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“पापा, वह कल रात 9:00 बजे एक इंटरव्यू है, मुझे जाना होगा। 9:00 बजे यह कौन सा समय है? वह क्या है ना 6:00 बजे का इवेंट है तो 9:00 बजे का ही समय मिल पाया है। रात को इंटरव्यू लेने की जरूरत ही क्या है? पर पापा, समय को लेकर कब तक मैं काम को टालती रहूंगी। यह तो आपको भी पता है कि पत्रकारिता जगत में समय की कोई पाबंदी नहीं होती। हां, तो क्या ज़रूरत है किसी चैनल में काम करने की अखबार वाले में काम कर लो और घर बैठकर ही आर्टिकल लिखो। पापा, उसके लिए भी बाहर निकलना ही पड़ता है।”

पत्रकारिता कर रही बेटी और उसके पिता के बीच ना जाने ऐसे कितने तर्क और कुतर्क रोज़ होते हैं। कभी पिता को उसकी बेटी की फिक्र सताती है। तो कभी बेटी के ऊंचे-ऊंचे सपने इस बहस की वजह होते हैं। आधुनिक दौर में आज की सशक्त महिलाएं न केवल घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर अपना अस्तित्व निखार रही हैं, बल्कि देश की तरक्की में भी अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं। महिलाओं के प्रति भारतीय समाज का नज़रिया तो बदला है, लेकिन संकीर्णता की स्थिति अभी भी बरकरार है। हमारे समाज में अब लड़कियों को पढ़ने की आज़ादी तो मिल गई है और एक हद तक उन्हें बाहर जाकर काम करने की स्वतंत्रता भी मिल चुकी है। लेकिन फिर भी उन्हें क्या पढ़ना चाहिए और किस पेशे को अपनाना चाहिए यह तय करने की जिम्मेदारी हमारे समाज ने ही ले रखी है।

आमतौर पर मध्यम वर्गीय परिवार में एक लड़की को शिक्षा यानी टीचर बनने या फिर बैंकिंग वगैरह जैसे क्षेत्र को अपनाने की सलाह दी जाती है क्योंकि यह 9 टू 5 के जॉब कैटेगरी में बिल्कुल सटीक बैठता है। बाकी जो लड़कियां पत्रकारिता, राजनीति या फिर फिल्म जगत में जाएं तो उन्हें देखने के लिए इस पुरुष-प्रधान समाज का एक अलग नज़रिया होता है। उस नजरिए से समाज उन्हें अपने पैमाने पर तौलना शुरू करता है। उन पर तरह-तरह के तंज कसता है कि लड़की हाथ से निकल गई है, सिर्फ अपनी मनमानी करती है वगैरह-वगैरह। आज मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में लड़कियों की स्थिति के बारे में बात करना चाहूंगी। पत्रकारिता यानी वह विधा जिसके द्वारा हम समाज में की आवाज़ बनते हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी की समाज के लिए आवाज उठाने वालों की भी आवाज दबा दी जाती है।

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भारत में पत्रकारिता की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हिक्की गैजेट के संपादन से शुरू हुआ था। इस के संपादक एक पुरुष, जेम्स अगस्तस हिक्की‌‌ थे। फिर लगभग दो दशक बाद बीसवीं शताब्दी में होमी व्यारावाला भारत की पहली महिला पत्रकार बनीं। वह फोटोजर्नलिज्म में कार्यरत थी। तब से लेकर अब तक पत्रकारिता में महिलाओं की भागीदारी जरूर बढ़ी है लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में भी पुरुष-प्रधान सोच ही हावी है। इस पितृसत्तात्मक समाज में प्राचीन काल से ही ऐसी व्यवस्था लागू की जाती है जिनमें महिलाओं का अपने उत्थान के बारे में सोचना भी बेहद मुश्किल होता है। समाज से लड़कर, परिवार से लड़कर, जैसे- तैसे एक लड़की इस क्षेत्र में शामिल तो हो जाती है, पर अपना स्थान बना पाना उसके लिए इतना आसान नहीं होता है। उन्हें काम के लिए ना के बराबर सुविधाएं, अवसर और प्रोत्साहन दिया जाता है।

बातचीत के दौरान एक महिला से पता चला, जो कुछ सालों तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम भी कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि वहां की स्थिति पसंद न आने पर उस क्षेत्र को छोड़कर अब वह सोशल मीडिया स्ट्रेटजिस्ट और इनफ्लुएंसर, ऑल इंडिया रेडियो में बतौर एंकर और मीडिया-प्रोफेसर काम कर रही हैं। उन्होंने बताया की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बाहर से देखने में जितना ही आकर्षक है अंदर से उतना ही खोखला है। वहां पर महिलाओं को ज्यादातर बस एंकरिंग दे दी जाती है। उसके लिए भी उनके गुण से ज्यादा उनके रूप को तवज्जो दी जाती है। जिससे उस चैनल को देखने वाले दर्शकों की संख्या यानी कि व्यूवर्सिप बढ़ती है।

इस पितृसत्तात्मक समाज में प्राचीन काल से ही ऐसी व्यवस्था लागू की जाती है जिनमें महिलाओं का अपने उत्थान के बारे में सोचना भी बेहद मुश्किल होता है। समाज से लड़कर, परिवार से लड़कर, जैसे- तैसे एक लड़की इस क्षेत्र में शामिल तो हो जाती है, पर अपना स्थान बना पाना उसके लिए इतना आसान नहीं होता है।

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यूएन विमेन की साल 2019 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी के 20,000 अखबारों में केवल 20% औरतें ही आलेख लिखती हैं। वहीं, हिंदी अखबारों में मुखपृष्ठ पर केवल 5% औरतों द्वारा ही आलेख लिखवाया जाता है, अंग्रेजी अखबारों में यह संख्या 27% है। हिंदी अखबारों में केवल 3% ही लैंगिक मुद्दों को प्रस्तुत किया जाता है। लगभग 5% से भी कम महिलाएं हिंदी अखबारों में नेतृत्व का कार्य संभालती हैं। भारत में पत्रकारिता के शिक्षण-प्रशिक्षण क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति कुछ बेहतर है, 46.20 प्रतिशत महिलाएं हैं और 53.80 प्रतिशत पुरुष हैं। भारत में पत्रकारिता और जन संचार के संस्थानों का बुरा हाल है क्योंकि पाठ्यक्रम में यूजीसी ने लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए कोई विचार ही नहीं रखा है।

इंडियन इंस्टिटियूट ऑफ मास कम्युनिकेशन और इंस्टिटियूट फॅार स्डडीज़ इन सोशल डेवलपमेंट, 2020 के शोध अनुसार भारत में केवल 28 प्रतिशत महिला ऐंकर हैं- अंग्रेजी में बराबर-बराबर, हिंदी में 11 प्रतिशत और क्षेत्रीय भाषाओं में 24 प्रतिशत हैं। पैनल चर्चाओं में 86 प्रतिशत पैनेलिस्ट पुरुष होते हैं। 65 प्रतिशत पैनलों में महिलाएं होती ही नहीं हैं। न्यूज़ मीडिया में महिलाओं पर काम का भारी बोझ होता है और उन्हें फ्लेक्सी-टाइम भी नहीं मिल पाता। पुरुषों के समान काम करने पर भी उन्हें समान वेतन नहीं मिलता। 55.3 प्रतिशत को 10,000-30,000 वेतन मिलता है। एच आर पाॅलिसी महिला-विरोधी होती है। साथ में, पदोन्नति और छुट्टी देने के मामले में काफी भेदभाव किया जाता है। यह भी देखा गया कि अधिक महिला पत्रकारों को कला, संस्कृति और मनोरंजन के पृष्ठ या स्तम्भ संपादित करने का काम मिलता है। महिलाएं पदोन्नति या बीट दिये जाने के मामले में लैंगिक भेदभाव झेलती हैं। प्रबंधन के शीर्ष पदों पर केवल 13.8% महिलाएं पाई गईं। भारत में नेतृत्व कारी पदों पर केवल 21.7% महिलाएं हि पहुंच पाती है।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समस्या भी बेहद संगीन और गंभीर है। कार्यरत औरतों से सेक्सुअल फेवर्स के लिए उच्च पदों पर बैठे पुरुषों की ओर से मांग की जाती है। पिछले समय में भारत के कुछ जाने-माने संपादकों पर महिलाओं ने यौन हिंसा का आरोप लगाया था। काम के संदर्भ में लैंगिक भेदभाव, लैंगिक स्टीरियोटाइपिंग, भयभीत करना, कार्यस्थल पर पुरुष-प्रधानता का प्रदर्शन आम बात है। यही वजह है कि बाहर की चमक-दमक को देखकर काफी लड़कियां पत्रकारिता की पढ़ाई तो करती हैं. लेकिन यहां के खोखलेपन की वजह से बहुत कम ही लड़कियां इस क्षेत्र में अपना योगदान दे पाती हैं। उपयुक्त डाटा इस बात को बेहतर साबित करते हैं।

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तस्वीर साभार : The Economist

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