंडिया में छपे एक लेख के मुताबिक, महिलाओं के सामने आने वाली एक बाधा औपचारिक अंशकालिक कार्य विकल्पों का अभाव है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, जहां अंशकालिक रोज़गार को कानून की मान्यता प्राप्त है, सुव्यवस्थित है और सामाजिक रूप से स्वीकार्य है। वहीं भारत में अंशकालिक काम के लिए कोई औपचारिक प्रावधान नहीं हैं। पेशेवर और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने के लिए लचीलापन चाहने वाली महिलाएं अक्सर अनौपचारिक, अनिश्चित नौकरियों में फंस जाती हैं, जिनमें न तो नौकरी की सुरक्षा होती है और न ही सामाजिक लाभ। वैतनिक और अवैतनिक कार्य का यह दोहरा बोझ न केवल महिलाओं के करियर की संभावनाओं को सीमित करता है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था में उनके योगदान की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
भारतीय महिला ट्रेड यूनियन नेताओं की यह यात्रा केवल श्रम अधिकारों की लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय की व्यापक लड़ाई का हिस्सा है। औपनिवेशिक दौर की मिलों से लेकर आज के असंगठित और गिग अर्थव्यवस्था तक, महिलाओं ने लगातार अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई है। फिर भी आज भी बड़ी संख्या में महिला श्रमिक असुरक्षित रोजगार, असमान वेतन और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में महिला ट्रेड यूनियनवादियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि श्रम आंदोलनों में महिलाओं की आवाज़ न केवल सुनी जाए, बल्कि नीति निर्माण में भी उसे बराबर जगह मिले।

