भारत में महिलाएं वोट देने की लाइन में तो आगे नज़र आती हैं। लेकिन सत्ता में भागीदारी अभी भी न के बराबर ही मिल पाती है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश के विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी महज 10 फीसद के आसपास है। यह सिर्फ़ संख्या की कमी को ही नहीं दिखाता, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर सवाल उठता है, जो महिलाओं को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने से रोकता है। देश की लगभग आधी आबादी होने और मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी के बावजूद राजनीतिक गलियारों में महिलाओं को वह जगह नहीं मिल पाई है, जिसकी वे हक़दार हैं। यह पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना से लेकर लोकतंत्र की असफलता को भी दिखाता है, जिसमें महिलाएं नीति निर्माता के तौर पर नहीं बल्कि लाभार्थी बन कर रह गई हैं।
क्या कहते हैं एडीआर के हालिया आंकड़े?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म और नेशनल इलेक्शन वॉच ने हाल ही में वर्तमान राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर एक रिपोर्ट जारी की है। यह मौजूदा लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में मौजूद महिला प्रतिनिधि और चुनाव में शामिल महिला उम्मीदवारों पर आधारित है। रिपोर्ट से पता चलता है कि देश की लोकसभा में मौजूद 543 सांसदों में से केवल 74 सांसद महिलाएं हैं जो कि कुल संख्या का महज 14 फीसद है। जबकि देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में मौजूद 4123 विधायकों में से सिर्फ 390 महिलाएं हैं। यानी देश में महज 9 फीसद महिला विधायक मौजूद हैं। लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं को मिलाकर देखें तो कुल 4666 जन प्रतिनिधियों में से सिर्फ़ 464 महिलाएं हैं जो कि कुल संख्या का लगभग 10 फीसद है। अगर चुनाव में उम्मीदवारी की बात करें तो लोकसभा, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 51708 उम्मीदवारों में से महज 5095 महिलाएं थीं, जो कि कुल उम्मीदवारों का 10 फीसद है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश के विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी महज 10 फीसद के आसपास है। यह सिर्फ़ संख्या की कमी को ही नहीं दिखाता, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर सवाल उठता है, जो महिलाओं को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने से रोकता है।
इसमें लोकसभा के 8360 पुरुष उम्मीदवारों की तुलना में केवल 800 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव में हिस्सा लिया था। ग़ौरतलब है कि 152 लोकसभा क्षेत्रों में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में हालात और भी खराब पाई गई। 43348 विधायक उम्मीदवारों में से केवल 4295 महिलाएं थीं जबकि कुल 4123 विधानसभा क्षेत्रों में से 1698 यानी लगभग 41 फीसद में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी। आंकड़ों से पता चला है कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में 15 फीसद से ज़्यादा महिला उम्मीदवार नहीं मिली। चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को लेकर दिल्ली, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा में स्थिति कमोबेश बेहतर मिली। अगर सांसदों की संख्या देखी जाए तो इस बार के लोकसभा में पश्चिम बंगाल से 11, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से 7-7 महिला सांसद हैं। जबकि विधायकों के मामले में उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा 47 महिला विधायक हैं इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है जहां महिला विधायकों की संख्या 40 है।
पितृसत्ता, संसाधनों की कमी और गेटकीपिंग
देश की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियों में सत्ता की बागडोर आमतौर पर पुरुषों के हाथ में होती है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व या चंद लोगों का समूह यह तय करता है कि पार्टी के अंदर कौन किस पद तक पहुंच सकता है और कौन कितना संसाधन और समर्थन हासिल कर सकता है, इसे ही गेटकीपिंग कहा जाता है। ऐसे में महिलाओं के उच्च पदों तक पहुंचाने की संभावना बेहद कम हो जाती है। महिलाओं को अगर चुनाव में उतारा भी जाता है तो टोकन उम्मीदवार के रूप में ही जगह मिल पाती है। अक्सर उन्हें नाम के लिए मैदान में उतारा जाता है और ऐसी मुश्किल सीटों पर उम्मीदवारी मिलती है, जहां जीतना मुश्किल हो। संसाधन और समर्थन की कमी की वजह से जिन महिलाओं को मौका मिलता भी है, वह भी राजनीति में ठीक से अपनी जगह नहीं बना पाती हैं।इसके साथ ही भारत में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना महिलाओं की राजनीति में भागीदारी के लिए एक बड़ी बाधा है। राजनीति या किसी भी दूसरे क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के बावजूद महिलाओं का घर परिवार की जिम्मेदारियों से पीछा नहीं छूटता।
अगर सांसदों की संख्या देखी जाए तो इस बार के लोकसभा में पश्चिम बंगाल से 11, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से 7-7 महिला सांसद हैं। जबकि विधायकों के मामले में उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा 47 महिला विधायक हैं इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है जहां महिला विधायकों की संख्या 40 है।
इस वजह से वे चुनाव प्रचार और पार्टी के दूसरे कामों में बराबरी से भागीदारी नहीं कर पाती हैं। साथ ही समाज में नेताओं की ‘जिताऊ छवि’ वाली सोच भी महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है। यूनाइटेड नेशन और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट्स बताती हैं कि महिलाओं के पास कुल संपत्ति पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि क़ानून बनने के बावजूद महिलाओं को संपत्ति में हिस्सेदारी नहीं मिल पाती है। इसके अलावा वैतनिक कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कम है जबकि इनसे अवैतनिक घरेलू काम ज़्यादा लिए जाते हैं। इस वजह से ज़्यादातर महिलाएं आर्थिक रूप से घर के दूसरे पुरुष सदस्यों पर निर्भर होती है। धन की कमी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने में बाधा डालती है। यहां तक कि चुनाव के दौरान ग़ैर क़ानूनी तरीके से पैसे और दूसरे सामान बांटने में भी पुरुष उम्मीदवार काफ़ी आगे निकल जाते हैं। यह सब मिलकर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करते हैं।
यौन हिंसा और असुरक्षित माहौल
न्यूज़ लॉन्ड्री में प्रकाशित यूएन वीमेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 90 फीसद महिलाएं हिंसा के डर से रजनीति में खुलकर भागीदारी से परहेज करती हैं। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि भारत में लगभग 45 फीसद महिला उम्मीदवारों को शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ा । राजनीतिक दलों के भीतर लैंगिक भेदभाव और यौन हिंसा महिलाओं की भागीदारी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों में समय-समय पर वरिष्ठ नेताओं पर हिंसा के मामले सामने आते रहे हैं। इसके साथ ही ऐसी स्थिति आने पर कोई मजबूत शिकायत व्यवस्था नहीं है, जहां सटीक और जल्द कार्रवाई हो सके, उल्टा अक्सर शिकायतकर्ता के साथ ही भेदभाव होता है।
न्यूज़ लॉन्ड्री में प्रकाशित यूएन वीमेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 90 फीसद महिलाएं हिंसा के डर से रजनीति में खुलकर भागीदारी से परहेज करती हैं। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि भारत में लगभग 45 फीसद महिला उम्मीदवारों को शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ा ।
इन सबसे आम जनता में महिलाओं के राजनीति में जाने को लेकर डर बैठ गया है। सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट योगमाया एमजी ने सभी राजनीतिक दलों को ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ (पॉश ऐक्ट) के दायरे में लाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें संविधान के मौलिक अधिकारों का हवाला दिया गया था। अफ़सोस की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया था, जिस वजह से राजनीतिक पार्टियों को इससे छूट मिल जाती है और वे अपनी जवाबदेही से बच जाते हैं।
दुनियाभर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और भारत
यूएन वुमन की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक दुनिया भर में अभी तक केवल 28 देशों में महिलाएं राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के पद पर हैं, और कुल मिलाकर लगभग 30 महिलाएं इन पदों पर कार्यरत हैं। इनमें से 16 देशों में महिला राष्ट्राध्यक्ष हैं और 21 देशों में महिला सरकार प्रमुख हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में बराबरी आने में 130 साल से ज़्यादा समय लग सकता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की साल 2025 की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत को 148 देशों में से 131वां स्थान मिला है, जो कि साल 2024 के 129 की तुलना में दो स्थान नीचे खिसक गया है। यह बेहद चिंताजनक है कि जहां दूसरे देश सुधार की ओर बढ़ रहे हैं, वहां भारत में गिरावट देखी जा रही है।
यूएन वुमन की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक दुनिया भर में अभी तक केवल 28 देशों में महिलाएं राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के पद पर हैं और कुल मिलाकर लगभग 30 महिलाएं इन पदों पर कार्यरत हैं। इनमें से 16 देशों में महिला राष्ट्राध्यक्ष हैं और 21 देशों में महिला सरकार प्रमुख हैं। ऐसे में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में बराबरी आने में 130 साल से ज़्यादा समय लग सकता है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) की साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत का प्रदर्शन 150 देशों से बदतर रहा। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि साल 2024 में महिला सांसदों की संख्या में 2019 की तुलना में गिरावट आई है, जिस वजह से रैंकिंग पर बुरा असर पड़ा है। देश में महिला सांसदों का अनुपात वैश्विक औसत 26.5 और दक्षिण एशियाई औसत 19 फीसद की तुलना में बहुत कम है। गौरतलब है कि रवांडा की संसद में महिला सांसदों की संख्या सबसे ज़्यादा 61.3 फीसद है। हालांकि भारत में महिला को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसद आरक्षण देने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पारित किया गया था लेकिन परिसीमन और जनगणना की शर्तों की वजह से यह 2029 से पहले लागू नहीं हो पाएगा।
क्या हो सकता है आगे का रास्ता
देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इससे लोकतंत्र सशक्त और समावेशी बनता है। महिलाओं की भागीदारी शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल विकास और महिलाओं के मुद्दों पर बेहतर नीतियां बनाने में सहायक होती है। इससे लैंगिक समानता हासिल करने में भी मदद मिलती है। संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों और सार्वभौमिक मानव अधिकारों को हासिल करने, और बराबरी पर आधारित समावेशी समाज बनाने के लिए राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बेहद ज़रूरी है। इसके लिए आरक्षण एक अच्छा कदम साबित हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही लैंगिक भेदभाव दूर करने और राजनीति से अपराध को ख़त्म करना भी ज़रूरी है जिससे महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले।
इसके लिए समाज में जागरूकता, महिलाओं की सुरक्षा, राजनीतिक ट्रेनिंग अच्छे कदम साबित हो सकते हैं। साथ ही ऐसा सिस्टम बनाया जाना चाहिए जो सभी को खासकर महिलाओं और हाशिए पर मौजूद समुदायों को बराबरी से मौका दे। इसके लिए सरकार, क़ानून और समाज सभी को मिलकर काम करने की ज़रूरत है। एडीआर की रिपोर्ट यह साफ़ दिखाती है कि सिर्फ़ वोट देने तक महिलाओं की भूमिका सीमित रह गई है, जबकि सत्ता के केंद्र में उनकी मौजूदगी बेहद कम है। ऐसे में राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करना, महिलाओं को टिकट देने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और सुरक्षित व समान अवसरों वाला राजनीतिक माहौल तैयार करना बहुत ज्यादा ज़रूरी है।

