भारतीय समाज में बचाव, सुरक्षा और नैतिकता जैसे शब्द अक्सर एक सकारात्मक अर्थ के साथ इस्तेमाल किए जाते हैं। खासकर जब बात सेक्स वर्क और मानव तस्करी की होती है, तो कानून, पुलिस और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका को एक रक्षक के रूप में देखा जाता है। लेकिन क्या ये हस्तक्षेप वास्तव में महिलाओं की आज़ादी और अधिकारों को मजबूत करते हैं? इस विषय पर प्रोफेसरऔर लेखिका विभूति रामचंद्रन की किताब इम्मोरल ट्रैफिक : एन एथ्नोग्राफी ऑफ लॉ, एनजीओज़ एंड द गवर्नेंस ऑफ प्रॉस्टिट्यूशन इन इंडिया, जो कि नृवंशविज्ञान (एथ्नोग्राफी) अनुसंधान पर केंद्रित है। इसके माध्यम से यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि भारत में सेक्स वर्क, मानव तस्करी-विरोधी कानून, और एनजीओ किस तरह मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं, जो अक्सर उन्हीं महिलाओं को नियंत्रित करता है जिन्हें ‘बचाने’ का दावा किया जाता है।
उन्होंने अपनी किताब में भारत के अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम और व्यापक मानव तस्करी-विरोधी उपायों की आलोचना की है, जिनका कहना है कि ये उपाय महिलाओं की वास्तविकताओं के बजाय नैतिक मान्यताओं पर आधारित है। यह कानून महिलाओं को मुख्य रूप से बचाव की ज़रूरत वाली सर्वाइवर के रूप में देखता है, जबकि उनकी आज़ादी, सहमति और आर्थिक विकल्पों के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ता है।ऐसे समय में जब मानव तस्करी विरोधी प्रयासों को अक्सर पुलिस और अदालतों द्वारा की गई छापेमारी, बचाव और सजाओं की संख्या और राज्य पुलिस इकाइयों और गृह मंत्रालय के साझा किए गए आंकड़ों के आधार पर मापा जाता है।यह किताब सवाल उठाती है कि छापेमारी के बाद ‘बचाई’ गईं महिलाओं के साथ क्या होता है ? इन तथाकथित ‘आश्रयों’, इन ‘सुरक्षात्मक घरों’ का क्या होता है, जहां छापेमारी के बाद इन महिलाओं को ले जाया जाता है?
लेखिका विभूति रामचंद्रन की किताब इम्मोरल ट्रैफिक : एन एथ्नोग्राफी ऑफ लॉ, एनजीओज़ एंड द गवर्नेंस ऑफ प्रॉस्टिट्यूशन इन इंडिया, के माध्यम से यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि भारत में सेक्स वर्क, मानव तस्करी-विरोधी कानून, और एनजीओ किस तरह मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं, जो अक्सर उन्हीं महिलाओं को नियंत्रित करता है जिन्हें ‘बचाने’ का दावा किया जाता है।
सेक्स वर्क पर नियंत्रण: कानून और एनजीओ की भूमिका
इस किताब का पहला अध्याय ‘लॉ, एनजीओज़, एंड द गवर्नेंस ऑफ प्रॉस्टिट्यूशन इन इंडिया’ यह समझाता है कि भारत में सेक्स वर्क से जुड़े कानून और व्यवस्था कैसे काम करते हैं। इसमें खास तौर पर अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम (आईटीपीए) 1956, अमेरिका के नेतृत्व वाले मानव तस्करी विरोधी प्रयासों और इस क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ की भूमिका को समझाया गया है। यह बताता है कि कैसे ये सभी मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं, जो सेक्स वर्क को नियंत्रित करता है। आज के समय में कानून केवल कानूनी नियम नहीं हैं।
बल्कि वे बड़े आर्थिक और वैश्विक प्रभावों (जैसे नवउदारवादी नीतियां) से भी प्रभावित होते हैं, जिसमें सेक्स वर्क पर काम करने वाली राज्य एजेंसियां और विदेशी वित्त पोषित गैर-सरकारी संगठन शामिल हैं। यह किताब नारीवादी शोधकर्ताओं के विचारों से जुड़ती है, जिन्होंने मानव तस्करी विरोधी अभियानों पर सवाल उठाए हैं और सेक्स वर्कर्स के जीवन की जटिलताओं को समझने की कोशिश की है। लेकिन यह किताब केबल सेक्स वर्क या तस्करी के बारे में ही नहीं है। यह इससे आगे बढ़कर यह समझने की कोशिश करती है कि भारत के कानून और वैश्विक तस्करी-विरोधी अभियान सेक्स वर्कर्स की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करते हैं। साथ ही, यह भी दिखाती है कि वह इन परिस्थितियों का सामना और विरोध कैसे करते हैं।
इसमें खास तौर पर अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम (आईटीपीए) 1956, अमेरिका के नेतृत्व वाले मानव तस्करी विरोधी प्रयासों और इस क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ की भूमिका को समझाया गया है। यह बताता है कि कैसे ये सभी मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं, जो सेक्स वर्क को नियंत्रित करता है।
बचाव अभियानों के भीतर की जटिलताएं
इस किताब का दूसरा अध्याय ‘ए टेल ऑफ टू रेस्क्यूज़’ बताता है कि बचाव अभियान अक्सर जल्दी और बिना सही योजना के किए जाते हैं, इसलिए वे काफी अव्यवस्थित होते हैं, इन अभियानों में भ्रम और अनिश्चितता होती है, साथ ही गैर-सरकारी संगठनों और पुलिस के बीच तनाव भी रहता है। इस दौरान सेक्स वर्कर्स अलग-अलग विकल्प अपनाते हैं यानी कुछ भागने की कोशिश करते हैं, तो कुछ बचाव का विरोध भी करते हैं। यह अध्याय, नृवंशविज्ञान संबंधी अवलोकनों और दो बचाव अभियानों की तुलना पर आधारित है, और यह दिखता है कि ये अभियान उन प्रश्नों, अनिश्चितताओं, तनावों और विकल्पों से कैसे प्रभावित होते हैं, जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया और नीतिगत प्रस्तुतियों में शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है।यह इस बात की पड़ताल करता है कि गैर सरकारी संगठन और पुलिस लगातार इन तनावों से कैसे निपटते हैं। नई दिल्ली और मेरठ में गैर सरकारी संगठनों के चलाए गए दो अभियानों की तुलना करते हुए, यह अध्याय यह भी दिखाता है कि सेक्स वर्क में महिलाओं के प्रवेश के अनुभव, विकल्प और दृष्टिकोण, और परिणाम किस प्रकार एक दूसरे से अलग होते हैं।
इस किताब का तीसरा अध्याय ‘दीज़ गर्ल्स नेवर गिव स्टेटमेंट्स’ बताता है कि मानव तस्करी के मामलों में आरोपी को सज़ा दिलाने के लिए सर्वाइवर महिलाओं की गवाही को सबसे ज़रूरी माना जाता है। हालांकि बचाई गई महिलाओं को तस्करों के खिलाफ गवाही देने के लिए प्रशिक्षित करना दानदाताओं के संचालित एनजीओ के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन लेखक के अध्ययन से पता चलता है कि ऐसा बहुत कम होता है। ज़्यादातर महिलाएं गवाही नहीं देतीं। इसके पीछे कई जटिल कारण होते हैं, जो भारत के सामाजिक और कानूनी हालात से जुड़े हैं। इसके साथ ही, यह अध्याय नई दिल्ली की एक निचली अदालत में अभियोजन पक्ष के पक्ष में गवाही देने वाली, तस्करी सर्वाइवर महिला सुनैना दास के मामले का भी विश्लेषण करता है, ताकि उन कारकों का पता लगाया जा सके जो कुछ महिलाओं को गवाही देने के लिए प्रेरित करते हैं और उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह अध्याय सुनैना के भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े अनुभवों, एनजीओ और भारतीय कानूनी संस्थाओं से मिले समर्थन का भी वर्णन करता है।
मानव तस्करी के मामलों में आरोपी को सज़ा दिलाने के लिए सर्वाइवर महिलाओं की गवाही को सबसे ज़रूरी माना जाता है। हालांकि बचाई गई महिलाओं को तस्करों के खिलाफ गवाही देने के लिए प्रशिक्षित करना दानदाताओं के संचालित एनजीओ के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन लेखक के अध्ययन से पता चलता है कि ऐसा बहुत कम होता है। ज़्यादातर महिलाएं गवाही नहीं देतीं।
एनजीओ, पुनर्वास और महिलाओं के लिए सीमित विकल्प
इस किताब का चौथा अध्याय ‘प्रूविंग प्रॉस्टिट्यूशन’ बताता है कि अदालत में मामलों का फैसला सिर्फ ‘बचाई गई’ महिलाओं की गवाही पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि यह कई अन्य चीज़ों से भी प्रभावित होता है।यह अध्याय समझाता है कि इन मामलों पर कानून की प्राथमिकताएं, पुलिस और वकीलों की समझ, और गवाहों से जुड़ी कानूनी शर्तें भी असर डालती हैं। विशेष न्यायालय में मानव तस्करी-विरोधी गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी न तो पूरी तरह से सर्वाइवर की गवाही पर निर्भर होती है और न ही यौन तस्करी को साबित करने पर। यह अध्याय दिखाता है कि इस विशेष न्यायालय में साक्ष्य और गवाही को यौन तस्करी के बजाय सेक्स वर्क को साबित करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है, और कैसे गैर-सरकारी संगठन, पुलिस और अन्य गवाह इन मुकदमों की उस प्रक्रिया में भाग लेते हैं, जिसे लेखक ‘इन मुकदमों की सुनियोजित कार्यप्रणाली कहता है’। सर्वाइवर की गवाही के अलावा, यह इस बात की भी जांच करता है कि अन्य अभियोजन गवाहों (पुलिस अधिकारी, गैर सरकारी संगठन के कार्यकर्ता और नकली ग्राहक) की गवाही, भौतिक साक्ष्य के रूप (नकदी, कंडोम और टिशू के पैकेट) और चिकित्सा रिपोर्ट मुंबई विशेष न्यायालय में आईटीपीए मामलों और उनके परिणामों को कैसे प्रभावित करते हैं।
पांचवां अध्याय ‘शी इज़ नॉट रिवीलिंग एनीथिंग’ मुंबई की अदालतों में होने वाली उन पूछताछ पर ध्यान देता है, जहां ‘बचाई गई’ महिलाओं से सवाल किए जाते हैं। इन पूछताछ में एनजीओ भी शामिल होते हैं और मजिस्ट्रेट के सामने यह प्रक्रिया चलती है।आईटीपीए की निर्धारित इन पूछताछों में बचाई गई महिलाओं की पृष्ठभूमि और सेक्स वर्क में उनके प्रवेश के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। महिलाओं की दी गई जानकारी के आधार पर, मजिस्ट्रेट उनकी हिरासत के बारे में निर्णय लेते हैं या तो उन्हें उनके परिवारों के पास वापस भेज देते हैं या आश्रयों और आर्थिक पुनर्वास कार्यक्रमों में भेज देते हैं। यह अध्याय दिखाता है कि पूछताछ केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पहचान और रिश्तेदारी का मूल्यांकन करने के लिए परामर्श और निंदा जैसी रणनीतियों का उपयोग करती है।साथ ही इस अध्याय से यह भी पता चलता है कि, बांग्लादेशी महिलाएं किस प्रकार संदेह की संस्कृति और प्रलेखन की व्यवस्था का निशाना बनती हैं और उससे कैसे निपटती हैं, जो मानव तस्करी विरोधी, सेक्स विरोधी विरोधी और आप्रवासन विरोधी अनिवार्यताओं को एक साथ लाती है।
इन मामलों पर कानून की प्राथमिकताएं, पुलिस और वकीलों की समझ, और गवाहों से जुड़ी कानूनी शर्तें भी असर डालती हैं। विशेष न्यायालय में मानव तस्करी-विरोधी गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी न तो पूरी तरह से सर्वाइवर की गवाही पर निर्भर होती है और न ही यौन तस्करी को साबित करने पर।
हिरासत की जटिलताएं, सुरक्षा, एजेंसी और नियंत्रण
छठा अध्याय ‘फ्रॉम ‘हाउस ऑफ हॉरर’ टू ‘सेंसिटिव’ गवर्नेंस’ मुंबई के एक सरकारी आश्रयगृह की स्थिति को समझाता है। यह एक कारागार जैसी संस्था में शोध करने की चुनौतियों पर चर्चा करता है, विशेष रूप से शोध पद्धति के रूप में फिल्म स्क्रीनिंग के उपयोग की व्याख्या करता है। इसमें बताया गया है कि आश्रय गृह में रखी गई महिलाओं को अपनी रिहाई को लेकर गहरी अनिश्चितता, उनकी आवाजाही पर अनिश्चितकालीन प्रतिबंध, रिश्तेदारों और साथियों के साथ मेलजोल में बाधा और आजीविका कमाने की क्षमता में कमी का सामना करना पड़ता है। यह जांच करता है कि कैसे गैर-सरकारी संगठन आजीविका कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से आश्रयगृह में हिरासत में शामिल होते हैं, जो विदेशी दानदाताओं और भारतीय सरकार को आकर्षित करते हैं, क्योंकि उनका नवउदारवादी उद्देश्य महिलाओं को सेक्स वर्क और सरकारी हिरासत दोनों से बाहर निकालना है। द लीफलेट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में समाजशास्त्र की प्रोफेसर महुआ बंद्योपाध्याय ने सुरक्षात्मक घरों को एक व्यापक कारागार परिदृश्य के भीतर रखते हुए तर्क दिया कि कारावास देखभाल की विफलता नहीं बल्कि उसका संचालन करने वाला तर्क है।
महिलाओं को इसलिए हिरासत में नहीं लिया जाता क्योंकि उन्होंने अपराध किए हैं, बल्कि इसलिए कि राज्य यह मान लेता है कि वे यौन और आर्थिक निर्णय लेने में असमर्थ हैं, बचाव-आधारित कारावास सुरक्षा के बजाय ‘सामाजिक मृत्यु’ को बढ़ावा देता है। इम्मोरल ट्रैफिक यह दिखाती है कि ‘बचाव’, ‘सुरक्षा’ और ‘पुनर्वास’ जैसे शब्द जितने सहज और सकारात्मक लगते हैं, वास्तविकता में वे उतने सरल नहीं हैं। कानून, पुलिस और गैर-सरकारी संगठनों का तंत्र कई बार महिलाओं की एजेंसी और चुनाव की क्षमता को सीमित कर देता है, भले ही उसका उद्देश्य उन्हें बचाना ही क्यों न हो। यह किताब सेक्स वर्क और मानव तस्करी को एक ही नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाती है और यह रेखांकित करती है कि महिलाओं के अनुभव जटिल और विविध होते हैं। यह पाठकों को इस बात पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि क्या ‘रेस्क्यू’ के नाम पर चलने वाले हस्तक्षेप वास्तव में सशक्तिकरण की ओर ले जाते हैं, या वे नियंत्रण और निगरानी के नए रूपों को मजबूत करते हैं।

