समाजकार्यस्थल खनन उद्योग में क्यों हो रहा है महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों की अनदेखी?

खनन उद्योग में क्यों हो रहा है महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों की अनदेखी?

रियो टिंटो की 2022 की आंतरिक समीक्षा ने कार्यस्थल पर गहरे पैमाने पर मौजूद सेक्सिज़्म, यौन हिंसा और यौन उत्पीड़न की संस्कृति को उजागर किया। लगभग 10,000 कर्मचारियों पर आधारित इस समीक्षा में पाया गया कि महिला उत्तरदाताओं में से करीब 30 प्रतिशत ने कार्यस्थल पर धमकाए जाने, यौन उत्पीड़न या यौन हमले का अनुभव होने की बात कही।

भारत का खनन क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश में कोयला से लेकर लौह और अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और संगमरमर से लेकर रेत और बजरी तक, हर चीज निकलती है। राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और गुजरात के हजारों गांवों में करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी इसी उद्योग से जुड़ी है। लेकिन इस चमकदार विकास की कहानी के छिपी है शोषण और रोजमर्रा की लड़ाई। खदानों के आस-पास बसे समुदायों में महिलाओं का खनन से रिश्ता तीन स्तरों पर है। सीधे श्रम के स्तर पर महिलाएं पत्थर तोड़ने, छांटने  और उन्हें ढोने जैसे कामों में लगी रहती हैं। दूसरे स्तर पर घरेलू संपर्क आता है, जहां मजदूरों के धूल से सने कपड़े धोना और खदान से आई धूल को घर से साफ करना उनकी रोज़मर्रा की जिम्मेदारी बन जाता है।
तीसरा और सबसे व्यापक प्रभाव पर्यावरणीय प्रदूषण के रूप में दिखाई देता है, जब खनन से उठने वाली बारीक धूल पूरे गाँव की हवा, पानी और मिट्टी में फैल जाती है। जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी में जुलाई 2023 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, साल 2015-16 में भारत में अनुमानित 1.15 करोड़ श्रमिक सिलिका धूल से जुड़े व्यवसायों में काम कर रहे थे, और यह संख्या 2025-26 तक बढ़कर 5.2 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इनमें लाखों महिलाएं हैं। कुछ प्रत्यक्ष मजदूर के रूप में, ज्यादातर अप्रत्यक्ष रूप से। लेकिन स्वास्थ्य रिकॉर्ड में इन महिलाओं का नामोनिशान तक नहीं मिलता। न उनके बीमार होने का कोई हिसाब, न इलाज की कोई व्यवस्था, न मुआवजे का कोई प्रावधान।

जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी में जुलाई 2023 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, साल 2015-16 में भारत में अनुमानित 1.15 करोड़ श्रमिक सिलिका धूल से जुड़े व्यवसायों में काम कर रहे थे, और यह संख्या 2025-26 तक बढ़कर 5.2 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इनमें लाखों महिलाएं हैं।

जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक राजस्थान के पत्थर खनन क्षेत्र में 38 फीसद से 79 फीसद तक की व्याप्ति दर दर्ज है। जनवरी 2025 में जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा ने भारत में सिलिकोसिस के 49 अध्ययनों की जांच की, जिसमें औसत सिलिकोसिस दर 31.39 फीसद पाई गई। इसी अध्ययन के अनुसार, गुजरात के खम्भात में एगेट उद्योग के श्रमिकों में 69.1 फीसद तक सिलिकोसिस के मामले पुष्ट हुए। लेकिन, इन आंकड़ों में महिलाएं कहां हैं? बीएमसी पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, साल 2015 से 2021 के बीच राजस्थान में आयोजित 137 स्क्रीनिंग कैंपों में 6,809 लोगों की जांच की गई, जिसमें 3,410 लोगों में सिलिकोसिस की पुष्टि हुई और 1,055 लोगों की मौत हुई। सरकारी रिकॉर्ड में 100 में से सिर्फ 4 महिलाएं दिखती हैं, जबकि 93 फीसद रिकॉर्ड सिर्फ पुरुष मजदूरों का है। यह असमानता इसलिए नहीं है कि महिलाएं सुरक्षित हैं, बल्कि इसलिए है कि वे आधिकारिक तौर पर ‘मजदूर’ ही नहीं मानी जातीं।

अनौपचारिक श्रम का अदृश्य बोझ 

महिलाएं अक्सर खदानों में दर्ज कर्मचारी के रूप में काम नहीं करतीं, इसलिए आधिकारिक आँकड़ों में उनकी गिनती नहीं होती। फिर भी पत्थर की धूल उनसे अछूती नहीं रहती। मजदूरों के धूल से सने कपड़े धोते समय, घर की सफाई करते हुए, खाना बनाते हुए या मलबा साफ करते हुए वे लगातार इस धूल के संपर्क में आती हैं। कई बार जब पति या बेटों की मृत्यु हो जाती है, तो जीविका चलाने के लिए उन्हें स्वयं भी खदानों में अनौपचारिक श्रमिक के रूप में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अमेरिका के नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ के एक अध्ययन के अनुसार खनन क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को पुरुषों की तुलना में काम से जुड़े मस्कुलोस्केलेटल विकारों (हड्डियों और मांसपेशियों से संबंधित समस्याओं) का अधिक खतरा होता है।

अध्ययन में पाया गया कि यह जोखिम महिलाओं में 73 फीसद है, जबकि पुरुषों में 54.3 फीसद। खदानों में महिलाएं अमूमन भूतल पर अयस्क और धातुओं को तोड़ने, छांटने, हथौड़े से कूटने, धोने और उन्हें ढोने जैसे श्रमसाध्य काम करती हैं। भले ही वे सीधे खदानों के अंदर काम न करें, लेकिन वे लगातार सिलिका धूल और विषैली धातुओं के संपर्क में आती हैं। जिंक, मैंगनीज, एल्युमीनियम, सीसा, कैडमियम, पारा और आर्सेनिक जैसी धातुओं के संपर्क से भ्रूण के विकास में देरी, प्रतिकूल जन्म परिणाम और बच्चों में ऑटिज्म, अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर, सेरेब्रल पाल्सी और बौद्धिक अक्षमता जैसी समस्याएं होती हैं।

बीएमसी पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, साल 2015 से 2021 के बीच राजस्थान में आयोजित 137 स्क्रीनिंग कैंपों में 6,809 लोगों की जांच की गई, जिसमें 3,410 लोगों में सिलिकोसिस की पुष्टि हुई और 1,055 लोगों की मौत हुई।

गर्भावस्था में खनन और उससे जुड़ी चुनौतियां

गर्भवती महिलाओं के लिए खनन क्षेत्रों का वातावरण विशेष रूप से खतरनाक है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की हृदय गति और श्वसन दर बढ़ जाती है, जिसका मतलब है कि वे अधिक विषाक्त धूल अंदर ले सकती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, भारत में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर 52.2 फीसद है, जो विशेष रूप से खनन क्षेत्रों और आकांक्षी जिलों में 61 फीसद से अधिक तक पहुंच जाती है। गर्भावस्था के दौरान एनीमिया मातृ मृत्यु दर, समय से पहले प्रसव, कम वजन के बच्चों के जन्म और भ्रूण के मस्तिष्क विकास में देरी का प्रमुख कारण बनता है। सिलिका धूल और जिंक, मैंगनीज, सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी विषैली धातुओं के संपर्क से न केवल मां का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि बच्चों में ऑटिज्म, अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर, सेरेब्रल पाल्सी और बौद्धिक अक्षमता जैसी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं। अत्यधिक गर्मी, शोर, कंपन और लंबे काम के घंटे महिला प्रजनन प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे गर्भावस्था के परिणाम और भी खराब हो जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का विवादास्पद फैसला और स्टे

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की एक विवादास्पद परिभाषा को स्वीकार किया, जिसके अनुसार केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ ही संरक्षित मानी जातीं। इससे अरावली की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048; करीब 8.7 फीसद ही संरक्षण के दायरे में रहतीं और 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र खनन के लिए खुल जाता। व्यापक विरोध के बाद 29 दिसंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ ने इस आदेश पर स्वतः संज्ञान लेते हुए रोक लगा दी और कहा कि इससे अनियंत्रित खनन को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, एक नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। 21 जनवरी 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन को “अक्षम्य अपराध” बताते हुए पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम मांगे, ताकि कोर्ट की निगरानी में एक उच्च-स्तरीय समिति बनाई जा सके। फिलहाल खनन गतिविधियों पर रोक जारी है और अंतिम निर्णय विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के बाद लिया जाएगा। यह फैसला खनन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रियो टिंटो की 2022 की आंतरिक समीक्षा ने कार्यस्थल पर गहरे पैमाने पर मौजूद सेक्सिज़्म, यौन हिंसा और यौन उत्पीड़न की संस्कृति को उजागर किया। लगभग 10,000 कर्मचारियों पर आधारित इस समीक्षा में पाया गया कि महिला उत्तरदाताओं में से करीब 30 प्रतिशत ने कार्यस्थल पर धमकाए जाने, यौन उत्पीड़न या यौन हमले का अनुभव होने की बात कही।

वैश्विक खनन उद्योग में हिंसा, सुरक्षा उपकरण और वैतनिक असमानता  

खनन उद्योग को अक्सर आर्थिक विकास और रोजगार से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके भीतर काम करने वाले श्रमिकों—खासकर महिलाओं—को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य जोखिमों के साथ-साथ कार्यस्थल पर असुरक्षा, लैंगिक भेदभाव और पर्याप्त सुरक्षा उपायों की कमी जैसी समस्याएँ भी व्यापक रूप से सामने आती रही हैं। दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनियों में से एक रियो टिंटो की 2022 की आंतरिक समीक्षा ने कार्यस्थल पर गहरे पैमाने पर मौजूद सेक्सिज़्म, यौन हिंसा और यौन उत्पीड़न की संस्कृति को उजागर किया। लगभग 10,000 कर्मचारियों पर आधारित इस समीक्षा में पाया गया कि महिला उत्तरदाताओं में से करीब 30 प्रतिशत ने कार्यस्थल पर धमकाए जाने, यौन उत्पीड़न या यौन हमले का अनुभव होने की बात कही।

इसी तरह रिस्पॉन्सिबल माइनिंग फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में 30 खनन कंपनियों का अध्ययन करते हुए पाया गया कि महिलाओं के लिए उपयुक्त सुरक्षा उपकरणों की भारी कमी है और लिंग आधारित वेतन अंतर भी मौजूद है। अक्सर महिलाओं को वही सुरक्षा जूते, हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं जो पुरुषों के लिए बनाए गए होते हैं। ये उपकरण उनके शरीर के अनुकूल नहीं होते, जिससे काम के दौरान उनकी सुरक्षा से समझौता होता है। इन चुनौतियों के बीच कुछ पहलें वैकल्पिक आजीविका के रास्ते भी खोल रही हैं। बेयरफुट कॉलेज जैसे संगठन महिलाओं को सोलर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण दे रहे हैं, जिससे वे खदानों में वापस काम करने के बजाय दूसरे क्षेत्रों में रोजगार पा सकें। इसके साथ ही महिलाओं की सहकारी समितियों का विकास, कौशल विकास कार्यक्रम, माइक्रोफाइनेंस और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी जरूरी है, ताकि वे सुरक्षित और स्थायी आजीविका के विकल्प चुन सकें।

बेयरफुट कॉलेज जैसे संगठन महिलाओं को सोलर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण दे रहे हैं, जिससे वे खदानों में वापस काम करने के बजाय दूसरे क्षेत्रों में रोजगार पा सकें। इसके साथ ही महिलाओं की सहकारी समितियों का विकास, कौशल विकास कार्यक्रम, माइक्रोफाइनेंस और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी जरूरी है, ताकि वे सुरक्षित और स्थायी आजीविका के विकल्प चुन सकें।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी न्यायिक हस्तक्षेप महत्वपूर्ण रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को सिलिकोसिस के प्रभावों की निगरानी करने का निर्देश दिया है। साथ ही, भारत के 2025 तक टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी नियंत्रण कार्यक्रमों में सिलिकोसिस की स्क्रीनिंग को शामिल करना बेहद आवश्यक है, क्योंकि खनन क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक इन दोनों बीमारियों के उच्च जोखिम में रहते हैं।

रोकथाम के उपाय और प्रौद्योगिकी की भूमिका 

सिलिकोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसे पूरी तरह रोका जा सकता है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकें धूल नियंत्रण में मदद कर सकती हैं। कार्यस्थलों को गीला रखना, उचित वेंटिलेशन की व्यवस्था करना, मास्क और सुरक्षात्मक उपकरण उपलब्ध कराना तथा नियमित स्वास्थ्य जांच करवाना जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। इसके लिए एक समग्र राष्ट्रीय सिलिकोसिस नियंत्रण कार्यक्रम की आवश्यकता है, जिसमें स्वास्थ्य जागरूकता, व्यक्तिगत सुरक्षा, स्पष्ट निदान मानदंड, रोकथाम उपाय, उपचार और पुनर्वास शामिल हों। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे कार्यक्रमों में महिलाओं को केंद्र में रखा जाए—उन्हें अनौपचारिक श्रमिक के रूप में मान्यता दी जाए, उनकी विशेष स्वास्थ्य जरूरतों को समझा जाए और सुरक्षा तथा मुआवजे का समान अधिकार दिया जाए।

देश के खनन क्षेत्रों से जुड़ी लाखों महिलाओं की स्थिति हमारे समाज और नीतियों के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। जब तक महिलाओं के लिए सुरक्षित आजीविका के विकल्प नहीं बनते, उन्हें औपचारिक कार्यबल में जगह नहीं मिलती और उनके स्वास्थ्य व आवाज़ को नीति निर्माण में महत्व नहीं दिया जाता, तब तक खदानों की धूल उनके जीवन और सपनों को प्रभावित करती रहेगी। दरअसल, यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और मानवाधिकार का सवाल है। भारत के विकास में खनन की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन हमें ऐसा विकास मॉडल अपनाना होगा जो सभी के स्वास्थ्य और गरिमा को प्राथमिकता दे—जहां कोई भी अदृश्य न रहे और महिलाओं के श्रम, जीवन और स्वास्थ्य को समान महत्व मिले।

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