इतिहास प्रतिरोध से परिवर्तन तक: अंबेडकरवादी प्रेस की विरासत और संघर्ष

प्रतिरोध से परिवर्तन तक: अंबेडकरवादी प्रेस की विरासत और संघर्ष

भीमराव अंबेडकर का मानना था कि कथित दलित समुदाय के व्यक्तियों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना खुद का मीडिया होना बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य के लिए उन्होंने 31 जनवरी 1920 को मराठी पत्रिका ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया था।

भारतीय समाज में मीडिया और प्रेस को अक्सर चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन इस क्षेत्र में लंबे समय तक जाति-आधारित सामाजिक संरचना का बोलबाला रहा, जिसने न केवल संसाधनों और अवसरों पर नियंत्रण स्थापित किया बल्कि ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति के माध्यमों को भी सीमित किया। ऐसे में हाशिए पर रह रहे समुदायों की आवाज़ें मुख्यधारा के मीडिया से कई दशकों तक दूर रहीं और अगर मुख्यधारा की मीडिया तक पहुंचीं भी तो, उन्हें पितृसत्तामक नजरिए से और अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता रहा है। इसी जातिगत भेदभाव और बहिष्कार के खिलाफ़ अंबेडकरवादी प्रेस का उदय हुआ। एक ऐसा मंच, जिसने हाशिए पर रह रहे समुदायों को अपनी बात बताने, अपने अनुभव दर्ज करने और अपने अधिकारों के लिए एक साथ आवाज़ उठाने का मौका दिया।

आज, जब यह परंपरा डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के रूप में विकसित हो रही है, तब अंबेडकरवादी प्रेस की ऐतिहासिक भूमिका और उसकी विरासत को समझना और भी जरूरी हो गया है। उन्होंने प्रेस को केवल सूचना और प्रसार का माध्यम नहीं माना, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और प्रतिरोध का माध्यम भी माना। उनकी शुरू की गई पत्रिकाओं जैसे ‘मूकनायक’ और ‘बहिष्कृत भारत’ ने पहली बार दलित जीवन की वास्तविकताओं को केंद्र में रखते हुए एक नई दिशा दी। इसके माध्यम से हाशिए के समुदायों की आवाजों को उनके अनुभवों और नजरिए से सबके सामने रखने की शुरुआत हुई।

भारतीय समाज में मीडिया और प्रेस को अक्सर चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन इस क्षेत्र में लंबे समय तक जाति-आधारित सामाजिक संरचना का बोलबाला रहा, जिसने न केवल संसाधनों और अवसरों पर नियंत्रण स्थापित किया बल्कि ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति के माध्यमों को भी सीमित किया।

अंबेडकरवादी प्रेस का उद्देश्य: आवाज़ से प्रतिरोध तक

इस क्षेत्र में अंबेडकर से पहले भी कुछ प्रयास थे, जैसे तमिलनाडु में साल 1869 से सूर्योदयम जैसी पत्रिकाएं चलीं, जो दलित समुदाय के उत्थान पर केंद्रित थीं। इसके अलावा साल 1877 का सत्यशोधक समाज के अखबार दीनबंधु आदी इसमें शामिल थी।लेकिन अंबेडकर ने इसे व्यवस्थित रूप दिया।फारवर्ड प्रेस में छपे एक लेख के मुताबिक, भीमराव अंबेडकर का मानना था कि कथित दलित समुदाय के व्यक्तियों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना खुद का मीडिया होना बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य के लिए उन्होंने 31 जनवरी 1920 को मराठी पत्रिका ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया था। ‘मूकनायक’ के प्रवेशांक की संपादकीय में उन्होंने इसके प्रकाशन के कारण के बारे में लिखा था कि, बहिष्कृत लोगों पर हो रहे और भविष्य में होने वाले अन्याय के उपाय सोचकर, उनकी उन्नति और उनके मार्ग के सच्चे स्वरूप की चर्चा करने के लिए वर्तमान पत्रों में जगह नहीं है। बहुत से समाचार पत्र विशिष्ट जातियों के हित में हैं और कभी-कभी वह इतर जातियों के हित में नहीं होता है। हालांकि उनके समय में भी मीडिया में जातिगत पूर्वग्रह था और आज भी है। 

मीडिया के ढांचे के जातिगत पूर्वाग्रह से प्रभावित होने और मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर कथित सवर्णों का आधिपत्य होने से कई बार दलितों के साथ होने वाले अन्याय की खबरों की अनदेखी होती है।इसकी आरंभिक दर्जनभर संपादकीय टिप्पणियां उन्होंने खुद लिखी थी। संपादकीय टिप्पणियों को मिलाकर उनके कुल 40 लेख इसमें छपे जिनमें खास तौर पर जातिगत गैर बराबरी के खिलाफ आवाज बुलंद की गई। मूकनायक अखबार किसी मतभेद के चलते अप्रैल 1923 में बंद हो गया। लेकिन इसके चार साल बाद, 3 अप्रैल 1927 को उन्होंने एक और मराठी अख़बार ‘बहिष्कृत भारत ‘ के नाम से शुरू किया, जो साल 1929 तक चलता रहा। वह न केवल समाज की बुराइयों के खिलाफ बोलते थे, बल्कि दलित समाज की कमजोरियों को भी समझते थे और उनके बारे में खुलकर बात करते थे, ताकि सुधार हो सके।

भीमराव अंबेडकर का मानना था कि कथित दलित समुदाय के व्यक्तियों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना खुद का मीडिया होना बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य के लिए उन्होंने 31 जनवरी 1920 को मराठी पत्रिका ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया था।

 20 मई 1927 को प्रकाशित ‘बहिष्कृत भारत’ के चौथे अंक की संपादकीय में उन्होंने ने जो लिखा कि पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए सरकारी नौकरियों में उन्हें प्रथम स्थान मिलना चाहिए। 3 जून 1927 को निकले इसके पांचवें अंक में उन्होंने भारतीय विद्यार्थियों के साथ भेदभाव पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और लिखा कि विदेश (विलायत) में पढ़ने जाने वाले ज़्यादातर अमीर लोगों के बच्चे होते हैं, जिनकी ज़िंदगी आसान होती है, इसलिए उनके लिए ज़्यादा सहानुभूति दिखाने की ज़रूरत नहीं है,उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग खुद अपने समाज में जाति भेद (वर्णभेद) को मानते हैं, अगर वही उसके खिलाफ शिकायत करें तो उनकी बात पर कौन ध्यान देगा?क्योंकि सच यह है कि उनके अंदर ही इतना भेदभाव है कि वे कथित दलितों को अपने समाज में बराबरी की जगह नहीं देते।

प्रमुख अंबेडकरवादी प्रकाशन, लेखक और हस्तियां 

उनके अलावा कई संपादक और लेखक इस परंपरा से जुड़े, जिन्होंने इस पत्रकारिता और प्रकाशन के संपादन में अपनी भूमिका निभाई। अंबेडकर की 2 और पत्रिकाएं साल 1928 से 1956 के बीच ‘समता’ जिसे बाद में ‘जनता’ नाम दिया गया और साल 1956 का ‘प्रबुद्ध भारत’ भी थीं।’बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ दोनों पाक्षिक थे, जबकि ‘प्रबुद्ध भारत’ साप्ताहिक था। पत्रकारिता के माध्यम से अंबेडकर ने न्याय, समानता, स्वतंत्रता, निष्पक्षता और बंधुत्व पर आधारित मानवतावादी सिद्धांतों को कायम रखा।आई ऑन डिज़ाइन में छपे लेख के मुताबिक,70 के दशक की शुरुआत में, कलाकार, प्रकाशक और कार्यकर्ता राजा ढाले ने ‘चक्रवर्ती’ नामक एक पॉकेट साइज पत्रिका को लगातार तेरह दिनों तक प्रकाशित किया। यह दलित साहित्य को बढ़ावा देने वाली सबसे महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में से एक थी।

70 के दशक की शुरुआत में, कलाकार, प्रकाशक और कार्यकर्ता राजा ढाले ने ‘चक्रवर्ती’ नामक एक पॉकेट साइज पत्रिका को लगातार तेरह दिनों तक प्रकाशित किया। यह दलित साहित्य को बढ़ावा देने वाली सबसे महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में से एक थी।

द सत्यशोधक में छपे एक लेख के मुताबिक,19वीं शताब्दी में भारत में प्रिंटिंग प्रेस तकनीक को अपनाने से लिखित सामग्री का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो गया, जिसके बाद मध्य और उच्च वर्ग के बुद्धिजीवियों ने पत्रकारिता में बढ़-चढ़कर भाग लिया।मराठी में इसका एक प्रारंभिक उदाहरण गोपाल हरि देशमुख थे, जिन्होंने साल 1848 से 1850 में प्रभाकर नामक एक साप्ताहिक में अपने शतपत्रों या टिप्पणी लेखों के माध्यम से बाल विवाह, दहेज और ब्राह्मण रूढ़िवादिता जैसी सामाजिक बुराइयों पर जोरदार विरोध किया।इसके अलावा साल 1873 में, 19वीं सदी के सबसे महान जाति-विरोधी नेता, जोतिराव फुले ने जाति व्यवस्था का विरोध करते हुए और ब्राह्मण वर्चस्व को सीधे चुनौती देते हुए एक गुलामगिरी  किताब लिखी।इसके बाद 20वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण सत्यशोधक पत्रकार-कार्यकर्ताओं में से एक मुकुंदराव पाटिल ने साल 1910 में अपना समाचार पत्र ‘दिनमित्र’ शुरू किया।

जमीनी नेटवर्क से डिजिटल प्लेटफॉर्म तक अंबेडकरवादी प्रेस की विरासत और चुनौतियां 

अंबेडकरवादी प्रेस ने ग्रासरूट नेटवर्क बनाया। पत्रिकाएं गांव-गांव तक पहुंचने लगी, जिसमें माध्यम से लोगों के बीच संवाद होता था और सामाजिक संगठन मजबूत होते थे। इसके साथ ही कुछ आत्मकथाएं भी लिखी गई, जिन्होंने दलित व्यक्तियों के जीवन और अनुभवों को जानने में मदद की। इसका एक उदाहरण साल 1950 के दशक में ओमप्रकाश वाल्मीकि की लिखित आत्मकथा ‘जूठन’ का देखा जा सकता है, जो भारत के सामाजिक ढांचे के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले समुदाय के दर्द, अपमान और गरीबी को सामने लाता है।इसके अलावा शरणकुमार लिंबाले की ‘द आउटकास्ट‘ महार समुदाय में पले-बढ़े एक व्यक्ति की भावनात्मक रूप से हिंसक आत्मकथा है, जिसमें वह अपने माता-पिता के न पाले जाने के कारण झेली गई पीड़ा का वर्णन करता है।ये आत्मकथाएं दलित इतिहास के मुख्यधारा के इतिहास में गायब आवाज़ों को जीवंत करती हैं।

आधुनिकता के इस दौर में अंबेडकरवादी प्रेस की परंपरा आज डिजिटल दलित जर्नलिज्म में जीवित है। द मूकनायक जैसे प्लेटफॉर्म जातिगत शोषण पर आधारित रिपोर्टिंग करते हैं। हालांकि सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनल और स्वतंत्र वेबसाइट्स ने पुरानी प्रेस की जगह ली है, जो पुरानी प्रेस की तरह ही जमीनी तौर पर लोगों से कनेक्शन बनाते हैं।लेकिन इसके साथ ही कई चुनौतियां भी उभरकर सामने आती हैं, जैसे सेंसरशिप, प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह और मुख्यधारा मीडिया में दलित प्रतिनिधित्व की कमी आदि। डी डब्ल्यू में साल 2023 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में भारत में लगभग 88 फीसदी पत्रकार कथित ऊंची जातियों से थे, और आज भी यह संख्या लगभग वैसी ही हैयानी इसमें ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है।अंबेडकरवादी प्रेस केवल एक ऐतिहासिक पहल नहीं था, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाला सामाजिक और वैचारिक आंदोलन है।उन्होंने जिस प्रेस की शुरुआत की, उसका उद्देश्य सिर्फ खबरें देना नहीं था, बल्कि समाज के सबसे हाशिए पर खड़े लोगों को आवाज़ देना, उन्हें जागरूक करना और बराबरी की लड़ाई के लिए संगठित करना था।

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