ग्राउंड ज़ीरो से कांगड़ा के चाय बागानों में काम करती दलित महिलाओं का अनदेखा संघर्ष 

कांगड़ा के चाय बागानों में काम करती दलित महिलाओं का अनदेखा संघर्ष 

हिमाचल प्रदेश में चाय की खेती 19वीं सदी के बीच में शुरू हुई थी। साल 1852 में कांगड़ा में चाय की खेती को व्यावसायिक रूप से शुरू किया गया। पालमपुर के पास हॉलटा नाम की जगह पर पहला चाय बागान बनाया गया था।

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले के खूबसूरत पहाड़ों में बनी चाय अपने स्वाद और खुशबू के लिए जानी जाती है। लेकिन इस चाय के पीछे जिन महिलाओं की मेहनत और संघर्ष छुपा है, वो अक्सर अनदेखा रह जाता है। इन बागानों में ज्यादातर दलित समुदाय की महिलाएं ही काम करती हैं। ये महिलाएं कम मजदूरी, अस्थायी रोजगार, और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे कई मुश्किल हालात में काम करती हैं। ना तो उन्हें मातृत्व अवकाश मिलता है और ना ही बीमार होने पर कोई छुट्टी मिलती है। यह काम ठेकेदारों के माध्यम से उन्हें मिलता है जिस कारण, सरकारी योजनाएं और चाय बागानों से जुड़ी नीतियां ज़मीन पर इन महिलाओं तक नहीं पहुंच पाती। यहां तक कि उन्हें अपने हक की जानकारी भी नहीं होती, और अगर होती भी है, तो उसे पाने के रास्ते बहुत मुश्किल होते हैं। न तो उनके पास मजदूर यूनियन का साथ होता है, और न ही कोई ऐसा मंच जहां वे अपनी बात खुलकर रख सकें। ऐसे में उनकी ज़िंदगी सिर्फ मेहनत तक सिमट कर रह जाती है। 

कांगड़ा चाय बागानों का इतिहास और वर्तमान स्थिति 

जर्नल ऑफ मार्केटिंग एंड सोशल रिसर्च के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में चाय की खेती 19वीं सदी के बीच में शुरू हुई थी। साल 1852 में कांगड़ा में चाय की खेती को व्यावसायिक रूप से शुरू किया गया। पालमपुर के पास हॉलटा नाम की जगह पर पहला चाय बागान बनाया गया था। यह बागान समुद्र तल से करीब 1260 मीटर की ऊंचाई पर था। यहां जो चाय के पौधे लगाए गए थे, वे पूरी तरह से चीन से लाए गए थे। साल 1886 और 1895 में, कांगड़ा चाय ने अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए लंदन और एम्स्टर्डम में गोल्ड और सिल्वर मेडल भी जीते। इससे यह साबित होता है कि कांगड़ा की चाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया था।

हिमाचल प्रदेश में चाय की खेती 19वीं सदी के बीच में शुरू हुई थी। साल 1852 में कांगड़ा में चाय की खेती को व्यावसायिक रूप से शुरू किया गया। पालमपुर के पास हॉलटा नाम की जगह पर पहला चाय बागान बनाया गया था।

टी बॉक्स के मुताबिक साल 1964 से 1983 के बीच पालमपुर, बीड़, सिद्धबाड़ी और बैजनाथ में चार चाय प्रोसेसिंग कारखाने बनाए गए। इनका मकसद छोटे किसानों की मदद करना था, जो खुद का कारखाना नहीं लगा सकते थे। लेकिन 2004 तक सिर्फ पालमपुर वाला कारखाना ही चल रहा था, क्योंकि बाकी कारखानों को चलाना बहुत महंगा और मुश्किल हो गया था। आज कांगड़ा में करीब 6,000 चाय के बागान हैं। इनमें ज़्यादातर बागानों में पारंपरिक काली चाय ही बनाई जाती है। लेकिन कुछ बागान जैसे धर्मशाला टी कंपनी का मान टी एस्टेट, खास तरह की ऊलोंग चाय और सिल्वर नीडल व्हाइट चाय भी थोड़ी मात्रा में हाथ से बनाते हैं। साल 2005 में कांगड़ा चाय को जीआई (भौगोलिक संकेत) का दर्जा मिला, जिससे इसकी खास पहचान और गुणवत्ता को सरकारी मान्यता मिली।

महिला मजदूरों पर काम का दोहरा बोझ

तस्वीर साभार : सविता

महिलाएं समाज और अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं, लेकिन उनके काम  को अक्सर अनदेखा  बना दिया जाता है। खासकर महिला मज़दूर, जिनके कंधों पर घर और बाहर दोनों जगहों की ज़िम्मेदारी होती है। टाइम यूज़ सर्वे 2024 के अनुसार, महिलाएं हर दिन लगभग 4 घंटे 49 मिनट घरेलू कामों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट यानी लगभग डेढ़ घंटे घरेलू कामों  में समय दे पाते  हैं। यानि पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा काम करती हैं। बैजनाथ की रहने वाली 38 वर्षीय सरला देवी चाय के बागान में, चाय पत्ती तोड़ने का काम करती हैं। वह बताती हैं, “सुबह उठते ही मैं घर का सारा काम करने लगती हूं। साफ- सफाई, खाना बनाना और उसके बाद बेटे को स्कूल के लिए तैयार करना। यह सारा काम मुझे सुबह 8 बजे से पहले करना पड़ता है, क्योंकि 8:30 बजे काम पर हाजिरी लगनी शुरू हो जाती है।”

जिस दिन चाय पत्ती 20 किलो से कम होती है उस दिन ठेकेदार बहुत गुस्सा करते हैं उस दिन या तो पैसे काट लेते हैं या फिर बोलते हैं कि घर चले जाओ दोबारा आने की कोई जरूरत नहीं है।

वह आगे बताती हैं, “उसके बाद 5 बजे तक मैं चाय पत्ती तोड़ने का काम करती हूं। इस बीच सिर्फ आधे घंटे का टाइम दिया जाता है जिसमें आराम से खाना भी नहीं खा पाती हूं। पूरा दिन काम करने के बाद फिर से घर का सारा काम करो ऐसे में टाइम कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता है। बहुत थक जाती हूं, न तो खुद के लिए समय निकाल पाती हूं और न ही बेटे को समय दे पा रही हूं। पूरे दिन में 20 किलो पत्ती तोड़नी पड़ती है और इसके बदले में केवल 400 रुपये दिहाड़ी मिलती है। वहीं ठेकेदार पत्ती के सूखने के बाद उसे बाजार में 400 से 500  रुपये प्रति किलो के दाम में बेचते हैं। जिस दिन पत्ती 20 किलो से कम होती है उस दिन ठेकेदार बहुत गुस्सा करते हैं उस दिन या तो पैसे काट लेते हैं या फिर बोलते हैं कि घर चले जाओ दोबारा आने की कोई जरूरत नहीं है।” 

तस्वीर साभार : सविता

एकल महिलाओं को और भी ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जैसे परिवार का दबाव, पैसों की कमी और समाज की अनदेखी। उनके पास अपनी कोई जमीन या पैसा नहीं होता, इसलिए वे अपने फैसले खुद नहीं ले पातीं। बैजनाथ की रहने वाली 40 वर्षीय मीरा देवी एकल महिला हैं। वह बताती हैं, “मैं अपनी माँ के घर में रहती हूं अपने भाई- भाभी के साथ, मेरे लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि शादी न करने की बजह से भी मुझे बहुत सी बातें सुननी पड़ती है। मुझे घर से लेकर खेतों तक का सारा काम करना पड़ता है। आजकल धान लगाने का काम चल रहा है तो सुबह उठकर मैं पहले सारे घर की साफ- सफाई करती हूं और उसके बाद सीधे खेतों में धान लगाने के लिए निकल जाती हूं ताकि मैं अपने हिस्से का काम खत्म करके, अपने काम पर पत्ती तोड़ने जा सकूं। 5 बजे तक वहां काम करती हूं। उसके बाद घर पहुंचकर मुझे फिर से मेरे हिस्से का जो काम बच्चा होता है खेतों में वो करना पड़ता है।” 

मैं पहले सारे घर की साफ- सफाई करती हूं और उसके बाद सीधे खेतों में धान लगाने के लिए निकल जाती हूं ताकि मैं अपने हिस्से का काम खत्म करके, अपने काम पर पत्ती तोड़ने जा सकूं।5 बजे तक वहां काम करती हूं। उसके बाद घर पहुंचकर मुझे फिर से मेरे हिस्से का जो काम बच्चा होता है खेतों में वो करना पड़ता है।

बुनियादी सुविधाओं की कमी और स्वास्थ्य पर प्रभाव 

मीरा बताती हैं, “हमें जूते और दस्ताने भी नहीं मिलते हैं। सिर्फ प्लास्टिक के झुम्ब यानी तिरपाल मिलते हैं जो दो महीनों के अंदर ही फट जाते हैं। आजकल बरसात का मौसम है तो सारे पत्ती के पेड़ गीले होते हैं, जिससे सारे कपड़े गीले हो जाते हैं और आजकल मधुमखियां भी बहुत ज्यादा काटती हैं। सारा दिन खड़े रहकर काम करना होता है, पूरे शरीर में दर्द हो जाता है और हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है। जूते और दस्ताने न होने की वजह से हाथ और पैरों की उंगलियां सड़ जाती हैं जिसमें बहुत ज्यादा खुजली होती है। हम तीन सालों से यूनिफ़ॉर्म, आईडी कार्ड और जूतों की मांग कर रहे हैं। लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।”

तस्वीर साभार : सविता

सरला बताती हैं, “यहां शौचालय भी नहीं हैं। जब पीरियड्स होते हैं तब सेनेटरी पैड बदलने में बहुत मुश्किल होती है। हमें कहीं दूर जाकर झाड़ियों  में छिपकर पैड बदलना पड़ता है और इस्तेमाल किए हुए पैड को किसी चीज से लपेटकर अपने झोले में डालना पड़ता है क्योंकि यहां कूड़ेदान की सुविधा भी नहीं है।” काम के दौरान महिलाएं पानी बहुत कम पीती हैं क्योंकि शौचालय न होने की वजह से पेशाब रोककर रखना पड़ता है, जिससे बहुत सी महिलाओं को यूटीआई की समस्या का सामना करना पड़ता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट मुताबिक किसी भी महिला के जीवन में यूटीआई होने की संभावना लगभग 60 फीसद जबकि पुरुषों में यह सिर्फ 13 फीसद होता है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के एक अध्ययन के मुताबिक चाय-बागानों में काम करने वाले मजदूरों में 25.9 फीसद को डायरिया, 23.8 फीसद को पेचिश, 17 फीसद को टाइफाइड और 14.3 फीसद मजदूरों में खुजली की समस्या पाई गई। ये बीमारियां ज्यादातर गंदे पानी, खराब सफाई व्यवस्था और साफ-सुथरे शौचालयों की कमी की वजह से होती हैं।

यहां शौचालय भी नहीं हैं जब पीरियड्स होते हैं तब हमें सेनेटरी पैड बदलने में बहुत मुश्किल होती है हमें कहीं दूर जाकर झाड़ियों  में छिपकर पैड बदलना पड़ता है और इस्तेमाल किये हुए पैड को किसी चीज से लपेटकर अपने झोले में डालना पड़ता है। क्योंकि यहां कूड़ेदान की सुविधा भी नहीं है।

मशीन आने के बाद हालात और सुधार के लिए कदम 

बैजनाथ की रहने वाली 45 वर्षीय कमला देवी बताती हैं, “अब तो पत्ती तोड़ने की मशीन आ गई है इससे हमें और परेशानी हो रही है। एक तो इससे हमारा रोजगार घटेगा और हम पर मशीन चलाने का बोझ पड़ रहा है। यह मशीन बहुत भारी होती है सारा दिन खड़े रहकर इसे चाय के पेड़ों पर चलाना पड़ता है जिससे बहुत ज्यादा कमर दर्द और बाजुओं में दर्द हो जाता है। मशीन आने के बाद लाभ सिर्फ ठेकेदारों को ही हो रहा है लेकिन इससे हमारी हालत खराब हो रही है।” 

तस्वीर साभार : सविता

कम मज़दूरी, बीमारी का डर, और मशीनों का बोझ ये सब उन महिलाओं की  ज़िंदगी का हिस्सा है। इन महिलाओं की हालत सिर्फ इसलिए नहीं सुधरती क्योंकि न उन्हें उनका हक़ मिलता है और न ही उनकी बात कोई सुनता है। इसके लिए ज़रूरी है कि उन्हें यूनिफॉर्म, जूते, दस्ताने, और पीरियड से जुड़ी सुविधाएं समय पर मिलें। काम के दौरान साफ़ पानी और शौचालय की सुविधा होना बहुत जरूरी है ताकि वे बीमारियों से बच सकें। ठेकेदारों की जगह महिलाओं को सीधा सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए और स्थायी रोज़गार की व्यवस्था की जाए ताकि वह बिना किसी दबाव के काम कर सकें । साथ ही, उनके लिए एक ऐसा मंच बने जहां वे अपनी बात खुलकर रख सकें और अपने अधिकार मांग सकें। तब ही उन महिलाओं को अपनी बात और समस्याओं को बताने की आजादी मिल सकेगी। 

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content